बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)
Brihan Naradiya Purana with Sanskrit & Hindi Commentary
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)
इस ग्रन्थ के बारे में
बृहन्नारदीय पुराण, जिसे नारदपुराण भी कहा जाता है, परम्परा में महर्षि व्यास से जोड़ा जाता है। इसका पूर्वभाग सनक आदि कुमारों द्वारा नारद को दिए गए उपदेशों के रूप में है, जिनमें धर्म, भक्ति, व्रत, तीर्थ, मन्त्र-साधना और वेदाङ्गों (शिक्षा, कल्प, व्याकरण, निरुक्त, ज्योतिष और छन्द) का विस्तृत वर्णन आता है। इसकी एक विशेषता अठारह पुराणों की विषय-सूची है, जिसमें प्रत्येक पुराण की श्लोक-संख्या और विषय बताए गए हैं; स्कैन में 'पञ्चविंशतिसाहस्रं...' और 'प्रभासस्य च माहात्म्यं...' जैसे श्लोक इसी अंश के हैं।
यह संस्करण हिन्दी साहित्य सम्मेलन, प्रयाग की पुराण-प्रकाशन योजना के अन्तर्गत छपा 'बृहन्नारदीयपुराणम् (पूर्वभागः)' है, जिसमें संस्कृत मूल के साथ व्याकरण-वेदान्ताचार्य तारिणीश झा का हिन्दी अनुवाद है। प्रथम संस्करण शक 1910, अर्थात् 1989 ई. में प्रकाशित हुआ; प्रकाशक सम्मेलन के प्रधान मन्त्री डॉ. प्रभात मिश्र शास्त्री थे।
प्रकाशकीय वक्तव्य इस पुराण के ही एक श्लोक से आरम्भ होता है, जिसमें कहा गया है कि जैसे नदियों में गंगा और सरोवरों में पुष्कर श्रेष्ठ है, वैसे ही पुराणों में नारदीय। पुस्तक 1008 पृष्ठों की है।
पञ्चाशीतितमोऽध्यायः
सनत्कुमार उवाच
वाग्देवतावतारोऽन्यः कालिकेति प्रकीर्तिता । तस्या मन्त्रं प्रवक्ष्यामि भुक्तिमुक्तिप्रदं नृणाम् ॥१॥
सृष्टिक्रियान्विता शांतिर्बिंद्वाढ्या च त्रिधा पुनः । अरुणाख्यादीपिका च बिंदुयुक्ता द्विधा ततः ॥२॥
मायाद्वयं ततः पश्चाद्दक्षिणे कालिके पदम् । पुनश्च सप्तबीजानि स्वाहांतोऽयं मनूत्तमः ॥३॥
भैरवोऽस्य ऋषिश्छन्द उष्णिक्काली तु देवता । बीजं मायादीर्घवत्सं शक्तिरुक्ता मुनीश्वर ॥४॥
षड्दीर्घाढ्येन बीजेन विद्याया अंगमीरितम् । मातृकार्णान्वश दश हृदये भुजयोः पदोः ॥५॥
विन्यस्य व्यापकं कुर्यान्मूलमंत्रेण साधकः । शिरः कृपाणमभयं वरं हस्तैश्च बिभ्रतीम् ॥६॥
मुंडस्रङ्मस्तकां मुक्तकेशां पितृवनस्थिताम् । सर्वालंकृतवर्णां च श्यामांगीं कालिकां स्मरेत् ॥७॥
एवं ध्यात्वा जपेल्लक्षं जुहुयादयुतं ततः । प्रसूनैः करवीरोत्थैः पूजायन्त्रमथोच्यते ॥८॥
विलिख्य पूर्वं षट्कोणं त्रिकोणत्रितयं ततः । पद्ममष्टदलं बाह्ये भूपुरं तत्र पूजयेत् ॥६॥
जया च विजया चापि अजिता चापराजिता । नित्या विलासिनी वापि दोग्ध्यघोरा च मंगला ॥१०॥
पीठस्य शक्तयो मायात्मनेहृत्पीठमंत्रकः । शिवरूपशवस्थां च शिवाभिर्दिक्षु वेष्टिताम् ॥११॥
महाकालरतासक्तां ध्यात्वांगान्यर्चयेत्पुरा । कालीं कपालिनीं कुल्लां कुरुकुल्लां विरोधिनीम् ॥१२॥
अध्याय ८५
वाग्देवता की अवतार-काली आदि के मन्त्रों का निरूपण
सनत्कुमार बोले- वाग्देवता का दूसरा अवतार कालिकारूप में हुआ है । अब मैं मानवों के लिये मुक्ति-
मुक्ति प्रदान करने वाले कालिका-मन्त्र के विषय में कहूँगा । सृष्टि क्रिया से युक्त, शान्ति, विद्यापूर्ण, अरुणाक्षी,
आदीविका, बिंदुयुक्ता, माया, दक्षिण कालिका, सात बीज और अन्त में स्वाहा-ये उत्तम मन्त्र हैं। इसके
ऋषि भैरव, छंद उष्णिक् और देवता काली हैं । मुनीश्वर ! माया इसका बीज है और दीर्घवत्सं शक्ति है । बीज
सहित छः दीर्घ विद्या के अंग कहलाते हैं ।॥१-४।। साधक मातृक (अकारादि ४९ अक्षर) वर्णों में से दश-दश को
हृदय, भुजा और चरणों में न्यस्त करके मूलमन्त्र से व्यापक' न्यास करे । तत्पश्चात् शिर, कृपाण तथा अभयास्त्र
को हाथों में धारण करनेवाली, मुण्डमाला को मस्तक पर पहनने वाली, बिखरे केश वाली, श्मशान में रहने वाली,
समस्त अलंकारों से विभूषित तथा श्यामांगी कालिका का ध्यान करे। ध्यानोत्तर एक लाख मन्त्र का जप करे और
दश हजार करवीर के पुष्पों से हवन करे । अब पूजायंत्र के बारे में कहता हूँ। पहले षट्कोण को लिख कर तीन
त्रिकोण का निर्माण करे । तदनन्तर अष्टदल कमल को लिखकर उस पर भूपुर की पूजा करे । जया, विजया,
अजिता, अपराजिता, नित्या, विलासिनी, दोग्धी, अघोरा और मंगला-ये पीठ शक्तियाँ हैं। "मायात्मने... "-यह
हृत्पीठ का मन्त्र है ॥५-१०३॥ पहिले शिवरूपा, शवस्था, चारों ओर शृगालियों से वेष्टिता, महाकालनिरता तथा
आसक्ता काली का ध्यान करके अंगों की अर्चना करे । षट्कोण में काली, कपालिनी, कुल्ला, कुरुकुल्ला, विरोधिनी
१. तन्त्रप्रसिद्ध सर्वाङ्ग सम्बन्धी न्यास ।
१८ ना० पु०
७७८ नारदीयपुराणम्
विप्रचित्तां च षट्कोणे नवकोणे ततोऽर्चयेत् । उग्रामुष्णप्रभां दीप्तां नीलाधानां बलाकिताम् ॥१३॥
मात्रां मुद्रां तथा मित्रां पूज्याः पत्रेषु मातरः । पद्मस्यास्य सुयत्नेन ब्राह्मी नारायणीत्यपि ॥१४॥
माहेश्वरी च चामुण्डा कौमारी चापराजिता । वाराही नारसिंही च पुनरेतास्तु नूपुरे ॥१५॥
भैरवीं महदाद्यां तां सिंहाद्यां धूम्रपूर्वकाम् । भीमोन्मत्तादिकां चापि वशीकरणभैरवीम् ॥१६॥
मोहनाद्यां समाराध्य शक्रादीन्वायुधान्यपि । एवमाराधिता काली सिद्धा भवति मन्त्रिणाम् ॥१७॥
ततः प्रयोगान्कुर्वीत महाभैरवभाषितान् । आत्मनो वा परस्यार्थं क्षिप्रसिद्धिप्रदायकान् ॥१८॥
