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बृहत्पाराशर होरा शास्त्र (महर्षि पराशर - सम्पूर्ण फलित ज्योतिष महाकोश सान्वय सटीक)

Brihat Parashara Hora Shastra of Maharshi Parasara with Commentary

महर्षि पराशर (टीकाकार: पं. गणेशदत्त पाठक / सीताराम झा) द्वारा

DevanagariHindipublished800 पृष्ठ

३८२ बृहत्पाराशरहोराशास्त्रम्
अथ शताब्दिकादशाज्ञानाय चक्रम्—

सू.चं.शु.बु.बृ.मं.श.ग्रहाः
५५१०१०२०२०३०वर्षाणि
रे.अ.भ.कृ.रो.मृ.आ.
पुन.पु.श्ले.म.पू.फा.उ.फा.ह.नक्षत्राणि
चि.स्वा.वि.अनु.ज्ये.मू.पू.षा.
उ.षा.श्र.ध.श.पू.भा.उ.भा.+

इति शताब्दिका दशा।
अथ चतुरशीत्यब्दिकां दशामाह—
रविश्चन्द्रः कुजः सौम्यो जीवः शुक्रः शनैश्चरः।
तमध्वजौ विना सर्वे ग्रहा द्वादश हायनाः॥३५॥
रवि, चन्द्र, भौम, बुध, गुरु, शुक्र और शनि की राहु-केतु को छोड़कर
१२, बारह वर्ष की दशा होती है॥३५॥
षवनाज्जन्मभं यावत्सप्ततष्टे दशा भवेत्।
चतुरशीतिका ज्ञेया कर्मेशे कर्मसंस्थिते॥३६॥
स्वाती से जन्मनक्षत्र तक गिनकर सात से भाग दें, शेष तुल्य सूर्यादि
की दशा होती है। इसे चतुरशीत्यब्दिका (८४ वर्ष की) दशा कहते हैं।
यदि कर्मेश कर्मस्थान में हो तो उस समय इस दशा को लेना चाहिए॥३६॥
अथ चतुरशीत्यब्दिकादशाचक्रम्—

सू.चं.मं.बु.बृ.शु.श.ग्रहाः
१२१२१२१२१२१२१२वर्षाणि
स्वा.वि.अनु.ज्ये.मू.पू.षा.उ.षा.
श्र.ध.श.पू.भा.उ.भा.रे.अ.
भ.कृ.रो.मृ.आ.पुन.पु.नक्षत्राणि
श्ले.म.पू.फा.उ.फा.ह.चि.+

इति चतुरशीत्यब्दिका दशा।

अथ दशाध्यायः ३८३
अथ द्विसप्ततिकां दशामाह-
लग्नेशे सप्तमे यत्र लग्ने वै मदनाधिपे।
चिन्तनीया दशा तत्र द्व्यधिका सप्ततिः समाः ।।३७।।
यदि लग्नेश सप्तम में हो और सप्तमेश लग्न में हो तो द्विसप्ततिका
(७२ वर्ष की) दशा से फल विचारना चाहिए।।३७।।
नव वर्षाणि सर्वेषां विकेतूनां ग्रहात्मनाम् ।
मूलाज्जन्मर्क्षपर्यन्तं गणयेदष्टभिर्हरेत् ।
शेषे दशा विचिन्त्या च फलं तस्माद्विचारयेत् ।।३८।।
मूल नक्षत्र से जन्मनक्षत्र तक गिनकर ८ से भाग देने से शेष तुल्य केतू
को छोड़कर सूर्यादि ग्रहों की ९ नव वर्ष की दशा होती है।।३८।।
अथ द्विसप्ततिकादशाचक्रम्-

सू.चं.मं.बु.बृ.शु.श.रा.ग्रहाः
९९९९९९९९वर्षाणि
मू.<br>रे.<br>पु.<br>वि.पू.षां.<br>अ.<br>श्ले.<br>अनु.उ.षा.<br>भ.<br>म.<br>ज्ये.श्र.<br>कृ.<br>पू.फा.ध.<br>रो.<br>उ.फा.श.<br>मृ.<br>ह.पू.भा.<br>आ.<br>चि.उ.भां.<br>पुन.<br>स्वा.नक्षत्राणि

इति द्विसप्ततिका दशा।
अथ षष्ट्यब्दिकां दशामाह-
यदार्को लग्नराशिस्थश्चिन्त्या षष्टिसमा दशा।
दास्त्रास्त्रयं चतुष्कं च त्रयं वेदं पुनः पुनः।।३९।।
यदि सूर्य जन्मलग्न में हो तो षष्टिहायनी (६० वर्ष की) दशा का
विचार करना चाहिए। अश्विनी नक्षत्र से ४ नक्षत्र के बाद ३ नक्षत्र, पुनः
४ नक्षत्र, फिर ३ नक्षत्र इस क्रम से ।।३९।।
गुर्वर्कभूसुतानां च वर्षाणि दिङ्मितानि च।
ततः शशिज्ञशुक्रार्कपुत्रागूनां समाश्च षट् ।।४०।।
गुरु, सूर्य, भौम, दश-दश वर्ष, इसके बाद चन्द्रमा, बुध, शुक्र, शनि,
और राहु की ६-६ वर्ष की दशा होती है।।४०।।

३८४ बृहत्पाराशरहोराशास्त्रम्
अथ षष्टिहायनीदशाचक्रम्-

सू.गु.मं.चं.बु.शु.श.रा.ग्रहाः
१०१०१०६६६६६वर्षाणि
श्र.रो.फा.स्वा.ज्ये.श्र.पू.भा.
भ.मृ.श्ले.उ.फा.वि.मू.ध.उ.भा.नक्षत्राणि
कृ.आ.म.ह.घ.पू.षा.श.रे.
पुन.चि.उ.षा.
इति षष्टिहायनी दशा।
अथ षट्त्रिंशतिकां दशामह-
श्रवणाज्जन्मभं यावद्गणयेदष्टभिर्भजेत्।
शशाङ्कार्कसुरेज्य secret/कार्कजौशुक्रराहवः ॥४१॥
श्रवण नक्षत्र से जन्मनक्षत्र तक गिनकर ८ से भाग देने से शेषतुल्य
क्रम से चन्द्र, सूर्य, गुरु, भौम, बुध, शनि, शुक्र, राहु की दशा होती
है॥४१॥
एकौपंचयतश्चैकाद्वर्षाण्येषां क्रमात्स्मृताः।
दिवसे सूर्यहोरायां रात्रौ वै चन्द्रहोरके ॥४२॥
और १ से एक अंक के वृद्धि तुल्य इनकी दशा का वर्ष होता है। दिन
में सूर्य की होरा में और रात में चन्द्र की होरा में जन्म हो तो यह दशा
लेनी चाहिए॥४२॥
अथ षट्त्रिंशदब्दिकां दशाचक्रम्-
चं.सू.बृ.मं.बु.श.शु.रा.ग्रहाः
:---::---::---::---::---::---::---::---::---:
१२३४५६७८वर्षाणि
श्र.ध.श.पू.भा.उ.भा.रे.अ.भ.
कृ.रो.मृ.आ.पुन.पु.श्ले.म.नक्षत्राणि
पू.फा.उ.फा.ह.चि.स्वा.वि.अनु.ज्ये.
मू.पू.षा.उ.षा.+++++
इति षट्त्रिंशदब्दिका दशा।

