बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)
Brihan Naradiya Purana with Sanskrit & Hindi Commentary
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)
इस ग्रन्थ के बारे में
बृहन्नारदीय पुराण, जिसे नारदपुराण भी कहा जाता है, परम्परा में महर्षि व्यास से जोड़ा जाता है। इसका पूर्वभाग सनक आदि कुमारों द्वारा नारद को दिए गए उपदेशों के रूप में है, जिनमें धर्म, भक्ति, व्रत, तीर्थ, मन्त्र-साधना और वेदाङ्गों (शिक्षा, कल्प, व्याकरण, निरुक्त, ज्योतिष और छन्द) का विस्तृत वर्णन आता है। इसकी एक विशेषता अठारह पुराणों की विषय-सूची है, जिसमें प्रत्येक पुराण की श्लोक-संख्या और विषय बताए गए हैं; स्कैन में 'पञ्चविंशतिसाहस्रं...' और 'प्रभासस्य च माहात्म्यं...' जैसे श्लोक इसी अंश के हैं।
यह संस्करण हिन्दी साहित्य सम्मेलन, प्रयाग की पुराण-प्रकाशन योजना के अन्तर्गत छपा 'बृहन्नारदीयपुराणम् (पूर्वभागः)' है, जिसमें संस्कृत मूल के साथ व्याकरण-वेदान्ताचार्य तारिणीश झा का हिन्दी अनुवाद है। प्रथम संस्करण शक 1910, अर्थात् 1989 ई. में प्रकाशित हुआ; प्रकाशक सम्मेलन के प्रधान मन्त्री डॉ. प्रभात मिश्र शास्त्री थे।
प्रकाशकीय वक्तव्य इस पुराण के ही एक श्लोक से आरम्भ होता है, जिसमें कहा गया है कि जैसे नदियों में गंगा और सरोवरों में पुष्कर श्रेष्ठ है, वैसे ही पुराणों में नारदीय। पुस्तक 1008 पृष्ठों की है।
अष्टाशीतितमोऽध्यायः ८१३
आदिमध्यावसानेषु पूजाजपविधिक्रमात् । प्रत्ये कं तैस्त्रिभिर्भेदैर्दीर्घस्वरसमन्वितैः ॥१४६॥
कुर्यात्करांगषक्वणां न्यासं प्रोक्तं यथाविधि । ऊर्ध्वप्राग्दक्षिणोदग्व पश्चिमाधरनामभिः ॥१४७॥
सुविनद्यंतरस्थैस्तन्तदात्मसु यथाक्रमम् । आधाररंध्रहृत्स्र्वेकं द्वितीयं लोचनत्रये ॥१४८॥
तृतीयं श्रोत्रचिबुके चतुर्थं घ्राणतालुषु । पंचमं चांसनाभीषु ततः पाणिपदद्वये ॥१४९॥
मूलमध्याग्रतो न्यस्येत्तन्नवधा मूलवर्णकैः । लोहितां लोहिताकारशक्तिवृंदानिवेष्विताम् ॥१५०॥
लोहितांशुकभूषाल्रत्नलेपनां षण्मुखांबुजाम् । अनर्घ्यरत्नघटितमाणिक्यमुकुटोज्ज्वलाम् ॥१५१॥
रत्नस्तबकसंच्छिन्नलसद्रक्षःस्थलां शुभाम् । कारुण्यानंदपरमामरुणांबुजविष्टराम् ॥१५२॥
भुजैर्द्वादशभिर्युक्तां सर्वेषां सर्ववाङ्मयीम् । प्रवालाक्षस्रजं पद्मं कुंडिकां रत्ननिर्मिताम् ॥१५३॥
रत्नपूर्णं तु चषकं लुंगीं व्याख्यानमुद्रिकाम् । दधानां दक्षिणैर्वार्मः पुस्तकं चारुणोत्पलम् ॥१५४॥
हैमों च लेखनीं रत्नमालां कंबुवरं भुजैः । अभितः स्तूयमानां च देवगंधर्वकिन्नरैः ॥१५५॥
यक्षरक्षसदैत्यार्षिसिद्धविद्याधरादिभिः । ध्यात्वैवमर्चयेन्नित्यां वाग्लक्ष्मीकान्तिसिद्धये ॥१५६॥
सितां केवलवाक्सिद्ध्यै लक्ष्म्यै हेमप्रभामपि । धूमाभां वैरिविद्विष्टयौ मृतये निग्रहाय च ॥१५७॥
नीलां च मकीकरणे स्मरेत्तत्तदपेक्षया । इत्येषा दशमी नित्या प्रोक्ता ते कुलसुन्दरी ॥१५८॥
नित्यानित्यां तु दशमीं त्रिकुटां वच्मि सांप्रतम् । हंसश्च हृत्प्राणरसाद्वाहकणैः समन्वितः ॥१५९॥
विद्यया कुलसुंदर्या योजितः संप्रदायतः । नित्यानित्यत्रिवर्णयं षड्भिः कूटाक्षरैर्युता ॥१६०॥
जिनके स्मरणमात्र से सर्वज्ञत्व की प्राप्ति होती है। "शुचिः ....... परः"—यह उनका मन्त्र है। तीन
मूल वर्णों से षडंगन्यास करना चाहिये ॥१४१-१४५॥ आदि, मध्य और अवसान में पूजा तथा जप के विधानक्रम
से दीर्घस्वरयुक्त तीन बीजमन्त्रों से हाथ, हृदय तथा मुख में न्यास करना चाहिये। ऊपर, नीचे, पूरब, दक्षिण
और उत्तर दिशा में भी मूलवर्णों से न्यास करना चाहिये। मूलाधार, रंध्र तथा हृदय में प्रथम अक्षर, तीनों
नेत्रों में द्वितीय अक्षर, कान एवम् ठुड्ढी में तृतीय अक्षर, नाक तथा तालू में चतुर्थ अक्षर, कंधे तथा नाभि में
पंचम अक्षर और हाथ, पैर, मूल तथा अन्त में छठे, सातवें, आठवे और नवें अक्षर का न्यास करना चाहिये।
तदनन्तर देवी का ध्यान करे कि उनका वर्ण लाल है, रक्तवर्ण शक्तियां उनकी परिचर्या में लगी हैं, शरीर में रक्त
वस्त्र, आभूषण, माला तथा लेप सुशोभित हैं, उनके छह मुखकमल हैं, बहुमूल्य रत्नजटित शुभ्र मणि का मुकुट
शोभायमान हो रहा है, वक्षःस्थल पर रत्नावली लटक रही है, स्वयं देवी मानों करुणा एवम् परमानन्द की प्रति-
मूर्ति हैं, रक्तकमल के आसन पर बैठी हुई हैं। उनकी आठ भुजायें हैं, वे सर्ववाङ्मयी हैं, दाहिने हाथों
में मूंगा तथा रुद्राक्ष की माला, पद्म, रत्ननिर्मित कमण्डलु, रत्नपूर्ण चषक (प्याला), 'लुंगी' नामक व्याख्यान
मुद्रिका को और बायें हाथों में पुस्तक, लाल कमल, सुवर्ण की लेखनी, रत्नमाला और उत्तम शंख को धारण
किये हुई हैं, उनकी चारों ओर से देव, गंधर्व, किन्नर, यक्ष, राक्षस, दैत्य, ऋषि, सिद्ध, विद्याधर आदि स्तुति
कर रहे हैं ॥१४६-१५५॥
इस प्रकार ध्यान करके वाणी, लक्ष्मी तथा कान्ति की सिद्धि के लिये नित्या देवी की अर्चना करे।
केवल वाक्सिद्धि के लिये सिता देवि की, लक्ष्मी की सिद्धि के लिये हेमप्रभा की, और शत्रुविद्वेष, मृत्यु तथा
निग्रह करने के लिये धूमाभा की पूजा करे। मूक बनाने के लिये नीला देवी का स्मरण करना चाहिये। यह
दसवीं नित्या कुलसुन्दरी का वर्णन किया है। अब दसवीं नित्या-अनित्या त्रिकुटा का वर्णन करूंगा। "हंस ...
८१४ नारदीयपुराणम्
प्रतिलोमाविमौ रूपैद्विसप्ततिमिदा मता । यस्या भजनतः सिद्धो नरः स्यात्खेचरः सुखी ॥१५६१॥
निग्रहानुग्रहौ कर्तुं क्षमः स्याद्भुवनत्रये । दीर्घस्वरसमेताभ्यां हंसहृद्ब्यां षडंगकम् ॥१५६२॥
भ्रूमध्ये कण्ठहृन्नाभिगुह्याधारेषु च क्रमात् । विद्याक्षराणि क्रमशो न्यसेद्बिन्दुयुतानि च ॥१५६३॥
व्यापकं च समस्तेन विधाय विधिना पुनः । ध्यायेत्समस्तसम्पत्तित्हेतोः सर्वात्मिकां शिवाम् ॥१५६४॥
उद्यद्भास्करबिम्बाभां माणिक्यमुकुटोज्ज्वलाम् । पद्मरागकृताकल्पामरुणांशुकधारिणीम् ॥१५६५॥
चारुस्मितलसद्वक्त्रषट्सरोजविराजिताम् । प्रतिवक्त्रं त्रिनयनां भुजैर्द्वादशभिर्युताम् ॥१५६६॥
पाशाक्षगुणपुङ्गेक्षुचापखेटत्रिशूलकान् । करैर्वामैर्दधानां च अङ्कुशं पुस्तकं तथा ॥१५६७॥
पुष्पेषुमंबुजं चैव नृकपालाभये तथा । दधानां दक्षिणेर्हस्तैर्ध्यायेद् वीमनन्यधीः ॥१५६८॥
इत्येषैकादशी प्रोक्ता द्वादशीं शृणु नारद । त्वरितायांत्यमाद्यं स्याद्द्युतिदोहस्वरस्वयुक् ॥१५६९॥
हृच्च दाहक्षमास्वयुतं वञ्नेशीपञ्चमं तथा । मरुत्स्वयुक्तो मथ्याढचोदशम्याः परतः पुनः ॥१५७०॥
भूमी रसाक्षमास्वयुता वज्रेशीत्यष्टमः क्रमात् । षडक्षराणि त्वरिता तृतीयं तदनंतरम् ॥१५७१॥
द्युतिर्दाहचरस्वेन अस्या आचमनन्तरम् । उक्ता नीलपताकाख्या नित्या सप्तदशाक्षरी ॥१५७२॥
द्विद्विपक्षाक्षिषड्वर्णैर्मन्त्रोत्थैरंगकल्पनम् । श्रोत्रादिनासायुगले वाचि कण्ठे हृदि क्रमात् ॥१५७३॥
नामावाधारके ऽप्यापि पादसंधिषु च क्रमात् । मन्त्राक्षराणि क्रमशो न्यसेत्सप्तदशापि च ॥१५७४॥
व्यापकं च समस्तेन विदध्याच्च यथाविधि । इन्द्रनीलनिभां भास्वन्मणिमौलि विराजिताम् ॥१५७५॥
पञ्चवक्त्रां त्रिनयनामरुणांशुकधारिणीम् । दशहस्तां लसन्मुक्तामण्याभरणमंडिताम् ॥१५७६॥
०००मतः" - यह उनका मन्त्र है । उनकी उपासना करने से मनुष्य सुखी, आकाशगामी और तीनों लोक में
निग्रह तथा अनुग्रह करने में समर्थ होता है । दीर्घ मात्रा और स्वर वर्ण समेत अजपा मन्त्र तथा प्रणव से षडंगन्यास
करे ॥१५६-१६२॥ भौं के मध्य, कंठ, नाभि, गुह्य तथा मूलाधार में क्रमशः बिंदुयुक्त विद्याक्षरों का न्यास करके
पुनः विधिपूर्वक सामस्त्येन व्यापक न्यास करे । तदनन्तर अखिल सम्पत्ति की प्राप्ति के लिये सर्वात्मिका शिवा का
ध्यान करे । साधक तन्मनस्क होकर उदयकालीन सूर्यबिंब के समान आभा वाली, शुभ्र मणि का मुकुट तथा
पद्मरागमणि जटित रक्तवस्त्र धारण करने वाली, मन्द मुसकान से सुशोभित छः मुख कमल वाली, प्रत्येक मुख
में तीन-तीन नेत्रों वाली, बारह भुजाओं वाली, बायें हाथों में पाश, रुद्राक्ष, माधवी लता का धनुष, ढाल तथा
त्रिशूल धारण करनेवाली, दाहिने हाथों में अंकुश, पुस्तक, पुष्पबाण, कमल, नरकपाल, और अभयास्त्र रखने वाली
देवी का ध्यान करे ॥१५६३-१५६८॥
नारद ! यह ग्यारहवीं देवी का वर्णन किया है। अब बारहवीं के बारे में सुनो । नीलपताका नामक
नित्या देवी सत्रह अक्षरों वाली हैं। "त्वरिता ००००० अनन्तरम्" - यह उसका मन्त्र है। मन्त्र के चौदह
वर्णों से अंगन्यास करना चाहिये । कान, नाक, कंठ, हृदय, नाभि, मूलाधार तथा चरण संधियों में सत्रहों मन्त्रा-
क्षरों का क्रमशः न्यास करके विधिपूर्वक सम्पूर्ण रूप से व्यापक न्यास करना चाहिये । तदुपरान्त इन्द्रनील मणि
के समान कान्ति वाली, दैदीप्यमान मणि का मुकुट धारण करने वाली, पाँच मुख तथा तीन नेत्र वाली, रक्त
वस्त्र पहनने वाली, दशहस्त परिमित दीर्घाकृति वाली, मणि और मुक्ता के आभूषणों से अलंकृता, रत्नावली से
सुशोभित, मन्द मुसकान युक्त मुख वाली, बायें हाथों में पाश, पताका, चर्म, धनुष तथा वरास्त्र धारण करनेवाली
अष्टाशीतितमोऽध्यायः ८१५
रतनस्तबकसम्पन्नदेहां चारुस्मिताननाम् । पाशं पताकां चर्मापि शाङ्गं चापं वरं करैः ॥१७७॥
दधानां वामपार्श्वस्थैः सर्वाभरणभूषितैः । अंकुशं च तथा शक्तिं खड्गं बाणं तथाभयम् ॥१७८॥
दधानां दक्षिणैर्हस्तैरासीनां पद्मविष्टरे । स्वाकारवर्णवेषास्याण्यायुधविभूषणैः ॥१७६॥
शक्तिवृन्दैर्वृतां ध्यायेद्देवी नित्यार्चनक्रमे । त्रिषट्कोणयुतं पद्ममष्टपत्रं ततो बहिः ॥१८०॥
अष्टास्रं भूपुरद्वन्द्वावृतं तत्पुरयुग्मकम् । चतुर्द्वारयुतं दिक्षु शाखाभिश्च समन्वितम् ॥१८१॥
कृत्वा नामावृतां शक्तिं गणैस्तत्वार्चयेच्छिवाम् । एषा ते द्वादशी नित्या प्रोक्ता नीलपताकिनी ॥१८२॥
समरे विजयं खड्गपादुकांजनसिद्धिदा । वेतालपक्षणीचेटपिशाचादिप्रसाधिनी ॥१८३॥
निधानबिलसिद्धान्तसाधिनी कामचोदिता । अथ त्रयोदशीं नित्यां वक्ष्यामि शृणु नारद ॥१८४॥
रसो नमस्तथा दाहो व्याप्तक्षमावनपूर्विका । स्वेन युक्ता भवेन्नित्या विजयेकाक्षरा मुने ॥१८५॥
विद्याया व्यंजनैर्दीर्घस्वरयुक्तैश्चतुष्टयम् । शेषाभ्यां च द्वयं कुर्यात्षडंगानि करांगयोः ॥१८६॥
ज्ञानेन्द्रियेषु श्रोत्रादिष्वथ चित्ते च विन्यसेत् । अक्षराणि क्रमाद्विन्दुयुतान्यन्यत्तु पूर्ववत् ॥१८७॥
पञ्चवक्त्रां दशभुजां प्रतिवक्त्रं त्रिलोचनाम् । भास्वन्मुकुटविन्यासचन्द्रलेखाविराजिताम् ॥१८८॥
सर्वाभरणसंयुक्तां पीतांबरसमुज्ज्वलाम् । उद्यद्भास्वद्दिवबस्तुल्यदेहकांति शुचिस्मिताम् ॥१८६॥
शंखं पाशं खेटचापौ कह्लारं वामबाहुभिः । चक्रं तथांकुशं खड्गं सायकं मातुलुंगकम् ॥१६०॥
दधानां दक्षिणैर्हस्तैः प्रयोगे भीमदर्शनाम् । उपासनेति सौम्यां च सिंहोपरि कृतासनाम् ॥१६१॥
व्याघ्रारूढाभिरभितः शक्तिभिः परिवारिताम् । समरे पूजनेऽन्येषु प्रयोगेषु सुखासनाम् ॥१६२॥
शक्तयश्चापि पूजायां सुखासनसमन्विताः । सर्वा देव्याः समाकारमुखपाण्यायुधा अपि ॥१६३॥
दाहिने हाथों में अंकुश, शक्ति, खड्ग, बाण तथा अभयास्त्र रखने वाली, अरविन्द के आसन पर बैठने वाली, अपने
समान वर्ण, वेष, आभूषण, तथा आयुधों से युक्त शक्तिगणों से आवृत होने वाली देवी का ध्यान करके पूजन
करे । तब नौ कोण वाले अष्टदल कमल और आठ जगहों में निम्नीभूत भूपूर-द्वय का निर्माण करे, जो चार द्वारों
तथा शाखाओं से समन्वित हो । वहाँ शक्तियों के साथ शिवा की अर्चना करे । यह नीलपताकिनी नामक
बारहवीं नित्या देवी का वर्णन किया, जो समर में विजय तथा खड्ग, पादुका, अंजन, वेताल, यक्षिणी, चेट,
पिशाच, निधि, बिल, सिद्धान्त आदि की सिद्धि अविलम्ब प्रदान करती हैं ।
नारद ! अब इसके बाद तेरहवीं नित्या देवी के विषय में सुनो ॥१६६१-१८४॥ मुने ! "रसो........
