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सर्वकोश
बृहत्पाराशर होरा शास्त्र (महर्षि पराशर - सम्पूर्ण फलित ज्योतिष महाकोश सान्वय सटीक)

बृहत्पाराशर होरा शास्त्र (महर्षि पराशर - सम्पूर्ण फलित ज्योतिष महाकोश सान्वय सटीक)

Brihat Parashara Hora Shastra of Maharshi Parasara with Commentary

महर्षि पराशर (टीकाकार: पं. गणेशदत्त पाठक / सीताराम झा) द्वारा

DevanagariHindipublished800 पृष्ठ

पृष्ठ 89, कुल 800 में से

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पृष्ठ 89

अथ पातफलम् ९१
छठे भाव में हो तो जातक शत्रु का नाशक, शरीर से पुष्ट, सभी अस्त्रों
को धारण करने वाला, कला में निपुण और शान्त होता है॥६॥
धनदारसुतैस्त्यक्तः स्त्रीजितः कष्टजीविकः।
पाते कलत्रगे कामी निर्लज्जः परसौहदः॥७॥
सातवें भाव में पात हो तो धन, स्त्री, पुत्र से हीन, स्त्री से जीता
हुआ, कष्ट से जीविका प्राप्त करने वाला, कामी और शत्रुओं से मित्रता
करने वाला होता है॥७॥
विकलाङ्गो विरूपश्च दुर्भगो द्विजनिन्दकः।
मृत्युस्थाने स्थिते पाते रक्तपीडापरिप्लुतः॥८॥
आठवें भाव में पात हो तो अंगहीन, कुरूप, दरिद्र, ब्राह्मणनिंदक और
रक्तपीड़ा से युक्त होता है॥८॥
बहुव्यापारको नित्यं बहुमित्रो बहुश्रुतः।
धर्मभे पातसम्प्राप्तो स्त्रीप्रियज्ञः प्रियंवदः॥९॥
नवम भाव में पात हो तो अनेक व्यापार को करने वाला, अनेक मित्रों
वाला, अनेक शास्त्रों को जानने वाला, स्त्री को प्रिय और प्रिय बोलने
वाला होता है॥९॥
सश्रीको धर्मकृच्छ्रान्तो धर्मकार्येषु कोविदः।
कर्मस्थे पातसम्प्राप्ते महाप्राज्ञो विचक्षणः॥१०॥
दशम भाव में पात हो तो लक्ष्मी से युक्त, धार्मिक, शान्त, धर्मकार्य
में पंडित होता है॥१०॥
प्रभूतधनवान्मानी सत्यवादी दृढव्रतः।
अश्वाढ्यो गीतसंसक्तः पाते लाभगते सति॥११॥
एकादश भाव में हो तो बहुत बड़ा धनी, मानी, सत्य बोलने वाला, दृढ़-
प्रतिज्ञ, घोड़ा रखने वाला, गीत को जानने वाला होता है॥११॥
क्रोधी च बहुकर्माढ्यो व्यङ्गो धर्मस्य द्वेषकः।
व्ययस्थाने गते पाते विद्वेषी निजबन्धुभिः॥१२॥
बारहवें भाव में हो तो क्रोधी, अनेक कार्यों में संलग्न, अंगहीन,
धर्मनिंदक और अपने बंधुओं से विद्वेष करने वाला होता है॥१२॥
इति पातफलम्।