अथ दशाध्यायः ३८५
अथ कालदशामाह-
सन्ध्या पञ्चघटी प्रोक्ता दिनषष्ट्यंशनाडिका।
सूर्यबिम्बांदधः पूर्वं परस्तादुदयादपि ।।४३।।
दिन-रात्रि का मान ६० घटी होता है, इसका चार विभाग किया गया,
सूर्य के बिम्ब के आधा उदय के पहले ५ घटी और बाद में ५ घटी;
यों दोनों मिलाकर १० घटी की प्रातः सन्ध्या एवं अर्धास्त सूर्यबिम्ब के पूर्व
५ घटी तथा इसके पश्चात् ५ घटी अर्थात् १० घटी की सायं सन्ध्या
होती है।।४३।।
सन्ध्याद्वयं विंशत्याघटिकाभिः प्रकीर्त्तितम्।
दिनस्य विंशतिर्घट्यः पूर्णसंज्ञा उदाहृता।।४४।।
इस प्रकार से दोनों संध्यायें २० घटी की होती हैं। शेष दिन के २० घटी
की पूर्ण संज्ञा।।४४।।
निशायाम्मुग्धसंज्ञाश्च घटिका विंशतिश्च याः।।४५।।
सूर्योदयस्य या सन्ध्या खण्डाख्या दशनाडिकाः।।४५।।
और इसी प्रकार रात्रि के २० घटी की मुग्धा संज्ञा होती है। सूर्योदय
के सन्ध्या की खण्ड संज्ञा।।४५।।
अस्तकालस्य या सन्ध्या सुधाख्या दशनाडिकाः।
पूर्णमुग्धे गतघटीषड्गुणे नवधा लिखेत्।।४६।।
और सायंकाल की संध्या को सुधा कहा है। यदि पूर्णा या मुग्धा में
जन्म हो तो दोनों के गतघटी को ६ से गुणा कर एकत्र रख दें।।४६।।
तथा खण्डसुधासूर्ये हते तु नवधा लिखेत्।
विभक्तानीन्द्रिययुगैर्मानख्यानफलानि च।।४७।।
यदि खंड या सुधा में जन्म हो तो १२ से गुणाकर एकत्र रखकर दोनों
जगह ४५ से भाग देने से जो फल आवे उसें नव जगह रखकर।।४७।।
क्रमात्सूर्यादिकानां च मानमुक्तं मुनीश्वरैः।
स्वस्वमानं स्वसंख्याभिर्गुणिते स्युः समादयः।।४८।।
सूर्यादि ग्रहों की संख्या १,२ आदि से गुणा कर देने से उनके दशावर्षादि
होते हैं।।४८।।
उदाहरण- जैसे किसी का दिन इष्टकाल २।२६- है, इसमें से सूर्योदय
के संध्यामान घटी में घटा देने से शेष ७।४४ बचा, अतः खण्ड

३८६ बृहत्पाराशरहोराशास्त्रम्
दशा में जन्म हुआ। इसे ६ से गुणा करने से गुणनफल ४६।२४ हुआ।
इसमें ४५ से भाग देने से १।०।२४।०।१० इसे ९ जगह लिखकर
१,२,३,४,५,६,७,८,९ से गुणा करने से सूर्य आदि ग्रहों के क्रम से दशा
वर्ष हुए।
इति कालदशा।
अथ चक्रदशामाह-
राशीश्वराद्दशा ज्ञेया सूर्यादीनां क्रमात्पुनः।
दिवारात्रिस्तथा सन्ध्यात्रिकाले त्रिविधा दशा ।।४९।।
दिन, रात और संध्या के अनुसार राशी और राशीस्वर के अनुसार ३
प्रकार की दशा होती है।।४९।।
दिवालग्रेशस्थिताद्भाच्च रात्रौ लग्नश्रितात्तथा।।५०।।
सन्ध्यायां धनभावस्थाद् ज्ञेया चक्रदशा बुधैः ।।५०।।
दिन में जन्म हो तो लग्नेश जिस राशि में हो उस राशि से, रात में
जन्म हो तो लग्न में जो राशि हो उससे और संध्या में जन्म हो
तो द्वितीय भाव की राशि से सूर्यादि ग्रहों की दशा होती है।।५०।।
राशीनां दश वर्षाण्येकेकस्य दशा भवेत्।
क्रमाद् द्वादशराशीनां विज्ञातव्या द्विजोत्तम।।५१।।
क्रम से १२ राशियों की प्रत्येक का दश-दश वर्ष दशा का प्रमाण होता
है, इसे चक्रदशा कहते हैं।।५१।।
उदाहरण- दिन में जन्म है (पृ. २४ का चक्र देखो), लग्नेश शनि
वृश्चिक राशि में है, अतः वृश्चिक राशि से दशा का आरम्भ हुआ। स्पष्टार्थ
चक्र देखिए।

वृ.ध.म.कुं.मी.मे.वृ.मि.क.सिं.कं.तु.
१०१०१०१०१०१०१०१०१०१०१०१०
००००००००००००
००००००००००००
००००००००००००
००००००००००००
२०१३२३३३४३५३६३७३८३९३२१०३१३२३
३३३३३३३३३३३३
१८१८१८१८१८१८१८१८१८१८१८१८