स्त्रीणां प्रहारं निंदां च कौटिल्यं वाप्रीयं वचः । आत्मनो हितमन्विच्छन् कालीभक्तो विवर्जयेत् ॥१९॥
सुदृशो मदनावासं पश्यन्द्यः प्रजपेन्मनुम् । अयुतं सोऽचिरादेव वाक्पतेः समतामियात् ॥२०॥
दिगम्बरो मुक्तकेशः श्मशानस्थोऽधियामिनि । जपेद्योऽयुतमेतस्य भवेयुः सर्वसिद्धयः ॥२१॥
शवस्य हृदये स्थित्वा निर्वासाः प्रेतभूमिगः । अर्कपुष्पसहस्रेणाभ्यक्तेन स्वीयरेतसा ॥२२॥
देवीं यः पूजयेद्भक्त्या जपन्नेकैकशो मनुम् । सोऽचिरेणैव कालेन धरणीप्रभुतां व्रजेत् ॥२३॥
रजःकीर्ण भगं नार्या ध्यायन्त्यो ह्युयुतं जपेत् । स कवित्वेन रम्येण जनान्मोहयति ध्रुवम् ॥२४॥
त्रिपञ्चारे महापीठे शिवस्य हृदि संस्थिताम् । महाकालेन देवेन मारयुद्धं प्रकुर्वतीम् ॥२५॥
तां ध्यायन्स्मेरवदनां विदधत्सुरतं स्वयम् । जपेत्सहस्रमपि यः स शंकरसमो भवेत् ॥२६॥
अस्थिलोमत्वचायुक्तं मांसं मार्जारमेषयोः । उष्ट्रस्य महिषस्यापि बलिं यस्तु समर्पयेत् ॥२७॥
भूताष्टम्योर्मध्यरात्रे वश्याः स्युस्तस्य जन्तवः । विद्यालक्ष्मीयशःपुत्रैः स चिरं सुखमेधते ॥२८॥
और विप्रचित्ता का पूजन कर नवकोण में पत्रों के ऊपर उग्रा, उष्णप्रभा, दीप्ता, नीलाधाना, बलाकिता, मात्रा, मुद्रा,
मित्रा तथा माताओं की पूजा करे । पुनः अष्टदल कमल पर यत्नपूर्वक ब्राह्मी, नारायणी, माहेश्वरी, चामुण्डा,
कौमारी, अपराजिता, वाराही तथा नारसिंही का पूजन करे । भैरवी, महदाद्या, सिंहाद्या, धूम्रपूर्विका, भीमा, उन्मत्ता,
उर्दिका, वशीकरण भैरवी तथा मोहनाद्या की आराधना करके इन्द्र आदि देवगण एवम् उनके अस्त्रों की पूजा करनी
चाहिये । इस तरह काली की आराधना करने से ये साधकों को सिद्ध हो जाती हैं ॥११-१७॥ अपने लिये या दूसरे
के लिये महाभैरव द्वारा प्रतिपादित शीघ्र सिद्धि दायक मन्त्रों का प्रयोग करे । कल्याण के इच्छुक काली के भक्तों
को चाहिये कि वह स्त्रियों के ऊपर प्रहार, उनकी निंदा, तथा उनके साथ वंचना एवम् कटु भाषण न करे । जो
नर सुन्दरी के मदनावास (भग) की ओर ताकते हुए दस हजार मन्त्र का जप करता है, वह शीघ्र ही बृहस्पति
तुल्य हो जाता है । जो व्यक्ति अर्धरात्रि के समय श्मशान में बालों को बिखेर कर नग्न होकर इस मन्त्र का
दश हजार जप करता है, उसे सकल सिद्धियों की प्राप्ति होती है । जो नर श्मशान में नग्न होकर शव की
छाती पर बैठ कर हजार आक के पुष्पों में अपना वीर्य मिलाकर उनसे भक्ति-पूर्वक देवी का पूजन करता है
तथा प्रति पुष्प चढ़ाने में मन्त्र का जप करता है, वह थोड़े ही समय में पृथ्वी का प्रभु हो जाता है ॥१८-२३॥
जो नर नारी के रजःपूर्ण भग का ध्यान करते हुए दश हजार मन्त्र का जप करता है, वह निश्चय ही
अपनी रमणीय कविता से जनता को मुग्ध करता है । जो व्यक्ति त्रिपञ्चार नामक महापीठ में शिव की छाती
पर अवस्थित तथा महाकाल देव (शंकर) के साथ रतिसंग्राम करती हुई स्मेर वदना देवा का ध्यान करके स्वयं
रतिक्रीड़ा करते हुए एक हजार भी मन्त्र का जप करता है, वह शंकर की समता को प्राप्त करता है ॥२४-२६॥
जो कृष्ण पक्ष की अष्टमी की मध्यरात्रि में बिलाड़, भेड़, ऊँट तथा महिष के अस्थि लोम एवम् त्वचा से युक्त
मांस की बलि समर्पण करता है, उसके वश में समस्त प्राणी हो जाते हैं और वह विद्या, लक्ष्मी, यश तथा पुत्रों
७७६
पञ्चाशीतितमोऽध्यायः
यो हविष्याशनरतो दिवा देवीं स्मरन् जपेत् । नक्तं निधुवनासक्तो लक्षं स स्याद्धरापतिः ॥२६॥
रक्तांभोजैर्हुनेन्मन्त्री धनैर्जयति वित्तपम् । बिल्वपत्रैर्भवेद्राज्यं रक्तपुष्पैर्वशीकृतिः ॥३०॥
असृजा महिषादीनां कालिकां यस्तु तर्पयेत् । तस्य स्युरचिरादेव करस्थाः सर्वसिद्धयः ॥३१॥
यो लक्षं प्रजपेन्मन्त्रं शवमारुह्य मन्त्रवित् । तस्य सिद्धो मनुः सद्यः सर्वेप्सितफलप्रदः ॥३२॥
तेनाश्वमेधप्रमुखैर्यागैरिष्टं सुजन्मना । दत्तं दानं तपस्तप्तं उपास्ते यस्तु कालिकाम् ॥३३॥
ब्रह्मा विष्णुः शिवो गौरी लक्ष्मीर्गणपती रविः । पूजिताः सकला देवा यः कालीं पूजयेत्सदा ॥३४॥
अथापरः सरस्वत्या ह्यवतारो निगद्यते । यां निषेव्य नरा लोके कृतार्थाः स्युर्न संशयः ॥३५॥
आप्यायिनी चन्द्रयुक्ता माया च वदनांतरे । सकामिका क्रुधा शांतिश्चन्द्रांलंकृतमस्तका ॥३६॥
दीपिका सासना चन्द्रयुगस्त्रं मनुरीरितः । मुनिरक्षोभ्य उद्दिष्टश्छन्दस्तु बृहती मतम् ॥३७॥
ताराख्या देवता बीजं द्वितीयञ्च चतुर्थकम् । शक्तिः षड्दीर्घयुक्तेन द्वितीयेनांगकल्पनम् ॥३८॥
षोढा न्यासं ततः कुर्यात्तारायाः सर्वसिद्धिदम् । श्रीकण्ठादोन्यसेद्रुद्रान्मातृकावर्णपूर्वकान् ॥३६॥
मातृकोक्तस्थले माया तृतीयक्रोधपूर्वकान् । चतुर्थीनमसायुक्तान्प्रथमो न्यास ईरितः ॥४०॥
शवपीठसमासीनां नीलकांतिं त्रिलोचनाम् । अर्द्धन्दुशेखरां नानाभूषणाढयां स्मरन्न्यसेत् ॥४१॥
द्वितीये तु ग्रहन्यासं कुर्यात्तां समनुस्मरन् । त्रिबीजस्वरपूर्वं तु रवत्सूर्य हृदि न्यसेत् ॥४२॥
को प्राप्त कर चिरकाल तक सुखोपभोग करता है। जो हविष्यभोजी होकर दिन में देवी का स्मरण करते हुए
एक लाख मन्त्र का जप करता है और रात्रि में रतिक्रीड़ा में आसक्त रहता है, वह महीपति होता है। रक्त-
कमल से हवन करनेवाला साधक धन में कुबेर को जीत लेता है। बिल्वपत्रों से हवन करने वालों को राज्य