भवेत्"-यह एकाक्षरा विजया देवी का मन्त्र है । मन्त्र के व्यंजन तथा दीर्घ स्वर वर्णों से अंगन्यास करना
चाहिये । कर्ण आदि ज्ञानेन्द्रियों में तथा चित्त में बिंदु युक्त अक्षरों का क्रमशः न्यास करना चाहिये । तत्पश्चात्
दैदीप्यमान मुकुट तथा चन्द्रलेखा से सुशोभित, समस्त आभूषणों से आभूषित, पीतवस्त्रधारिणी, उदयकालीन सूर्य
बिम्ब के समान देह कांतिवाली, पवित्र हास्यवाली, वाम करों में शंख, पाश, ढाल, धनुष तथा श्वेत कमल और
दक्षिण हस्तोँ में चक्र, अंकुश, खड्ग, बाण तथा बीजपूर धारण करनेवाली, देखने में भयंकर, उपासना करने में अत्यन्त
सौम्य, सिंह के ऊपर आरूढ, बाघों के ऊपर चढ़ी शक्तियों से परिवेष्टित, संग्राम, पूजन तथा अन्य प्रयोगों में सुख
से आसनोपविष्ट होनेवाली देवी का ध्यान करे । पूजा काल में शक्तियां भी उनके साथ सुख से आसनों पर बैठती
हैं । उनके समान ही उन शक्तियों की भी आकृति मुख तथा अस्त्रविशिष्ट हाथ हैं । ॥१८६-१९३॥ चार द्वार
८१६ नारदीयपुराणम्
चतुरस्रद्वयं कृत्वा चतुर्द्वारोपशोभितम् । शाखाष्टकसमोपेतं तत्र प्राग्वत्समर्चयेत् ॥१९४॥
तदंतर्वृत्तयुग्मांतरष्टकोणं विधाय तु । तदंतश्च तथा पद्मं षोडशच्छदसंयुतम् ॥१९५॥
तथैवाष्टच्छदं पद्मं विधायावाह्य तत्र ताम् । तत्तच्छक्त्या वृतां सम्यगुपचारैस्तथार्चयेत् ॥१९६॥
एषा त्रयोदशी प्रोक्ता वादे युद्धे जयप्रदा । चतुर्दशीं प्रवक्ष्येऽथ नित्यां वै सर्वमंगलाम् ॥१९७॥
हृद्वंबुवनयुक्तं खं नित्या स्यात्सर्वमंगला ॥१९८॥
एकाक्षर्यनया सिद्धो जायते खेचरः क्षणात् । षड्दीर्घाढ्यां मूलविद्यां षडंगेषु प्रविन्धसेत् ॥१९९॥
तां नित्यां जातरूपाभां मुक्तामाणिक्यभूषणाम् । माणिक्यधृन्मुकुटां नेत्रद्वयप्रैंखद्दयापराम् ॥२००॥
द्विभुजां शासनां पद्मे त्वष्टषोडशतद्वयेः । पत्त्रैरुपैते सचतुर्द्वारसूमद्मयुग्मके ॥२०१॥
मातुलुंगफलं दक्षे दधानां करपंकजे । वामेन निजभक्तानां प्रयच्छंतीं धनादिकम् ॥२०२॥
स्वसमानाभिरभितः शक्तिभिः परिवारिताम् । षट्सप्ततिभिरन्याभिरप्सरोत्थामिरन्विताम् ॥२०३॥
प्रयोगेष्वन्यदा नित्यं सपर्यासक्तशक्तिकाम् । एषा चतुर्दशी प्रोक्ता तथा पंचदशीं शृणु ॥२०४॥
भूः शून्यं नभसा भूश्च रसश्चाथ स्थिरांबु च । रयोगिना युतीज्यांबुमरुद्युक्तारखा मरुत् ॥२०५॥
नभश्च महता युक्तं रसा शून्येऽपि संयुते । गोत्रा चरेण सहिता अंबुपूवर्क्षरस्तथा ॥२०६॥
अंब्वग्नी हृच्च दाहांबुरसक्ष्मारयहृत्स्वयुक् । हंसश्च महता दाहः प्राणश्च महतायुतः ॥२०७॥
दाहः साग्निप्राणचरौ ज्यामरुत्सहितारयः । चरेणांबु च गोत्राहृत्साग्निर्ज्या'बुरसा स्वयुक् ॥२०८॥
रयः साग्निर्ज्या'बुरसा पुनरेतेजवो ततः । दाहेनानेन ते द्विः स्याद्ध्रस्वो दाहमरुत्स्वयुक् ॥२०९॥
हंसः सदाहवह्निस्त्रो दाहक्ष्मास्वयुतश्च सः । सप्तदाहास्ततोऽस्याः स्युरष्टमाद्यास्तु पंच ते ॥२१०॥
तथा आठ शाखा वाले चतुरस्र (चौकोर) पीठ बनाकर वहाँ पूर्ववत् अर्चना करे । उस पर अष्टकोण, षोडशदल
तथा अष्टदल कमल की रचना कर शक्ति समेत देवी का आवाहन करके सम्यक् उपचारों से उनका
पूजन करे । यह युद्ध में तथा वाद-विवाद में विजय देने वाली तेरहवीं देवी का वर्णन किया ।
अब सर्वमंगला नामक चौदहवीं देवी का वर्णन करूँगा । “हृत् ............”—यह उनका मंत्र है ।
वह एकाक्षरी देवी कहलाती हैं । उनके मन्त्र सिद्ध हो जाने पर मनुष्य तत्क्षण आकाश में विचरने की क्षमता
प्राप्त कर लेता है । छह दीर्घ मात्राओं से युक्त मूल मन्त्र से षडंगन्यास करना चाहिये । तदनन्तर देवी का इस
प्रकार ध्यान करे कि उनका वर्ण चांदी के समान धवल है, आभूषण मोती और मणि के हैं, मुकुट मणिमय है,
दोनों नेत्र दया से आर्द्र हैं, भुजायें दो हैं, चार द्वार वाले भूगृह में वे अष्टदल, षोडशदल तथा शतदल कमल पर
आसीन हैं, दाहिने करकमल में बीजपुर धारण किये हुई हैं, बायें हाथ से अपने भक्तों को धन आदि प्रदान करती
हैं, अपने समान शक्तिगणों से परिवेष्टित हैं और छिहत्तर अन्य अप्सराओं से भी युक्त हैं ॥१९४-२०३॥ प्रयोग
में तथा अन्य समय भी उक्त शक्तियों के साथ देवी की अर्चना करनी चाहिये । यह चौदहवीं देवी का वर्णन
किया । अब पन्द्रहवीं देवी का वर्णन सुनो । “भूः......”—यह उनका मंत्र है । वह ज्वालामालिनी नामक
नित्या देवी तिरसठ अक्षरों से युक्त हैं । मूलमंत्र के प्रथम, द्वितीय, चतुर्थ, पंचम तथा दशम अक्षरों से अंगन्यास
करे । आदि से छह कर तथा अंगों में न्यास करे । तदनन्तर शेष अक्षरों से व्यापकन्यास करके
सवातनी देवी का इस तरह ध्यान करे कि प्रज्वलित अग्नि के समान उनका वर्ण है, शुभ्र मणि का मुकुट है,
छह मुख हैं, बारह भुजायें हैं, वे समस्त आभूषणों से भूषिता हैं, करकमलों में पाश, अंकुश, खड्ग, ढाल, बाण
अष्टाशीतितमोऽध्यायः ५१७
उपांख्याधः स्थितं नीलपताकाया अनंतरम् । त्वरिता त्वं च भेरुंडाष्टमं च नवमं तथा ॥२११॥
सा ज्वालामालिनी नित्या त्रिषष्टचर्णा समीरिता । एकद्वयचतुःपंचचतुष्टयदशाक्षरैः ॥२१२॥
कुर्यादंगानि मूलार्णैरादितः षट्करांगयोः । शेषैस्तु व्यापकं कुर्यात्ततो ध्यायेत्सनातनीम् ॥२१३॥
ज्वलज्ज्वलनसंकाशां माणिक्यमुकुटोज्ज्वलाम् । षड्वक्त्रां द्वादशभुजां सर्वाभरणभूषिताम् ॥२१४॥
पाशांकुशौ खड्गखेटौ चापबाणौ गदादरौ । शूलवह्नी वराभीतौ दधानां करपंकजैः ॥२१५॥
स्वप्रमाणाभिरभितः शक्तिभिः परिवारिताम् । चारुस्मितलसद्वक्त्र सरोजां त्रीक्षणान्विताम् ॥२१६॥
ध्यात्वैवमुपचारैस्तैरर्चयेत्तां तु नित्यशः । चतुरस्रद्वयं कृत्वा चतुर्द्वारसमन्वितम् ॥२१७॥
सशाखमष्टपत्राब्जमंतरा त्र्यस्रकं ततः । षट्कोणं मध्यतस्त्यस्रं विधायाथ शिवां यजेत् ॥२१८॥
एषा पंचदशी प्रोक्ता षोडशीं शृणु नारद । वायुप्रणवतत्त्वैस्तु चित्रास्पादक्षरद्वया ॥२१९॥
या सिद्धा धनधान्यात्मनिधिलाभाय कल्प्यते । विद्याद्यवायुना कुर्याद्दीर्घस्वरयुजा क्रमात् ॥२२०॥
षडंगानि यथापूर्वं मातृकां विद्यया न्यसेत् । उद्यदादित्यबिंबाभां नवरत्नविभूषणाम् ॥२२१॥
नवरत्नकिरीटां च चित्रपट्टांशुकोज्ज्वलाम् । चतुर्भुजां त्रिनयनां शुचिस्मितलसन्मुखीम् ॥२२२॥
सर्वानंदमयीं नित्यां समस्तेप्सितदायिनीम् । चतुर्भुजेषु वै पाशमंकुशं वरदाभये ॥२२३॥
दधानां मंगलापद्मकर्णिकायोनिमध्यगाम् । तच्छक्तिभिश्च तच्चक्रे तथैवार्चनमीरितम् ॥२२४॥
प्राणदाहौ धरायुक्तौ पुनराद्यं रसे महत् । व्यासं मरुच्छक्तियुतं भूः स्वयुक्ता ततस्त्रयम् ॥२२५॥
अस्या आद्यं रसाक्षुब्धं चरणेन प्रयोजितम् । दाहेन वन्हिशक्तिभ्याम् युतो हंसस्ततः परम् ॥२२६॥
नभो दिहंत्सदाहांबुज्या शून्यं स्वेन संयुतम् । अंबु पश्चाद्विषयुतं मरुता तु नज्ञोयुतम् ॥२२७॥
शून्यं व्याप्तं भुजा हंसः पूर्वोक्त्यो स्यान्मनुत्रयम् । अस्याः षष्ठादिपंचाणां दैत्यास्यादाद्य ईरितः २२८॥
एकादशाक्षरादंत्या द्वितीयः खंड ईरितः । तृतीयः पंचविंशार्णः प्रोक्ता मंत्रा इति क्रमात् ॥२२९॥
बाण, गदा, त्रिशूल, अग्नि, वरास्त्र एवम् अभयास्त्र धारण किये हुई हैं। अपने सदृश शक्तियों से परिवेष्टित
रहती हैं, उनका मुखारविन्द मनोहर हास्य से सुशोभित है और नेत्र तीन हैं। इस प्रकार ध्यान करके सकल उप-
चारों से उनकी पूजा करे। तदनन्तर चार द्वार वाले भूगृह का निर्माण कर उसके भीतर अष्टदल कमल तथा
शाखाओं से युक्त चौकोर तथा षट्कोण पीठ की रचना करे। फिर वहाँ शिवा की अर्चना करे ॥२०४-२१८॥
नारद ! यह पन्द्रहवीं नित्या का वर्णन हुआ। अब सोलहवीं देवी का वर्णन सुनो। वायु और प्रणव तत्त्वों से
युक्त चित्रा देवी दो अक्षरों की हैं, जिनकी सिद्धि हो जाने पर धन, धान्य तथा आत्मनिधि का लाभ होता है,
दीर्घस्वर युक्त बीजमंत्र से क्रमशः षडंगन्यास तथा मातृकान्यास करना चाहिए। तत्पश्चात् उदयकालीन सूर्यबिंब
के समान कान्तिवाली, नौ रत्नों के आभूषण तथा मुकुट धारण करनेवाली, चित्र-पट्ट एवम् शुक्ल वस्त्र धारण
करने वाली, चार भुजाओं तथा तीन नेत्रों वाली मन्द मुस्कान से सुशोभित मुखवाली, सबको आनन्द देनेवाली,
सकल कामनाओं को पूर्ण करनेवाली, चारों भुजाओं में पाश, अंकुश, वरास्त्र तथा अभयास्त्र धारण करनेवाली,
और पद्मकर्णिका के समान बनी योनिमुद्रा के मध्य में बैठनेवाली मंगलमयी देवी का ध्यान करके शक्तियों समेत
उनकी अर्चना करे ॥२१९-२२४॥ तदुपारान्त "प्राण दाहो••••••••", "अस्या'•••••" एवम् "नभः••••
•••" इन तीन मंत्रों से षडंगन्यास करके बिखरे हुए केश वाली, नग्ना, रक्तवर्णा, आनंद स्वरूपिणी तथा हाथों
१०३ ना० पु०
८१८ नारदीयपुराणम्
बाला बीजत्रयाद्यैर्द्विस्त्रिर्मन्त्रैः षडंगकम् । विक्कीर्णकुंतलां नग्नां रक्ताभानन्दविग्रहाम् ॥२३०॥
दधानां चिंतयेद्रत्नचापपाशासृणी करैः । तत्समानायुधाकारवर्णा देव्यस्तु बाह्यगाः ॥२३१॥