इति चक्रदशा।

अथ दशाध्यायः ३८७
मतान्तर से चक्रदशा-
चक्राख्याथ दशां वक्ष्ये तवाग्रे द्विजनन्दन।
लग्नस्थस्य दशा चादौ ततो वित्तस्थितादयः।।१।।
यह दशा दो प्रकार की होती है। प्रथम भावस्थ ग्रह की और दूसरी
भावों की। हे द्विजनंदन ! मैं तुमसे चक्रदशा को कहता हूँ। पहले जन्मलग्न
में बैठे ग्रह की, उसके बाद धन आदि भावों में बैठे हुए ग्रहों की दशा होती
है।।१।।
द्वित्र्यादयो यदैकस्था तदा भागादयोऽधिकात्।
तत्रापि तुल्ये नैसर्गाद्बलात्सर्वाधिकस्य च।।२।।
यदि एक ही भाव में दो या तीन ग्रह हों तो उनमें जिसका अधिक अंश
हो उसका पहले, इसके बाद उससे न्यूनांश की दशा होती है। यदि
अंशादि भी समान हों तो नैसर्गिक बल जिसका अधिक हो उसी की पहले
दशा होगी।।२।।
राशिप्रमितवर्षाणि भागाह्नश्चानुपातः।
भावानामपि लग्नाच्च वर्षाणि दिङ्मितानि च।।३।।
जिस भाव में ग्रह है उस भाव की राशि से संख्या तुल्य वर्ष प्रमाण दशा
वर्ष और अंश से अनुपात द्वारा मासादि लेना चाहिए। भावों की दशा
जन्मलग्न से आरम्भ कर प्रत्येक भावों की दशा होती है। इनका दशा
वर्ष प्रत्येक भाव का दश-दश वर्ष का होता है।।३।।
भुक्ता दशाऽनुयाताद्वा विज्ञेया स्वस्वकल्पनात्।
अन्तर्दशापि सुधिया सूक्ष्मादेशाय चिन्तयेत्।।४।।
दशा का भुक्त अनुपात द्वारा लाना चाहिए। इसी प्रकार सूक्ष्म फल
कहने के लिए अन्तर्दशा का भी साधन करना चाहिए।।४।।
अथ कालचक्रदशामाह-
वन्देऽहं गोपिकानाथं भारतीं गणनायकम्।
पार्वत्यै कथिता पूर्वं कालचक्रं पिनाकिना।।५२।।
श्रीकृष्ण, सरस्वती एवं गणेशजी को प्रणाम कर जो कि शंकरजी ने
पार्वती से पूर्व में कालचक्र को कहा था।।५२।।
तच्चक्रसारमुद्धृत्य लघुमार्गेण कथ्यते।
शुभाशुभं मनुष्याणां भूतभव्यं च भावि तत्।।५३।।
उसके तत्त्व को लेकर लाघव से मैं कालचक्र को कह रहा हूँ, जो

३८८ बृहत्पाराशरहोराशास्त्रम्
मनुष्यों के भूत, वर्तमान और भविष्य के शुभ-अशुभ को बताने वाला
है।।५३।।
द्वादशारं लिखेच्चक्रं तिर्यगूर्ध्वं समानकम्।
गृहा द्वादश जायन्ते सव्यचक्रे यथाक्रमम् ।।५४।।
खड़ी और आड़ी रेखाओं से १२ कोष्ठ का चक्र बना के।।५४।।
द्वितीयादिषु कोष्ठेषु राशीन्मेषादिकाँल्लिखेत्।
एवं द्वादशराश्याख्यं कालचक्रमुदीरितम्।।५५।।
उसके दूसरे आदि कोष्ठ में मेषादि राशियों को लिखे। उनके आगे
कहे अनुसार नक्षत्रों का न्यास करे। इसी प्रकार एक दूसरा चक्र भी बनावे।
दोनों में एक की सव्य और दूसरे की अपसव्य कल्पना कर आगे
कहे हुए रीति के अनुसार राशि तथा नक्षत्रों का न्यासं करे। इसी को १२
राशि का कालचक्र कहते हैं।।५५।।
चक्रे नक्षत्रन्यासविधिः-
अश्विन्यादित्रयं चैव सव्यमार्गे प्रतिष्ठितम्।
रोहिण्यादि त्रयं चैव अपसव्ये यथाक्रमम् ।।५६।।
अश्विनी से तीन नक्षत्रं सव्य चक्र में, रोहिणी से ३ नक्षत्र अपसव्य चक्र
में।।५६।।
अश्विन्यादितिहस्तर्क्षमूलवाताहिवह्नयः।
विश्वर्क्षपूर्वाभाद्रं च रेवती सव्यतारकाः।।५७।।
पुनर्वसु से ३-३ नक्षत्र सव्य-अपसव्य चक्र में लिखने से सव्य चक्र
में अश्विनी, पुनर्वसु, हस्त, मूल, स्वाती, श्लेषा, कृत्तिका, उत्तराषाढ़,
पूर्वाभाद्रपद और रेवती- ये १० नक्षत्र सव्य चक्र में हुए।।५७।।
एतद्दशोडुपादानामश्विन्यादौ च वीक्षयेत्।
विशदस्तत्प्रकारस्तु कथ्यते शृणु पार्वति।।५८।।
इन नक्षत्रों के चरणों को अश्विनी के चरणों के समान ही देखना
चाहिए। इसका विशद प्रकार आगे कह रहा हूँ।।५८।।
देहजीवज्ञानप्रकारमाह-
देहजीवौ मेषचापौ दस्रादाद्यचरणस्य च।
मेषादि चापपर्यन्तं राशिपाश्च दशाधिपाः।।५९।।
अश्विनी नक्षत्र के पहले चरण मेष देह और धनराशि जीव संज्ञक होती
है और मेष से धन पर्यन्त नव राशियाँ (मेष, वृष, मिथुन, कर्क,

अथ दशाध्यायः ३८९
सिंह, कन्या, तुला, वृश्चिक, धन) और इनके स्वामी क्रम से दशाधीश होते
हैं।।५९।।
देहजीवौ नक्रयुग्मौ दिगीशार्काष्टभूधराः।
षड्वेदशरलोकानां राशिपाश्च दशाधिपाः।।६०।।
अश्विनी के दूसरे चरण में मकर देह और मिथुन जीव संज्ञक होता
है और १०, ११, १२, ८, ७, ६, ४, ५, ३ राशियों अर्थात् मकर, कुम्भ,
मीन, वृश्चिक, तुला, कन्या, कर्क, सिंह और मिथुन के स्वामी दशाधिपति
होते हैं।।६०।।
दास्त्रादि दशताराणां तृतीयचरणेषु च।
गौर्देहो मिथुनं जीवो द्वेकार्केशदशाङ्ककाः।।६१।।
क्वक्षिरामाख्यनाथास्ते दशाधिपतयः क्रमात्।
अश्विन्यादिदशोडूनां चतुर्थचरणेषु च।।६२।।
अश्विनी आदि १० नक्षत्रों के ३ रे चरण में वृष देह और मिथुन राशि
जीव संज्ञक होती है और २, १, १२, ११, १०, ९, १, २, ३ राशियों
के स्वामी क्रम से दशा के स्वामी होते हैं। अश्विनी आदि १० नक्षत्रों के
चौथे चरण में।।६२।।
कर्कमीनौ देहजीवौ कर्कादिनवमेश्वराः।
दशाधिपाश्च विज्ञेया श्रृणु पार्वति निश्चितम् ।।६३ ।।
कर्क देह और मीन राशि जीव संज्ञक होती है और कर्क से मीन पर्यन्त
९ राशियों के स्वामी दशेश होते हैं।।६३।।
याम्येज्यचित्रातोयर्क्ष उत्तराभाद्रपदांस्तथा।
एतत्पञ्चजोडुपादानां भरण्यादौ च वीक्षयेत् ।।६४।।
भरणी, पुष्य, चित्रा, पूर्वाषाढ़, उत्तराभाद्रपद इन पाँच नक्षत्रों के चरणों
का भरणी नक्षत्र के समान ही विचार करना चाहिए।।६४।।
याम्यप्रथमपादस्य देहजीवावलिर्झषः।
नागागर्तुपयोधीषु रामाक्षीन्द्वर्कभेश्वराः।।६५।।
भरणी के प्रथम चरण में वृश्चिक देह और मीन राशि जीव संज्ञक
हैं। ८।७।६।४।५।३।२।१।१२ राशियों के स्वामी क्रम से दशेश होते
हैं।।६५।।

