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सर्वकोश
बृहत्पाराशर होरा शास्त्र (महर्षि पराशर - सम्पूर्ण फलित ज्योतिष महाकोश सान्वय सटीक)

बृहत्पाराशर होरा शास्त्र (महर्षि पराशर - सम्पूर्ण फलित ज्योतिष महाकोश सान्वय सटीक)

Brihat Parashara Hora Shastra of Maharshi Parasara with Commentary

महर्षि पराशर (टीकाकार: पं. गणेशदत्त पाठक / सीताराम झा) द्वारा

DevanagariHindipublished800 पृष्ठ

पृष्ठ 709, कुल 800 में से

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पृष्ठ 709

अथ द्वादशोऽध्यायः । ६९७
गंड योग हो तो प्रक्रमायु, शक्तियोग हो तो रश्मिजायु, शकट योग हो तो
ध्रुवायु, यूप योग हो तो अंशायु, केदार योग हो तो भिन्नाष्टकवर्गायु ।।२९।।
अष्टवर्गसमुद्भूतौ क्रमादेवं बलोत्तरे ।
नौछत्रवज्रदामाख्ये स्वरदायोऽतिनीचगे ।।३०।।
शूल योग हो तो समुदायाष्टकवर्गायु सूर्यादि के बली होने से लेना। सूर्यादि
अत्यंत नीच में हो और नौका योग छत्र, वज्र, दाम योग हो तो स्वरांशायु लेना
चाहिये।।३०।।
योगान्तरम् -
कूटे गंडा शरे नांगे गोले श्रृंगाटके पुनः ।
कालकूटे क्रमात्प्रोक्ता पेंडाद्याः- सप्तवै द्विज ।।३१।।
हे मैत्रेय! कूट, गंड, शर, नाग, गोल, शृंगाटक और कालकूट योग हो तो
क्रम से पिंडादि सात हो आयु को लेना।।३१।।
पेंड्यास्त्रयो ध्रुवाश्वांशादायाश्चाष्टकवर्गकौ ।
द्रेष्काणेषु नवांशेषु द्वादशांशेषु च क्रमात् ।।३२।।
कलांशेषु नव प्रोक्ता दायाश्चैव पुनः पुनः ।
लग्न में प्रथम द्रेष्काण हो तो पेंडव, दूसरा हो तो ध्रुवायु और तीसरा हो तो
स्वरांश आयु लेना, नवांश में ध्रुवादि नव आयु लेना। द्वादशांश में अंशायु आदि
लेना। कलांश (उच्चादि नव स्थानों में) भिन्नाष्टकवर्गायु आदि आयु लेना।।३२।।
रश्मिवशेनायु ग्रहणोनियमः-
त्रिंशत्खवेदा स्वरपाचकाश्च सुराश्चदंताः क्षितिपावकाश्च ।।३३।।
यदि जन्म समय ३०।३४।३७।३३।३२।३१ ।।३३।।
षड्त्रिंशदिष्वग्नय एव भानि छंदासि मूर्छाश्च जिनाः कराश्चेत्।
पेंड्यस्तथा द्वादशधा प्रभिन्नः क्रमेणदायो नियतः प्रदिष्टः।।३४।।
३६।३५।२७।२६।२१।२४ इनमें से किसी संख्या के तुल्य रश्मि संख्या
हो तो पिंडायु दाय लेना चाहिये ।।३४।।
तत्त्वाग्नि नंदाग्नय एव रत्नदस्त्रास्त्रिदस्त्रा ध्रुवदाय भेदाः ।
एकास्त्रयश्चेत्समुदाय संज्ञस्ततस्तु वेदा इतरोऽष्टवर्गः ।।३५।।