बृहत्पाराशर होरा शास्त्र (महर्षि पराशर - सम्पूर्ण फलित ज्योतिष महाकोश सान्वय सटीक)
Brihat Parashara Hora Shastra of Maharshi Parasara with Commentary
महर्षि पराशर (टीकाकार: पं. गणेशदत्त पाठक / सीताराम झा) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंराशिदृष्टिभेदाध्यायः ७९
अपसव्यगणना सव्यगणना
३ २ पूर्व १ १२ १२ १ पूर्व २ ३
४ उत्तर ५ ११ दक्षिण १० ११ उत्तर १० ४ दक्षिण ५
६ ७ पश्चिम ८ ९ ९ ८ पश्चिम ७ ६
इति राशिदृष्टिभेदम्।
अथ ग्रहाणां दृष्टिचक्रमाह—
होराशास्त्रे मित्रदृष्टिः खेटानां च परस्परम्।
त्रिदशे च त्रिकोणे च चतुरस्रे च सप्तमे ॥१७॥
होराशास्त्र में ग्रहों की भिन्न-भिन्न दृष्टियाँ कही गई हैं, वो इस प्रकार हैं॥
ग्रह अपने स्थान से ३।१०, ९।५, ४।८।७ स्थान को देखते हैं॥१७॥
शनिर्देवगुरुर्भौमः परे च वीक्षणेऽधिकाः।
पदार्धं त्रिपदं पूर्णं वदन्ति गणकोत्तमाः ॥१८॥
शनिपादं त्रिकोणेषु चतुरस्रे द्विपादकम्।
त्रिपादं सप्तमे विप्र त्रिदशे पूर्णमेव हि ॥१९॥
किन्तु शनि ९।५ स्थान को १ चरण से, ४।८ स्थान कौ २ चरण
से, सातवें को ३ चरण से और ३।१० स्थान को पूर्णदृष्टि सौ देखता
है॥१८-१९॥
चतुरस्रे गुरुः पादं सप्तमे च द्विपादकम्।
त्रिपादं त्रिदशे विप्र पूर्णं पश्यति कोणभे ॥२०॥
गुरु अपने स्थान से ४।८ भाव को १ चरण सो, ७ स्थान कौ २ चरण
से, ३।१० को ३ चरण से और ९।५ स्थान को पूर्णदृष्टि सौ देखता है॥२०॥
सप्तमे पादमेकं च द्विपादं त्रिदशे द्विज।
त्रिपादं च त्रिकोणेषु भौमः पूर्णं चतुरस्रगो ॥२१॥