३९० बृहत्पाराशरहोराशास्त्रम्
याम्यद्वितीयपादस्य देहजीवौ घटाङ्गने।
रुद्रदिङ्नन्दचन्द्राक्षिश्रामाब्धीषु दशेश्वराः।।६६।।
भरणी के दूसरे चरण में कुम्भ देह और कन्या जीव संज्ञक है।
११।१०।९।१।२।३।४।५।६ राशियों के स्वामी क्रम से दशेश होते
हैं।।६६।।
याम्यतृतीयपादस्य देहजीवौ तुलाङ्गने।
सप्ताष्टाङ्कदिगीशार्कगजाद्रिरसराशिपाः।।६७।।
भरणी के तीसरे चरण में तुला देह और कन्या जीव संज्ञक होते
हैं। ७।८।९।१०।११।१२।८।७।६ राशियों के स्वामी क्रम से दशेश होते
हैं।।६७।।
देहजीवौ कर्कचापौ चतुर्थचरणे स्मृतौ।
वेदबाणाग्निनेत्रेन्दुसूर्येशदशनन्दपाः ।।६८।।
भरणी के चौथे चरण में कर्क देह और धन राशि जीवसंज्ञक है।
४।५।३।२।१।१२।११।१०।९ राशियों के स्वामी क्रम से दशेश होते
हैं।।६८।।
सव्यमेवं विजानीयादपसव्यं तु कथ्यते।
द्वादशारं लिखेच्चक्रं तिर्यगूर्ध्वं समानकम्।।६९।।
उपर्युक्त सव्य चक्र को कहा, अब अपसव्य चक्र को कह रहा हूँ। १२
कोष्ठ का ऊपर-नीचे चक्र को लिखकर।।६९।।
द्वितीयादिषु कोष्ठेषु वृश्चिकाद्व्यस्तमालिखेत्।
प्राजापत्यमघेन्द्राग्निं श्रवणं च चतुष्टयम्।।७०।।
दूसरे आदि कोष्ठ में वृश्चिकादि उलटे राशियों को लिखे। उसमें
रोहिणी, मघा, विशाखा और श्रवण इन चार नक्षत्रों को लिखे।।७०।।
धातृवद्दीक्षयेद्देहजीवौ कर्कधनुर्धरौ।
नवदिग्रुद्रसूर्येन्दुनेत्राङ्गीष्वब्धिराशिपाः।।७१।।
उपर्युक्त चार नक्षत्रों में रोहिणी के समान ही देह-जीव का विचार करना
चाहिए। यथा रोहिणी के प्रथम चरण में कर्क देह और धन राशि जीवसंज्ञक
है। ९।१०।११।१२।१।२।३।५।४ राशियों के स्वामी दशेश होते हैं।।७१।।
धातृद्वितीयचरणे तुलास्त्रीदेहजीवकौ।
षष्ठसप्ताष्टार्करुद्रा दिगङ्कवसुसप्तपाः।।७२।।

अथ दशाध्यायः ३९१
रोहिणी के दूसरे चरण में तुला देह और कन्या जीव संज्ञक हैं।
६।७।८।१२।११।१०।९।८।७ राशियों के स्वामी दशेश होते हैं।।७२।।
धातृतृतीयचरणे देहजीवौ कुम्भाङ्गने।
षट्बाणाब्धिगुणाक्षीन्दुनन्ददिगुद्रराशिपाः।।७३।।
रोहिणी के तीसरे चरण में कुम्भ देह और कन्या जीव संज्ञक है।
६।५।४।३।२।१।९।१०।११ राशियों के स्वामी क्रम से दशेश होते
हैं।।७३।।
रोहिण्यन्तपदे देहजीवालिझषौ स्मृतौ।
सूर्येन्दुद्विगुणेष्वब्धितर्कशैलाष्टराशिपाः।।७४।।
रोहिणी के चौथे चरण में वृश्चिक देह और मीन जीव संज्ञक हैं।
१२।१।२।३।४।५।६।७।८ राशियों के स्वामी क्रम से दशेश होते
हैं।।७४।।
चान्द्ररौद्रभगार्य्यममित्रेन्द्रवसुवारुणम्।
एतत्ताराष्टकं चैव विज्ञेयं चान्द्रवत्क्रमात्।।७५।।
मृगशिरा, आर्द्रा, पूर्वाफाल्गुनी, उत्तराफाल्गुनी, अनुराधा, ज्येष्ठा, धनिष्ठा
और शतभिषा- इन आठ नक्षत्रों के देह-जीवादि को मृगशिरा के समान
समझना।।७५।।
देहजीवौ कर्कमीनौ मृगाद्यचरणस्य च।
व्यस्तमीनादि कर्कान्तं राशिपाश्च दशाधिपाः।।७६।।
मृगशिरा के प्रथम चरण में कर्क देह और मीन राशि जीव संज्ञक हैं।
मीन से उलटे कर्क पर्यन्त (१२।११।१०।९।८।७।७।६।५।४) राशियों
के स्वामी दशेश होते हैं।।७६।।
गौर्देहो मिथुनं जीवो इन्दुभस्य द्वितीयेके।
त्रिद्वेकाङ्कदिगीशार्कचन्द्रद्विभवनाधिपाः।।७७।।
मृगशिरा के दूसरे चरण में वृष देह और मिथुन राशि जीव संज्ञक
होती हैं। ३।२।१।९।१०।११।१२।१।२ राशियों के स्वामी दशेश होते
हैं।।७७।।
देहजीवौ नक्रयुग्मे मृगपादे तृतीयके।
त्रिबाणाब्धिरसागाष्टसूर्येशदशराशिपाः।।७८।।
मृगशिरा के तीसरे चरण में मकर देह और मिथुन राशि जीव संज्ञक
होती है। ३।५।४।६।७।८।१२।११।१० राशियों के स्वामी दशेश होते
हैं।।७८।।

