बृहत्संहिता: प्रथम भाग (आचार्य वराहमिहिर - विमला हिन्दी व्याख्या, पं. अच्युतानन्द झा)
Brihat Samhita Vol 1 with Vimala Hindi Commentary
आचार्य वराहमिहिर (टीकाकार: पं. अच्युतानन्द झा) द्वारा
पृष्ठ 157, कुल 728 में से
संदर्भ में पढ़ेंराहूचाराध्यायः ११७
तथा च वृद्धगर्गः—
येषां सोमो युगे ग्रस्तो विमर्दो यत्र वा भवेत्।
तेषां पीडां विजानीयात् मोक्षे शुभमथादिशेत्।। इति।।२८-३१।।
अथायनफलं दिक्फलं चाह श्लोकत्रयेण—
द्विजनृपतीनुदगयने विट्शूद्रान् दक्षिणायने हन्ति।
राहुरुदगादिदृष्टः प्रदक्षिणं हन्ति विप्रादीन्॥३२॥
म्लेच्छान् विदिक्स्थितो यायिनश्च हन्याद्धुताशसक्तांश्च।
सलिलचरदन्तिघाती याम्येनोदग्गवामशुभः ॥३३॥
पूर्वेण सलिलपूर्णां करोति वसुधां समागतो दैत्यः।
पश्चात् कर्षकसेवकबीजविनाशाय निर्दिष्टः ॥३४॥
यदि उत्तरायण में चन्द्र या सूर्य का ग्रहण हो तो ब्राह्मण और क्षत्रियों का नाश करता
है। दक्षिणायन में वैश्य और शूद्रों का नाश करता है। प्रदक्षिणक्रम से उत्तर आदि दिशाओं
(उत्तर, पूर्व, दक्षिण और पश्चिम) में राहु दिखाई दे तो क्रम से ब्राह्मण आदि का नाश
करता है। जैसे—उत्तर में ब्राह्मण, पूर्व में क्षत्रिय, दक्षिण में वैश्य और पश्चिम में शूद्र का
नाश करता है। विदिशा (ईशान, आग्नेय, नैर्ऋत्य और वायव्य कोण) में स्थित राहु
म्लेच्छ जाति, यायी और अग्नि से जीविका चलाने वाले (अग्निहोत्री आदि) का नाश
करता है। दक्षिण, उत्तर, पूर्व और पश्चिम दिशाओं के लिये पुनः विशेष फल कह रहे हैं।
यदि दक्षिण में राहु दिखाई दे तो जलचर और हस्तियों का नाश करता है। उत्तर में दिखाई
दे तो गाय-बैलों का नाश करता है। पूर्व में दिखाई दे तो भूमि को जल से पूर्ण करता है
तथा पश्चिम में दिखाई दे तो किसान, भृत्य और बीजों का नाश करता है।३२-३४।।
मकरादिराशिशट्कस्थेऽर्के उत्तरमयनम्। कर्कटादिराशिशट्कस्थेऽर्के दक्षिणमयनमिति।
उदगयने उत्तरायणे राहुर्दृष्टो द्विजान् ब्राह्मणान् नृपतीन् क्षत्रियांश्च निहन्ति। तथा विट्शूद्रान्
वैश्यान् शूद्रांश्च दक्षिणायने हन्ति घातयति। तथा च गर्गः—
उत्तरायणसन्दृष्टो ब्रह्मक्षत्रविनाशनः।
दक्षिणायनगो राहुर्वैश्यशूद्रविनाशनः।।
राहुरुदगादिदृष्ट इति। उदगादिषूत्तराद्यासु चतसृषु दिक्षु प्रदक्षिणेन राहुर्दृष्टो विप्रादीन्
ब्राह्मणादीन् हन्ति। एतदुक्तं भवति—सूर्ये चन्द्रे वा यद्युत्तरस्यां दिशि राहुः प्रग्रहणं करोति
तदा ब्राह्मणान् हन्ति। पूर्वस्यां दृष्टः क्षत्रियान् निहन्ति। दक्षिणस्यां दृष्टो वैश्यान् हन्ति।
पश्चिमायां दृष्टः शूद्रान्निहन्ति। अत्र यद्यप्यर्कचन्द्रयोर्दक्षिणोत्तरदिग्भागात् प्रग्रहणं न सम्भवति,
तथाप्याचार्येण पूर्वशास्त्रदृष्टत्वात् कृतम्। तथा च काश्यपः—
सौम्यायामागतो विप्रान् पूर्वस्यां क्षत्रजातयः।
वैश्यान् दक्षिणतो राहुर्हन्ति पश्चिमतोऽपरान्।।
CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA