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सर्वकोश
बृहत्पाराशर होरा शास्त्र (महर्षि पराशर - सम्पूर्ण फलित ज्योतिष महाकोश सान्वय सटीक)

बृहत्पाराशर होरा शास्त्र (महर्षि पराशर - सम्पूर्ण फलित ज्योतिष महाकोश सान्वय सटीक)

Brihat Parashara Hora Shastra of Maharshi Parasara with Commentary

महर्षि पराशर (टीकाकार: पं. गणेशदत्त पाठक / सीताराम झा) द्वारा

DevanagariHindipublished800 पृष्ठ

पृष्ठ 279, कुल 800 में से

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पृष्ठ 279

आयु जानने का दूसरा प्रकार कह रहा हूँ, जिसे दीर्घादि तीनों प्रकार
से ब्रह्माजी ने कहा है।।९।।
जन्मलग्नाष्टमेशौ द्वौ चिन्तयेज्जन्मपत्रके।
पञ्चमैकादशे विप्र दीर्घायुश्च प्रजायते।।१०।।
जन्मांग चक्र में लग्नेश और अष्टमेश यदि ५।११ भाव में हों तो
दीर्घायु ।।१०।।
लाभे तृतीयगे वापि मध्यमायुर्विचिन्तयेत्।
लाभे वित्ते त्रिकोणे वा ह्यायुरल्पं भवेद्द्विज।।११।।
११।३ भावों में हों तो मध्यमायु और ११।२।५।९ भावों में हों तो
अल्पायु ।।११।।
गतायुर्लाभगौ द्वौ चेज्जातकोऽपि न जीवति।
एवं समस्तजन्तूनामीदृग्योगं विचिन्तयेत्।।१२।।
और दोनों ११ भाव में हों तो गतायु होता है और जातक नहीं जीता
है। इस प्रकार से सभी प्राणियों के आयुर्दाय का निर्णय करना
चाहिए।।१२।।
अथैवं भिन्नमार्गेण आयुर्दायं निरूप्यते।
तनुतन्वीशतद्राशिपत्युर्भानां त्रिकोणके।।१३।।
पुनः प्रकारान्तर से आयु का निर्णय कह रहा हूँ। लग्न, लग्नेश और
उनकी राशियों के स्वामि से त्रिकोण में।।१३।।
अल्पमध्यचिरायुष्यं रूपवर्णप्रमाणतः।
अष्टमेशादियोगेन निर्याणं कारयेद्ग्रहः।।१४।।
अल्प, मध्य और दीर्घायु रूप वर्ष प्रमाण से होती है। इसमें अष्टमेश
आदि के युग से निर्याणकर्ता ग्रह होता है।।१४।।
लग्नत्रिकोणगेऽल्पायुर्लग्नेशस्य त्रिकोणगे।
मध्यमायुर्विजानीयान्निर्विशङ्कं द्विजोत्तम।।१५।।
लग्न त्रिकोण में अल्पायु, लग्नेश से त्रिकोण में मध्यमायु।।१५।।
लग्नेशात्स्वीयराशीशे त्रिकोणे रन्ध्रनायके।
दीर्घायुषि प्रदातव्यं पुरा शम्भुप्रणोदितम्।।१६।।
लग्नेश वा जन्मराशीश वा अष्टमेश त्रिकोण में हो तो दीर्घायु होता
है।।१६।।