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सर्वकोश
बृहत्पाराशर होरा शास्त्र (महर्षि पराशर - सम्पूर्ण फलित ज्योतिष महाकोश सान्वय सटीक)

बृहत्पाराशर होरा शास्त्र (महर्षि पराशर - सम्पूर्ण फलित ज्योतिष महाकोश सान्वय सटीक)

Brihat Parashara Hora Shastra of Maharshi Parasara with Commentary

महर्षि पराशर (टीकाकार: पं. गणेशदत्त पाठक / सीताराम झा) द्वारा

DevanagariHindipublished800 पृष्ठ

पृष्ठ 765, कुल 800 में से

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पृष्ठ 765

प्रश्नाध्यायः । ७५३
जन्मलग्नं समासाद्य यद्यत्प्रोक्तं तु जातके ।
तत्सर्वं प्रश्न लग्नेन प्रश्नकालाद्वदेद्बुधः ।।२२।।
इसका विचार कर जन्मलग्न से जिस प्रकार विचार किये जाते हैं उसी प्रकार
यहां भी सभी बातों का विचार करे।।१७-२२।।
आरूढ़लग्नादायुर्निर्णयः-
यत्कालावधिलग्नं तत्तत्कालावधिस्थिते ।
तेषां बलवतां चैव निर्णयः स्वायुषाः स्मृतः ।।२३।।
तात्कालिक लग्न की जितने काल पर्यन्त स्थिति है उतनी ही आयुष्य की स्थिति
होती है।।२३।।
आद्यद्रेष्काणमंत्यं च मृत्युदं च क्रमाद्भवेत् ।
मृगालिकर्कटानां च मीनस्यारूढ़लग्नतः ।।२४।।
मकर, वृश्चिक और कर्क तथा मीन राशि का आरूढ़ लग्न से प्रथम और अंत
द्रेष्काण हो तो मृत्युदायक होता है।।२३-२४।।
मृत्युलक्षणम् -
लग्ने पृष्टोदये क्रूरवेश्मास्तव्यगा यदि ।
धनेधर्मे कुजे मंदे चन्द्रे रंध्रे मृतिर्भवेत् ।।२५।।
यदि पृष्ठोदय राशि में प्रश्न हो और पापग्रह लग्न से ४।७।१२ वें स्थान
में हों अथवा भौम २।९ भाव में हो शनि चंद्र ८ भाव में हों तो मृत्यु होती है।।२५।।
योगान्तरम् -
पापैदुरुधो जाते लग्नकामसुहृत्स्थिते ।
चन्द्रेऽर्के च विलग्नस्थे म्रियतेव्याधिना भृशम् ।।२६।।
राहुकाल समायोगेमरणं निश्चितं भवेत् ।
प्रश्न लग्न वा जन्म लग्न में पापग्रह से दुरूधरा योग हो अथवा लग्न ७।४
भाव में पापग्रह हों और सूर्य लग्न में हो राहु काल का योग हो तो निश्चय ही व्याधि
से मृत्यु होती है।।२६।।
राहुकालसमायोगलक्षणम् -
भेषाद्व्युत्क्रमतो राहुर्वृषात्कालः क्रमाच्चरेत् ।।२७।।
राशौ राशौ तु पंचाशद्भोगकालोविनाडिकाः ।
अर्कोदयादितश्चोभौ भुंजाते च पुनः पुनः ।।२८।।