३९२ बृहत्पाराशरहोराशास्त्रम्
मेषचापौ देहजीवाविन्दुभस्य चतुर्थके।
व्यस्तं चापादि मेषान्तं राशिपाश्च दशाधिपाः।।७९।।
मृगशिरा के चौथे चरण में मेष देह और धन जीव संज्ञक हैं। धन राशि
से मेष पर्यन्त विलोम (९।८।७।६।५।४।३।२।१) राशियों के स्वामी
दशेश होते हैं।।७९।।
एवं व्यस्ततरे ज्ञेयं देहजीवदशादिकम्।
स्पष्टं तवाग्रे कथितं पार्वति प्राणवल्लभे।।८०।।
हे पार्वति ! यह अपसव्य चक्र के देह-जीव आदि को तुम्हारे सामने
कहा।।८०।।
अथ दशावर्षाणि-
भूतैकविंशगिरयो नवदिक् षोडशाब्धयः।।८१।।
सूर्यादीनां क्रमादब्दाः राशीनां स्वामिनो वशात्।।८१।।
५ । १२ । ७ । ९ । १० । १६ । ४ यह क्रम से सूर्यादि ग्रहों के दशावर्ष राशियों
के अधिपति के क्रम से हैं। विशेष चक्र को देखिए।।८१।।
चक्रम्-
| मे. | वृ. | मि. | क. | सिं. | कं. | तु. | वृ. | ध. | म. | कुं. | मी. | राशयः |
| मं. | शु. | बु. | चं. | सू. | बु. | शु. | मं. | बृ. | श. | श. | बृ. | अधिपाः |
| ७ | १६ | ९ | २१ | ५ | ९ | १६ | ७ | १० | ४ | ४ | १० | दशावर्षाणि |
दशाज्ञानप्रकारमाह-
नरस्य जन्मकाले वा प्रश्नकाले यदंशकः।
तदादि नवपर्यन्तमायुषं परिचक्षते।।८२।।
मनुष्य के जन्मकाल वा प्रश्नकाल में नक्षत्र का जो अंश (चरण) हो
उससे आरम्भ करके नव (९) राशियों के वर्ष संख्या तुल्य उस मनुष्य
की आयु होती है।।८२।।
सम्पूर्णायुर्भवेदादावर्धमंशस्य मध्यमम्।
अपमृत्युसमं कष्टमंशान्ते चापरे जगुः।।८३।।
अन्य विद्वानों का कहना है कि नक्षत्र के चरण के आदि में जन्म
हो तो पूर्णायु, मध्य में आधी और अन्त में कष्ट वा अल्पायु होती है।।८३।।

अथ दशाध्यायः ३९३
नक्ष'चरणतः नवांशज्ञानम्—
ज्ञात्वैवं स्फुटसिद्धान्तं राश्यंशं गणयेद्बुधः।
अनुपातेन वक्ष्यामि तदुपायमतः परम्।।८४।।
इस सिद्धान्त को जानकर राशि के अंश की गणना करना चाहिए।
अब मैं अनुपात द्वारा उसके जानने का उपाय कह रहा हूँ।।८४।।
गततारा त्रिभिर्भक्ता शेषं चत्वारि संगुणम्।
वर्तमानपदेनाढ्यं राशीनामंशको भवेत्।।८५।।
गतनक्षत्र संख्या (अश्विनी से जन्मनक्षत्र के पूर्व नक्षत्र की संख्या) को
३ से भाग देने से जो शेष बचे उसे ४ से गुणाकर गुणनफल में जन्मनक्षत्र
वा वर्तमान नक्षत्र के वर्तमान चरण संख्या को जोड़ दे। जो संख्या हो वही
मेष से गिनने से नवांश होता है।।८५।।
उदाहरण— जैसे पुनर्वसु के प्रथम चरण में जन्म है तो गतनक्षत्र (आर्द्रा)
संख्या ६ में तीन से भाग देने पर शेष को ४ से गुणाकर उसमें पुनर्वसु
के प्रथम चरण की संख्या १ जोड़ने से १० मेष से गिनने से मेष ही का
नवांश हुआ।
चक्रे राशीनां वर्षयोगसंख्यामाह—
मेषगोयमकुलीरराशिषुस्वांशकेषु परमायुरुच्यते।
ज्ञानकं १०० मंद ८५ गज ८३ स्त्तदा ८६ क्रमात्त-
त्त्रिकोणभवनेषु तद्‌भवेत्।।८६।।
कालचक्र में स्थित मेषादि राशियों से मेषांश में १००, वृषांश में ८५,
मिथुनांश में ८३ और कर्कांश में ८६ वर्ष योग वा परमायु होता है।
इन राशियों के त्रिकोण (५।९) राशियों में भी यही वर्ष योग होते
हैं।।८६।।
स्पष्टार्थ चक्रम्—

मे.वृ.मि.क.सिं.कं.तु.वृ.ध.म.कुं.मी.अंशकाः
१००८५८३८६१००८५८३८६१००८५८३८६वर्षयोगः
विशेष— यहाँ ज्ञानकं मंदगज आदि शब्दों से 'कटपयवर्गभवैरिहः
अंकाः' इत्यादि के अनुसार अंकों को समझना चाहिए।

३९४ बृहत्पाराशरहोराशास्त्रम्
.दशारम्भज्ञानप्रकारमाह-
ये जीवा अंशके जाता गतनाडीपलेन तु।
तदंशस्य हताङ्कस्तु पञ्चभूमिविभाजिताः॥८७॥
मनुष्य का जन्म नक्षत्र के जिस चरण में हो उसके गत घटी-पल को
उसके वर्ष संख्या से गुणाकर गुणन फल में १५ का भाग देने से॥८७॥
एवं महादशारम्भे सूर्यादीनां यथाक्रमात्।
गणयेन्नवपर्यन्तमायुष्यं तत्प्रकीर्त्तितम्॥८८॥
लब्धि दशा का भुक्त वर्षादि होता है। इसे दशावर्ष में घटाने से भोग्य
वर्षादि होता है। इस प्रकार से दशा का आरम्भ होता है॥८८॥
.उदाहरण- किसी का पुनर्वसु नक्षत्र के तृतीय चरण में जन्म है। पुनर्वसु
सव्य नक्षत्र है। उसका देहाधिपति भौम और जीवाधिपति गुरु है। पुनर्वसु
का भभोग ५५।५२ भयात ३२।१० है। भभोग का चार भाग करने से एक
भाग घट्यादि १३।४८।१५ हुआ। यही एक चरण का मान है। इसे
दूना कर भयात से घटाने से शेष ४।१३।३० यह पुनर्वसु के तीसरे चरण
की भुक्त घट्यादि है। इसका दशा वर्ष १०० है, इससे शेष घट्यादि
को गुणा करने से ४००।१३००।३००० सवर्णन करने से ४२२।३०।१०
हुआ। इसमें १५ का भाग देने से २८।३।१८ वर्षादि जन्मकाल में भुक्त हुआ।
पुनर्वसु सव्य गणना में है, देहादि जीव पर्यन्त गणना होगी। अतः पुनर्वसु
प्रथम चरण में देह मेष और जीव धनु है। अतः भुक्त वर्षादि २८।३।१८
में मेष से वृष पर्यन्त के योग-वर्ष २३ को घटाने से ५।३।१८ यह
वर्षादि मिथुन के भुक्त वर्षादि हुए। अतः इसे बुध के वर्षमान ९ से घटाने
से ३।८।४२ वर्षादि भोग्य हुआ। अतः विंशोत्तरी दशा के समान ही
मिथुन आदि दशा का क्रम हुआ। शेष चक्र से स्पष्ट है।
कालचक्रदशा-

मि.क.सिं.कं.तु.वृ.ध.मे.वृ.
५<br>३<br>१८२१५९१६७१०७१६
२०१३२०१८२०३९२०४४२०५१२०६२२०७४२०८४२०९१२१०७
३७७७७७७७७७
१८०६१६१६१६१६१६१६१६१६

अथ दशाध्यायः ३९५

दशानां नक्षत्राणि तत्पादानि चनक्ष.पा.जीवाधिपाः१२३४५६७८९परमा. वर्षा.देहाधिपाःराश. अंशा
मृ. १च. अ. १च. पू. १च. घ. १च.मृगशिरा, पूर्वाफाल्गुनी, अनुराधा, धनिष्ठा१बृ.बृ. = १०व.श. = ४व.श. = ४व.बू. = १०व.मं. = ७व.शु. = १६व.बु. = ९व.सू. = ५व.चं. = २१व.८६चं.क.
मृ. २च. अ. २च. पू. २च. घ. २च.२बु.बु. = ९व.शु. = १६व.मं. = ७व.बृ. = १०व.श. = ४व.श. = ४व.बू. = १०व.मं. = ७व.शु. = १६व.८३शु.मि.
मृ. ३च. अ. ३च. पू. ३च. घ. ३च.३बु.बु. = ९व.सू. = ५व.चं. = २१व.बु. = ९व.शु. = १६व.मं. = ७व.बृ. = १०व.श. = ४व.श. = ४व.८५श.वृ.
मृ. ४च. अ. ४च. पू. ४च. घ. ४च.४बृ.बृ. = १०व.मं. = ७व.शु. = १६व.बु. = ९व.सू. = ५व.चं. = २१व.बु. = ९व.शु. = १६व.मं. = ७व.१००मं.मे.
आ. १च. ज्ये. १च. उ. १च. शत. १च.आर्द्रा, उत्तराफाल्गुनी ज्येष्ठा, शतभिषा१बृ.बृ. = १०व.श. = ४व.श. = ४व.बू. = १०व.मं. = ७व.शु. = १६व.बु. = ९व.सू. = ५व.चं. = २१व.८६चं.मी.
आ. २च. ज्ये. २च. उ. २च. शत. २च.२बु.बु. = ९व.शु. = १६व.मं. = ७व.बृ. = १०व.श. = ४व.श. = ४व.बू. = १०व.मं. = ७व.शु. = १६व.८३शु.कुं.
आ. ३च. ज्ये. ३च. उ. ३च. शत. ३च.३बु.बु. = ९व.सू. = ५व.चं. = २१व.बु. = ९व.शु. = १६व.मं. = ७व.बृ. = १०व.श. = ४व.श. = ४व.८५श.म.
आ. ४च. ज्ये. ४च. उ. ४च. शत. ४च.४बृ.बृ. = १०व.मं. = ७व.शु. = १६व.बु. = ९व.सू. = ५व.चं. = २१व.बु. = ९व.शु. = १६व.मं. = ७व.१००मं.ध.

३९६ बृहत्पाराशरहोराशास्त्रम्
अथ कालचक्रदशायां सव्यमार्गचक्रम्

दशानां नक्षत्राणि तत्पादानि चनक्ष.पा.देहाधी.१२३४५६७८९परमा. वर्षा.जीवाधिपाःराश. अंशाः
अ. १च. मू. १च. पुन. १च. पू. १च. ह. १च.अश्विनी, पुनर्वसु, हस्त, मूल, पूर्वाभाद्रपद१मं.मं. = ७व.शु. = १६व.बु. = ९व.चं. = २१व.सू. = ५व.बु. = ९व.शु. = १६व.मं. = ७व.बृ. = १०व.१०० वर्षबृ.मे.
अ. २च. मू. २च. पुन. २च. पू. २च. ह. २च.अश्विनी, पुनर्वसु, हस्त, मूल, पूर्वाभाद्रपद२श.श. = ४व.श. = ४व.बृ. = १०व.मं. = ७व.शु. = १६व.बु. = ९व.चं. = २१व.सू. = ५व.बु. = ९व.८५ वर्षबु.वृ.
अ. ३च. मू. ३च. पुन. ३च. पू. ३च. ह. ३च.अश्विनी, पुनर्वसु, हस्त, मूल, पूर्वाभाद्रपद३शु.शु. = १६व.मं. = ७व.बृ. = १०व.श. = ४व.श. = ४व.बृ. = १०व.मं. = ७व.शु. = १६व.बु. = ९व.८३ वर्षबु.मि.
अ. ४च. मू. ४च. पुन. ४च. पू. ४च. ह. ४च.अश्विनी, पुनर्वसु, हस्त, मूल, पूर्वाभाद्रपद४चं.चं. = २१व.सू. = ५व.बु. = ९व.शु. = १६व.मं. = ७व.बृ. = १०व.श. = ४व.श. = ४व.बृ. = १०व.८६ वर्षबृ.कं.
भ. १च. चि. १च. पु. १च. पू.षा. १च. उ.भा. १च.भरणी, पुष्य, चित्रा, पूर्वाषाढ़, उत्तराभाद्रपद१मं.मं. = ७व.शु. = १६व.बु. = ९व.चं. = २१व.सू. = ५व.बु. = ९व.शु. = १६व.मं. = ७व.बृ. = १०व.१०० वर्षबृ.सिं.
भ. २च. चि. २च. पु. २च. पू.षा. २च. उ.भा. २च.भरणी, पुष्य, चित्रा, पूर्वाषाढ़, उत्तराभाद्रपद२श.श. = ४व.श. = ४व.बृ. = १०व.मं. = ७व.शु. = १६व.बु. = ९व.चं. = २१व.सू. = ५व.बु. = ९व.८५ वर्षबु.क.
भ. ३च. चि. ३च. पु. ३च. पू.षा. ३च. उ.भा. ३च.भरणी, पुष्य, चित्रा, पूर्वाषाढ़, उत्तराभाद्रपद३शु.शु. = १६व.मं. = ७व.बृ. = १०व.श. = ४व.श. = ४व.बृ. = १०व.मं. = ७व.शु. = १६व.बु. = ९व.८३ वर्षबु.तु.
भ. ४च. चि. ४च. पु. ४च. पू.षा. ४च. उ.भा. ४च.भरणी, पुष्य, चित्रा, पूर्वाषाढ़, उत्तराभाद्रपद४चं.चं. = २१व.सू. = ५व.बु. = ९व.शु. = १६व.मं. = ७व.बृ. = १०व.श. = ४व.श. = ४व.बृ. = १०व.८६ वर्षबृ.वृ.

