बृहत्पाराशर होरा शास्त्र (महर्षि पराशर - सम्पूर्ण फलित ज्योतिष महाकोश सान्वय सटीक)
Brihat Parashara Hora Shastra of Maharshi Parasara with Commentary
महर्षि पराशर (टीकाकार: पं. गणेशदत्त पाठक / सीताराम झा) द्वारा
पृष्ठ 438, कुल 800 में से
संदर्भ में पढ़ें४४० बृहत्पाराशरहोराशास्त्रम् ।
चौथे भाव में स्थित पंचमेश की दशा शुभद होती है। चौथे भाव में बैठे हुये
कर्मेश की दशा राज्यदायिनी होती है।।८७।।
ताभ्यां युक्तस्य खेटस्य दृष्टियुक्तस्य चैतयोः ।
राज्यप्रदां दशां प्राहुर्विद्वांसो दैवचिन्तकाः ।।८८।।
इन दोनों से युक्त वा दृष्ट ग्रह की दशा भी राज्यदायिनी होती है।।८८।।
कर्मस्थानस्थ बुद्धीशदशा सम्पत्करी भवेत् ।
मान्स्ति तपोधीश दशा राज्यप्रदायिनी ।।८९।।
कर्म भाव में बैठे हुये पंचमेश की दशा सम्पत्ति देने वाली होती है। दशमस्थित
धर्मेश की दशा राज्य देने वाली होती है।।८९।।
यस्माद्व्ययगतोयस्तु तद्दशायां धनक्षयम् ।
यस्मात्त्रिकोणगा पापात्तत्रात्मशमनाशनम् ।।९०।।
जिससे (भाव से) जो बारह स्थान में हो उसके दशा में धन की हानि होती
है। जिससे त्रिकोण स्थान में पापग्रह हों उसकी दशा में आत्मीय पुरुषार्थ का
नाश।।९०।।
पुत्रहानिः पितुः पीडा मनस्तापो महान्भवेत् ।
यस्मात्त्रिकोणगाः रिःफरन्ध्रेशार्केन्दुसूर्यजाः ।।९१।।
पुत्र की हानि, पिता को पीड़ा, मन को संताप होता है जिससे त्रिकोण में
अष्टमेश, व्ययेश और सूर्य चन्द्रमा शनि हों।।९१।।
पुत्रपीडा द्रव्यहानिस्तत्र केत्वहि संगमे ।
विदेशभ्रमणं क्लेशो भयं चैव पदे पदे ।।९२।।
तो विदेश की यात्रा तथा क्लेश और केतु राहु युत हों तो पद पद पर भय
होता है।।९२।।
यस्मात्षष्ठाष्टमे क्रूरनीचखेटाश्च संस्थिताः ।
रोगशत्रुनृपाद्वा स्यान्मुहुः पीडासुदुःसहा ।।९३।।
जिससे ३।८ भाव में क्रूरग्रह हो नीच आदि स्थानगत ग्रह हो तो उसकी दशा
में रोग, शत्रु, राज से दुःसह पीड़ा होती है।।९३।।
यस्माच्चतुर्थगः क्रूरः स्याद्भूगृहक्षेत्रनाशनम् ।
पशुहानिस्तत्र भौमे गृहदाहप्रमादतः ।।९४।।
जिससे चौथे भाव में क्रूरग्रह हो तो उसकी दशा में भूमि, गृह, खेत का नाश