ऋतुस्नाताः स्फुरद्योन्यः सदानंदारुणेक्षणाः । इत्येषा कुरुकुल्लांते प्रोक्ता चंद्रावली स्वयम् ॥२३२॥
वाराहीमभिधास्यामि ललितायाः परा तनुः । शुचिः स्वेनाथ शून्यं स्यान्नभसाभ्ररसस्थिरा ॥२३३॥
अंबु पश्चाद्वयः साग्निर्मरुताम्बुरयो तथा । इलायुतोऽग्निरेतानि पुनरंबुमरुद्यतम् ॥२३४॥
दाहारम्बुमरुनाहंसस्त्वग्निने तत्वयं पुनः । अम्बुदाहौ मरुद्व्यक्तौ हंसोऽथ धरया नमः ॥२३५॥
तेजोग्निना पुनः पंच वातः स्वेन समायुतः । तोयं चरेण तत्पूर्वं तोयमग्नियुतं ततः ॥२३६॥
शून्यं व्याप्येन शुचिना शून्यं शक्त्या नमो युतम् । दाहो धरा स्वसहितस्तोयं चरसमन्वितम् ॥२३७॥
एतत्पूर्वमधुः प्रोक्तं चतुष्टयमतः परम् । ज्याह्येन युक्ता सचरो रभश्चैतस्य पूर्वकम् ॥२३८॥
रसोऽग्निना पुनः प्रोक्तं चतुष्का अपयं ततः । शुभाभ्रता चरेणापि हंसः स्वेन सपूर्वकम् ॥२३९॥
हंसाऽग्निना प्राक् वितयं हृदयं स्वसमायुतम् । रसश्चरेण तत्पूर्वमग्निना चरसो युतः ॥२४०॥
पश्चादुक्तत्रयं वातो धरया च नभोन्वितम् । प्राणः स्वेन युतः पश्चाद्ध्रदयस्रयुतं रसः ॥२४१॥
व्याप्तमतत्वयं पश्चाद्दाहेनांबु समन्वितम् । गोत्राम्रायुता स्पर्शो नाद्युक्तो जबीयुतः ॥२४२॥
दाहेन पूर्वपूर्वं च पूर्व च मरुता युतम् । शून्यं मरुत्स्वसहितं हृद्दाहेनांबना चरः ॥२४३॥
स्पर्शा मरुत्स्वसहितो हृद्दाहेनाम्बुसंयुतम् । ज्याग्निः स्वसंयतो हंसस्तथाब मरुता सह ॥२४४॥
हृद्रूपेण स्वेन युतं रसश्च स्वेन संयुतः । प्राणदाहौ धरायक्तौ पुनस्तो वह्निना वियत् ॥२४५॥
वाह्निव्यक्तमंब स्याद्विषट्चास्रवसंयुक्तम् । पूर्वद्विरुक्तवर्णौ च शुद्धिः स्वेन युतस्तथा ॥२४६॥
स्थिरा रसा वतस्वेन दावो हंसा धरा स्वयुक् । युतिर्नादवती पश्चाद्दधदंबुमरुता युतम् ॥२४७॥
हंसश्च मरुता विद्यः दशात्तरशताक्षरी । वाराही पश्चमी विश्वविजया भद्रकौमुदी ॥२४८॥
वार्त्तालीति च विख्याता स्तंभनाद्यखिलेष्टदा । अंगानि कुर्यान्मन्त्राणैः सप्तभिःषड्भिरेव च ॥२४९॥
दशभिः सप्तभिः सप्तसंख्यैर्जातिभिरन्विताः । त्रिकोणवृत्तषट्कोणवृत्तद्वयसमन्वितम् ॥२५०॥
विधाय चक्रं तत्रैव स्वनामाल्लिख्य पूजयेत् । ध्यायच्च देवीँ कीलास्यां ततः कांचनसन्निभाम् ॥२५१॥
आकंठं वनितारूपां ज्वलत्पद्मपसरोरुहाम् । त्रिनेत्रामष्टहस्तां च चक्रं शंखमथांकुशम् ॥२५२॥
पाशं च मुशल शोभंममयं वरदं तथा । दधानां गरुडस्कन्धे सुखासीनां विचिंतयेत् ॥२५३॥
में बाण, धनुष, पाश एवम् अंकुश धारण करने वाली देवी और उनके समान आयुध, आकार एवम् वर्णवाली,
ऋतुस्नाता, स्फुरणशील योनिवाली और सदा आनन्द से लाल नेत्रों वालो अन्य देवियों का ध्यान करना
चाहिए। यह साक्षात् चन्द्रावली जैसी कुरुफुल्ला के बारे में कहा, अब ललिता की उत्कृष्ट रूप-वाराही के
विषय में कहूँगा। "शुचि.....विद्या" - यह उनका एक सौ दश अक्षरों का मंत्र है। स्तंभन आदि अखिल
कामनाओं का पूर्ण करनेवालो वाराही देवी पंचमी, विश्वविजया, भद्र कौमुदी तथा वार्ताली नाम से भी विख्यात
हैं। छह या सात मंत्राक्षरों से अंगन्यास करना चाहिये। तत्पश्चात् त्रिकोणवृत्त और षट्कोणवृत्त सहित चक्र
का निर्माण कर वहाँ अपना नाम लिखकर पूजन करे ॥२२५-२५०॥ अनन्तर कोल के समान मुखवाली, सुवर्ण के
समान आभावाली, कंठ तक वनिता का रूप धारण करनेवाली तीन नेत्रों तथा आठ हाथों वाली, चक्र, शंख, अंकुश,
पाश, मुशल, अभयास्त्र, काल, तथा पोतरुमल धारण करने वाली ओर गरुड़ के कन्धे पर सुख से बैठने वाली
एकोननवतितमोऽध्यायः ६१६
नित्यपूजासु तच्छक्तीस्तत्तत्स मानाःस्मरेन्मुने। प्रयोगेषु [स्मरेद्देवीं सिंहस्थां व्याघ्रगामपि ॥२५४॥
गजारूढां हयारूढां तार्क्ष्यारूढां च शक्तिभिः । श्यामामप्यरुणां पीतामसितांभोजविग्रहाम् ॥२५५॥
तत्तत्प्रयोगेषु तथा ध्यायेत्तत्तदवाप्तये । अरूणां पंचमीं वश्ये पीतां स्तंभनके स्मरेत् ॥२५६॥
श्यामां च दुर्गे मार्गे सितां युद्धेऽरिनष्टये । धूम्रामुच्चाटने ध्यायेत्साधको द्विजसत्तमः ॥२५७॥
एताः षोडश नित्यास्ते संक्षेपात्समुदीरिताः । भजतामिष्टदाः सद्यः सर्वपापक्षयंकराः ॥२५८॥
इति श्रीबृहन्नारदीयपुराणे पूर्वभागे बहुदुपाख्याने तृतीयपादे राधादिमन्त्रनिरूपणं
नामाष्टाशीतितमोऽध्यायः ॥८८॥
एकोननवतितमोऽध्यायः
सनत्कुमार उवाच
अथा सामावृत्तिस्थानां शक्तीनां समयेन च । नाम्नां सहस्रं वक्ष्यामि गुरुध्यानपुरःसरम् ॥१॥
नाथा नव प्रकाशाद्याः सुभगांताः प्रकीर्तिताः । भूम्यादीनि शिवांतानि विद्धि तत्त्वानि नारद ॥२॥
गुरुजन्मादिपर्वाणि दर्शान्तानि च सप्त वै । एतानि प्राङ्मनोवृत्त्या चिंतयेत्साधकोत्तमः ॥३॥
देवी का ध्यान करे । मुने ! नित्याओं की पूजा में तत्सदृश शक्तियों की भी अर्चना करे । प्रयोगकाल में सिंह, बाघ,
हाथी, अश्व तथा गरुड़ पर शक्तियों के साथ बैठी हुई देवी का ध्यान करना चाहिये । तदनन्तर श्याम, रक्त पीत
तथा श्वेत कमल के समान शरीर वाली देवी का ध्यान करे । पश्चात् वस्तुओं की प्राप्ति के लिये तत्तत् प्रयोगों
में उक्त प्रकार का ध्यान करना चाहिए । द्विजवर ! साधक वशीकरण में रक्तवर्ण वाली, स्तंभन में पीतवर्ण वाली
दुर्गम मार्ग में श्यामवर्ण वाली, युद्ध में शत्रुनाश के लिये शुक्ल वर्ण वाली और उच्चाटन में धूम्रवर्ण वाली देवी
का ध्यान करे । इस तरह मैंने सोलह नित्याओं का, जो भक्तों को सद्यः अभीष्ट फल देने वाली, तथा समस्त
पापों का क्षय करने वाल हैं, संक्षिप्त वर्णन कर दिया ॥२५१-२५८॥
श्रीनारदीयपुराण के पूर्वार्ध में बृहदुपाख्यानयुक्त तृतीयपाद में राधादिमंत्र निरूपण नामक
अठ्ठासीवां अध्याय समाप्त ॥८८॥
अध्याय ८९
कवच सहित ललिता सहस्रनामस्तोत्र
सनत्कुमार बोले--इसके उपरान्त गुरु का ध्यान करके मैं सामवेद के अनुसार शक्तियों के सहस्र नामों
को यथार्थतः प्रतिपादन करूंगा । नारद ! प्रकाशा से लेकर सुभगा तक नौ देवियां स्वामिनी कहलाती हैं ।
भूमि से लेकर शिवा तक तत्त्वों को समझिये । गुरुजन्म से लेकर दर्श तक सात पर्व हैं । उत्तम साधक पहले
२२० नारदीयपुराणम्
गुरुस्तोत्रं जपेच्चापि तद्गतेनान्तरात्मना । नमस्ते नाथ भगवञ्छिवाय गुरुरूपिणे ॥४॥
विद्यावतारसंसिद्ध्यै स्वीकृतानेकविग्रह । नवाय नवरूपाय परमार्थैकरूपिणे ॥५॥
सर्वाज्ञानतमोभेदभानवे चिद्धनाय ते । स्वतंत्राय दयाक्लृप्तविग्रहाय शिवात्मने ॥६॥
परतन्त्राय भक्तानां भव्यानाम् भव्यरूपिणे । विवेकिनां विवेकाय विमर्शाय विमर्शिनाम् ॥७॥
प्रकाशानां प्रकाशाय ज्ञानिनां ज्ञानरूपिणे । पुरस्तात्पार्श्वयोः पृष्ठे नमः कुर्यादुपर्यधः ॥८॥
सदा मच्चित्तसदने विधेहि भवदासनम् । इति स्तुत्वा गुरुं भक्त्या परां देवीं विचिंतयेत् ॥६॥
गणेशग्रहनक्षत्रयोगिनीराशिरूपिणीम् । देवीं मंत्रमयीं नौमि मातृकापीठरूपिणीम् ॥१०॥
प्रणमामि महादेवीं मातृकाम् परमेश्वरीम् । कालहल्लोललोलोहकलानाशनकारिणीम् ॥११॥
यदक्षरैकमात्रेऽपि संसिद्धे स्पद्धंते नरः । रवितार्क्ष्यदुकन्दर्पः शंकरानलविष्णुभिः ॥१२॥
यदक्षरशशिज्योत्स्नामंडितं भुवनत्रयम् । वन्दे सर्वेश्वरीं देवीं महाश्रीसिद्धमातृकाम् ॥१३॥
यदक्षरमहासूत्रप्रोतमेतज्जगत्त्रयम् । ब्रह्माण्डादिकटाहान्तं तां वन्दे सिद्धमातृकाम् ॥१४॥
यदेकादशमाधारं बीजं कोणत्रयोद्भवम् । ब्रह्माण्डादिकटाहान्तं जगद्व्यापि दृश्यते ॥१५॥
अकचादिटतोन्नद्धषट्पञ्चाक्षरवणिणीम् । ज्येष्ठांगबाहुहृत्कंठकटिपादनिवासिनीम् ॥१६॥
नौमीकाराक्षरोद्धारां सारात्सारां परात्पराम् । प्रणमामि महादेवीं परमानन्दरूपिणीम् ॥१७॥
अद्यापि यस्या जानंति न मनागपि देवताः । केयं कस्मात्क्व केनेति सरूपारूपभावनामू ॥१८॥
इन वस्तुओं का मनोयोग पूर्वक चिन्तन करे। पश्चात् गुरु में चित्त को लगाकर उनके स्तोत्र का इस प्रकार पाठ
करे— "नाथ ! आपको नमस्कार है। भगवन् ! गुरुरूप शिव को नमस्कार है ॥१-४॥ विद्या के अवतारों की
सिद्धि के लिये अनेक शरीर धारण करने वाले आपको नमस्कार है। नव, नवरूप और परमार्थैकरूप आपको
नमस्कार है। संपूर्ण अज्ञानरूपी तम को नष्ट करने वाले ! भानु, चित् एवम् घनरूप आपको नमस्कार है।
भक्तों के परतन्त्र, भव्यों के भव्य रूप, विवेकियां के विवेक रूप, विमर्शियों के विमर्श रूप, प्रकाशकों के प्रकाश
रूप और ज्ञानियों के ज्ञानरूप आपके आगे, पीछे, ऊपर, नीचे तथा दोनों पार्श्व भाग से नमस्कार करता हूँ। आप
सदा मेरे मानस मन्दिर में आसन जमाइये।" इस प्रकार भक्तिपूर्वक गुरु की स्तुति कर परा देवी का ध्यान
करे— "गणेश, ग्रह, नक्षत्र, योगिनी, राशि तथा मातृका पीठ रूपिणी एवम् मंत्रमयी देवी को नमस्कार करता
हूँ। परमेश्वरी, मातृका तथा समयापहारी लोह-कला का नाश न करने वाली महादेवी को नमस्कार