की प्राप्ति होती है। रक्तपुष्पों से होम करनेवाला वशीकरणसिद्धि को प्राप्त करता है ॥२७-३०॥ जो व्यक्ति
महिष आदि के शोणित से कालिका को तृप्त करता है उसे सकल सिद्धियां प्राप्त हो जाती हैं। जो मन्त्रवेत्ता
शव पर आरूढ़ होकर लाख बार मन्त्र का जप करता है, वह तुरन्त अभीष्ट फलदायक मन्त्र को सिद्ध कर लेता
है। जो सुजन्मा व्यक्ति कालिका की उपासना करता है, वह मानो अश्वमेध आदि यज्ञ, दान तथा तप करता है।
जो सदा काली का पूजन करता हो, वह मानो ब्रह्मा, विष्णु, महेश, गौरी, लक्ष्मी, गणेश तथा सूर्य आदि
सकल देवों की पूजा करता है ॥३१-३४॥
इसके उपरान्त मैं सरस्वती के दूसरे अवतार का वर्णन करता हूँ, जिनकी आराधना करके मनुष्य कृतार्थ हो जाते
हैं, इसमें संशय नहीं। आप्यायिनी, चन्द्रयुक्ता, वदनान्तरवर्तिनी, माया, सकामिका, क्रुधा, शान्ति, चन्द्रमा से
अलंकृत मस्तकवाली, दीपिका, सासना, और चन्द्रयुक्त अस्त्र (खड्ग) - यह उनका मन्त्र है। इस मन्त्र के ऋषि
अक्षोभ्य हैं, छंद बृहती है और देवता तारा हैं। द्वितीय अक्षर बीज है और चतुर्थ अक्षर शक्ति है। छः दीर्घों से
युक्त द्वितीय अक्षर से अंगों को कल्पना करे। तत्पश्चात् अखिल सिद्धिदायक तारा के षडंगन्यास करे। मातृका
वर्ण पुरस्सर श्रीकंठ आदि रुद्रों का न्यास करके मातृकोक्त स्थल में तृतीय क्रोधपूर्वक माया का न्यास करे।
तदनन्तर शव के पीठ पर आसीन नीलकांति, त्रिलोचना, विविध आभूषणों से भूषिता तथा ललाट पर अर्धचन्द्र
को धारण करनेवाली देवी का ध्यान करके न्यास करना चाहिये, इसे प्रथम न्यास कहते हैं, पुनः उन्हीं का
स्मरण करते हुए ग्रहों का न्यास करे। इसे द्वितीय न्यास कहते हैं॥३५-४१॥ तीन बीजस्वर के साथ रक्त सूर्यं
का हृदय में न्यास करे। पवर्ग पूर्वक शुक्ल चन्द्र का दोनों भौंहों पर न्यास करे। कवर्ग पूर्वक रक्त मंगल का
७८० नारदीयपुराणम्
तथा षवर्गपूर्वं तु शुक्लं सोमं भ्रुवोर्द्वये । कवर्गपूर्वं रक्ताभं मंगलं लोचनत्रयम् ॥४३॥
चवर्गाद्यं बुधं श्यामं न्यसेद्वक्षःस्थले बुधः । तवर्गाद्यं पीतवर्णं कण्ठकूपे बृहस्पतिम् ॥४४॥
तवर्गाद्यं श्वेतवर्णं घटिकायां तु भार्गवम् । नीलवर्णं पवर्गार्थं नाभिदेशे शनैश्चरम् ॥४५॥
शवर्गार्थं धूम्रवर्णं ध्यात्वा राहुं मुखे न्यसेत् । त्रिबीजपूर्वकश्चैवं ग्रह्न्यासः समीरितः ॥४६॥
तृतीयं लोकपालानां न्यासं कुर्यात्प्रयत्नतः । मायादिवीजत्रितयं पूर्वकं सर्वसिद्धये ॥४७॥
स्वमस्तके ललाटादि विश्वत्रष्टस्वधउर्ध्वतः । ह्रस्वदीर्घकादिकाष्टवर्गपूर्वान्दिशाधिपान् ॥४८॥
शिवशक्त्यभिधे न्यासं चतुर्थे तु समाचरेत् । त्रिबीजपूर्वकान्न्यस्येत्षट् शिवाञ्छक्तिसंयुतान् ॥४९॥
आधारादिषु चक्रेषु स्वचक्रवर्णपूर्वकम् । ब्रह्माणं डाकिनोयुक्तं वादिसान्तांर्णपूर्वकम् ॥५०॥
मूलाधारे विन्यसेच्च चतुर्दलसमन्वितम् । श्रीविष्णुं राकिणीयुक्तत्वादिलांतार्णपूर्वकम् ॥५१॥
स्वाधिष्ठानाभिधे चक्रे लिंगस्थे षड्दले न्यसेत् । रुद्रं तु डाकिनीयुक्तं दादिकांतांणपूर्वकम् ॥५२॥
चक्रे दशदले न्यस्येन्नाभिस्थे मणिपूरके । ईश्वरं कादिठान्तार्णपूर्वकं शाकिनीयुतम् ॥५३॥
विन्यसेद्द्वादशदले हृदयस्थे त्वनाहते । सदाशिवं शाकिनीं च षोडशस्वरपूर्वकम् ॥५४॥
कण्ठस्थे षोडशदले विशुद्धाख्ये प्रविन्धसेत् । आज्ञाचक्रे परशिवं हाकिनीसंयुतं न्यसेत् ॥५५॥
लक्षार्णपूर्वं भ्रू मध्यसंस्थितेऽतिमनोहरे । तारादिपंचमं न्यासं कुर्यात्सर्वेष्टसिद्धये ॥५६॥
अष्टौ वर्गान्स्वरद्वंद्वपूर्वकान् बीजसंयुतान् । ताराद्या न्यासपूर्वाश्च प्रयोज्या अष्टशक्तयः ॥५७॥
तारायोग्रा महोग्रापि वञ्चा काली सरस्वती । कामश्वेरी च चामुंडा इत्यष्टौ तारिकाः स्मृताः ॥५८॥
नेत्रों पर न्यास करे । विद्वान् साधक चवर्गाद्य श्याम बुध का वक्षःस्थल पर न्यास करे । पीतवर्ण वाले दवर्गाद्य
बृहस्पति का कंठकूप में न्यास करे ॥४२-४४॥ श्वेतवर्ण वाले तवर्गाद्य शुक्र का घटिका (नितम्ब) पर न्यास करे ।
नीलवर्ण वाले पवद्यि शनैश्चर का नाभि देश में न्यास करे । धूम्रवर्ण वाले शवर्गार्थ राहु का मुख में न्यास करे ।
ग्रहों का त्रिबीज पूर्वक न्यास इसी तरह कहा गया है ॥४५-४६॥
अब तीसरा न्यास लोकपालों का कहा गया है, जिसे यत्न पूर्वक करना चाहिये । मायादि तीन बीजों
के साथ इसे करने से सब प्रकार की सिद्धियां प्राप्त होती हैं । अपने मस्तक और ललाट पर, आठों दिशाओं में
नीचे एवम् ऊपर ह्रस्व दीर्घ आदि अष्ट वर्ग पूर्वक दिक्पालों का न्यास करना चाहिये ॥४७-४८॥ चौथा न्यास
शिवशक्ति नामक है । शक्तियुक्त छः रुद्रों का त्रिबीज पूर्वक न्यास करना चाहिये । आधार आदि चक्रों में
अपने चक्र के वर्णों के साथ इनका न्यास करे । तवर्ण पूर्वक डाकिनीयुक्त ब्रह्मा का न्यास करके मूलाधार में
चतुर्दल समन्वित श्री विष्णु का न्यास करना चाहिये, जो राकिणी से और पवर्ग के अन्तिम वर्ण से युक्त हों
स्वाधिष्ठान संज्ञक लिंगस्थ षड्दल चक्र में डाकिनीयुक्त रुद्र का 'ड' आदि 'फ' अन्तवर्णपूर्वक न्यास करना चाहिये
मणिपूर नामक नाभिस्थ दशदल चक्र में लाकिनीयुक्त ईश्वर का 'क' आदि 'ठ' अन्तवर्ग पूर्वक न्यास करना
चाहिये ॥४९-५३॥ अनाहत संज्ञक हृदयस्थ द्वादशदल चक्र में शाकिनी युक्त सदाशिव का सोलहस्वर पूर्वक न्यास
