बृहत्पाराशर होरा शास्त्र (महर्षि पराशर - सम्पूर्ण फलित ज्योतिष महाकोश सान्वय सटीक)
Brihat Parashara Hora Shastra of Maharshi Parasara with Commentary
महर्षि पराशर (टीकाकार: पं. गणेशदत्त पाठक / सीताराम झा) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअथ राजयोगाध्यायः २२३
जन्मलग्नेश तथा पंचमेश के संबंध से तथा आत्मकारक और उससे
पंचमेश इन दोनों के बलाबल के अनुसार उत्तम, मध्यम और अधम
राजयोग होता है॥५॥
लग्नेऽथ पञ्चमे वापि लग्नेशे पञ्चमाधिपे।
पुत्रात्मकारकौ विप्र लग्ने वा पञ्चमेऽपि च॥६॥
सम्बन्धे वीक्षिते तत्र दृष्टैवं पञ्चमाधिपे।
स्वोच्चे स्वांशे स्वभे वापि शुभग्रहनिरीक्षिते॥७॥
महाराजेति योगोऽयं सोऽत्र जातः सुखी नरः।
गजवाजिरथैर्युक्तः सेनासङ्गमनैकधा॥८॥
लग्नेश और पंचमेश लग्न में वा पंचम भाव में हों, आत्मकारक और
पंचमेश लग्न वा पंचम में हो, दोनों का किसी प्रकार का संबंध हों और
अपने उच्च, नवांश या राशि में हों तो 'महाराज' योग होता है। इसमें उत्पन्न
पुरुष सुखी, हाथी, घोड़ा और रथ-सेना आदि से युक्त होता है॥६-
८॥
भाग्येशः कारके लग्ने पञ्चमे सप्तमेऽपि वा।
राजयोगप्रदातारौ गजवाजिधनैरपि॥९॥
भाग्येश और आत्मकारक लग्न, पंचम वा सप्तम में हों तो हांथी, घोड़े
और धन से युक्त राज्य को देते हैं॥९॥
कारकाद्विचतुर्थे च पञ्चमे भावगे द्विज।
शुभखेटो न सन्देहो राजयोगं ददाति च॥१०॥
कारक से २, ४, ५ भाव में शुभग्रह हों तो निश्चय ही राजयोग करते
हैं॥१०॥
कारकात् त्रितये षष्ठे राश्योरुभयपापयुक्।
राजवंशोद्भवो विप्र राजयोगस्तथा भवेत्॥११॥
कारक से ३, ६ वा लग्न से ३, ६ भाव में पापग्रह युक्त हों तो
राजयोग होता है॥११॥
लग्नाधीशाद्द्यूननाथाद्धने तुर्ये च पञ्चमे।
शुभखेटयुते विप्र राजा च भवति ध्रुवम्॥१२॥
लग्नेश से वा सप्तमेश से ४ वा ५ भाव में शुभग्रह युत हों तो निश्चय
ही राजा होता है॥१२॥