करता हूँ। जिन देवी के मंत्र के एक अक्षर भी सिद्ध हो जाने पर मनुष्य सूर्य, चन्द्रमा, कन्दर्प, शंकर, अग्नि
तथा विष्णु से प्रतिस्पर्धा करता है तथा जिनके अक्षर से तीनों लोक व्याप्त हैं, उन महाश्री, सिद्धि तथा
मातृका रूप सर्वेश्वरी देवी की वंदना करता हूँ ॥५-१३॥ जिनके अक्षर रूप महासूत्र में ब्रह्मांड से
लेकर कटाह पर्यन्त तीनों जगत् ओत-प्रोत हैं, उन सिद्धमातृका को प्रणाम करता हूँ। ब्रह्माण्डादि कटाह
पर्यन्त जगत् जिनके त्रिकोणोत्पन्न एकादश आधार बीज में समाविष्ट होते हुए आज भी दीखता है, उन देवी
की मैं वंदना करता हूँ। अ, क, च, ट, प, य तथा श अक्षरों में और शिर, बाहु, हृदय, कंठ तथा चरणों
में निवास करनेवाली देवी को नमस्कार करता हूँ। ईकार अक्षर का उद्धार करनेवाली, सार से भी सार,
श्रेष्ठ से भी श्रेष्ठ, परमानन्द रूपिणी महादेवी को प्रणाम करता हूँ। देवगण जिनके विषय में कुछ भी नहीं
जानते हैं अर्थात् वे कौन हैं ? किससे हुईं ? कहाँ हुईं ? क्यों हुईं ? इस मूर्तामूर्त भावना को बिलकुल नहीं जानते
एकोननवतितमोऽध्यायः ८२१
वन्दे तामहमक्षय्यां क्षकाराक्षररूपिणीम् । देवीं कुलकलोल्लोलप्रोल्लसन्तीं शिवां पराम् ॥१९॥
वर्गानुक्रमयोगेन यस्याख्योमाष्टकं स्थितम् । वन्दे तामष्टवर्गोत्थमहासिद्धादिकेश्वरीम् ॥२०॥
कामपूर्णजकाराख्य सुपीठान्तन्निवासिनीम् । चतुराज्ञाकोशभूतां नौमि श्रीत्रिपुरामहम् ॥२१॥
एतत्स्तोत्रं तु नित्यानां यः पठेत्सुसमाहितः । पूजादौ तस्य सर्वास्ता वरदाः स्युर्न संशयः ॥२२॥
अथ ते कवचं देव्या वक्ष्ये नवरतात्मकम् । येन देवासुरनरजयी स्यात्साधकः सदा ॥२३॥
सर्वतः सर्वदात्मानं ललिता पातु सर्वगा । कामेशी पुरतः पातु भगमाली त्वनन्तरम् ॥२४॥
दिशं पातु तथा दक्षपार्श्वं मे पातु सर्वदा । नित्यक्लिन्नाथ भेरुण्डा दिशंमे पातु कौणपीम् ॥२५॥
तथैव पश्चिमं भागं रक्षताद्वह्निवासिनो । महावज्रेश्वरी नित्या वायव्ये मां सदावतु ॥२६॥
वामपार्श्वं सदा पातु इतोभेलांरता ततः । माहेश्वरी दिशं पातु त्वरितं सिद्धिदायिनी ॥२७॥
पातु मामूर्ध्वतः शश्वद्देवताकुलसुंदरी । अधोनीलपताकाख्या विजया सर्वतश्च माम् ॥२८॥
करोतु मे मंगलांनि सर्वदा सर्वमंगला । देहेंद्रियमनःप्राणाञ्ज्वालामालिनिविग्रहा ॥२९॥
पालयत्वनिशं वित्ता चित्तं मे सर्वदावतु । कामात्क्रोधात्तथा लोभान्मोहान्मानान्मदादपि ॥३०॥
पापान्मां सर्वतः शोकात्संशयात्सर्वतः सदा । असत्यात्क्रूरचिंतातो हिंसातश्चौरतस्तथा ॥३१॥
स्तैमित्याच्च सदा पांतु प्रेरयत्यः शुभं प्रति
नित्याः षोडश मां पांतु गजारूढाः स्वशक्तिभिः । तथा हयसमारूढाः पांतु मां सर्वतः सदा ॥३२॥
सिंहारूढास्तथा पांतु पांतु ऋक्षगता अपि । रथारूढाश्च मां पांतु सर्वतः सर्वदा रणे ॥३३॥
उन क्षकाराक्षर रूप वाली, कभी नष्ट न होने वाली, वाम-मार्ग के नाद से चंचल तथा शोभित होने वाली श्रेष्ठ
शिवा देवी को प्रणाम करता हूँ। वर्गों के अनुक्रम-योग से जिनके नाम पर उमाष्टक बना है, उन अष्ट वर्ग से
उद्भूत महासिद्धि आदि की स्वामिनी की मैं वन्दना करता हूँ। ॥१४-२०॥ कामपूर्ण जकार संज्ञक सुन्दर पीठ
के भीतर निवास करने वाली और चार आज्ञाकोशों से युक्त श्री त्रिपुरा को नमस्कार करता हूँ। पूजा के
आरम्भ में जो व्यक्ति अत्यन्त सावधानी से नित्याओं के इस स्तोत्र का पाठ करेगा, उसे सकल देवियों का वरदान
मिलेगा, इसमें संशय नहीं ॥२१-२२॥
इसके उपरान्त देवी के नवरतात्मक कवच को बता रहा हूँ। जिसके पाठ से साधक देवताओं, असुरों,
तथा मनुजों पर सदा विजय प्राप्त करता है। कवच-- "सर्वत्र गमन करने वाली ललितादेवी सदा सब ओर से
मेरी रक्षा करें। कामेशी अग्रभाग से और भगमाली पृष्ठ भाग से रक्षा करे। नित्यक्लिन्ना मेरे दक्षिण
पाश्र्वं तथा पूर्व दिशा की रक्षा करें। भेरुंडा उत्तर दिशा ओर वह्निवासिनी पश्चिम दिशा की रक्षा करें।
महावज्रेश्वरी दक्षिण दिशा की रक्षा करें। ललितादेवी सदा मेरे वामपार्श्व की रक्षा करें। सिद्धिदायिनी
माहेश्वरी समस्त दिशाओं में मेरी रक्षा करें। कुलसुन्दरी सदा ऊपर से और नीलपताका नीचे
से रक्षा करें। विजयादेवी सब ओर से मेरी रक्षा करें। सर्व मंगला सदा मेरा कल्याण करें। ज्वाला-
मालिनी देह, इंद्रिय, मन तथा प्राणों की रक्षा करें ॥२३-२९॥ वित्ता सदा मेरे चित्त की रक्षा करें। अपनी
शक्तियों समेत गजों पर आरूढ सोलह नित्यादेवियाँ रक्षा करें। काम, क्रोध, लोभ, मोह, मान, मद, पाप,
शोक, क्षय, असत्य, क्रूर चिंता, हिंसा, स्तेय, तथा जड़ता से मुझे बचायें और शुभ कर्मों की प्रेरणा दें।
अश्वों पर आरूढ देवियाँ, सदा सब ओर से मेरी रक्षा करें। सिह्मरूढ, ऋक्षारूढ, तथा रथारूढ देवियाँ सदा
६२२ नारदीयपुराणम्
तार्क्ष्यारूढाश्च मां पांतु तथा व्योमगताश्च ताः । भूतगाः सर्वगाः पान्तु पान्तु देव्यश्च सर्वदा ॥३४॥
भूतप्रेतापिशाचाश्च परकृत्यादिकान् गदान् । द्रावयंतु स्वशक्तीनां भूषणैरायुधैर्मम ॥३५॥
गजाश्वद्वीपिपंचास्यतार्क्ष्यारूढाखिलायुधाः । असंख्याः शक्तयो देव्यः पान्तु मां सर्वतः सदा ॥३६॥
सायं प्रातर्जपन्नित्याकवचं सर्वरक्षकम् । कदाचिन्नाशुभं पश्येत्सर्वदानंदमास्थितः ॥३७॥
इत्येतत्कवचं प्रोक्तं ललितायाः शुभावहम् । यस्य संधारणात्मर्त्यो निर्भयो विजयो सुखी ॥३८॥
अथ नाम्नां सहस्रं ते वक्ष्ये सावरणार्चनम् । षोडशानामपि मुने स्वस्वक्रमगतात्मकम् ॥३६॥
ललिता चापि वा कामेश्वरी च भगमालिनी । नित्यक्लिन्ना च भेरुंडा कीर्तिता वह्निवासिनी ॥४०॥
वज्रेश्वरी तथा दूती त्वरिता कुलसुंदरी । नित्या संवित्त्था नीलपताका विजयाह्वया ॥४१॥
सर्वमंगळिका चापि ज्वालामालिनिसंज्ञिता । चित्रा चेति क्रमान्नित्याः षोडशापीष्टविग्रहाः ॥४२॥
कुरुकुल्ला च वाराही द्वे एते चेष्टविग्रहे । वशिनी चापि कामेशी मोहिनी विमलारुणा ॥४३॥
तपिनी च तथा सर्वेश्वरी चाध्यक्ष कौलिनी । मुद्राणंतनुरिष्वर्णरूपा चापार्णविग्रहा ॥४४॥
पाशवर्णशरीरा चाकुर्वर्णमुखपुंदरा । त्रिखंडा स्थापनी सन्निरोधनी चावगुंठनी ॥४५॥
सन्निधानेषु चापाख्या तथा पाशांकुशाभिधा । नमस्कृतिस्तथा संक्षोभणी विद्रावणी तथा ॥४६॥
आकर्षणी च विख्याता तथै वावेशकारिणी । उन्मादिनी महापूर्वा कुशाथो खेचरी मता ॥४७॥
बीजा शक्त्युत्थापना च स्थूलसूक्ष्मपरामिधा । अणिमा लघिमा चैव महिमा गरिमा तथा ॥४८॥
प्राप्तिः प्रकाम्यता चापि चेशिता वशिता तथा । भुक्तिः सिद्धिस्तथैवेच्छा सिद्धिरूपा च कीर्तिता ॥४९॥
ब्राह्मी माहेश्वरी चैव कौमारी वैष्णवी तथा । वाराहींद्राणी चामुंडा महालक्ष्मीस्वरूपिणी ॥५०॥
मेरी रक्षा करें। गरुड़ पर आसीन देवियां सदा मेरो रक्षा करें। आकाशगामिनी, भूतगामिनी तथा सर्वगामिनी
देवियां सर्वदा मेरी रक्षा करें। तथा अपनी शक्तियों के आयुधों से भूत, प्रेत, पिशाच, कृत्या आदिकों का संहार
करें। गज, अश्व, व्याघ्र, सिंह तथा गरुड़ पर आरूढ एवम् अखिल आयुधों से युक्त असंख्य शक्ति देवियां सदा
सब ओर से मेरी रक्षा करें ॥३०-३६॥ जो मानव प्रातःकाल तथा सायंकाल इस सर्वरक्षक नित्याकवच का
पाठ करता है, वह सर्वदा आनंद को प्राप्त करता है, अशुभ को तो कभी देखता ही नहीं। यह ललिता का मुख-
दायक कवच मैंने तुम्हें सुना दिया। जो मनुष्य इसको धारण करेगा, वह निर्भय, विजयी तथा सुखी होगा
॥३७-३८॥
मुने ! अब इसके बाद सोलह नित्याओं के सहस्र नामों को क्रमशः अर्चनविधि पूर्वक बताऊंगा-
'ललिता, कामेश्वरी, भगमालिनी, नित्यक्लिन्ना, भेरुंडा, वह्निवासिनी, वज्रेश्वरी, दूती, त्वरिता, कुलसुन्दरी,
संवित्, नीलपताका, विजया, सर्वमंगळिका, ज्वालामालिनी तथा चित्रा-ये सोलहों नित्यायै इष्टांवग्रहा कहलाती
हैं। कुरुकुल्ला तथा वाराही ये दोनों भी इष्टविग्रहा हैं। वशिनी, कामेशी, मोहिनी, विमला, अरुणा, तपिनी,
सर्वेश्वरी, कौलिनी, मुद्रातनु, इषूवर्णरूपां, चापवर्णविग्रहा, पाशवर्णशरीरा, चातुवर्णं देहा (?), त्रिखंडा,
स्थापनी, सन्निरोधनी, अवगुण्ठनी, समीपेष्वापा, पाशांकुशा, मनस्कृति, संक्षोभणी, विद्रावणी, आकर्षणी, आवेश-
कारिणी, उन्मादिनी, महापूर्वा, कुशा, खेचरी, बीजा, शक्त्युत्थापना, स्थूलसूक्ष्मपरा, अणिमा, लघिमा, महिमा,
गरिमा, प्राप्ति, प्रकाम्यता, ईशिता, वशिता, भुक्ति, सिद्धि, इच्छासिद्धि, ब्राह्मी, माहेश्वरी, कौमारी, वैष्णवी,
वाराही, इन्द्राणी, चामुण्डा, महालक्ष्मीस्वरूपिणी, कामा, बुद्धि, अहंकार-शब्द-स्पर्श-स्वरूपिणी, रूपरूपा, रसा,
एकोननवतितमोऽध्यायः ८२३
कामा बुद्धिरहंकारशब्दस्पर्शस्वरूपिणी । रूपरूपा रसाह्ला च गंधवित्तधृतिस्तथा ॥५१॥
नाभीबीजामृताख्या च स्मृतिदेहात्मरूपिणी । कुसुमा मेखला चापि मदना मदनातुरा ॥५२॥
रेखा संवेगिनी चैव ह्यङ्कुशा मालिनीति च । संशोभिणी तथा विद्राविण्याकर्षणरूपिणी ॥५३॥