करना चाहिये । विशुद्ध नामक कंठस्थित षोडशदलात्मक आज्ञाचक्र में हाकिनीयुक्त परशिव का न्यास करना
चाहिये । सकल इष्ट सिद्धि के लिये अत्यन्त मनोहर भ्रूमध्य में लक्षवर्ण पूर्वक तारादि पंचम न्यास करना चाहिये ।
स्वर एवम् बिन्दु पूर्वक बीज संयुक्त अष्ट वर्गों का न्यास करके तारिका आदि आठ शक्तियों का न्यास करे ।
तारा, उग्रा, महोग्रा, वज्रा, काली, सरस्वती, कामेश्वरी और चामुंडा ये आठ तारिकायें कहलाती हैं । ब्रह्मरन्ध्र,
ललाट, भ्रूमध्य, कंठदेश, हृदय, नाभि तथा मूलाधार में क्रमशः इनका न्यास करे । तदनन्तर सकल सिद्धि-
पञ्चाशीतितमोऽध्यायः ७८१
ब्रह्मरन्ध्रे ललाटे च भ्रूमध्ये कण्ठदेशतः । हृदि नाभौ फले मूलाधारे चेताः क्रमान्न्यसेत् ॥५९॥
अङ्गन्यासं ततः कुर्यात्पीठाख्यं सर्वसिद्धिदम् । आधारे कामरूपाख्यं बीजं ह्रस्वार्णपूर्वकम् ॥६०॥
हृदि जालन्धरं बीजं दीर्घपूर्वं प्रविन्यसेत् । ललाटे पूर्णगिर्याख्यं कवर्गार्चं न्यसेत्सुधीः ॥६१॥
उड्डीयानं चवर्गाय केशसन्धौ प्रविन्यसेत् । कण्ठे तु मथुरापीठं दशमं यादिकं न्यसेत् ॥६२॥
षोढा न्यासस्तु तारायाः प्रोक्तोऽभीष्टप्रदायकः । हृदि श्रीमदेकजटां तारिणीं शिरसि न्यसेत् ॥६३॥
वज्रोदके शिखां पातु उग्रतारां तु चर्मणि । महोग्रा वत्सरे नेत्रे पिंगाग्रैकजटास्त्रके ॥६४॥
षड्दीर्घयुक्तमायाया एतान्यष्टौ षडंगके । अंगुष्ठादिवंगुलीषु एवं विन्यस्य यत्नतः ॥६५॥
तर्जनीमध्यमाभ्यां तु कृत्वा तालत्रयं ततः । छोटिकामुद्रया कुर्याद्दिग्बन्धं देवतां स्मरन् ॥६६॥
विद्यया तारपुटया व्यापकं सप्तधा चरेत् । उग्रतारां ततो ध्यायेत्सद्यो वावेऽतिसिद्धिदाम् ॥६७॥
लयान्धावंबुजन्मस्थां नीलाभां दिव्यभूषणाम् । कम्बुं खड्गं कपालं च नीलाब्जं दधतीं करैः ॥६८॥
नागश्रेष्ठालंकृतांगीं रक्तनेत्रत्रयां स्मरेत् । जपेल्लक्षचतुष्कं हि दशांशं रक्तपद्मकैः ॥६९॥
हुनेत्क्षीराज्यसंमिश्रैः शंखं संस्थाप्य संजपेत् । नारीं पश्यन्स्पृशन्गच्छन्महानिशि बलिं चरेत् ॥७०॥
श्मशाने शून्यसदने देवागारेऽथ निर्जने । पर्वते वनमध्ये वा शवमारुह्य मंत्रवित् ॥७१॥
समरे शत्रुनिहतं यद्वा षाण्मासिकं शिशुम् । विद्यां साधयतः शीघ्रं साधितैवं प्रसिद्ध्यति ॥७२॥
मेघा प्रज्ञा प्रभा विद्या धीवृत्तिस्मृतिबुद्धयः । विश्वेश्वरीति संप्रोक्ताः पीठस्य नव शक्तयः ॥७३॥
भृगुमन्विन्दुसंयुक्तं मेघवर्त्म सरस्वती । योगपीठामने हार्दं पीठस्य मनुरीरितः ॥७४॥
दत्वानेनासनं मूत्ति मूलमंत्रेण कल्पयेत् । पूजयेद्विधिवद्देवींत द्विधानमयोच्यते ॥७५॥
दायक पीठ से एक अंग न्यास को करे । ॥५४-५६॥ आधार में ह्रस्ववर्ण पूर्वक कामरूप संज्ञक बीज का,
हृदय में दीर्घ पूर्वक जालंधर नामक बीज का, ललाट पर कवर्ग पूर्वक पूर्णगिरि नामक बीज का, केश संधि में चवर्ग
पूर्वक उड्डीयान नामक बीज का और कंठ में य' पूर्वक मथुरापीठ नामक दशम बीज का न्यास करे । कामना-
दायक तारा के छः न्यास कहे जाते हैं । हृदय में श्रीमदेकजटा का, मस्तक पर तारिणी का, शिखा पर वज्रोदका
का, त्वचा पर उग्र तारा का, छाती पर महोग्रा का और नेत्रों में पिंगाग्रैकजटा का न्यास करे । छः दीर्घों से
युक्त माया का अंगुष्ठ आदि अंगुलियों में यत्नपूर्वक न्यास करके तर्जनी और मध्यमा से तीन बार ताली
बजावे ॥६०-६५॥ फिर छोटिका मुद्रा से देवतास्मरण पूर्वक दिग्बन्ध करके तारामंत्र से संपुटित विद्या से सात
बार सर्वांग सम्बन्धि न्यास करे । तदनन्तर सद्यः सिद्धि प्रदान करनेवाली, नीलवर्णवाली, दिव्य आभूषणवाली,
हाथों में शंख, खड्ग, कपाल तथा नीलकमल धारण करनेवाली, उत्तम नाग से अलंकृत कार्यवाली और तीन लाल
आँखों वाली उग्रतारा का ध्यान करके चार लाख मंत्र का जप करे और उसका दशांश दूध तथा घी मिलाये
रक्त कमलों से हवन करे । फिर शंख की स्थापना कर के जप करे और महानिशा में नारी का दर्शन एवम्
स्पर्श करते हुए बलि चढ़ावे ॥६६-७०॥ श्मशान, शून्य गृह, देवालय, निर्जनस्थान, पर्वत अथवा वनमध्य
में शव के ऊपर आरूढ़ होकर मंत्रवेत्ता विद्या का साधन करे । शव छः महिने शिशु का हो या समर में
शत्रुद्वारा निहत सैनिक का । ऐसा करने से विद्या शीघ्र सिद्ध हो जाती है । मेघा, प्रज्ञा, प्रभा, विद्या, धी,
वृत्ति, स्मृति, बुद्धि तथा विश्वेश्वरी-ये नौ पीठ शक्तियाँ हैं ॥७१-७३॥
"भृगुमन् ....." यह मन्त्र है । इस मन्त्र से आसन देकर मूलमन्त्र से मूर्ति की कल्पना करे । तद-
नन्तर विधिपूर्वक देवी की आराधना करे । विधान इस प्रकार है-"तारो माया...... स्वाहा" यह बलिमंत्र है।
७८२ नारदीयपुराणम्
तारो माया भगं ब्रह्मा जटे सूर्यः सदीर्घकम् । यक्षाधिपतये तंद्री सोपनीतं बलिं ततः ॥७६॥
गृहयुग्मं शिवा स्वाहा बलिमंत्रोऽयमीरितः । दद्यान्नित्यं बलिं तेन मध्यरात्रे चतुष्पथे ॥७७॥
जलदानादिकं मंत्रैर्विदध्याद्दशभिस्ततः । ध्रुवो वज्रोदके वर्म फट्सप्तार्णो जलग्रहे ॥७८॥
ताराद्या वह्निजायांता माया हि क्षालने मता । तारो मायाः भृगुः कर्णी विशुद्धं धर्मवर्मतः ॥७९॥
सर्वपापानि शाम्यंते छेतो नेत्रयुतं जलम् । कल्पान्तनयनस्वाहा मंत्र आचमने मतः ॥८०॥
ध्रुवो मणिधरीत्यंते वज्रिण्यक्षियुता मृतिः । खरिविद्यायुग्ग्रिजश्च सर्ववांते बकोऽब्जवान् ॥८१॥
कारिण्यंते दीर्घवर्म अस्त्रं वह्निप्रियांतितः । त्रयोविंशतिवर्णात्मा शिखाया बंधने मनुः ॥८२॥
