सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
बृहत्पाराशर होरा शास्त्र (महर्षि पराशर - सम्पूर्ण फलित ज्योतिष महाकोश सान्वय सटीक)

बृहत्पाराशर होरा शास्त्र (महर्षि पराशर - सम्पूर्ण फलित ज्योतिष महाकोश सान्वय सटीक)

Brihat Parashara Hora Shastra of Maharshi Parasara with Commentary

महर्षि पराशर (टीकाकार: पं. गणेशदत्त पाठक / सीताराम झा) द्वारा

DevanagariHindipublished800 पृष्ठ

पृष्ठ 775, कुल 800 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 775

शास्त्र फलं तथा शास्त्र परम्परा । ७६३
त्रयोदशे तथा भाग्यं कलांशादि फलं द्विज ।
चतुर्दशेऽब्दचर्या च विजानीहि ततः परम् ।।१२।।
अब्दचर्या फलं पश्चान्मासचर्या फलं ततः ।
दिनचर्या ततः प्रश्न जातकं प्रब्रवीति हि ।।१३।।
अध्यायानुक्रमं पश्चाद्विंशे शास्त्रफलं द्विज ।
एवं होराशताध्यायी सर्वपाप प्रणाशिनी ।
युगेषु च चतुर्ष्वेव प्रत्यक्षफलदायिनी ।।१४।।
स्पष्ट ही है।।८-१४।।
इति पाराशर होरायामुत्तरार्धे एकोनविंशतितमोऽध्यायः ।।१९।।
शास्त्र फलं तथा शास्त्र परम्परा ।।२०।।
होराशास्त्रमिदं सर्वं श्रद्धाविनयसंयुतः ।
श्रुत्वा गुरुमुखादेव बुद्धिमानवलोक्य च ।।१।।
इस होराशास्त्र को बुद्धिमान् श्रद्धा विजय से युक्त होकर गुरु के मुख से सुनकर
और देखकर ।।१।।
यो यानाति सशास्त्रार्थं सर्वपापैः प्रमुच्यते ।
श्रावयेद्दर्शयेद्विद्वानन्यो गर्गो द्विजोत्तमः ।।२।।
सर्वपापविनिर्मुक्तोब्रह्मलोकं स गच्छति ।
जो शास्त्र के अर्थ को जानता है वह सभी पापों से छूट जाता है और ऐसा
विद्वान दूसरे को सुनाता और दिखाता है वह दूसरा गर्ग होता है और सभी पापों
से मुक्त होकर ब्रह्मलोक को जाता है।।२।।
वेदेभ्यश्चसमुद्धृत्यब्रह्मा प्रोवाच विस्तृतम् ।।३।।
यह वहीं वेदाङ्ग और वेद का नेत्ररूपी शास्त्र है जिसे ब्रह्माजी ने वेद से निकाल
कर गर्गऋषि को बताया था और गर्गजी से मैंने सुना ।।३।।
शास्त्रमाद्यं तदेवेदं वेदाङ्गं वेदचक्षुषी ।
गार्गस्तस्मादिदं प्राह मया तस्माद्यथातथा ।।४।।
तदुक्तं तव मैत्रेय शास्त्रमाद्यंतमेव हि ।।५।।
हे मैत्रेय ! उसी शास्त्र को आद्यंत मैंने तुमसे कहा है ।।१-५।।
इति पाराशरहोरायामुत्तरार्धे विंशोऽध्यायः ।।२०।।