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सर्वकोश
बृहत्पाराशर होरा शास्त्र (महर्षि पराशर - सम्पूर्ण फलित ज्योतिष महाकोश सान्वय सटीक)

बृहत्पाराशर होरा शास्त्र (महर्षि पराशर - सम्पूर्ण फलित ज्योतिष महाकोश सान्वय सटीक)

Brihat Parashara Hora Shastra of Maharshi Parasara with Commentary

महर्षि पराशर (टीकाकार: पं. गणेशदत्त पाठक / सीताराम झा) द्वारा

DevanagariHindipublished800 पृष्ठ

पृष्ठ 300, कुल 800 में से

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पृष्ठ 300

३०२ बृहत्पाराशरहोराशास्त्रम्
यदि एक रुद्र पापी हो और दूसरा शुभ हो तो मध्य शूल में मृत्यु होती
है।।७५।।
मध्ये शूले मृतिर्विप्र निर्विशङ्कं भविष्यति ।
शुभग्रहद्वयं विप्र एकत्र यदि तिष्ठति ।।७६ ।।
और शुभमान्य का संबंध हो तो तीसरे शूल में मृत्यु होती है।।७६ ।।
अन्तशूले मृतिर्ज्ञेया शूलिना भाषितं पुरा।
एवं भेदानुभेदेन विद्यात् सर्वत्र बुद्धिमान् ।।७७।।
इस प्रकार के भेदानुभेद से सर्वत्र विचार करना चाहिए। यह आवश्यक
है कि दोनों रुद्र पाप वा शुभ हों ।।७७।।
शूलक्षेत्रे च द्वौ रुद्रौ यदि पापोऽथवा शुभः ।
मिश्रग्रहोऽथ वा विप्र चिन्तयेद्बलवत्तरः ।।७८ ।।
वा मिश्रग्रह हैं और दोनों में बली कौन ।।७८।।
दीर्घायुरायुरयोगेन भङ्गाभावे द्विजोत्तम ।
मृत्युः शूलदशायां च पापयोगं विना रविः ।।७९।।
दीर्घायु योग में भंग के अभाव में रवि के बिना अन्य पापग्रहों के योग
होने से शूल दशा में मृत्यु होती है।।७९ ।।
क्रूराश्च येषु क्षेत्रेषु शुभानामाश्रयेषु च ।
निर्वाणमितरेषां तु शूलर्क्षे निर्दिशेदयम् ।।८०।।
क्रूरग्रह जिस राशि में शुभग्रह के आश्रय से हों तो यह निर्याण अन्य
ग्रहों के शूल में कहना चाहिए।।८०।।
शुभानामत्र पक्षे तु तथा क्रूराश्रयेषु च।
तस्मिन् जातकशूलर्क्षे मृतिं ब्रूयान्न संशयः ।।८१।।
शुभग्रहों के पक्ष में क्रूरग्रहों के आश्रय में शूलर्क्ष में जातक की मृत्यु
होती है।।८१।।
यद्यप्राणिरुद्रयोगे यत्किञ्चिन्न्यूनता द्विज।
तर्हि रुद्राश्रयं तच्च त्रिधा न परतोऽपि च ।।८२।।
यदि निर्बल रुद्र के योग में कुछ न्यूनता हो तो रुद्राश्रय के द्वारा मृत्यु
का विचार करना चाहिए।।८२।।
रुद्राश्रयेऽपि चायुर्दा समाप्तिर्भवति ध्रुवम् ।
प्रायेण चिन्तयेद्विप्र पूर्वापरप्रयत्नतः।।८३।।