आह्लादिनीति च प्रोक्ता तथा संमोहिनीति च । स्तंभिनी जंभिनी चैव वशंकर्यथ रंजिनी ॥५४॥
उन्मादिनी तथैवार्थसाधिनीति प्रकीर्तिता । संपत्तिपूर्णा सा मंत्रमयी द्वंद्वक्षयंकरी ॥५५॥
सिद्धिः संपत्प्रदा चैव प्रियमंगलकारिणी । कामप्रदा निगदिता तथा दुःखविमोचिनी ॥५६॥
मृत्युप्रशमनी चैव तथा विघ्ननिवारिणी । अंगसुंदरिका चैव तथा सौभाग्यदायिनी ॥५७॥
ज्ञानेश्वर्यप्रदा ज्ञानमयी चैव च पंचमी । विंध्यवासनका घोरस्वरूपा पापहारीणी ॥५८॥
तथानंदमयी रक्षा रूपेप्सितफलप्रदा । जयिनी विमला चाथ कामेशी वज्रिणी भगा ॥५९॥
त्रैलोक्यमोहना स्थाना सर्वाशापरिपूरणी । सर्वसंक्षोभणगता सौभाग्यप्रदसंस्थिता ॥६०॥
सर्वार्थसाधकागारा सर्वरोगहरास्थिता । सर्वरक्षाकरास्थाना सर्वसिद्धिप्रदस्थिता ॥६१॥
सर्वानंदमयाधारबिंदुस्थानशिवात्मिका । प्रकृष्टा च तथा गुप्ता ज्ञेया गुप्ततरापि च ॥६२॥
संप्रदायस्वरूपा च कुलकौलनिनिर्गभा । रहस्यापरावरप्राकृत्यैवातिरहस्यका ॥६३॥
त्रिपुरा त्रिपुरेशी च तथैव पुरवासिनी । श्रीमालिनी च सिद्धान्ता महात्रिपुरसुंदरी ॥६४॥
नवरत्नमयद्वीपपवखंडविराजिता । कल्पकोद्यानसंस्था च ऋतुरूषेंद्रियार्चका ॥६५॥
कालमुद्रा मातृकाख्या रत्नदेशोपदेशिका । तत्त्वाग्रहाभिधा मूर्तिस्तथैव विषयद्विपा ॥६६॥
देशकालाकारशब्दरूपा संगीतयोगिनी । समस्तगुप्तप्रकटसिद्धयोगिनिचक्रयुक् ॥६७॥
वह्निसूर्येन्दुभूताह्ला तथात्माष्टाक्षराह्वया । पंचधाचार्यस्वरूपा च नानाव्रतसमाह्वया ॥६८॥
निषिद्धाचाररहिता सिद्धचिह्नस्वरूपिणी । चतुर्द्धा कूर्मभागस्था नित्यार्चास्वरूपिणी ॥६९॥
गंधवित्तधृति, नाभीबीजा, अमृता, स्मृतिदेहा, आत्मरूपिणी, कुसुमा, मेखला, मदना, मदनातुरा, रेखा, संवे-
गिनी, अंकुशा, मालिनी, संक्षोभिणी, विद्राविणी ।।४९ ५३।। आकर्षणरूपिणी, आह्लादिनी, संमोहिनी, स्तंभिनी,
जंभिनी, वशंकरी, रंजिनी, ।।५४।। उन्मादिनी, अर्थसाधिनी, संपत्तिपूर्णा, मंत्रमयी, द्वन्द्वक्षयकरी ।।५५।। सिद्धि,
संपत्प्रदा, प्रियमंगलकारिणी, कामप्रदा, निगदिता, दुःखविमोचिनी, ।।५६।। मृत्युप्रशमनी, विघ्ननिवारिणी,
अंगसुन्दरिका, सौभाग्यदायिनी, ।।५७।। ज्ञानेश्वर्यप्रदा, ज्ञानमयी, पंचमी, विंध्यवासनका, घोरस्वरूपा, पाप-
हारिणी, ।।५८।। आनन्दमयी, रक्षारूपा, ईप्सितफलप्रदा, जयिनी, विमला, कामेशी, वज्रिणी, भगा, ।।५९।।
त्रैलोक्यमोहनी, स्थाना, निखिल-आशा-परिपूरिणी, सबको संक्षुब्ध करने वाली, सौभाग्य-प्रद-संस्थिता ।।६०।।
समस्त अभिलाषाओं को पूर्ण करने वाली, अखिल रोगों का नाश करने वाली, सब की रक्षा करने वाली, सकल
सिद्धियों को देने वाली, सर्वानन्दमया, मूलाधार और बिन्दु की स्थान, शिवालिका, प्रकृष्टा, गुप्ता, ज्ञेया,
गुप्ततरा, संप्रदायस्वरूपा, कौलकुलगर्भगामिनी, रहस्यरूपा, परात्परा, अतिरहस्यका, ।।६१-६३।। त्रिपुरा,
त्रिपुरेशी, पुरवासिनी, श्रीमालिनी, सिद्धान्ता, महात्रिपुरसुन्दरी, नवरत्नमय, द्वीपों तथा नवखण्डों में रहनेवाली,
कल्पसूपी उद्यान में रहनेवाली, ऋतुरूप इन्द्रियों से पूजित होने वाली, काल-मुद्रारूपिणी, मातृकारूपिणी, रत्न-
देशोपदेशिका, तत्त्वा, ग्रहसंज्ञका, मूर्ति, विषयद्विपा, देश-काल-आकार-शब्द-रूपा, संगीतयोगिनी, समस्त गुप्त
एवम् प्रकट सिद्धचक्र तथा योगिनी चक्र की अधिष्ठात्री, वह्नि, सूर्य चन्द्र तथा महाभूत कहलाने वाली,
८२४ नारदीयपुराणम्
।॥७०॥
दमनादित्रयभ्यर्चा षट्कर्मसिद्धिदायिनी । तिथिवारपृथग्द्रव्यसमर्चनशुभावहा ॥७१॥
वायोश्वानंगकुसुमा तथैवानंगमेखला । अनंगमदनानंगमदनातुरासाह्वया ॥७२॥
मददेविर्निका चैव तथा भुवनपालिनी । शशिलेखा समुद्दिष्टा गतिलेखाह्वया मता ॥७३॥
श्रद्धा प्रीती रतिश्चैव धृतिः कांतिर्मनोरमा । मनोहरा समाख्याता तथैव हि मनोरथा ॥७४॥
मदनोन्मादिनी चैव मोदिनी शंखिनी तथा । शोषिणी चैव शंकरी सिजिनी सुभगा तथा ॥७५॥
पुषाचैद्वासुमनसा रतिः प्रीतिधृतिस्तथा । ऋद्धिः सौम्या मरीचिश्व तथैव ह्यंशुमालिनी ॥७६॥
शशिनी चांगिरा छाया तथा संपूर्णमंडला । तुष्टिस्तथामृताख्या च डाकिनी साथ लोकपा ॥७७॥
बटुकेभास्वरूपा च दुर्गा क्षेत्रेशरूपिणी । कामराजस्वरूपा च तथा मन्मथरूपिणी ॥७७॥
कंदर्परूपिणी चैव तथा मकरकेतना । मनोभावस्वरूपा च भारती वर्णरूपिणी ॥७८॥
मदना मोहिनी लोला जंभिनी चोद्यमा शुभा । ह्लादिनी द्राविणी प्रोती रती रक्ता मनोरमा ॥७६॥
सर्वोन्मादा सर्वमुखा ह्यभंगा चामितोद्यमा । अनल्पाव्यक्तविभवा विविधाक्षोभविग्रहा ॥८०॥
रागशक्तिद्वेषशक्तिस्तथा शब्दादिरूपिणी । नित्या निरंजना विलिन्ना क्लेदिनी मदनातुरा ॥८१॥
मदद्रवा द्राविणी च द्रविणी चेति कीर्तिता । मदा विला मंगला च मन्मथानी मनस्विनी ॥८२॥
मोहा मोदा मानमयी माया मंदा मितावती । विजया विमला चैव शुभा विश्वा तथैव च ॥८३॥
विभूतिर्बिनता चैव विविधा विनता क्रमात् । कमला कामिनी चैव किराता कीर्तिरूपिणी ॥८४॥
कुट्टिनी च समुद्दिष्टा तथैव कुलसुंदरी । कल्याणी कालकोला च डाकिनी शाकिनी तथा ॥८५॥
लाकिनी काकिनी चैव राकिनी काकिनी तथा । इच्छाज्ञाना क्रियाख्या चाप्यायुधाष्टकधारिणी ॥८६॥
कपर्दिनी समुद्दिष्टा तथैव कुलसुंदरी । ज्वालिनी विस्फुलिंगा च मंगला सुमनोहरा ॥८७॥
आत्मरूपिणी, अष्टाक्षर कहलानेवाली, पंचपूजनस्वरूपा, अनेक व्रतों वाली, निषिद्ध आचरण से रहिता,
सिद्धचिह्नस्वरूपा, चार प्रकार से कर्म-भोगों में अवस्थिता नित्य आदि की पूजा स्वरूपा, दमना आदि को अर्चा-
रूपा, छह कर्मों को सिद्धि प्रदान करनेवाली, तिथि, दिन, द्रव्य, पूजन तथा मंगलरूपा, वायोश्वो, अनंगकुसुमा,
अनंगमेखला, अनंगमदना, अनंगमदनातुरा, मददेविर्निका, भुवनपालिनी, शशिलेखा, गतिलेखा, श्रद्धाप्रीति,
रति, धृति, कांति, मनोरमा, मनोहरा, मनोरथा ॥६३-७३॥
मदनोन्मादिनी, मोदिनी, शंखिनी, शोषिणी, शंकरी, सिजिनी, सुभगा, पूषा, वासुमनसा, रति, प्रीति, धृति,
ऋद्धि, सौम्या, मरीचि, अंशुमालिनी, शशिनो, आंगरा, छाया, संपूर्णमंडला, तुष्टि, अमृता, डाकिनी, लोकपा,
बटुका, भास्वरूपा, दुर्गा, क्षेत्रेशरूपिणी, कामराजस्वरूपा, मन्मथरूपिणी, कंदर्परूपिणी, मकरकेतना, मनो-
भवस्वरूपा, भारती, वर्णरूपिणी ॥७४-७८॥ मदना, मोहिनी, लोला, जंभिनी, उद्यमा, शुभा, ह्लादिनी,
द्राविणी, प्रीति, रति, रक्ता, मनोरमा, सर्वोन्मादा, सर्वमुखा, अभंगा, अमितोद्यमा, अनल्पा, तथा अव्यक्त विभव
वाली, विविधा, क्षोभविग्रहा, रागशक्ति, द्वेषशक्ति, शब्दादिरूपिणी, नित्या निरंजना, क्लिन्ना, क्लेदिनी, मदना-
तुरा, मदद्रवा, द्राविणी, द्रविणी, मदाविला, मंगला, मन्मथानी, मनस्विनी, मोहा, मोदा, मानमयी, माया, मंदा,
मितावती, विजया, विमला, शुभा, विश्वा, विभूति, विनता, कमला, कामिनी, किराता, कीर्तिरूपिणी, कुट्टिनी,
कुलसुन्दरी, कल्याणी, कालकोला, डाकिनी, शाकिनी, लाकिनी, काकिनी, राकिनी, इच्छा, ज्ञान एवंम् क्रिया-
रूपा, अष्टायुधधारिणी, कपर्दिनी, ज्वालिनी, विस्फुलिंगा, मंगला, सुमनोहरा, कनका, विनवा, विद्या, मेधा,
एकोननवतितमोऽध्यायः ८२५
कनका क्लिन्नना विद्या विविधा च प्रकीर्तिता । मेषा वृषाह्वया चैव मिथुना कर्कटा तथा ॥८८॥
सिंहा कन्या तुला कीटा चापा च मकरा तथा । कुम्भा मीना च सारा च सर्वभक्षा तथैव च ॥८९॥
विश्वात्मा विविधोद्भूतचित्ररूपा च कीर्तिता । निःसपत्ना निरांतंका याचनाचित्यवैभवा ॥९०॥
रक्ता चैव ततः प्रोक्ता विद्याप्राप्तिस्वरूपिणी । हृल्लेखा क्लेदिनी क्लिन्ना क्षोभिणो मदनातुरा ॥९१॥
निरंजना रागवती तथैव मदनावती । मेखला द्राविणी वेगवती चैव प्रकीर्तिता ॥९२॥
कमला कामिनी कल्पा कला च कलिताद्भुता । किराता च तथा काला कदना कौशिका तथा ॥९३॥
कंबुवादनिका चैव कातरा कपटा तथा । कीर्तिश्चापि कुमारी च कुंकुमा परिकीर्तिता ॥९४॥
भञ्जिनी वेगिनी नागा चपला पेशला सती । रतिः श्रद्धा भोगलोला मदोन्मत्ता मनस्विनी ॥९५॥
विह्वला कर्षिणी लोला तथा मदनमालिनी । विनोदा कौतुका पुण्या पुराणा परिकीर्तिता ॥९६॥
वागीशी वरदा विश्वा विभवा विघ्नकारिणी । बोजविघ्नहरा विद्या सुमुखी सुंदरी तथा ॥९७॥
सारा च सुमना चैव तथा प्रोक्ता सरस्वती । समया सर्वगा विद्या शिवा वाणी च कीर्तिता ॥९८॥
दूरसिद्धा तथा प्रोक्तार्थो विग्रहवती मता । नादा मनोन्मनी प्राणप्रतिष्ठारुणवैभवा ॥९९॥
प्राणापाना समाना च व्यानोदाना च कीर्तिता । नागा कूर्मा च कृकला देवदत्ता धनञ्जया ॥१००॥
फट्कारी किंकराराध्या जया च विजया तथा । हुंकारी खेचरी चंडा छेदिनी क्षपिणी तथा ॥१०१॥
स्त्रीहुंकारी क्षेमकारी चतुरक्षररूपिणी । श्रीविद्यामत्तवर्णांगी काली याम्या नृपर्णका ॥१०२॥
भाषा सरस्वती वाणी संस्कृता प्राकृता परा । बहुरूपा चित्तरूपा रम्यानंदा च कौतुका ॥१०३॥
