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सर्वकोश
बृहत्संहिता: प्रथम भाग (आचार्य वराहमिहिर - विमला हिन्दी व्याख्या, पं. अच्युतानन्द झा)

बृहत्संहिता: प्रथम भाग (आचार्य वराहमिहिर - विमला हिन्दी व्याख्या, पं. अच्युतानन्द झा)

Brihat Samhita Vol 1 with Vimala Hindi Commentary

आचार्य वराहमिहिर (टीकाकार: पं. अच्युतानन्द झा) द्वारा

DevanagariHindipublished728 पृष्ठ

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पृष्ठ 106

६६ बृहत्संहिता
भूपते राज्ञः। सबलस्य बलसहितस्य। स्वयशोऽभिविवृद्धये आत्मीयकीर्तिवृद्ध्यर्थम्।
आप्तः शास्त्रज्ञाततत्त्वार्थः। दैवविद्दैवज्ञो यथा हितमिच्छति श्रेय आकाङ्क्षते। तथा न पिता
जनक इच्छति न जननी माता न स्वजनो बन्धुजनो न सुहृन्मित्रं तथा हितमिच्छतीति।।४०।।
आवन्तरचित्ते सांवत्सरसूत्रमहोदधौ।
अर्थिनामुत्पलश्चक्रे स्वाप्तये विवृत्तिप्लवम्।। इति।।४०।।
इति श्रीभट्टोत्पलविरचितायां संहिताविवृतौ
सांवत्सरसूत्रनामाध्यायो द्वितीयः ॥२॥
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