प्रणवो रक्षयुगलं दीर्घवर्मास्त्रठद्वयम् । नवार्णेनामुना मंत्रो कुर्याद्भूमिविशोधनम् ॥८३॥
नारांते सर्वविघ्नानुत्सारयेति पदं ततः । हुं फट् स्वाहा गुणैर्दर्भा मनुर्विघ्ननिवारणम् ॥८४॥
मायाबीजं जपापुष्पनिभं नाभौ विचिंतयेत् । तदुत्थेनाग्निना देहं दहेत्सार्द्धंस्वपाप्मना ॥८५॥
ताराबीजं सुवर्णाभं चिंतयेद्धृदि मंत्रवित् । पवनेन तदुत्थेन पापभस्म क्षिपेद्भुवि ॥८६॥
तुरीयं चन्द्रकुन्दाभं बीजं ध्यात्वा ललाटतः । तदुत्थसुधयादेहं स्वयं वै देवतानिशम् ॥८७॥
अनया भूतशुद्ध्या तु देवी सादृश्यमाप्नुयात् । तारोऽनंतो भृगुः कर्णी पद्मनाभयुतो बली ॥८८॥
खे वज्ररेखे क्रोधाख्यं बीजं पावकवल्लभा । अमुना द्वादशार्णेन रचयेन्मंडलं शुभम् ॥८९॥
तारो यथागता निद्रा सद्कूषेकभृगुविषम् । सदीर्घंस्मृतिरौ साक्षौ महाकालो भगान्वितः ॥९०॥
क्रोधोऽस्त्रं मनुवर्णोऽयं मनुः पुष्पाविशोधने । तारः पाशः परा स्वाहा पंचार्णश्चित्तशोधने ॥९१॥
मनवो दश संप्रोक्ता अर्घ्यस्थापनमुच्यते । सेंदुभ्यां मासतो माया भुवं संसृज्य भूगृहम् ॥९२॥
वृत्तं त्रिकोणसंयुक्तं कुर्यान्मंडलमंत्रतः । यजेत्तत्राधारशक्ति वह्निमंडलमध्यगाम् ॥
वह्निमंडलमभ्यर्च्य महाशंखं निधापयेत् ॥९३॥
वामकर्णेन्दुयुक्तेन फडंतेन विहायसा । प्रक्षालितं भृगुदंडी विमूर्तींडुयुतं पठेत् ॥९४॥
इससे मध्यरात्रि में चौराहे पर नित्य बलि अर्पण करे। तत्पश्चात् दश मन्त्रों से जलदान आदि करना चाहिये।
"ध्रुवों......स्वाहा" इस मन्त्र से आचमन करना चाहिये। "ध्रुवो मणिधरी......त्रयोविंशतिवर्णात्मा
इससे शिखा बांधे। "प्रणवो......द्वयम्" इससे भूमिशोधन करना चाहिये। नारांते......वर्णः" इसके जप
से विघ्नों का निवारण होता है। साधक नाभि में जपापुष्प सदृश माया बीज का चिन्तन करे और कल्पना करे
कि मायाबीज रूपी अग्नि से मेरा शरीर पापसहित जल गया। तदनन्तर हृदय में सुवर्णतुल्य प्रकाशमान तारा-
बीज का ध्यान करके कल्पना करे कि ताराबीज रूपी वायु ने मेरे पापरूपी भस्म को उड़ा डाला। पुन: चन्द्र
और कुन्द समान धवल तुरीय बीज का ध्यान करके भावना करे कि तुरीय बीजरूपी अमृत का पान कर मैं
स्वयं देवतुल्य हो गया हूँ। इस प्रकार भूतशुद्धि करनेवाला साधक देवी के सादृश्य को प्राप्त करता है। "तारो
......पावकवल्लभा" इस मन्त्र से पवित्र मण्डल की रचना करे ॥७४-८९॥ "तारो यथागता......
मनुवर्णः" इससे पुष्पादि शोधन करे। "तारः पाशः परा स्वाहा" इससे चित्त शुद्धि करनी चाहिये। अर्घ्यदान
में दश मन्त्र कहे गये हैं। "सेंदुभ्याम्......त्रिकोण संयुक्तम्" इससे मंडल का निर्माण कर उस पर वह्नि
मण्डल के मध्य में जानेवाली आधारशक्ति की अर्चना करे। फिर अग्निमंडल का पूजन कर "वामकर्ण......
इंदुयुतम्" इस मन्त्र का पाठ करते हुए महाशंख की स्थापना करे। तत्पश्चात् वक्ष्यमाण चारों मन्त्रों का
पञ्चाशीतितमोऽध्यायः ७८३
ततोऽर्चयेन्महाशंखं जपन्मन्त्रचतुष्टयम्। दीर्घत्रयान्विता माया काली सृष्टिः सदीर्घसः ॥९५॥
प्रतिमासंयुतं मासं यवनं हृदयं ततः । एकादशार्णः प्रथमो महाशंखाचंने मनुः ॥९६॥
हंसो हरिमृजंगेशयुक्तो दीर्घत्रयेदुयुक् । तारिण्यंते कपाल पशो द्वादशाक्षरः ॥९७॥
स्वं दीर्घत्रयसम्बाढद्यमेषो वामदगन्वितः । लोकपालाय हृदयं तृतीयोऽयं शिवाक्षरः ॥९८॥
मायास्त्रीबोजमर्डेदुयुतं स्वं स्वर्गखादिमः । पालाय सर्वाधाराय सर्वः सर्वोद्भवस्तथा ॥९९॥
सर्वशुद्धिमयश्चेति डेंताः सर्वासुरांतिकम्। रुधिरा रतिदीर्घा च वायुः शुभ्रानिलःसुरा ॥१००॥
भाजनाय भगो सत्यो विकपालाय हृन्मनुः । तुर्यो रसेषु वर्णोऽयं महाशंखप्रपूजने ॥१०१॥
नवार्कमंडलं चेष्ट्वा सलिलं मूलमन्त्रतः । प्रपूरयेत्सुधाबुद्ध्या गंधपुष्पाक्षतादिभिः ॥१०२॥
मुद्रां त्रिखंडां संदर्य पूजयेच्चंद्रमंडलम् । वाक्सत्यपद्मागगने रेफानुग्रहबिंदुयुक् ॥१०३॥
मूलमंत्रो विपद्धंसमनुसर्गसमन्वितम् । अष्टकृत्वोऽमुना मंत्री मंत्रयेत्प्रयतो जलम् ॥१०४॥
मायया संदिशं क्षिप्त्वा खं योनिं च प्रदर्शयेत् । तत्र वृत्ताष्टषट्कोणं ध्यात्वा देवीं विचिंतयेत् ॥१०५॥
पूर्वोक्तां पूजयेत्त्वेलां मूलेनाथ प्रतर्पयेत् । तर्जनीमध्यमानामाकनिष्ठामिर्महेश्वरीम् ॥१०६॥
सांगुष्ठानिश्चतुर्वारं महाशंखस्थिते जले । खरेंफमनुबिंद्वाढ्यं भृगुर्मन्विदुयुतया ॥१०७॥
धूवाद्येन नमोतेन तर्पदानंद भैरवम् । ततस्तेनार्धतोयेन प्रोक्षेत्पूजनसाधनम् ॥१०८॥
योनिमुद्रां प्रदर्श्यापि प्रणमेद्भवतारिणीम् । विधानमर्घ संप्रोक्तं सर्वसिद्धिप्रदायकम् ॥१०६॥
पूर्वोक्ते पूजयेत्पीठे पद्मे षट्कोणकणिके । धरागुहावृते रम्ये देवीं रम्योपचारकैः ॥११०॥
महीगृहे चतुर्विश्व गणेशदीन्प्रपूजयेत् । पाशांकुशौ कपालं च त्रिशूलं दधतं करैः ॥१११॥
अलंकारचयोपेतं गणेशं प्राक्तमर्चयेत् । कपालशूले हस्ताभ्यां दधतं सर्पभूषणम् ॥११२॥
जप करते हुए महाशंख की आराधना करनी चाहिये ॥९०-९४३॥ "दीर्घत्रयान्विता ······हृदयं ततः”
यह महाशंख पूजन का पहला मन्त्र है। "हंसो······अन्तः" यह दूसरा मन्त्र । "स्वम्······हृदयम्” यह
तीसरा मन्त्र है। "माया······हृन्मनुः” यह चौथा मन्त्र है। इसके बाद नवीन सूर्यमंडल की अर्चना करके
अमृतबुद्ध्या जल में मूलमन्त्र से गंध, पुष्प, अक्षत आदि डाले। त्रिखंडा मुद्रा को दिखा कर चंद्रमंडल की पूजा
