सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)

बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)

Brihan Naradiya Purana with Sanskrit & Hindi Commentary

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)

कॉपीराइट समस्या बताएँ

DevanagariSanskritpublished1,008 पृष्ठ

पृष्ठ 851, कुल 1008 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 851

८३२ नारदीयपुराणम्

मधूकस्यांभसि क्षिप्त्वा शतमर्द्धावशेषितम् । प्राक्सूतांशेन मिलितं दिवसद्वयात् ॥१९॥
गालितं स्वादु पूजाहं मनोलयकरं शुभम् । वाक्षं तु नालिकेरं स्याद्धितालस्याथ तालतः ॥२०॥
फलक्रांडात्स्रुतं दुग्धं नीतं सद्यो रसावहम् । नालिकेरफलांतस्थसलिने शशिना युते ॥२१॥
अर्द्धपूगफलोत्थं तु रसं संक्षिप्य तापयेत् । आतपे सद्य एवैतदासवं देवताप्रियम् ॥२२॥
आसवैरेभिरुदितैरर्घ्यं देव्यै निवेदयेत् । देवीः कृत्वा ततः सद्यो दद्यात्तत्सिद्धये द्वयम् ॥२३॥
साधको नियताहारः समाधिस्थः पिबेत्सदा । न कदाचित्पिबेत्सिद्धो देव्यर्घ्यमनिवेदितम् ॥२४॥
पानं च तावत्कुर्वीत यावता स्यान्मनोलयः । ततः करोति चेत्सद्यः पातकी भवति ध्रुवम् ॥२५॥
देवतागुरुशिष्टान्यं पिबन्नासवमाशया । पातकी राजदंड्यश्च रिक्थयोभासक एव च ॥२६॥
साध्यसाधकयोरेतत्काम्य एव समीरितम् । सिद्धश्च सर्वदा प्रोक्तं यतोऽसौ तन्मयो भवेत् ॥२७॥
पूजयेत्प्रोक्तरूपैस्तु प्रोक्तरूपाश्च ताः क्रमात् । उपचारैरासवैश्च मत्स्यैर्मांसैश्च संस्कृतैः ॥२८॥
अथ काम्यार्चनं वक्ष्ये प्रयोगांश्चापि नारद । येषामाचरणात्सिद्धिं साधको लभते ध्रुवम् ॥२९॥
चैत्रे दमनकैरर्चेत्पूर्णायां मदनोत्सवम् । वैशाखे मासि पूर्णायां पूजयेद्धेमपुष्पकैः ॥३०॥
ज्येष्ठ्यां फलैर्यजेद्देवी कदलीपनसाम्रजैः । आषाढ्यां चन्दनैरेलाजाताकंकोलकुङ्कुमैः ॥३१॥


सुन लो, जिसके आस्वादन से मन की एकाग्रता होती है । दाख या खजूर के फल या पुष्प को महुए के जल में
छोड़ कर पकाये । आधा शेष रह जाने पर पहले के बने किंचिन्मात्र मद्य के साथ मिलाकर दो दिनों तक छोड़
दे । ऐसा करने से वह मद्य पूजा योग्य तथा मन की एकाग्रता का विधायक होता है । वृक्ष का मद्य तो इस तरह
बनाया जाता है कि नारियल, हिंताल, ताल और नागकेसर के तुरन्त निकाले हुए रसावह दूध (ताड़ी) को
नारियल के जल में छोड़ दे । फिर उसमें पूगीफल का पूंरस डाल कर धूप में रख दे । इस प्रकार तैयार किय
हुआ आसव देवता को अधिक प्रिय होता है ॥१९-२२॥
इस आसवों के तैयार हो जाने पर देवी को इनका अर्ध देना चाहिये । तदनन्तर सिद्धि के लिये देवताओं
को दो अर्ध देने चाहिए । साधक नियमपूर्वक आहार करते हुए सदा समाधिस्थ होकर इसका पान करे । सिद्ध
पुरुष बिना देवी को समर्पित किये पान कभी न करे पान उतनी मात्रा में करे, जिससे कि मन की एकाग्रता हो
जाय । उससे अधिक पान करने वाला निश्चय ही पातक का भागी बनता है । देवता, गुरु और शिष्यों का बिना
समर्पित किये जो उपभोग की इच्छा से मद्य का पान करता है, वह पातकी तथा राजा से दण्ड पाने योग्य है ।
धन की कामना करते हुए जो इसका पान करता है, वह भी पातकी है । साध्य और साधक के लिए यह काम्य
रूप से बतलाया गया है (अर्थात् इष्ट सिद्धि के लिए ही साधक इसका पान करे) । किन्तु सिद्ध पुरुष अपनी
तन्मयता के लिये सदा इसका उपयोग करे । उक्त प्रकार का व्यक्ति उक्त रूप देवियों की सुसंस्कृत मत्स्य, मांस
तथा मद्य से सोपचार अर्चना करे ॥२३-२८॥
नारद ! अब काम्या के पूजन तथा प्रयोगों को बतलाऊँगा, जिनके करने से साधक अवश्यमेव सिद्धि को
प्राप्त करता है । चैत्र मास की पूर्णिमा में कुन्द के पुष्पों से देवी की अभ्यर्थना करे । वैशाख की पूर्णिमा में चम्पा
के पुष्पों से पूजन करे । ज्येष्ठ की पूर्णिमा में केले, कटहल, तथा आम के पुष्पों (फलों) से पूजा करे । आषाढी
पूर्णिमा में चन्दन, इलायची, जूही, कंकोल (कंकल-अशोक) तथा कुंकुम से पूजन करे । श्रावण की पौर्णमासी में