अथ कालचक्रदशायां सव्यमार्गाच्चक्रम्

दशानां नक्षत्राणि तत्पादानि चनक्ष.पा.जीवाधिपाः१२३४५६७८९परमावर्षा.देहाधिपाःराश. अंशाः
कृ. १च.उ.षा. १च.श्ले. १च.रे. १च.स्वा. १च.कृत्तिका, आश्लेषा, स्वाती, उत्तराषाढ, रेवती१मं.मं. = ७ व.शु. = १६ व.बु. = ९ व.चं. = २१ व.सू. = ५ व.बु. = ९ व.शु. = १६ व.मं. = ७ व.
कृ. २च.उ.षा. २च.श्ले. २च.रे. २च.स्वा. २च.२श.श. = ४ व.श. = ४ व.बृ. = १० व.मं. = ७ व.शु. = १६ व.बु. = ९ व.चं. = २१ व.सू. = ५ व.
कृ. ३च.उ.षा. ३च.श्ले. ३च.रे. ३च.स्वा. ३च.३शु.शु. = १६ व.मं. = ७ व.बृ. = १० व.श. = ४ व.श. = ४ व.बृ. = १० व.मं. = ७ व.शु. = १६ व.
कृ. ४च.उ.षा. ४च.श्ले. ४च.रे. ४च.स्वा. ४च.४चं.चं. = २१ व.सू. = ५ व.बु. = ९ व.शु. = १६ व.मं. = ७ व.बृ. = १० व.श. = ४ व.श. = ४ व.

अथ कालचक्रदशायामपसव्यमार्गाच्चक्रम्

दशानां नक्षत्राणि तत्पादानि चनक्ष.पा.जीवाधिपाः१२३४५६७८९परमावर्षा.देहाधिपाःराश. अंशाः
रो. १च.वि. १च.म. १च.श्र. १च.रोहिणी, मघा, विशाखा, श्रवण१बृ.बृ. = १० व.श. = ४ व.श. = ४ व.बृ. = १० व.मं. = ७ व.शु. = १६ व.बु. = ९ व.सू. = ५ व.चं. = २१ व.
रो. २च.वि. २च.म. २च.श्र. २च.२बु.बु. = ९ व.शु. = १६ व.मं. = ७ व.बृ. = १० व.श. = ४ व.श. = ४ व.बृ. = १० व.मं. = ७ व.शु. = १६ व.
रो. ३च.वि. ३च.म. ३च.श्र. ३च.३बु.बु. = ९ व.सू. = ५ व.चं. = २१ व.बु. = ९ व.शु. = १६ व.मं. = ७ व.बृ. = १० व.श. = ४ व.श. = ४ व.
रो. ४च.वि. ४च.म. ४च.श्र. ४च.४बृ.बृ. = १० व.मं. = ७ व.शु. = १६ व.बु. = ९ व.सू. = ५ व.चं. = २१ व.बु. = ९ व.शु. = १६ व.मं. = ७ व.

(पृष्ठ-शीर्षकः) अथ दशाध्यायः ३९७

३९८ बृहत्पाराशरहोराशास्त्रम्
अथ कालचक्रगतिभेदमाह-
प्रथमा गति मण्डूकी द्वितीया मर्कटी तथा।
बाणाच्च नवपर्यन्तं गतिः सिंहावलोकनम् ।।८८।।
कालचक्र की गति ३ प्रकार की होती है। पहली गति का नाम मण्डूकी
है, दूसरी का नाम मर्कटी और तीसरी का नाम सिंहावलोकन है।।८८।।
कन्यायां कर्कटे वापि सिंहभे मिथुनेऽपि च।
माण्डूकी गति विज्ञेया भवेद्रोगस्य कारणम् ।।८९।।
कन्या से कर्क में और सिंह से मिथुन में जाने को मण्डूकी गति कहते
हैं। इसमें रोग होता है।।८९।।
मीनवृश्चिकयोर्विप्र चापमेषस्तथैव च।
सिंहावलोकनं चैव तादृशं च फलं भवेत्।
सिंहावगतिमार्गे च मर्कटीगतिसम्भवः ।।९०।।
मीन से वृश्चिक में और धन से मेष में जाने को सिंहावलोकन गति
कहते हैं। नाम सदृश ही इसका फल होता है। सिंह से कर्क में
जाने को मर्कटी गति कहते हैं।।९०।।
गतिफलञ्चाह-
मीनात्तु वृश्चिके याते ज्वरो भवति निश्चितम्।
कन्यातः कर्कटे याते भ्रातृबन्धुविनाशनम् ।।९१।।
मीन से वृश्चिक प्राप्त हो तो उस दशा में निश्चय ही ज्वर होता है। कन्या
से कर्क प्राप्त हो तो उस दशा में माता और बन्धु का नाश होता है।।९१।।
सिंहात्तु मिथुने याते स्त्रिया व्याधिर्भवेद् ध्रुवम्।
कर्कटाच्च हरौ याते वधो भवति देहिनाम्।
पितृबन्धुमृतिं विद्याच्चापान्मेषगते पुनः ।।९२।।
सिंह से मिथुन प्राप्त हो तो इस दशा में स्त्री को रोग होता है। कर्क से
सिंह प्राप्त हो तो उस दशा में मनुष्य का वध होता है। धन से मेष
प्राप्त हो तो पिता के भाई (चाचा) की मृत्यु होती है।।९२।।
पुनः गतिफलमाह-
कन्यातः कर्कटे याते पूर्वभागे महत्फलम्।
उत्तरे देशमाश्रित्य शुभा यात्रा भविष्यति ।।९३।।

