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सर्वकोश
बृहत्पाराशर होरा शास्त्र (महर्षि पराशर - सम्पूर्ण फलित ज्योतिष महाकोश सान्वय सटीक)

बृहत्पाराशर होरा शास्त्र (महर्षि पराशर - सम्पूर्ण फलित ज्योतिष महाकोश सान्वय सटीक)

Brihat Parashara Hora Shastra of Maharshi Parasara with Commentary

महर्षि पराशर (टीकाकार: पं. गणेशदत्त पाठक / सीताराम झा) द्वारा

DevanagariHindipublished800 पृष्ठ

पृष्ठ 222, कुल 800 में से

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२२४ बृहत्पाराशरहोराशास्त्रम्
कारके पञ्चमे शुक्रे सितेन्दुयुतवीक्षितः।
तन्वारूढपदे लग्ने राजवर्गो भवेन्नरः।।९३।।
कारकांश वा पाँचवें भाव में शुक्र हो और शुक्र-चन्द्रमा से युत-दृष्ट
हो, लग्न वा आरूढ लग्न में हो तो राजा होता है।।९३।।
जन्माङ्गे च हि होराङ्गे कलाङ्गे येन केनचित्।
रव्यादि दृष्टिमार्गेण सराजा भवति ध्रुवम् ।।९४।।
जन्मलग्न वा होरालग्न वा पदलग्न सूर्यादि किसी ग्रह से देखा जाता
हो तो राजा होता है।।९४।।
स्वक्षेत्रे तु नवांशे वा द्रेष्काणे भानुजादयः।
लग्नं च सप्तमं विप्र पश्यन्ति राजयोगदाः।।९५।।
पूर्णदृष्टे पूर्णयोगमर्धे चार्धं विधीयते।
पादेन पादयोगं च राजयोगमिदं क्रमात्।।९६।।
अपने राशि, नवांश, द्रेष्काण में सूर्य आदि ग्रह होकर लग्न वा सप्तम
को देखें तो राजयोग होता है। पूर्णदृष्टि हो तो पूर्ण, अर्धदृष्टि हो तो
आधा, पाददृष्टि हो तो चौथाई राजयोग होता है।।९५-९६।।
षट्कुण्डल्यन्तरे विप्र पश्यन्ति भास्करादयः।
राजयोगप्रदातारौ निर्विशङ्कं द्विजोत्तम ।।९७।।
षड्वर्ग कुण्डली के लग्न को सूर्य आदि ग्रह देखते हों तो राजयोग होता
है।।९७।।
लग्नस्थाने पूर्णदृष्ट्या सप्तमे स्वल्पवीक्षिते।
स्वल्पराज्यप्रदो विप्र षट्लग्नेषु विचिन्तयेत् ।।९८।।
यदि लग्न को पूर्णदृष्टि से और सप्तम को अल्पदृष्टि से देखते हों तो
अल्प राजयोग होता है।।९८।।
एवं नवांशकुण्डल्यां द्रेष्काणेऽपि विचिन्तयेत् ।
लग्नसप्तमयोः खेटो राजयोगप्रदायकः ।।९९।।
इसी प्रकार नवांशकुंडली और द्रेष्काणकुंडली को भी देखना चाहिए।
क्योंकि लग्न और सप्तम देखने वाला ग्रह राजयोगकारक होता है।।९९।।