बृहत्पाराशर होरा शास्त्र (महर्षि पराशर - सम्पूर्ण फलित ज्योतिष महाकोश सान्वय सटीक)
Brihat Parashara Hora Shastra of Maharshi Parasara with Commentary
महर्षि पराशर (टीकाकार: पं. गणेशदत्त पाठक / सीताराम झा) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअथ मारकप्रकरणम् ३०३
रुद्राश्रय में भी आयु की समाप्ति होती है।।८३।।
यद्बाह्यप्राणिरुद्रस्य योगे पूर्णे भवत्यपि।
रुद्रशूलपरत्वेन आयुर्दायसमाप्तये।।८४।।
जो बाह्य प्राणीरुद्र के योग में पूर्ण आयु होने स रुद्रशूलान्त आयु कहा
है।।८४।।
रुद्राश्रयेण प्रायेण शूलमेकद्वयं त्रयम्।
उल्लङ्घनं कृतं विप्र यदि योगविशेषता।।८५।।
तथा रुद्राश्रय से प्रायः एक, दो वा तीसरे शूल का उल्लंघन योग-विशेष
से किया है तो वह प्रायः रुद्राश्रय से ही होता है।।८५।।
तर्हि रुद्राश्रयेणैव प्रायेणायुर्भवेद् ध्रुवम्।
तावद्वर्षेण कथनं जीवनं जातकस्य च।।८६।।
अतः उतना ही वर्ष जातक का जीवन कहना चाहिए।।८६।।
इत्युक्तं च प्रयाणे च पूर्वं रुद्राश्रयाद्द्विज।
आयुर्योगसमाप्तिश्च कष्टयोगादिकारकम्।।८७।।
उक्त योगादि निधन को प्रायः रुद्र के आंश्रय से कहा है।।८७।।
रुद्राश्रयात्तु ह्येवं च निरुक्तं चायुषि द्विज।
किञ्चिद्विशेषरूपं च तवाग्रे दर्शयामि च।।८८।।
अब कुछ विशेष रूप से कह रहा हूँ।।८८।।
मेषलग्ने विशेषेण आयुरुद्राश्रयान्तके।
कुष्ठरोगादि कुर्वीत पूर्णायुर्न समाप्यते।।८९।।
मेष लग्न में रुद्राश्रयांत में कुष्ठरोगादि होता है और पूर्णायु को
नहीं भोगता है।।८९।।
द्वन्द्वराशौ स्थितौ रुद्रौ प्राणी गौणद्वयेऽपि वा।
रुद्राश्रये तदन्ते वा आयुर्दायं भवत्यपि।।९०।।
मिथुन राशि में रुद्र हो तो रुद्राश्रय में वा उसके अंत में आयु की समाप्ति
होती है।।९०।।
आयुर्वा योगभेदेन प्रथमे मध्यमोत्तमे।
दर्शयामि तवाग्रे च कथां शम्भुप्रचोदिताम्।।९१।।
पूर्व में जो अल्पायु, मध्यमायु और दीर्घायु योग कहा है।।९१।।