त्रयाख्या परमात्मारूयाप्यमेयविभवा तथा । वाक्स्वरूपा बिंदुसर्गरूपा विश्वात्मिका तथा ॥१०४॥
वृषा, मिथुना, कर्कटा, सिंहा, कन्या, तुला, कीटा, चापा, मकरा, कुम्भा, मीना, सारा, सर्वभक्षा, विश्वात्मा,
विविधोद्भूतचित्ररूपा, निःसपत्ना, निरांतका, याचना, अर्चित्यवैभवा ॥७६-९०॥
रक्ता, विद्याप्राप्तिस्वरूपिणी, हृल्लेखा, क्लेदिनी, क्लिन्ना, क्षोभिणी, निरंजना, रागवती, मदनावती,
मेखला, वेगवती, कमला, कामिनी, कल्पा, कला, कलिता, अद्भुता, किराता, काला, कदना, कोशिका, कंबुवादनिका;
कातरा, कपटा, कीर्ति, कुमारी, कुंकुमा, भञ्जिनी, वेगिनी, नागा, चपला, पेशला, सती, रति, श्रद्धा, भोग-
लोला, मदोन्मत्ता, विह्वला, कषिणी, लील।, मदनमालिनी, विनोदा, कौतुका, पुण्या, पुराणा, वागीशी, वरदा,
विश्वा, विभवा, विघ्नकारिणी, बीजविघ्नहरा, विद्या, सुमुखी, सुन्दरी, सारा, सुमना, सरस्वती, समया, सर्वगा,
विद्या, शिवा, वाणी, दूरसिद्धा, विग्रहवती, नादा, मनोन्मनी, प्राणप्रतिष्ठा, अरुणवैभवा; प्राणा, अपाना, समाना,
व्याना, उदाना, नागा, कूर्मा, कृकला, देवदत्ता, धनञ्जया ॥९१-१००॥
फट्कारी, किंकराराध्या, जया, विजया, हुंकारी, खेचरी, चंडा, छेदिनी, क्षपिणी, स्त्रीहुंकारी, क्षेम-
कारी चतुरक्षररूपिणी, श्रीविद्या, श्रेष्ठवर्णांगी, काली, याम्या, नृपर्णका, भाषा, सरस्वती, वाणी, संस्कृता, प्राकृता,
परा, बहुरूपा, चित्तरूपा, रम्या, आनन्दा, कौतुका, त्रयाख्या, परमात्मारूपा, अमेयविभवा, वाक्स्वरूपा, बिंदु
सर्गरूपा, विश्वात्मिका, त्रैपुरकंदा, ज्ञात्रादित्रिविधात्मिका, आयु, लक्ष्मी, कीर्ति, भोग, सौंदर्य तथा आरोग्य
देने वाली, ऐहिक तथा पारलौकिक ज्ञानमयो, जीवा, विजया, विश्वविन्मयी ॥१०१-१०६॥ हृदादिविद्या,
१०४-ना० पु०
यहाँ पृष्ठ पर अंकित पाठ का लिप्यंतरण दिया गया है:
८२६ नारदीयपुराणम्
तथा वैपुरकंदाख्या ज्ञात्रादिविविधात्मिका । आयुर्लक्ष्मीकीर्तिभोगसौंदर्यारोग्यदायिका ॥१०५॥
ऐहिकामुष्मिकज्ञानमयी च परिकीर्तिता । जीवाख्या विजयाख्या च तथैव विश्वविन्मयी ॥१०६॥
हृदादिविद्या रूपादिभानुरूपाः जगद्वपुः । विश्वमोहनिका चैव त्रिपुरामृतसंज्ञिका ॥१०७॥
सर्वाप्यायनरूपा च मोहिनी क्षोभणी तथा । क्लेदिनो चापि षट्कूटा पंचकूटा विशुद्धगा ॥१०८॥
संपत्करी हलक्षार्णा सीमामातृतनु रतिः । प्रीतिर्मनोभवा वापि प्रोक्ता वाराधिपा तथा ॥१०९॥
विकटा चापि षट्कूटा पंचकूटा विशुद्धगा । अनाहतगता चैव मणिपूरकसंस्थिता ॥११०॥
स्वाधिष्ठानसमासीनाधारस्थाज्ञासमास्थिता । षट्त्रिंशत्कूटरूपा च पंचाशन्मिथुनात्मिका ॥१११॥
पादुकादिकसिद्धीशा तथा विजयदायिनी । कामरूपप्रदा वेतालरूपा च पिशाचिका ॥११२॥
विचित्रा विभ्रमा हंसी भीषणी जनरंजिका । विशाला मदना तुष्टा कालकंठी महाभया ॥११३॥
माहेंद्री शंखिनी चैंद्री मंगला वटवासिनी । मेखला सकला लक्ष्मीर्मालिनी विश्वनायिका ॥११४॥
सुलोचना सुशोभा च कामदा च विलासिनी । कामेश्वरी नंदिनी च स्वर्णरेखा मनोहरा ॥११५॥
प्रमोदा रागिणी सिद्धा पद्मिनी च रतिप्रिया । कल्याणदा कलादक्षा ततश्च सुरसुन्दरी ॥११६॥
विभ्रमा वाहका वीरा विकला कोरका कविः । सिंहनादा महानादा सुग्रीवा मर्कटा शठा ॥११७॥
विडालाक्षा विडालास्या कुमारी खेचरी भवा । मयूरा मंगला भीमा द्विपवक्त्रा खरानना ॥११८॥
मातंगी च निशाचारा वृषग्राहा वृकानना । सैरिभास्या गजमुखा पशुवक्त्रा मृगानना ॥११९॥
क्षोभका मणिभद्रा च क्रीडका सिंहचक्रका । महोदरा स्थूलशिखा विकृतास्या वरानना ॥१२०॥
चपला कुक्कुटास्या च पाविनी मदनालसा । मनोहरा दीर्घजंघा स्थूलदन्ता दशानना ॥१२१॥
सुमुखा पंडिता क्रुद्धा वराहास्या सटामुखा । कपटा कौतुका काला किंकरा कितवा खला ॥१२२॥
भक्षका भयदा सिद्धा सर्वांगा च प्रकीर्तिता । जया च विजया दुर्गा भद्रा भद्रकरी तथा ॥१२३॥
रूपादिभानुरूपा, जगद्वपु, विश्वमोहनिका, त्रिपुरामृतसंज्ञिका, सबको संवर्धित करनेवाली, मोहिनी, क्षोभिणी,
क्लेदिनी, महोदया, संपत्करी, ह, ल एवम् क्ष वर्णों वाली, सीमा, मातृतनु, रति, प्रीति, मनोभवा, वाराधिपा,
त्रिकूटा, षट्कूटा, पंचकूटा, विशुद्धगा, अनाहत चक्र में जानेवाली, मणिपूरक में संस्थित होनेवाली, अपने अधि-
ष्ठान में संस्थित होने वाली, अपने आंष्ठान में आसोन होने वाली, आधार चक्र तथा आज्ञा चक्र में आस्थित होने
वाली, छत्तीस कूटवाली, पचास मिथुन वाली, पादुका आदि सिद्धियों की ईश्वरी, विजयदायिनी, कामरूपप्रदा,
बेतालरूपा, पिशाचिका, विचित्रा, विभ्रमा, हंसी, भीषणी, जनरंजिका, विशाला, मदना, तुष्टा, कालकंठी,
महाभया, ॥१०७-११३॥ माहेंद्री, शंखिनी, ऐंद्री, मंगला, वटवासिनी, मेखला, सकला, लक्ष्मा, मालिनी, विश्व-
नायिका, सुलोचना, सुशोभा, कामदा, विलासिनी, कामेश्वरी, नंदिनी, स्वर्णरेखा, मनोहरा, प्रमोदा, रागिणी
सिद्धा, पद्मिनी, रतिप्रिया, कल्याणदा, कलादक्षा, सुरसुन्दरी, विभ्रमा, वाहका, वीरा, विकला, कोरका, कवि,
सिंहनादा, महानादा, सुग्रीवा, मर्कटा, शठा, बिडालाक्षा, बिडालास्या, कुमारा, खेचरी, भवा, मयूरा, मंगला,
भीमा, व्याघ्रमुखा, खरानना, मातंगी, निशाचरा, वृषग्राहा, वृकानना, महिषानना, गजमुखा, पशुवक्त्रा,
मृगानना, क्षोभका, मणिभद्रा, क्रीडका, सिंहचक्रका, महोदरा, स्थूलशिखा, विकृतास्या, वरानना ॥११४-१२०॥
चपला, कुक्कुटास्या, पावती, मदनालसा, मनोहरा, दीर्घजंघा, स्थूलदन्ता, दशानना, सुमुखा, पंडिता, क्रुद्धा,
वाराहास्या, जटामुखा, कपटा, कौतुका, काला, किंकरा, कितवा, खला, भक्षका, भयदा, सिद्ध, सर्वांगा, जया
एकोननवतितमोऽध्यायः ८२७
अम्बिका वामदेवी च महामायास्वरूपिणी । विदारिका विश्वमयी विश्वा विश्वविभंजिता ॥१२४॥
वीरा विक्षोभिणी विद्या विनोदा बाजविग्रहा । वीतशोका विषग्रीवा विपुला विजयप्रदा ॥१२५॥
विभवा विविधा विप्रा तथैव परिकीर्तिता । मनोहरा मंगला च मदोत्सिक्ता मनस्विनी ॥१२६॥
मानिनी मधुरा माया मोहिनी च तथा स्मृता । भद्रा भवानी भव्या च विशालाक्षी शुचिस्मिता ॥१२७॥
ककुभा कमला कल्पा कलाथो पूरणी तथा । नित्या चाप्यमृता चैव जीविता च तथा दया ॥१२८॥
अशोका ह्यमला पूर्णा पूर्णा भाग्योद्यता तथा । विवेका विभवा विश्वा वितता च प्रकीर्तिता ॥१२९॥
कामिनी खेचरी गर्वा पुराणा परमेश्वरी । गौरी शिवा ह्यमेया च विमला विजया परा ॥१३०॥
पवित्रा पद्मिनी विद्या विश्वेशी शिववल्लभा । अशेषरूपा ह्यानंदांबुजाक्षी चाप्यनिंदिता ॥१३१॥
वरदा वाक्यदा वाणी विविधा वेदविग्रहा । विद्या वागीश्वरी सत्या संयता च सरस्वती ॥१३२॥
निर्मलानन्दरूपा च ह्यमृता मानदा तथा । पूषा चैव तथा पुष्टिरतुष्टिश्चापि रतिधृतिः ॥१३३॥
शशिनी चंद्रिका कांतिर्ज्योत्स्ना श्रीः प्रीतिरंगदा । पूर्णा पूर्णामृता कामदायिनीन्दुकलात्मिका ॥१३४॥
तपिनी तापिनी धूम्रा मरीचिज्ज्वलिनी रुचिः । सुषुम्णा भोगदा विश्वा बाधिनी धारिणी क्षमा ॥१३५॥
धूम्रार्चिरूष्मा ज्वलिनी ज्वालिनी विस्फुलिंगिनी । सश्रीः स्वरूपा कपिला हव्यकव्यवहा तथा ॥१३६॥
घस्मरा विश्वकवला लोलाक्षी लोलजिह्विका । सर्वभक्षा सहस्राक्षी निःसंगा च गतिप्रिया ॥१३७॥
अचिंत्याचापमेया च पूर्णरूपा दुरासदा । सर्वा संसिद्धिरूपा च पावनोत्येकरूपिणी ॥१३८॥
तथा यामलवेधाख्या शाक्ते वेदस्वरूपिणी । तथा शांभववेधा च भावनासिद्धिसूचिनी ॥१३९॥
वह्निरूपा तथा दक्षा ह्यमा विघ्ना भुजंगमा । षण्मुखा रविरूपा च माता दुर्गा दिशा तथा ॥१४०॥
विभवा, दुर्गा, भद्रा, भद्रकरी, अंबिका, वामदेवी, महामायास्वरूपिणी, विदारिका, विश्वमयी, विश्वा,
विश्वविभंजिता, वीरा, विक्षोभिणी, विद्या, विनोदा, बीजविग्रहा, वीतशोका, विषग्रीवा, विपुला, विजयप्रदा,
विभवा, विविधा, विप्रा, मनोहरा, मंगला, मदोत्सिक्ता, मनस्विनी ॥१२१-१२६॥ मानिनी, मधुरा, माया,
मोहिनी, भद्रा, भवानी, भव्या, विशालाक्षी, शुचिस्मिता, ककुभा, कमला, कल्पा, कला, पूरणी, नित्या,
अमृता, जीविता, दया, अशोका, अमला, पूर्णा, भाग्योद्यता, विवेका, विभवा, विश्वा, वितता, कामिनी, खेचरी,
गर्वा, पुराणा, परमेश्वरी, गोरी, शिवा, अमेया, विमला, विजया, परा, पवित्रा, पद्मिनी, विद्या, विश्वेशी,
शिववल्लभा, अशेषरूपा, आनन्दांबुजाक्षी, अनिंदिता, वरदा, वाक्यदा, वाणी, वेदविग्रहा, विद्या, वागीश्वरी,
सत्या, संमता, सरस्वती ॥१२७ १३२॥
निर्मला, आनन्दरूपा, अमृता, मानदा, पूषा, पुष्टि, तुष्टि, रति, धृति, शशिनी, चंद्रिका, कांति, ज्योत्स्ना,
श्री, प्रीति, अंगदा, पूर्णा, पूर्णामृता, कामदायिनी, इन्दुकलात्मिका, तपिनी, तापिनी, धूम्रा, मरीचि, ज्वलिनी
रुचि, सुषुम्णा, भागदा, विश्वा, बाधिनी, धारिणी, क्षमा, धूम्रार्चि, ऊष्मा, ज्वलिता, ज्वालिनी, विस्फु-
लिंगिनी, सुश्री, स्वरूपा, कपिला, हव्य-कव्यवहा, घस्मरा, विश्वकवला, लोलाक्षी, लोलजिह्विका, सर्वभक्षा,