अथ दशाध्यायः . ३९९
कन्या से कर्क में जाने के समय पूर्वभाग से लाभ और उत्तर देश की
शुभकर यात्रा होती है।।९३।।
सिंहात्तु मिथुने याते पूर्वभागं विसृज्यते।
कार्यान्तेऽपि च नैर्ऋत्यां सुखं यात्रा भविष्यति ।।९४।।
सिंह से मिथुन में जाने के समय पूर्व दिशा को त्याग देना चाहिए। कार्य
हो जाने पर भी नैर्ऋत्य कोण की यात्रा से सुख होता है।।९४।।
कर्कटात्तु गते सिंहे कार्यहानिश्च जायते।
दक्षिणां दिशमाश्रित्य प्रत्यगामनं भवेत् ।।९५।।
कर्क से सिंह में जाने के समय दक्षिण दिशा में यात्रा करने से कार्य
की हानि होती है और दक्षिण से पश्चिम की यात्रा होती है।।९५।।
मीनात्तु वृश्चिके याते उदग्गच्छति सङ्कटम्।
चापाच्च मकरे विप्र दुःखं सङ्कटमुच्यते ।।९६।।
मीन से वृश्चिक में जाने के समय उत्तर की यात्रा से संकट होता है।
धन से मकर में जाने से दुःख और संकट होता है।।९६।।
चापान्मेषे तु यात्रायां वधबन्धो मृतिर्भवेत्।
तुला सम्पद्विवाहश्च स्त्रीप्राप्तिर्वृश्चिके गतिः ।।९७।।
धन से मेष में जाने के समय वध, बंधन और मृत्यु होती है। तुला
से वृश्चिक में जाने के समय सम्पत्ति, स्त्री की प्राप्ति होती है।।९७।।
अथ कालचक्रांशफलम्-
मेषांशे चोरको विन्द्याच्छ्रीमाञ्छुक्रांशके भवेत्।
बुधांशे ज्ञानसम्पन्नश्चन्द्रे च नृपतिर्भवेत् ।।९८।।
यदि कालचक्र की दशा में मेषांश में जन्म हो तो चोर होता
है। वृषांश में लक्ष्मीवान्, मिथुनांश में ज्ञानी, कर्कांश में राजा।।९८।।
सिंहांशे भूपतिः प्रोक्तः सौम्यांशे पण्डितो भवेत्।
तुलांशे राजमन्त्री च भौमांशे निर्धनो भवेत् ।।९९।।
सिंहाश में राजा, कन्यांश में पंडित, तुलांश में राजमन्त्री, [वृश्चिकां]श
में दरिद्र।।९९।।
चापांशे ज्ञानसंयुक्तो मकरांशे च पापकृत्।
कुम्भांशे च वणिक्कर्मा मीनांशे किल धान्यवान् ।।१००।।

४०० बृहत्पाराशरहोराशास्त्रम्
धन्वंश में बुद्धिमान्, मकरांश में पापी, कुम्भांश में व्यापारी और मीनांश
में धान्य से युक्त होता है।।१००।।
अथ देहजीवफलम्-
देहजीवसमायोगे भौमार्करविजादिभिः।
एकैकयोगे मरणं बहुयोगे तु का कथा।।१।।
यदि देह या जीव में कोई भी भौम, सूर्य, शनि में से किसी से युत
हो तो मरण होता है। यदि सभी से युक्त हो तो क्या कहना है।।१।।
देहयोगे महाबाधा जीवयोगे तु मृत्युदः।
द्वाभ्यां संयोगमात्रेण हन्यते नात्र संशयः।।२।।
देह में पापग्रह का योग हो तो महाबाधा होती है और जीव में पापयोग
हो तो मृत्यु होती है। यदि दोनों में पापयोग हो तो अवश्य मृत्यु होती
है।।२।।
देहे जीवे यदा राहुः सौरिर्वक्रो रविः स्थितः।
मृत्युकालगतिं ज्ञात्वा शान्तिं कुर्याद्यथाविधि ।।३।।
देह-जीव में जब राहु, शनि, भौम, सूर्य स्थित हों उस समय मृत्यु का
भय होता है। इसे जानकर शान्ति करनी चाहिए।।३।।
देहे जीवे यदि सोमे सौम्यजीवसितः स्थितः।
तदा सौख्यं प्रकुर्वन्ति रोगमृत्युविनाशनम् ।।४।।
देह-जीव में जब चन्द्रमा, बुध, गुरु, शुक्र होते हैं उस समय रोग
तथा मृत्यु का नाश कर सुख देते हैं।।४।।
पापक्षेत्रे दशायोगे देहजीवौ तु दुःखदौ।
शुभक्षेत्रे दशायोगे शुभयोगे शुभं भवेत् ।।५।।
देह-जीव पापक्षेत्र में हों और पापयुक्त हों तो उसकी दशा में दुःख होता
है। देह-जीव शुभक्षेत्र में हों और शुभयुक्त हों तो उसकी दशा में शुभ फल
होता है।।५।।
देहे शुभग्रहैर्युक्ते भूषणादि ध्रुवं भवेत्।
जीवे शुभग्रहैर्युक्ते पुत्रदारादिकाँल्लभेत ।।६।।
देह में शुभग्रह युक्त हों तो भूषण आदि का लाभ होता है। जीव शुभग्रह
से युक्त हो तो पुत्र-स्त्री आदि का लाभ होता है।।६।।
इति कालचक्रदशाज्ञानम्।

अथ दशाध्यायः ४०१
अथ चरदशानयनम्-
लग्नादि व्ययपर्यन्तं राशयो द्वादशो द्विज।
आयुर्वर्षप्रदातार एभिश्चरदशा मता।।७।।
लग्न से १२वें भाव पर्यन्त १२ राशियाँ होती हैं। ये आयु के वर्ष को
देने वाली होती हैं और इन्हीं से चरदशा भी होती है।।७।।
ओजर्क्षाणां क्रमाद्विप्र समानां व्युत्क्रमात्पुनः।
नाथान्तेन समाज्ञेया निर्विशङ्कं द्विजोत्तम।।८।।
ओज (विषम) राशियों का क्रम से और सम राशियों का व्युत्क्रम
से उस राशि के स्वामी पर्यन्त गिनने से दशा के वर्ष का मान होता
है।।८।।
मेषो वृषोऽथ मिथुनो तुलालिश्च धनुर्धरः।
एतेषामोजसंज्ञा स्यादब्दानां गणनाक्रमात्।।९।।
मेष, वृष, मिथुन, तुला, वृश्चिक, धन राशियों की ओज संज्ञा है और
इसमें वर्ष के गणना क्रम से गिनना चाहिए।।९।।
कर्कः सिंहश्च कन्या च नक्रकुम्भझषा द्विज।
एतेषां समसंज्ञा स्यादृक्षाणां व्युत्क्रमाद्द्विज।।१०।।
कर्क, सिंह, कन्या, मकर, कुंभ और मीन इन राशियों की सम संज्ञा
है। इनमें व्युत्क्रम गणना से वर्ष की संख्या को जानना चाहिए।।१०।।
स्वर्क्षसंस्थितखेटस्य वर्षाणि द्वादशैव हि।
धनस्थे चैकवर्षं हि तृतीये हायनद्वयम्।।११।।
ग्रह (राशीश) अपनी राशि में हो तो १२ वर्ष की दशा होती है। अपनी
राशि से धन भाव में हो तो १ वर्ष, तीसरे भाव में हो तो २ वर्ष।।११।।
तुर्ये वर्षत्रयं विप्र पञ्चमे तुर्यहायनम्।
रिपुस्थे पञ्चवर्षाणि षड्वर्षाणि च सप्तमे।।१२।।
चौथे में हो तो ३ वर्ष, पाँचवें में हो तो ४ वर्ष, छठे में हो तो ५ वर्ष,
सातवें में हो तो ६ वर्ष, आठवें में हो तो ७ वर्ष।।१२।।
रन्ध्रस्थे नगवर्षाणि चाष्टवर्षाणि पुण्यभे।
नभस्थे चाङ्कवर्षाणि दिग्वर्षाणि तु लाभगे।
व्ययस्थे रुद्रवर्षाणि राश्यङ्काश्च तथानघ।।१३।।