बृहत्पाराशर होरा शास्त्र (महर्षि पराशर - सम्पूर्ण फलित ज्योतिष महाकोश सान्वय सटीक)
Brihat Parashara Hora Shastra of Maharshi Parasara with Commentary
महर्षि पराशर (टीकाकार: पं. गणेशदत्त पाठक / सीताराम झा) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१५२ बृहत्पाराशरहोराशास्त्रम्
अंग के जिस भाग में पापग्रह हों वहाँ चिह्न कहना चाहिए। यदि बुध
के साथ पापग्रह हो तो निश्चय ही चिह्न होता है और शुभग्रह हो तो उस
अंग में लक्षण होता है।।२२।।
अथ तनुभावफलम्-
देहाधिपः पापयुतोऽष्टमस्थो व्यारिगोवाडङ्गसुखं निहन्ति ।
सर्वत्र भावेषु च योजनीयमेवं बुधैर्भाववशात्फलं हि ।।२३।।
लग्नेश पापग्रह से युत होकर आठवें, बारहवें, छठे हो तो शरीर-सुख
नहीं होता है। यही नियम सभी भावों का है, यानि जिस भाव
का स्वामी पापग्रह से युत होकर ६, ८, १२ वें भाव के फल का अभाव
होता है।।२३।।
पापो विलग्नाधिपतिर्विलग्ने चन्द्रेण युक्तो यदि बालकः स्यात्।
तदातिरोगं स हि केन्द्रसंस्थस्त्रिकोणलाभेषु गदं निहन्ति ।।२४।।
यदि लग्नेश पापग्रह चन्द्रमा से युक्त होकर लग्न में हो तो बालक अत्यंत
रोगी होता है। यदि वह केन्द्र-त्रिकोण और लाभभाव में हो तो रोग का
नाश करता है।।२४।।
लग्नाधिपोऽथ जीवो वा शुक्लो वा यदि केन्द्रगः।
स जातो धनवांल्लोके दीर्घायू राजवल्लभः ।।२५।।
लग्नेश वा गुरु या शुक्र केन्द्र में हो तो जातक धनी, दीर्घायु और
राजप्रिय होता है।।२५।।
केन्द्रत्रिकोणेषु न यस्य पापा
लग्नाधिपःसुरगुरुश्च चतुष्टयस्थौ।
भुक्त्वा सुखानि विविधानि च पुण्यकर्मा
जीवेत्तु वर्षशतमेव विमुक्तरोगः ।।२६।।
जिसके जन्मांग में केन्द्र-त्रिकोण भाव में पापग्रह न हों और लग्नेश तथा
गुरु केन्द्र में हों तो वह बालक पुण्यकर्त्ता, अनेक प्रकार के सुखों को
भोगने वाला एवं दीर्घायु होता है।।२६।।
लग्नेशे चरराशिस्थे शुभग्रहनिरीक्षिते ।
कीर्त्तिः श्रीमान्महाभोगी देहपुष्टिसमन्वितः ।।२७।।
लग्नेश चरराशि में हो तथा शुभग्रह से देखा जाता हो तो बालक यशस्वी,
धनी, भोगों को भोगने वाला औरें बलवान् होता है।।२७।।