सहस्राक्षी, निःसंगा, गतिप्रिया, अचिंत्या, अप्रमेया, पूर्णरूपा, दुष्प्राप्या, संसिद्धिरूपा, पावना, एकरूपिणी
॥१३३-१३८॥
यामलवेधा, वेदस्वरूपिणी, शांभववेधा, भावनासिद्धिसूचिनी, वह्निरूपा, दक्षा, अमाविघ्ना, भुजंगमा,
षण्मुखा, रविरूपा, माता, दुर्गा, दिशा, धनदा, केशवा, यमी, हरा, शश्रा, आश्वनी, यमी, वाह्निरूपा, धात्री,
८२८ नारदीयपुराणम्
घनदा केशवा चापि व्यमी चैव हरा शशा । अश्विनी च यमी वह्निरूपा धात्रीति कीर्तिता ॥१४१॥
चंद्रा शिवादितिर्जीवा सर्पिणी पितृरूपिणी । अर्यम्णा च भगा सूर्या त्वाष्ट्रीमारुतसंज्ञिका ॥१४२॥
इंद्राग्निरूपा मित्रा चाप्येन्द्राणी निऋ तिर्जला । वैश्वदेवी हरित्सूर्वासवी वरुणा जया ॥१४३॥
अहिर्बुध्न्या पूषणी च तथा कारस्करामला । उदुंबरा जंबुका च खदिरा कृष्णरूपिणी ॥१४४॥
वंशा च पिप्पला नागा रोहिणा च पलाशका । पक्षका च तथाम्बष्ठा विल्वा चार्जु नरूपिणी ॥१४५॥
विकंकता च ककुभा सरला चापि संजिका । मंजुला पनसार्का च शमी हलिप्रियाम्रका ॥१४६॥
निम्बा मधूकसंज्ञा चाप्यश्वत्था च गजाद्वया । नागिनी सर्पिणी चैव शुनी चापि बिडालिकी ॥१४७॥
छागी मार्जारिका मूषी वृषभा माहिषी तथा । शार्दू ली सैरिभी व्याघ्री हरिणी च मृगी शुनी ॥१४८॥
कपिरूपा च गोघंटा वानरी च नराश्विनी । नगा गौर्हस्तिनी चेति तथा षट्चक्रवासिनी ॥१४९॥
त्रिखंडा तोरपालाख्या भ्रामणी द्रविणी तथा । सोमा सूर्या तिथिवारा योगाक्षां करणात्मिका ॥१५०॥
यक्षिणी तारणा व्योमशब्दाद्या प्राणिनी च धीः । क्रोधिनी स्तंभिनी चंडोच्चंडा ब्राह्मयादिरूपिणी ॥१५१॥
सिंहस्था व्याघ्रगा चैव गजाश्वगरुडस्थिता । भौमाप्या तैजसी वायुरूपिणी तामसा तथा ॥१५२॥
एकवक्त्रा चतुर्वक्त्रा नववक्त्रा कलानना । पंचविंशतिवक्त्रा च षड्विंशद्वदना तथा ॥१५३॥
ऊनपंचाशदास्या च चतुःषष्टिमुखा तथा । एकाशीतिमुखा चैव शताननसमन्विता ॥१५४॥
स्थूलरूपा सूक्ष्मरूपा तेजोविग्रहधारिणी । वृणावृत्तिस्वरूपा च नाथावृत्तिस्वरूपिणी ॥१५५॥
तत्त्वावृत्तिस्वरूपानि नित्यावृत्तिवपुर्द्धरा ॥१५६॥
अंगावृत्तिस्वरूपा चाप्यायुधावृत्तिरूपिणी । गुरुपंक्तिस्वरूपा च विद्यावृत्तिनुस्तथा ॥१५७॥
ब्रह्माद्यावृत्तिरूपा च परा पश्यंतिका तथा । मध्यमा वैखरी शीर्षंकण्ठतालवोष्ठदन्तगा ॥१५८॥
चंद्रा, शिवा, दिति, जीवा, सर्पिणी, पितृरूपिणी, अर्यम्णा, भगा, सूर्या, त्वाष्ट्री, मारुती, इन्द्रा, अग्निरूपा,
मित्रा, इंद्राणी, निऋति, जला, वैश्वदेवी, हरित्भू, वासवी, वरुणा, जया, अहिर्बुध्न्या, पूषणी, कार-
स्करा, अमला, उदुंबरा, जंबुका, खदिरा, कृष्णरूपिणी ॥१३६-१४४॥ वंशा, पिप्पला, नागा, रोहिणा,
पलाशका, यक्षका, चेष्टा, बिल्वा, अर्जुनरूपिणी, विकंकता, ककुभा, सरला, संजिका, वंजुला, पनसा, काचशमी,
हलिप्रिया, आम्रका, निंबा, मधूकसंज्ञा, अश्वत्था, गजा, अजा, नागिनी, सर्पिणी, शुनी, बिडालिकी, छागी,
मार्जारिका, मूषी, वृषभा, माहिषी, शार्दूली, सैरिभी, व्याघ्री, हरिणी, मृगी, कपिरूपा, गोघंटा, वानरी,
नराश्विनी, नगा, गौ, हस्तिनी, षट्चक्र-वासिनी, त्रिखंडा, तोरपाला, भ्रामणी, द्राविणी, भोमा, सूर्या, तिथि,
वारा, योगा, ऋक्षा, करणात्मिका ॥१४५-१५०॥
यक्षिणी, तारणा, व्योमशब्दा, आद्या, प्राणिनो, धी, क्रोधिनी, स्तंभिनी, चंडा, उच्चंडा, ब्रह्मादि
रूपिणी, सिंहस्था, व्याघ्रगा, गज, अश्व तथा गरुड़ पर आरूढ होने वाली, आप्या, तैजसी, वायुरूपिणी, तामसा,
एकवक्त्रा, चतुर्वक्त्रा, नववक्त्रा, कलानना, पंचविंशतिवक्त्रा, षड्विंशद्वदना, ऊनपंचाशद्वदना, चतुःषष्टि-
मुखा, एकाशीतिमुखा, शतानना, स्थूलरूपा, सूक्ष्मरूपा, तेजोविग्रहधारिणी, वृणा, वृत्तिस्वरूपा, मायावृत्ति-
स्वरूपिणी, गुरुपंक्तिस्वरूपा, विद्यावृत्तिस्वरूपिणी, तत्त्वावृत्तिस्वरूपा, नित्यावृत्तिशरीरधारिणी, अंगावृत्ति-
स्वरूपा, आयुधावृत्तिरूपिणी, ब्रह्माद्यावृत्तिरूपा, परा, पश्यंतिका, मध्यमा, वैखरी, शीर्ष, कंठ, तालु, ओष्ठ,
एकोननवतितमोऽध्यायः ८२१
जिह्वामूलगता नासागतोरःस्थलगामिनी । पदवाक्यस्वरूपा च वेदभाषास्वरूपिणी ॥१५९॥
सेकाख्या वीक्षणाख्या चोपदेशाख्या तथैव च । व्याकुलाक्षरसंकेता गायत्री प्रणवादिका ॥१६०॥
जपहोमार्चनध्यानयंत्रतर्पणरूपिणी । सिद्धसारस्वता मृत्युंजया च त्रिपुरा तथा ॥१६१॥
गारुडा चान्नपूर्णा चाप्यश्वारूढा नवात्मिका । गौरी च देवी हृदया लक्षदा च मतंगिनी ॥१६२॥
निष्कत्रयपदा चेष्टावादिनी च प्रकीर्तिता । राजलक्ष्मीनर्महालक्ष्मीः सिद्धलक्ष्मीर्गवानना ॥१६३॥
इत्येवं ललितादेव्या दिव्यं नामसहस्रकम् । सर्वार्थसिद्धिदं प्रोक्तं चतुर्वर्गफलप्रदम् ॥१६४॥
एतन्नित्यमुषःकाले यो जपेच्छुद्धमानसः । स योगी ब्रह्मविज्ज्ञानी शिवयोगी तथात्मवित् ॥१६५॥
द्विरावृत्त्या प्रजपतो ह्यायुरारोग्यसंपदः । लोकानुरंजनं नारीनृपावर्जनकर्म च ॥१६६॥
अपृथक्त्वेन सिद्ध्यंति साधकस्यास्य निश्चितम् । त्रिरावृत्त्यास्य वै पुंसो विश्वं ब्रूयाद्वशेऽखिलम् ॥१६७॥
चतुरावृत्तितश्चास्य समीहितमनारतम् । फलत्येव प्रयोगार्हो लोकरक्षाकरो भवेत् ॥१६८॥
पंचावृत्त्या नरा नार्यो नृपा देवाश्च जंतवः । भजंत्येनं साधकं च देव्यामाहितचेतसः ॥१६९॥
षडावृत्त्या तन्मयः स्यात्साधकश्चास्य सिद्धयः । अचिरेणैव देवानां प्रसादात्संभवंति च ॥१७०॥
सप्तावृत्त्यारिरोगादिकृत्यापस्मारनाशनम् । अष्टावृत्त्या नरो भूपान्निग्रहानुग्रहक्षमः ॥१७१॥
नवावृत्त्या मन्मथाभो विक्षोभयति भूतलम् । दशावृत्त्या पठेन्नित्यं वागलक्ष्मीकांतिसिद्धये ॥१७२॥
रुद्रावृत्त्याखिलद्धिश्च तदायत्तं जगद्भवेत् । अर्कावृत्त्या सिद्धिभिः स्याद्दिग्भिर्मर्त्यो हरोपमः ॥१७३॥
तथा दंतगामिनी, ॥१५१-१५८॥ जिह्वामूलगता, नासागता, उरःस्थलगामिनी, षड्वाक्यस्वरूपा, वेदभाषा-
स्वरूपिणी, सेका, वीक्षणा, उपदेशा, व्याकुलाक्षरसंकेता, गायत्री, ब्रह्मवादिनी, जप होम, पूजन, ध्यान,
यंत्र तथा तर्पण-रूपिणी, सिद्धसारस्वता, मृत्युंजया, त्रिपुरा, गारुडा, अन्नपूर्णा, अश्वारूढा, नवात्मिका,
गौरी, देवी, हृदया, लक्षदा, मतंगिनी, निष्कत्रयपदा, चेष्टा-वादिनी, राजलक्ष्मी, महालक्ष्मी, सिद्धलक्ष्मी,
ओर गवानना ॥१५६-१६३॥ ये ललितादेवी के सहस्र नाम हैं, जो समस्त प्रयोजनों को सिद्ध करने वाले तथा
चतुर्वर्ग (धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष) के फल को देने वाले हैं। जो व्यक्ति नित्य प्रातःकाल शुद्ध मन से इन
नामों का पाठ करेगा, वह योगी, ब्रह्मवेत्ता, ज्ञानी, शिवयोगी तथा आत्मवेत्ता होगा। जो नित्य दो आवृत्ति
पाठ करेगा, उसे, आयु, आरोग्य तथा संपत्ति की प्राप्ति होगी और वह नारी, राजा तथा लोगों को प्रसन्न
करेगा। तीन आवृत्ति पाठ करने से विश्व वशीभूत हो जाता है। चार आवृत्ति पाठ करने से सतत इच्छा-
नुसार फल मिलता है और प्रयोग करने से लोगों को रक्षा होती है ॥१६४-१६८॥
जो पांच आवृत्ति पाठ करता है, उसकी सेवा नर, नारियाँ, राजा, देवता सभी जन्तु देवी से मोहित-
चित्त होकर करते हैं। तन्मय होकर छह आवृत्ति पाठ करने से साधक को देवी की कृपा से शीघ्र ही
समस्त सिद्धियाँ प्राप्त हो जाती हैं। सात आवृत्ति करने से (पाठक अपने) शत्रुओं को रोग आदि उत्पन्न
कर सकता है और अपस्मार (मिरगी) आदि रोगों का नाश भी कर सकता है। आठ आवृत्ति करने से
मनुष्य राजाओं के ऊपर निग्रह-अनुग्रह करने की क्षमता प्राप्त कर लेता है। नौ आवृत्ति पाठ करने वाला
साधक मदन तुल्य होकर संपूर्ण भूतल को विक्षुब्ध करता है। दश आवृत्ति करने से वाणी, लक्ष्मी तथा
कांति की सिद्धि होती है ॥१६९-१७२॥ ग्यारह आवृत्ति करने से अखिल ऋद्धियां प्राप्त होती हैं तथा उसके
अधीन निखिल जगत् हो जाता है। बारह आवृत्ति करने से अष्ट सिद्धियां प्राप्त होती हैं तथा वह मनुज
८३० नारदीयपुराणम्
विश्वावृत्त्या तु विजयी सर्वतः स्यात्सुखी नरः । शक्रावृत्त्याखिलेष्टाप्तिः सर्वतो मंगलं भवेत् ॥१७४॥
तिथ्यावृत्त्याखिलानिष्टानयत्नादाप्नुयान्नरः । षोडशावृत्तितो भूयान्नरः साक्षान्महेश्वरः ॥१७५॥
विश्वं स्रष्टुं पालयितुं संहर्तुं च क्षमो भवेत् । मंडलं मासमात्रं वा यो जपेद्यद्यदाशयः ॥१७६॥
तत्तदेवाप्नुयात्सत्यं शिवस्य वचनं यथा । इत्येतत्कथितं विप्र नित्याह्यर्चनाश्रितम् ॥१७७॥
नाम्नां सहस्रं मनसोऽभीष्टसंपादनक्षमम् ॥१७८॥
इति श्रीबृहन्नारदीयपुराणे पूर्वभागे बृहदुपाख्याने तृतीयपादे ललितास्तोत्रकवचसहस्र-
नामकथनं नामैकोननवतितमोऽध्यायः ॥८९॥
नवतितमोऽध्यायः
सनत्कुमार उवाच
अथातो विप्र नित्यानां प्रयोगादिसमन्वितम् । पटलं तेऽभिधास्यामि नित्याभ्यर्चनदीपकम् ॥१॥
ललितायास्त्रिभिर्वर्णैः सकलार्थोऽभिधीयते । शेषेण देवीरूपेण तेन स्यादिदमीरितम् ॥२॥
