बृहत्पाराशर होरा शास्त्र (महर्षि पराशर - सम्पूर्ण फलित ज्योतिष महाकोश सान्वय सटीक)
Brihat Parashara Hora Shastra of Maharshi Parasara with Commentary
महर्षि पराशर (टीकाकार: पं. गणेशदत्त पाठक / सीताराम झा) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअथ द्वादशोऽध्यायः । ६९१.
ग्रहों से भावों के बारहवें स्थानों के भागांश को ब्रह्माजी ने कहा है।।४१।।
सर्वद्विवेदसप्ताष्टत्रिदल दिशाद्रयः ।
वेदांगा हारका एव ग्रहाणां समुदीरिताः ।।४२।।
वह इस प्रकार है— तनु आदि भावों का क्रम से सम्पूर्ण, आधा, चतुर्थांश,
सप्तांश, अष्टमांश, षष्ठांश, तृतीयांश, नवांश, दशांश, चतुर्थांश और बारहवें भाव
का षष्ठांश यह ग्रहों के हारक भाग कहे गये हैं।।४२।।
हत्वा दायं वलैः स्वैस्तु वलं योगेनभाजयेत् ।
आयव्यये तु भावानां ग्रहाणां वियदादिषु ।।४३।।
लाभ और व्यय भाव में हरण करने से जो शेष आय हो उसे अपने अपने
वल से गुणा कर सर्ववल योग से भाग देने से जो प्राप्त हो वह लाभ और व्यय
की अन्तर्दशा का स्वरूप होता है।।४३।।
सर्वद्वित्रीषुवेदत्रिपंच सप्त ततः क्रमात् ।
स्थानांतरे तु भागांशाः सर्वभावेषु कीर्त्तिताः ।।४४।।
और तीसरे भाव से दशम भाव पर्यन्त भावों के क्रम से संपूर्ण, आधा,
तृतीयांश, पंचमांश, चतुर्थांश, तृतीयांश, पंचमांश, सप्तमांश और शेष दो भावों
(प्रथम द्वितीय) में क्रम से सम्पूर्ण और आधा भागांश होता है।।४४।।
सर्वत्रिसप्तरामेषु षट् त्र्याग्निद्वियमाः क्रमात् ।
कालांश अर्ध होरांशः पतयोऽर्धहरा यथा ।।४५।।
सर्व, तृतीयांश, सप्तांश, तृतीयांश, पंचमांश, षष्ठांश, तृतीयांश,
द्वितीयांश, द्वितीयांश ये कलांश और अर्धहोरांश पति होते हैं।।४५।।
इति पाराशरहोरायामुत्तरार्धे एकादशोऽध्यायः।।११।।
अथ द्वादशोऽध्यायः।।१२।।
पिंडायुषिभेदानि-
ग्रहेषु सर्वेषु वलोत्तरेषु स्वोच्चांशगेषुप्रवलस्यवर्गे ।
दिग्वीर्य चेष्टाबलपूर्तियुक्ते पैण्डेयेषु नीचार्धकृतापहाराः ।।१।।
पूर्व में कहे हुये पिंडायु के १२ भेद (१० अध्याय १ श्लो.) में नीचार्धादि
अपहार से ।।१।।