करे। साधक “वाक् ····अनुसर्ग समन्वितम्” इस मन्त्र से जल को अभिमन्त्रित करके ऊपर को मार्जन करे।
फिर माया तथा खयोनि मुद्रा को दिखाकर घिरे हुए अष्टकोण एवम् षट्कोण पीठ का ध्यान करे और वहां देवी
की चिन्तना करके मूलमन्त्र से उनकी पूजा करे ॥९५-१०५३॥ तर्जनी, मध्यमा, अनामिका और कनिष्ठा अंगु-
लियों द्वारा महाशंखस्थित जलसे महेश्वरी तर्पण करके “एवम् ···नमः” इस मन्त्र से आनन्द भैरव को तृप्त
करे। तदनन्तर अर्घ जल से पूजन सामग्री को सिक्त करके योनिमुद्रा दिखावे ओर भवतारिणी को प्रणाम करे।
अर्घसम्बन्धी विधान सर्व सिद्धिदायक है। भूमि-गृह से आवृत, रमणीय, षट्कोण तथा पद्म एवम् कणिका से
युक्त पीठ पर मनोहर उपचारों से देवी की आराधना करनी चाहिये । महीगृह में चारों तरफ गणेश आदि का
पूजन करे। हाथों में पाश, अंकुश, कपाल तथा त्रिशूल धारण करने वाले ओर समस्त अलंकारों से विभूषित
गणेश की पूरव दिशा में पूजा करे ॥१०६-१११३॥ करों में कपाल तथा त्रिशूल धारण करने वाले, सर्प रूपी
आभूषण से भूषित, अपने गण से वेष्टित ओर मनोरम बटुक की दक्षिण दिशा में पूजा करे। हाथों में खङ्ग,
शूल, कपाल डमरू धारण करने वाले, कृष्णवर्ण, दिगंबर तथा क्रूर क्षेत्रपाल की पश्चिम दिशा में पूजा करे।
स्वयूथवेष्टितं रम्यं बटुकं दक्षिणेऽर्चयेत् । असिशूलकपालानि डमरुं दधतं करैः ॥११३॥
कृष्णं दिगंबरं क्रूरं क्षेत्रपालं च पश्चिमे । कपालं डमरुं पाशं लिंगं संबिभ्रतीं करैः ॥११४॥
अध्र्याकन्यां रक्तवस्त्रां योगिनीमुत्तरे यजेत् । अक्षोभ्यं प्रयजेन्मूर्ध्नि देव्या मंत्रमृषिं शुभम् ॥११५॥
अक्षोभ्यं वस्त्रपुष्पं च प्रतीच्छानलवल्लभा । अक्षोभ्यपूजने मंत्रः षट्कोणेषु षडंगकम् ॥११६॥
वैरोचनं चामिताभं पद्मनामाभिधं तथा । शंखं पांडुरसंज्ञं च दिग्दलेषु प्रपूजयेत् ॥११७॥
लामकां मानकां चैव पांडुरां तारकां तथा । विदिक्पत्रानब्जपत्रेषु पूजयेदिष्टसिद्धये ॥११८॥
बिंदुनामादिवर्णाद्याः संबुद्ध्य तास्तथाभिधाः । व्रजपुष्पं प्रतीच्छाग्निप्रियांताः प्रणवादिकाः ॥११९॥
वैरोचनादिपूजायां मनवः परिकीर्तिताः । भूधरश्च चतुर्द्वार्विषु पद्मांतकयमांतकौ ॥१२०॥
विद्यांतकाभिधः पश्चान्नरांतक इमान्यजेत् । शक्रादींश्चैव वज्रादीन्प्रजपेत्तदनंतरम् ॥१२१॥
एवं संResource/पूजयन्देवी पांडित्यं धनमद्भूतम् । पुत्रान्पौत्राञ्छुभां कीर्ति लभते जनवश्यताम् ॥१२२॥
तारो माया श्रीमदेकजटे नीलसरस्वती । महोग्रतारे देवासः सनेत्रो गदियुग्मकम् ॥१२३॥
सर्वदेवपिशाकर्मो दीर्घोग्निमंसुसान्द्रस । अभ्रगुर्धम जाड्यं च छेदयद्वितयं रमा ॥१२४॥
मायास्त्राग्निप्रियांतोऽयं द्विपंचाशल्लिपिमंतुः । अनेन नित्यं पूजांतेऽन्वहं देव्यै बलिं हरेत् ॥१२५॥
एवं सिद्धे मनौ मंत्री प्रयोगान्विदधाति च । जातमात्रस्य बालस्य दिवसत्रितयावधः ॥१२६॥
जिह्वायां विलिखेन्मंत्रं मध्वाज्याभ्यां शलाकया । सुवर्णकृतया यद्वा मंत्री धवलदूर्वया ॥१२७॥
गतेऽष्टमेऽब्दे बालोऽपि जायते कविरद्भूतम् । तथापरैरजेयोऽपि भूपसंघैर्र्चार्चितः ॥१२८॥
उपरागे वतानीव नरदारुस्ररोजले । निर्माय कीलकं तेन तैलमध्वमृतैर्लिखेत् ॥१२६॥
सरोजिनीदले मंत्रं वेष्टयेन्मातृकाक्षरैः । निधाय तदलं कुंडे चतुरस्रे समेखले ॥१३०॥
संस्थाप्य पावकं तत्र जुहुयान्मनुनामुना । सहस्रं रक्तपद्मानां धेनुदुग्धजलाप्लुतम् ॥१३१॥
करों में कपाल, डमरू, पाश तथा लिंग धारण करनेवाली, अर्धकन्या रूपवाली और रक्तवस्त्र पहननेवाली
योगिनी की उत्तर दिशा में पूजा करे। देवी के अक्षोभ्य नामक पवित्र मन्त्रऋषि की मस्तक पर पूजा करे।
"अक्षोभ्य••••वल्लभा" इस मन्त्र से अक्षोभ्य की पूजा कर षट्कोण में षडंग देवता का पूजन करे ॥११२-११६॥
इष्ट सिद्ध्यर्थ दिक् पद्मपत्रों पर वैरोचन, अमिताभ, पद्मनाभ, पांडुर संज्ञक, शंख, लाभका, मानका, पांडुरा
तथा तारका की अर्चना करनी चाहिये। "बिंदुनाम••••प्रणवादिकाः"-यह मन्त्र वैरोचनादि पूजन का कहा
गया है। चारों द्वारों पर भूधर, पद्मांतक, यमांतक, विद्यांतक तथा नरांतक की पूजा करनी चाहिये। पश्चात्
शक्र आदि की पूजा करके उनके वज्र आदि अस्त्रों का भी पूजन करे। इस प्रकार देवी की पूजा करने से उद्-
भुत पांडित्य, पुत्र, पौत्र, निर्मल यश, तथा जनवश्यता (लोगों को अपने अधीन करना) की प्राप्ति होती है।
"तारो••••स्वाहा" इस मन्त्र से पूजा के अन्त में प्रतिदिन देवी को बलि चढ़ावे ॥११७-१२५॥ इस प्रकार
मन्त्र सिद्ध कर लेने पर मन्त्री उसका प्रयोग करे। सुवर्ण की शलाका या उज्ज्वल दूर्वा में मधु और घी लगाकर
उससे सद्योजात बालक, जिसे तीन दिन भी न हुए हों, की जिह्वा पर यह मन्त्र लिख दे। ऐसा करने से आठ वर्ष
होते-होते वह बालक महाकवि, दूसरों से अजेय तथा राजाओं से पूजित होगा। "उपरागे••••सरोजने"
इस मन्त्र से एक कील बनाकर उससे कमलिनी पत्र पर तेल, मधु और अमृत (जल) से उपर्युक्त मन्त्र को लिखकर
उसे मातृका अक्षरों से वेष्टित करे। तत्पश्चात् मेखला सहित चतुरस्र कुण्ड खोदकर उसमें अग्नि स्थापना करके
पञ्चाशीतितमोऽध्यायः ७८५
होमांते विविधै रनैः पलैरपि बलिं हरेत् । बलि मंत्रेण विधिवद्बलिमंत्रः प्रकाश्यते ॥१३२॥
तारः पद्धं युमं तंद्री वियद्दीर्घं च लोहितः । अविविध्वमारूढो वदेत्पद्मावतोपदम् ॥१३३॥
