सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
बृहत्संहिता: प्रथम भाग (आचार्य वराहमिहिर - विमला हिन्दी व्याख्या, पं. अच्युतानन्द झा)

बृहत्संहिता: प्रथम भाग (आचार्य वराहमिहिर - विमला हिन्दी व्याख्या, पं. अच्युतानन्द झा)

Brihat Samhita Vol 1 with Vimala Hindi Commentary

आचार्य वराहमिहिर (टीकाकार: पं. अच्युतानन्द झा) द्वारा

DevanagariHindipublished728 पृष्ठ

पृष्ठ 109, कुल 728 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 109

आदित्यचाराध्यायः ६९
इदानीं वैकृते फलमाह—
अप्राप्य मकरमर्को विनिवृत्तो हन्ति सापरां याम्याम् ।
कर्कटकमसम्प्राप्तो विनिवृत्तश्चोत्तरां सैन्द्रीम् ॥४॥
यदि मकर में नहीं प्रविष्ट होकर सूर्य दक्षिण तरफ लौट जाय तो पश्चिम और दक्षिण
दिशा में स्थित जनों का नाश करता है। यदि कर्क में प्रविष्ट नहीं होकर सूर्य उत्तर तरफ
लौट जाय तो पूर्व और उत्तर दिशा में स्थित जनों का नाश करता है॥४॥
अर्क आदित्यो मकरमप्राप्य मकरमगत्वा यदि विनिवृत्तो व्यावृत्तस्तदा सापरां याम्या-
मपरया पश्चिमया सह दक्षिणां दिशं हन्ति। तत्स्थान् जनान्नाशयतीत्यर्थः। तथा कर्कटकं
कुलीरमसम्प्राप्तोऽगतो यदि निवृत्तो भवति तदोत्तरामुदीचीं दिशं सैन्द्रीं सपूर्वां हन्ति। तत्स्थान्
जनान्नाशयतीत्यर्थः। तथा च गर्गः—
यदा निवर्ततेऽप्राप्तो धनिष्ठामुत्तरायणे।
आश्लेषां दक्षिणेऽप्राप्तस्तदा विन्द्यान्महद्भयम्॥ इति।
तथा च पराशरः—‘यद्यप्राप्तो वैष्णवमुद्गमार्गं प्रपद्यते। दक्षिणमाश्लेषां वा महा-
भयाय।’ इति॥४॥
अथाधिकतायां शुभमाह—
उत्तरमयनमतीत्य व्यावृतः क्षेमसस्यवृद्धिकरः ।
प्रकृतिस्थश्चाप्येवं विकृतगतिर्भयकृदुष्णांशुः ॥५॥
यदि सूर्य उत्तर अयन को अतिक्रमण करके (मकर में प्रविष्ट होकर) उत्तर तरफ
लौटे तो लोगों का कल्याण और धान्य की वृद्धि करता है। यहाँ पर उत्तरायण का ग्रहण
उपलक्षण है; किन्तु दक्षिणायन में भी इसी तरह का फल कहना चाहिये अर्थात् कर्क में
प्रविष्ट होकर सूर्य दक्षिण तरफ लौटे तो भी लोगों का कल्याण और सत्य की वृद्धि करता
है। प्रकृतिस्थित (गणितागत अयननिवृत्ति और पूर्वकथित वेधीय अयननिवृत्ति एक काल
में) होने पर ही पूर्वकथित फल ठीक घटता है तथा विकारयुक्त गति होने पर सूर्य लोगों
में भय उत्पन्न करता है॥५॥
उष्णांशुरादित्य उत्तरमयनमतीत्यातिक्रम्य मकरं प्राप्य पश्चाद्यदि व्यावृतो निवर्तितस्तदा
क्षेमसस्यवृद्धिकरो भवति। लब्धपालनं क्षेमं करोति, लोके सस्यानां च वृद्धिकरो भवति।
तस्य च दिनाधिक्यादुत्तरायणग्रहणमुपलक्षणार्थम्। दक्षिणमयनमप्येवं ज्ञेयम्। तथा प्रकृतिस्थः
स्वभावस्थश्चाप्येवं क्षेमसस्यवृद्धिकृद्भवति। एतदुक्तं भवति—स्फुटगणितेन यस्मिन् दिने-
ऽयननिवृत्तिर्ज्ञाता तस्मिन्नेव दिने यदि छायाप्रवेशनिर्गमचिह्नैर्महति मण्डले दृष्ट्या दृश्यते
तदा प्रकृतिस्थः। तथा च भगवान् वृद्धगर्गः—
अयने सुप्रभः स्निग्धः सेवते यदि भास्करः।
सुवृष्टिं च सुभिक्षं च योगक्षेमं च निर्दिशेत्॥
CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA