बृहत्पाराशर होरा शास्त्र (महर्षि पराशर - सम्पूर्ण फलित ज्योतिष महाकोश सान्वय सटीक)
Brihat Parashara Hora Shastra of Maharshi Parasara with Commentary
महर्षि पराशर (टीकाकार: पं. गणेशदत्त पाठक / सीताराम झा) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२७० बृहत्पाराशरहोराशास्त्रम्
लग्नेशाष्टमेशाभ्यां योगैकः कथितो द्विज।
द्वितीयं शनिचन्द्राभ्यां चिन्तनीयं सदा द्विज।।२१।।
प्रथम लग्नेश और अष्टमेश से १ योग। द्वितीय शनि और चन्द्रमा
से॥२१॥
होरालग्नलग्नाभ्यां तृतीयं च विचिन्तयेत्।
लग्नेन्दूमदने वापि चिन्तयेल्लग्नचन्द्रतः।।२२।।
तथा तीसरा होरालग्न और जन्मलग्न से होता है। दूसरे योग
में यदि चन्द्रमा जन्मलग्न या सातवें भाव में हो तो लग्न और
चन्द्रमा से अन्यथा शनि और चन्द्रमा से जो आयु आवे उसे लेना
चाहिए॥२२॥
चरे चरे स्थिते द्वौ च लग्नरन्ध्राधिपौ यदि।
दीर्घायुयोगो विज्ञेयो निर्विशङ्कं द्विजोत्तम।।२३।।
यदि लग्नेश और अष्टमेश दोनों चर राशि में हों।।२३।।
स्थिरर्क्षे लग्ननाथो हि लयेशे द्वन्द्वभे स्थिते।
तदा दीर्घायुषो योगः सम्भवेद्गणिताग्रणीः।।२४।।
अथवा एक स्थिर और दूसरा द्विस्वभाव राशि में हो तो दीर्घायु योग
होता है॥२४॥
लग्नाधीशे स्थिते द्वन्द्वे स्थिरे रन्ध्राधिपे स्थिते।
दीर्घायुयोगो विज्ञेयो निर्विशङ्कं द्विजोत्तम।।२५।।
यदि लग्नेश और अष्टमेश में से एक चर राशि में और दूसरा स्थिर
राशि में हो तो मध्यायु योग होता है।।२५।।
अथातः सम्प्रवक्ष्यामि मध्यायुर्योगमुत्तमम्।
चरे लग्नाधिपे विप्र स्थिरे रन्ध्रपतिर्यदि।।२६।।
अथवा दोनों द्विस्वभाव राशि में हों तो भी मध्यायु योग होता है।।२६।।
तदा मध्यायुषं विद्याद् द्वौ द्वन्द्वे मध्यमायुषः।
अधुनाल्पायुयोगं च तवाग्रे कथयाम्यहम्।।२७।।
लग्नेश और अष्टमेश दोनों में से एक चर राशि में तथा दूसरा द्विस्वभाव
राशि में हो तो अल्पायु योग होता है।।२७।।