झिटीशाढ्योऽनिलस्वाहा षोडशार्णो बलेर्मनुः । ततो निशीथे च बलिं पूर्वोक्तमनुना हरेत् ॥१३४॥
एवं कृते पंडितानां स जयो कविराड् भवेत् । निवासो भारती लक्ष्म्योर्जनतारञ्जनक्षमः ॥१३५॥
शताभिजप्त्या यो मंत्री रोचनां मस्तके धरेत् । यं यं पश्यति तस्यासो दास्रवज्जायते क्षणात् ॥१३६॥
श्मशानांगारमाश्रित्य पूर्वाषां कुजवासरे । तेन मंत्रेण संवेष्टय निबद्धं रक्ततंतुभिः ॥१३७॥
शताभिजप्तं मतेन निक्षिपेदरिवेश्मनि । उच्चाटयति सप्ताहात्सकुटुम्बाविरोधिमः ॥१३८॥
क्षीराढ्यया निशामंत्रं लिखित्वा पौरुषेऽस्थनि । रविवारे निशीथिन्यां सहस्त्रमभिमंत्रयेत् ॥१३९॥
तत्क्षिप्तं शत्रुसदने मंडलाद्भ्रंशकं भवेत् । क्षेत्रे क्षिप्तं सस्यहान्योजवहत्तुरमा लयेत् ॥१४०॥
षट्कोणांतर्लिखेन्मूलं साध्यार्णं केशरे स्वरैः । बाह्येऽष्टवर्गयुक्त्वं पद्मम्भूमिपरावृतम् ॥१४१॥
यंत्रं भूर्जे जतुरसैर्लिखेत्पीताम्बरावृतम् । पट्टसूत्रेण सन्नद्धं शिशुकंठगतं ध्रुवम् ॥१४२॥
भूतमीतिहरं वामबाहौ स्त्रीणां च पुत्रदम् । नृणां दक्षिणबाहुस्थं निर्धनानां धनप्रदम् ॥१४३॥
ज्ञानदं ज्ञातमिच्छूनां राज्ञां तु विजयप्रदम् ॥१४४॥
इति श्रीबृहन्नारदीयपुराणे पूर्वभागे बृहदुपाख्याने तृतीयपादे यक्षिणीमन्त्रभेदनिरूपणं
नाम पञ्चाशीतितमोऽध्यायः ॥८५॥
गोदुग्ध एवम् जल से धोये सहस्र रक्त कमलों से हवन करे । होमान्त में विविध रत्न तथा मांस-खंडों की बलि चढ़ाये ।
“तारः ० ० ० ० स्वाहा" इस मन्त्र से बलि समर्पण करना चाहिये । रात्रि में भी पूर्वोक्त मन्त्र से बलि दे ।
॥१२६-१३४॥ ऐसा करने वाला व्यक्ति पंडित विजयो, कविराट्, सरस्वती ओर लक्ष्मी का निवास तथा जनप्रिय
होता है । जो व्यक्ति गोरोचन को उपर्युक्त मन्त्र से सो बार अभिमन्त्रित करके मस्तक पर उसे धारण करेगा,
वह जिसकी ओर दृष्टिपात करेगा, वह तत्क्षण उसका दासत्तुल्य हो जाएगा । मंगल दिन पूर्वाषाढ नक्षत्र में जो
श्मशान से अंगार लाकर उस मन्त्र से उसे संवेष्टित कर लाल डोरे में बांधकर पुनः मूलमन्त्र से सो बार अभि-
मन्त्रित करके शत्रु के घर पर फेंकता है, उसके शत्रु का एक सप्ताह के भीतर ही सपरिवार उच्चाटन हो जाता
है ॥१३५-१३८॥ पुरुष की हड्डी पर दुग्धयुक्त शलाका से निशामन्त्र को लिख कर रविवार को रात्रि में सहस्र
बार उसे अभिमन्त्रित करके जिस शत्रु के घर पर इसे फेंका जाएगा, वह शीघ्र गृहविहीन हो जाएगा । खेत में
उसे फेंकने से सस्य की क्षति होगी । भोजपत्र पर अलक्त (अलता) से षट् ० ० ० ० वृतम्" इस मन्त्र को लिख कर
उसे पीत वस्त्र में लपेट दे । फिर उसे रेशम के धागे शिशु के कंठ में बांध दे । ऐसा करने से निश्चय ही
शिशुका अरिष्ट दूर हो जाता है । स्त्रियों की बायीं भुजा में बांधने से पुत्र होता है, निर्धन मनुष्यों की दाहिनी
भुजा में बांधने से धन होता है, ज्ञान के इच्छुकों को ज्ञान की प्राप्ति और राजाओं को विजय की प्राप्ति
होती है ॥१३९-१४४॥
श्री नारदीय पुराण के पूर्वार्ध में बृहदुपाख्यानयुक्त तृतीय पाद में यक्षिणी मन्त्रभेद निरूपण नामक
पचासीवाँ अध्याय समाप्त ॥८५॥
९९-ना० पु०
षडशीतितमोऽध्यायः
सनत्कुमार उवाच
सरस्वत्यवतारास्ते कथिताः सिद्धिदा नृणाम् । अथ लक्ष्म्यवतारांस्ते वक्ष्ये सर्वार्थसिद्धिदान् ॥१॥
वाणीमन्मथशक्त्याख्यं बीजत्रितयमीरितम् । ऋषिः स्याद्दक्षिणामूर्तिः पंक्तिश्छंदः प्रकीर्तितम् ॥२॥
देवता त्रिपुरा बाला मध्यांते शक्तिबीजके । नाभेरथापादमाद्यं तु नाभ्यंतं हृदयात्परम् ॥३॥
मूर्ध्नो हृदंतं तार्तीयं क्रमाद्देहेषु विन्यसेत् । आद्यं वामकरे दक्षकरे तदुभयोः परम् ॥४॥
पुनस्त्रीजत्रयं न्यस्य मूर्ध्नि गुह्ये च वक्षसि । नव योन्याभिधं न्यासे नवकृत्वो मनुं न्यसेत् ॥५॥
कर्णयोश्चिबुके न्यस्येच्छंखयोर्मुखपंकजे । नेत्रयोर्नासिकायां च स्कंधयोरुदरे तथा ॥६॥
न्यसेत्कूर्परयोर्नाभौ जानुनोलिंगमस्तके । पादयोरपि गुह्ये च पार्श्वयोर्हृदये पुनः ॥७॥
स्तनयोः कंठदेशे च वामांगादिषु विन्यसेत् । वाग्भवाद्यां रतिं गुह्ये प्रीतिमत्यादिकां हृदि ॥८॥
कामबीजादिकान्पश्येद्व्रूमध्ये तु मनोभवाम् । पुनर्वागात्ममाद्यास्तिस्र एव च विन्यसेत् ॥६॥
अमृतेशीं च योगेशीं विश्वयोनिं तृतीयकाम् । मूर्ध्नि वक्त्रे हृदि न्यसेद्गुह्ये चरणयोरपि ॥१०॥
कामेशीं पंचबीजाढ्यां स्मरात्पञ्च न्यसेत्क्रमात् । मायाकामो च वाग्लक्ष्मी कामेशी पंचबीजकम् ॥११॥
अध्याय ८६
महालक्ष्मी का अवतार—बगला आदि का मंत्र-साधन
सनत्कुमार बोले—मनुष्यों को सिद्धि प्रदान करने वाले सरस्वती-अवतार के बारे में मैंने बता दिया।
अब सकलकामनादायक लक्ष्मी अवतार का वर्णन करूंगा। वाणी, मन्मथ, शक्ति (ऐं क्लीं ह्रीं)—ये तीन बीज मन्त्र
हैं। इसके ऋषि दक्षिणामूर्ति है, छंद पंक्ति है और देवता त्रिपुरा है। नाभि से चरण तक, पुनः नाभि से हृदय तक
और हृदय से मस्तक तक क्रमशः शरीर में अंगन्यास करे ॥१-३३॥ बायें हाथ, दाहिने हाथ, मस्तक, गुह्य स्थान
और हृदय में तीन मन्त्र का न्यास करके योनि देश में नौ बार मन्त्र का न्यास करना चाहिये। दोनों कान,
ढुड्डी, मुखारविन्द, नेत्र, नासिका, स्कंध, उदर, कुहनी, नाभि, घुटने, लिंग, मस्तक, चरण, गुह्य प्रदेश, पार्श्व,
