बृहत्पाराशर होरा शास्त्र (महर्षि पराशर - सम्पूर्ण फलित ज्योतिष महाकोश सान्वय सटीक)
Brihat Parashara Hora Shastra of Maharshi Parasara with Commentary
महर्षि पराशर (टीकाकार: पं. गणेशदत्त पाठक / सीताराम झा) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअथ वर्षचर्यादिफलाध्यायः । ७४१
गुरोः फलम् -
गुरुः शुभैस्तु संदृष्टो धर्मकार्योद्यमं सुखम् ।
जयं धनायतिमित्रैर्दारक्षेत्रादिसंग्रहम् ।।७२।।
गुरु शुभग्रह से देखे जाते हों तो धर्मकार्य में उद्यमशील और सुखी हो, विजयी :
और धनी हो, मित्रग्रह से दृष्ट हो तो स्त्री, भूमि आदि का संग्रही ।।७२।।
शत्रुभिः कुष्ठरोगं च त्वग्दोषकलहं रणम् ।
पापैः पराजयं बुद्धेः कुदारादिवियोजनम् ।।७३।।
शत्रुग्रहों से दृष्ट हो तो चर्मरोग कुष्ठरोग कलह और संग्राम, पापग्रह से दृष्ट
हो तो बुद्धि दोष से पराजय सुख, स्त्री आदि से वियोग हों।।७२-७३।।
भृगोः फलम् -
शुभैः शुक्रः सुखं योषालाभं भूषाधनायतिम् ।
मित्रैस्तु पट्टवंथादि देशलाभादि चाखिलम् ।।७४।।
शुक्र शुभग्रहों से दृष्ट हो तो सुख, स्त्री लाभ आभूषण, धन का लाभ हो,
मित्रग्रह से दृष्ट हो तो पट्टबंधन, देश का लाभ।।७४।।
पापैः पराजयं योषावियोगं धननाशनम् ।
शत्रुभिर्याप्यरोगं च मूत्रकृच्छादिकं तथा ।।७५।।
पापग्रह से दृष्ट हो तो पराजय, स्त्री वियोग और धन का नाश होता है, शत्रुग्रहों
से दृष्ट हो तो कष्टसाध्य रोग, मूत्रकृच्छ्र (सूजाक) रोग हो।।७५।।
मंदः पापैस्तथा कुक्षिरोगं बंधनकं क्षयम् ।
शत्रुभिः शत्रुबाधां च पराभवमथामयम् ।।७६।।
शनि पापग्रहों से देखा जाता हो तो कुक्षिरोग, बंधन और क्षय होता है। शत्रुओं
से देखा जाता हो तो शत्रुबाधा, पराभव और व्याधि होती है।।७६।।
अथ स्थानबलयुक्तसूर्यादिग्रहाणां फलम् -
शुभैररोगतां मित्रैर्दृष्टो बंधुसमागमम् ।
रवौ स्थानवलेपूर्णे स्वदेशे विद्यायावली ।।७७।।
सूर्य स्थान बल से युक्त हो तो स्वदेश में विद्या से बली होता है।।७७।।