अशेषतो जगत्कृत्स्नं हृल्लेखात्मकमुच्यते । तस्याश्चार्थस्तु कथितः सर्वतंत्रेषु गोपितः ॥३॥
शिव के तुल्य हो जाता है । तेरह आवृत्ति करने से मनुष्य सर्वविजयी तथा सुखी होता है । चौदह आवृत्त
करने से समस्त कामनाओं की प्राप्ति तथा सब प्रकार से कल्याण होता है । पन्द्रह आवृत्ति करने से अना-
यास ही अखिल वस्तुओं की प्राप्ति हो जाती है। सोलह आवृत्ति करने से मानव साक्षात् महेश्वर होता है
और विश्व के सृजन, पालन तथा संहार करने की क्षमता प्राप्त करता है। जो एक मास तक नित्य सत्रह
आवृत्ति पाठ करेगा, उसके हृदय में जो-जो अभिलाषायें होंगी, वे तुरन्त पूर्ण हो जायेंगी, यह शिव का सत्य
वचन है। विप्र ! सहस्रं मनःकामनाओं को पूर्ण करने वाले नित्याओं के पूजन सहित सहस्र नामों को मैंने
बता दिया ॥१७३-१७८॥
श्री नारदीय पुराण के पूर्वार्ध में बृहदुपाख्यानयुक्त तृतीयपाद में ललिता के स्तोत्र, कवच तथा
सहस्रनाम कथन नामक नवासीवां अध्याय समाप्त ॥
अध्याय ६०
अर्चन-विधि सहित नित्यापटल-कथन
सनत्कुमार बोले- विप्र ! अब इसके उपरान्त नित्याओं के प्रयोग, अर्चना आदि बतलाते हुए पटल का
निरूपण करूँगा । ललिता के तीन वर्णों से ही सकल पदार्थों का अभिधान होता है । शेष देवी रूप से यह जगत्
कहा गया है । संपूर्ण विश्व हृल्लेखा का स्वरूप है। उनका वर्णन सब तन्त्रों में गुप्त रूप से किया गया है।
नवतितमोऽध्यायः ८३१
व्योम्ना प्रकाशमानत्वं ग्रसमानत्वमग्निना । तयोविमर्श ईकारो बिंदुना तन्निफालनम् ॥४॥
पिडकंर्तरि बीजाख्या मन्त्रा मालाभिधाः क्रमात् । एकार्णवन्तो द्वयूर्णाश्च विदिक्ष्मुखमुखार्णकाः ॥५॥
वृत्तिजा र्णांल्लिखेदंकैर्व्यत्यस्तक्रमयोगतः । तर्भेदयोजनं कुर्यात्संभर्भाणामशेषतः ॥६॥
देव्यात्मकं समुदयं विश्रांति च शिवात्मकम् । उभयात्मकमप्यात्मस्वरूपं तैश्च भावयेत् ॥७॥
कालेनान्यच्च दुःखार्तिवासनानाशनो ध्रुवम् । पराहंतामयं सर्वस्वरूपं चात्मविग्रहम् ॥८॥
सदात्मकं स्फुरताख्यमशेषोपाधिवर्जितम् । प्रकाशरूपमात्मत्वे वस्तु तद्भासते परम् ॥६॥
यत एवमतो लोके नास्त्यमंत्रं यदक्षरम् । यद्विद्येति समाख्यातं सर्वथा सर्वतः सदा ॥१०॥
वासरेषु तु तेष्वेवं सर्वापत्तारकं भवेत् । तद्विधानं च वक्ष्यामि सम्यगासवकल्पनम् ॥११॥
गौडी पैष्टी तथा माध्वीत्येवं तत्त्रिविधं स्मृतम् । गुडमुष्णोदके क्षिप्त्वा समालोड्य विनिक्षिपेत् ॥१२॥
घटे काचमये तस्मिन् धातकीसुमनोरजः । खात्वा भूमौ संध्ययोस्तु करैः संक्षोभ्य भूयसा ॥१३॥
मासमात्रे गते तस्मिन्निमग्ने रजसि द्रुतम् । संशोध्य पूजयेत्तेन गौडी सा गुडयोगतः ॥१४॥
एवं मधुसमायोगान्माध्वी पैष्टीं शृणु प्रिये । अध्यर्द्धद्विगुणे तोये श्रपयेत्तन्दुलं शनैः ॥१५॥
दिनत्रयोषिते तस्मिन्धात्यूंकुररजः क्षिपेत् । दिमेकं धृते वाते निवाते स्थापयेत्ततः ॥१६॥
उदकेंलोलितं पश्चाद्गलितं पैष्टिकं मधु । वृक्षजं फलजं चेति द्विविधं क्रियते मधु ॥१७॥
तन्निर्माणं शृणुष्वाय यदास्वादान्मनोलयः । मृद्वीकां वाथ खजूरफलं पुष्पमथापि वा ॥१८॥
उनमें प्रकाशमानता आकाश से आती है और ग्रसमानता (निगलने का भाव) अग्नि से । उन दोनों का विमर्श
ईकार है। बिन्दु से उसका अवलोकन करना चाहिए ॥१-४॥
पिंड के कर्त्ता में माला नामक बीज मंत्र क्रमशः स्थापित करने चाहिये । उस मन्त्र में एक वर्ण, चार
वर्ण और तीन दिशाओं में मुख वाले वर्ण होने चाहिये । फिर विपरीत क्रम से वृत्तिजन्य अक्षरों को लिखे । उनसे
सन्दर्भों का भेद सम्पूर्णतया कर दे । उदय में देवी के रूप, विश्राम में शिव के रूप और दोनों रूपों में आत्म-रूप
की भावना करे । ऐसा करने से निश्चित ही दुःख, पीडा तथा वासना का नाश होता है। उत्कृष्ट अहंकारमय,
सबका स्वरूप, आत्मरूप, सद्रूप, भासमानता की संज्ञा से युक्त, अक्रोध की उपाधि से रहित तथा प्रकाशरूप वस्तु
आत्मा होने में भासित होती है । जिस लिए ऐसी बात है, इसलिए लोक में कोई वस्तु मन्त्र-रहित नहीं है । उस
मन्त्र के जो अक्षर हैं और जो विद्या है वह सब बातें भली-भाँति बता दी गईं । विहित दिनों में उस मंत्र का
अनुष्ठान करने से सभी आपत्तियाँ दूर हो जाती हैं। अब मैं भली-भांति आसव बनाने की विधि बताऊँगा ।
आसव (मद्य) विविध प्रकार के कहे गये हैं - जैसे - गौडी, पैष्टी तथा माध्वी । गरम जल में गुड़ को छोड़कर
उसका मन्थन करे । फिर कांच के घड़े में धायके फूल के पराग के साथ उसे रखे। अनन्तर भूमि में उस घड़े को
गाड़कर दोनों संध्या हाथों से उसे चलाये। एक मास तक ऐसा करने के उपरान्त उसको परिशोधित करके
उससे पूजन करे । इस तरह गुड़योग से गोडी नामक मदिरा तैयार होती है ॥५-१४॥
प्रिय ! इसी प्रकार मधु के योग से माध्वी तथा पैष्टी नामक मद्य बनाया जाता है। ढाई गुने जल में
चावल को धीरे-धीरे पकाये । फिर तीन दिनों तक उसे बासी करके धात्रीफल के चूर्ण के साथ मिलाये। पश्चात्
एक दिन वायु में रख कर निर्वात स्थान में रख छोड़े । कुछ दिनों बाद जल मिलाकर उसका प्रयोग करे । इस
तरह पैष्टिक मद्य बनता है। माध्वी मदिरा दो प्रकार की होती हैं- वृक्ष की एवम् फल की। उसका बनाना
८३२ नारदीयपुराणम्
मधूकस्यांभसि क्षिप्त्वा शतमर्द्धावशेषितम् । प्राक्सूतांशेन मिलितं दिवसद्वयात् ॥१९॥
गालितं स्वादु पूजाहं मनोलयकरं शुभम् । वाक्षं तु नालिकेरं स्याद्धितालस्याथ तालतः ॥२०॥
फलक्रांडात्स्रुतं दुग्धं नीतं सद्यो रसावहम् । नालिकेरफलांतस्थसलिने शशिना युते ॥२१॥
अर्द्धपूगफलोत्थं तु रसं संक्षिप्य तापयेत् । आतपे सद्य एवैतदासवं देवताप्रियम् ॥२२॥
आसवैरेभिरुदितैरर्घ्यं देव्यै निवेदयेत् । देवीः कृत्वा ततः सद्यो दद्यात्तत्सिद्धये द्वयम् ॥२३॥
साधको नियताहारः समाधिस्थः पिबेत्सदा । न कदाचित्पिबेत्सिद्धो देव्यर्घ्यमनिवेदितम् ॥२४॥
पानं च तावत्कुर्वीत यावता स्यान्मनोलयः । ततः करोति चेत्सद्यः पातकी भवति ध्रुवम् ॥२५॥
देवतागुरुशिष्टान्यं पिबन्नासवमाशया । पातकी राजदंड्यश्च रिक्थयोभासक एव च ॥२६॥
साध्यसाधकयोरेतत्काम्य एव समीरितम् । सिद्धश्च सर्वदा प्रोक्तं यतोऽसौ तन्मयो भवेत् ॥२७॥
पूजयेत्प्रोक्तरूपैस्तु प्रोक्तरूपाश्च ताः क्रमात् । उपचारैरासवैश्च मत्स्यैर्मांसैश्च संस्कृतैः ॥२८॥
अथ काम्यार्चनं वक्ष्ये प्रयोगांश्चापि नारद । येषामाचरणात्सिद्धिं साधको लभते ध्रुवम् ॥२९॥
चैत्रे दमनकैरर्चेत्पूर्णायां मदनोत्सवम् । वैशाखे मासि पूर्णायां पूजयेद्धेमपुष्पकैः ॥३०॥
ज्येष्ठ्यां फलैर्यजेद्देवी कदलीपनसाम्रजैः । आषाढ्यां चन्दनैरेलाजाताकंकोलकुङ्कुमैः ॥३१॥
सुन लो, जिसके आस्वादन से मन की एकाग्रता होती है । दाख या खजूर के फल या पुष्प को महुए के जल में
छोड़ कर पकाये । आधा शेष रह जाने पर पहले के बने किंचिन्मात्र मद्य के साथ मिलाकर दो दिनों तक छोड़
दे । ऐसा करने से वह मद्य पूजा योग्य तथा मन की एकाग्रता का विधायक होता है । वृक्ष का मद्य तो इस तरह
बनाया जाता है कि नारियल, हिंताल, ताल और नागकेसर के तुरन्त निकाले हुए रसावह दूध (ताड़ी) को
नारियल के जल में छोड़ दे । फिर उसमें पूगीफल का पूंरस डाल कर धूप में रख दे । इस प्रकार तैयार किय
हुआ आसव देवता को अधिक प्रिय होता है ॥१९-२२॥
इस आसवों के तैयार हो जाने पर देवी को इनका अर्ध देना चाहिये । तदनन्तर सिद्धि के लिये देवताओं
को दो अर्ध देने चाहिए । साधक नियमपूर्वक आहार करते हुए सदा समाधिस्थ होकर इसका पान करे । सिद्ध
पुरुष बिना देवी को समर्पित किये पान कभी न करे पान उतनी मात्रा में करे, जिससे कि मन की एकाग्रता हो
जाय । उससे अधिक पान करने वाला निश्चय ही पातक का भागी बनता है । देवता, गुरु और शिष्यों का बिना
समर्पित किये जो उपभोग की इच्छा से मद्य का पान करता है, वह पातकी तथा राजा से दण्ड पाने योग्य है ।
धन की कामना करते हुए जो इसका पान करता है, वह भी पातकी है । साध्य और साधक के लिए यह काम्य
रूप से बतलाया गया है (अर्थात् इष्ट सिद्धि के लिए ही साधक इसका पान करे) । किन्तु सिद्ध पुरुष अपनी
तन्मयता के लिये सदा इसका उपयोग करे । उक्त प्रकार का व्यक्ति उक्त रूप देवियों की सुसंस्कृत मत्स्य, मांस
तथा मद्य से सोपचार अर्चना करे ॥२३-२८॥
नारद ! अब काम्या के पूजन तथा प्रयोगों को बतलाऊँगा, जिनके करने से साधक अवश्यमेव सिद्धि को
प्राप्त करता है । चैत्र मास की पूर्णिमा में कुन्द के पुष्पों से देवी की अभ्यर्थना करे । वैशाख की पूर्णिमा में चम्पा
के पुष्पों से पूजन करे । ज्येष्ठ की पूर्णिमा में केले, कटहल, तथा आम के पुष्पों (फलों) से पूजा करे । आषाढी
पूर्णिमा में चन्दन, इलायची, जूही, कंकोल (कंकल-अशोक) तथा कुंकुम से पूजन करे । श्रावण की पौर्णमासी में