बृहत्पाराशर होरा शास्त्र (महर्षि पराशर - सम्पूर्ण फलित ज्योतिष महाकोश सान्वय सटीक)
Brihat Parashara Hora Shastra of Maharshi Parasara with Commentary
महर्षि पराशर (टीकाकार: पं. गणेशदत्त पाठक / सीताराम झा) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें६९२ वृहत्पाराशरहोराशास्त्रम् ।
अष्टत्रिंशाद्भिदा संति ताः स्वोच्चादिसुसंस्कृताः ।
.लग्नादिभावगानां च ग्रहाणां स्थितिभेदतः ।।२।।
३८ भेद होते हैं किन्तु सभी ग्रह बली हों और स्वोच्चांश दिग्वीर्य चेष्टा बल
आदि से युक्त हों और संस्कृत हों तो ३८ भेद होता है, यदि अपने उच्चादि से
संस्कृत हों तो ७६ भेद होता है। लग्नादि द्वादश भाव में ग्रहों के स्थिति भेद से ।।२।।
द्विघ्नाश्चतुरशीतिश्च भिदाः संति द्विजोत्तम ।
स्वोच्चादिस्थिति भेदेन भिन्नाः सूर्येषुभूमयः ।।३।।
८४ भेद होते हैं। हे द्विज! स्वोच्चादि स्थिति भेद से १५१२ भेद होते
हैं।।३।।
आयुषः ग्रहणे नियमः-
सलग्नानां वलैः सर्वैरधिकानां क्रमाद्विज ।
अंशोद्भवस्तथा पैड्यो निसर्गोत्थाभिधः परः ।।४।।
हे मैत्रेय! लग्न बली हो तो अंशायुदायं लेना चाहिये, सूर्य बली हों तो पिंडायु,
चन्द्रमा बली हों तो निसर्गायु ।।४।।
शतस्वरांशो भौमाच्च नक्षत्रांशक संज्ञकौ ।
स्वरांशचेतरोदायः करदायस्तथेतरः ।।५।।
भौम बली हों तो शतस्वरांशायुदाय, बुध बली हो तो नक्षत्रा युदाय, गुरु बली
हों तो नवांशायुदाय, शुक्र बली हों तो स्वरांशयुदाय और शनि बलवान् हों तो
करदाय लेना चाहिये ।।५।।
विशेषः-
स्वोच्चनीचसुहृच्छत्रुवर्गैश्च चतुर्विधः ।
अतिनीचातिशत्रोश्च भागराशिगतस्य च ।।६।।
स्वोच्चवर्ग में पिंडायु, स्वनीचवर्ग में निसर्गायु, त्रिवर्ग में हो तो स्वरांशायु,
शत्रुवर्ग में नक्षत्रा यु, अति नीच नवांश में हो तो समुदा्राष्टक वर्गायु, अति शत्रु
नवांश राशि में भिन्नाष्टक वर्गायु लेना चाहिये ।।६।।
समुदा्राष्टवर्गश्च भिन्नाष्टक उदीरितः ।
तत्र मूलत्रिकोणे च भिन्नवर्गे च वृद्धिकृत् ।।७।।