बृहत्पाराशर होरा शास्त्र (महर्षि पराशर - सम्पूर्ण फलित ज्योतिष महाकोश सान्वय सटीक)
Brihat Parashara Hora Shastra of Maharshi Parasara with Commentary
महर्षि पराशर (टीकाकार: पं. गणेशदत्त पाठक / सीताराम झा) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२३० बृहत्पाराशरहोराशास्त्रम्
क्रूरसौम्यविभागेन स्वस्थानादिवशात्तथा।
ग्रहाणां स्थानभेदेन राशिदृष्टिवशात्फलम् ।।९४।।
इस प्रकार क्रूर तथा शुभ ग्रह के अपने स्थानादि भेद से ग्रहों के
बलाबल को विचार कर फलादेश समझना चाहिए।।९४।।
इति धनयोगाः।
अथ दरिद्रयोगाध्यायः
लग्नेशे वै रिष्फगते रिष्फेशे लग्नमागते।
मारकेशयुते दृष्टे जातः स्यान्निर्धनः पुमान् ।।१।।
जन्मलग्नेश बारहवें भाव में और व्ययेश लग्न में हो, मारकेश से युत
दृष्ट हो तो मनुष्य निर्धन होता है।।१।।
लग्नाधिपे शत्रुगृहं गते वा षष्ठेश्वरे लग्नगतेऽपि वा चेत्।
विलग्नपे मारकनाथदृष्टे जातो भवेन्निर्धनकीपि मुख्यः ।।२।।
लग्नेश छठे भाव में हो और षष्ठेश लग्न में हो और लग्नेश मारकेश
से दृष्ट हो तो निर्धन होता है।।२।।
लग्नेन्दू केतुयुक्तौ वा लग्नेशे निधनं गते।
मारकेशयुते दृष्टे जातो वै निर्धनो भवेत् ।।३।।
लग्न और चंद्रमा केतु से युत हों तथा लग्नेश आठवें भाव में हो,
मारकेश से युत-दृष्ट हो तो मनुष्य निर्धन होता है।।३।।
षष्ठाष्टमव्ययगते लग्नेशे पापसंयुते।
मारकेशयुते दृष्टे राजवंशोऽपि निर्धनः ।।४।।
लग्नेश पापग्रह से युत होकर ६-८-१२ भाव में गया हो और मारकेश
से युत-दृष्ट हो तो राजबालक भी निर्धन होता है।।४।।
विलग्ननाथेऽरिविनाशरिष्फनाथेन युक्ते यदि पापदृष्टे।
मित्रात्मजेनाथयुतेपि दृष्टे शुभैर्न दृष्टे स भवेद्दरिद्रः ।।५।।
लग्नेश ६-८-१२ भावों के स्वामी से युक्त होकर पापग्रह से दृष्ट होकर
शनि से भी युत हो तथा शुभग्रह से न दृष्ट हो तो मनुष्य दरिद्र होता है।।५।।
मन्त्रेशो धर्मनाथश्च षष्ठव्ययस्थितौ क्रमात्।
दृष्टो चेन्मारकेशेन जातः स्यान्निर्धनो नरः ।।६।।