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सर्वकोश
बृहत्पाराशर होरा शास्त्र (महर्षि पराशर - सम्पूर्ण फलित ज्योतिष महाकोश सान्वय सटीक)

बृहत्पाराशर होरा शास्त्र (महर्षि पराशर - सम्पूर्ण फलित ज्योतिष महाकोश सान्वय सटीक)

Brihat Parashara Hora Shastra of Maharshi Parasara with Commentary

महर्षि पराशर (टीकाकार: पं. गणेशदत्त पाठक / सीताराम झा) द्वारा

DevanagariHindipublished800 पृष्ठ

पृष्ठ 229, कुल 800 में से

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पृष्ठ 229

दरिद्रयोगाध्यायः २३१
पंचमेश और धर्मेश क्रम से ६/१२ भाव में हों और मारकेश से देखे.
जाते हों तो जातक निर्धन होता है ।।६।।
पापग्रहे लग्नगते राज्यधर्माधिपौ विना।
मारकेशयुते दृष्टे जातः स्यान्निर्धनो नरः।।७।।
कर्मेश और नवमेश से अतिरिक्त अन्य पापग्रह लग्न में हों और मारकेश
से युत-दृष्ट हो तो जातक निर्धन होता है।।७।।
यद्भावेशो रन्ध्ररिष्फारिसंस्थो यद्भावस्था रन्ध्ररिष्फारिभेशाः।
पापैर्दृष्टो मन्ददृष्टोऽथवा चेद्दुःखाक्रान्तश्चञ्चलो निर्धनः स्यात्।।८।।
जो भावेश (३-८-१२) में स्थित हों और जिस भाव में (६-८-
१२) के स्वामी हों, पापग्रह वा शनि से दृष्ट हों तो जातक दुःखी, चंचल
और दरिद्र होता है।।८।।
चन्द्राक्रान्तनवांशेशो मारकेशयुतो यदि।
मारकस्थानगो वापि जातोऽसौ निर्धनो भवेत् ।।९।।
चंद्रमा के नवांश का स्वामी मारकेश से युत हो अथवा मारक
स्थान में हो तो जातक निर्धन होता है।।९।।
विलग्नेशनवांशेशौ रिष्फषष्ठाष्टगौ यदि।
मारकेशयुतौ दृष्टौ जातोऽसौ निर्धनो नरः।।१०।।
लग्नेश के नवांश का स्वामी १२-६-८ भाव में हो और मारकेश से युत
दृष्ट हो तो जातक निर्धन होता है।।१०।।
शुभस्थानगताः पापाः पापस्थाने गताः शुभाः।
धनार्तिर्जायते बालो भोजनेन प्रपीडितः।।११।।
शुभग्रह की राशि में पापग्रह और पापग्रह की रशि में शुभग्रह हों तो
जातक को धन और अन्न दोनों का कष्ट होता है।।११।।
कारकाद्वा विलग्नाद्वा रन्ध्रे रिष्फे द्विजोत्तम।
लग्नकारकयोर्दृष्ट्या दरिद्रार्त्तियुतो नरः।।१२।।
कारक से वा लग्न से ८/१२ वें भाव को कारक और लग्नेश न
देखते हों तो जातक दरिद्र होता है।।१२।।
लग्नाद्वा कारकाद्वापि द्वादशे यस्य वै द्विज।
लग्नकारकयोर्दृष्ट्या व्ययशीलो भवेन्नरः।।१३।।