हृदय, स्तन, कंठ देश तथा वाम अंग आदि में भी न्यास करना चाहिये। वाग्भवा आद्या रति का न्यास गुह्य-
देश में और प्रीतिमती आदि का न्यास हृदय में करना चाहिये ॥४-८॥ कामबीज आदि का भ्रू मध्य में न्यास
करके मनोभवा तथा वागात्मा देवियों का भी न्यास करे। अमृतेश्वरी, योगेश्वरी तथा विश्वयोनि ये तीन वागात्मा
देवी कहलाती हैं। मस्तक, मुख, हृदय, गुह्य तथा चरणों में पाँच बीजों से युक्त कामेशी तथा पाँच कामों
का क्रमशः न्यास करे। माया, काम, वाक् लक्ष्मी, तथा कामेशी (ह्रीं क्लीं ऐं श्रीं ह्...)—ये पाँच बीज हैं और
षडशीतितमोऽध्यायः ७८७
मनोभवश्च मकरध्वजकंदर्पमन्मथाः। कामदेवः स्मरः पंच कीर्तिता न्याससिद्धिदाः ॥१२॥
शिरःपन्मुखगुह्येषु हृदये बाणदेवताः । द्राविणाद्याः क्रमान्न्यस्येद्बाणेशीबीजपूर्वकाः ॥१३॥
द्रांत्रीं क्लीं जूस इति वै बाणेशीबीजकं च कम् । द्राविणी क्षोभिणी वशीकरण्याकर्षणी तथा ॥१४॥
संमोहनी च बाणानां देवताः पञ्च कीर्तिताः । तार्तीयवाग्मध्यगेन कामेन स्यात्षडंगकम् ॥१५॥
षड्दीर्घस्वरयुक्तेन ततो देवीं विचिंतयेत् । ध्यायेद्रक्तरसरोजस्थां रक्तवस्त्रां त्रिलोचनाम् ॥१६॥
उद्यदर्कनिभां विद्यां मालाभयवरोद्दहाम् । लक्षत्रयं जपेन्मंत्रं दशांशं किंशुकैर्द्भवैः ॥१७॥
पुष्पैह्र्यारिजैर्वापि जुहुयान्मधुरान्वितैः । नवयोन्यात्मकं यंत्रं बहिरष्टदलावृतम् ॥१८॥
केशरेषु स्वरान्न्यस्येद्वर्गानष्टोदलेष्वपि । दलाग्रेषु त्रिशूलानि पद्मं तु मातृकावृतम् ॥१९॥
एवं विलिखिते यंत्रे पीठशक्तीः प्रपूजयेत् । इच्छा ज्ञाना क्रिया चैव कामिनी कामदायिनी ॥२०॥
रती रतिप्रिया नंदा मनोन्मन्यपि चोदिताः । पीठशक्तीरिमा इष्ट्वा पीठं तन्मनुना दिशेत् ॥२१॥
व्योमपूर्वे तु तार्तीयं सदाशिवमहापदम् । प्रेत पद्मासनं डेंतं नमोतः पीठमन्त्रकः ॥२२॥
षोडशार्णस्ततो मूर्ती कॢप्तायां मूलमंत्रतः । आवाह्य प्रजपेद्देवीमुपचारैः पृथग्विधैः ॥२३॥
देवीमिष्ट्वा मध्ययोनौ त्रिकोणे रतिपूर्वकाम् । वामकोणे रति दक्षे प्रीतिमग्रे मनोभवम् ॥२४॥
योन्यन्तर्वह्निकोणाद्वंगान्यग्रेर्विदिक्ष्वपि । मध्ययोनेर्बहिः पूर्वादिसु चाग्रे स्मरानपि ॥२५॥
बाणदेवीस्तद्वदेव शक्त्तीरष्टसु योनिषु । सुभगाख्या भगा पश्चात्तुतीया भगसर्पिणी ॥२६॥
भगमाला तथानंगा नगाद्या कुसुमापरा । अनंगमेखलानंगमदनेत्यष्टशक्तयः ॥२७॥
पद्मकैशरगा ब्राह्मी मुखाः पत्रेषु भैरवाः । दीर्घाद्या मातरः पूज्या ह्रस्वाद्याश्चाष्टभैरवाः ॥२८॥
मनोभव, मकरध्वज, कन्दर्प, मन्मथ, तथा कामदेव--ये पाँच स्मर कहलाते हैं। इनके न्यास करने से
सिद्धि मिलती है ॥९-१२॥ शिर, चरण, मुख, गुह्य, हृदय में बाणेशीबीज के साथ बाणदेवता द्राविणी आदि का
क्रमशः न्यास करे । "द्रांद्रीं क्लीं जूस:" यह बाणेशीबीज है और द्राविणी, क्षोभिणी, वशीकरणी, आकर्षणी तथा
संमोहिनी-ये पांच बाणदेवता हैं। तृतीयवाक् के मध्य में संचरण करने वाले छह दीर्घ स्वरों से युक्त काम से
षडंगन्यास करना चाहिये ॥१३-१५½॥ तदनन्तर रक्तकमल पर अवस्थित, रक्तवस्त्रधारिणी, त्रिलोचना, उदीय-
मान सूर्य के समान कान्तिवाली और माला तथा अभयास्त्र धारण करने वाली विद्या का ध्यान
करके तीन लाख मन्त्र का जप करे और उसका दशांश मधुर मिश्रित पलाश तथा करवीर के पुष्पों से हवन करे।
नवयोन्यात्मक यन्त्र का निर्माण करके उनके अष्टदल (कमल) से आवृत करे । फिर केसरों तथा अष्टदलों पर
वर्गीय स्वरों का न्यास करके दलों पर त्रिशूल तथा मातृकावृत पद्म का उल्लेख करे । इस प्रकार मन्त्र को लिख-
कर उस पर पीठशक्तियों का पूजन करे । इच्छा, ज्ञाना, क्रिया, कामिनी, कामदायिनी, रति, रतिप्रिया,
आनंदा, मनोन्मनी-ये पीठशक्तियां कहलाती हैं। इनका पूजन करके पीठ को अभिमंत्रित करे ॥१६-२१॥
"व्योमपूर्वे ........ नमः" यह पीठ का मन्त्र है । तत्पश्चात् देवी की प्रतिमा बनाकर मूलमन्त्र से
आवाहन करके नानाविध उपचारों से उनका पूजन करे । त्रिकोण योन्याकृति का निर्माण कर उसके मध्य में
पहले रति पश्चात् देवी की पूजा करे । फिर वाम कोण में रति, दक्षिण कोण में प्रीति और अग्र भाग में मनो-
भवा देवो की अर्चना करनी चाहिये । योनि के भीतर अग्निकोण में तथा मध्य योनि के बाहर पूर्व आदि दिशाओं में
कामों का पूजन करना चाहिये । उसी तरह अष्टयोनियों में अष्ट शक्तियों की पूजा करे। सुभगा, भगसर्पिणी
भगमाला, अनंगा, नगाद्या, कुसुमा, अनंगमेखला, अनंगमदना ये आठ शक्तियां हैं ॥२२-२७॥ पत्रों के ऊपर
पद्मकेंसरस्थित ब्राह्मीमुख भैरवों को, दीर्घा आदि माताओं की और ह्रस्व आदि आठ भैरवों की पूजा करनी
७८८ नारदीयपुराणम्
दलाग्रेष्वष्टपीठानि कामरूपाख्यमादिमम् । मलयं कोल्लगिर्याख्यं चौराहाख्यं कुलांतकम् ॥२९॥
जालंधरं तथोन्नासं कोटपीठमथाष्टमम् । भूगृहे दशदिक्ष्वर्चद्धेतुकं त्रिपुरांतकम् ॥३०॥
वैतालमग्निजिह्वं च कमलांतकपालिनौ । एकपादं भीमरूपं विमलं हाटकेश्वरम् ॥३१॥
शक्रांचानायुधैः सार्द्धं स्वस्वदिक्षु समर्चयेत् । तद्बहिर्दिक्षु बटुकं योगिनीं क्षेत्रनायकम् ॥३२॥
गणेशं विदिशास्वर्चेद्वसूनसूर्याञ्छिवांस्तथा । भूताश्चेत्थं भजन्बालामीशः स्याद्धनविद्ययोः ॥३३॥
रक्तांभोजैहुतैनार्यो वश्याः स्युः सर्षपैनृ पाः । नंद्यावर्तै राजवृक्षैः कुन्दैः पाटलचंपकैः ॥३४॥
पुष्पैर्बिल्वफलैरपि होमाल्लक्ष्मीः स्थिरा भवेत् । अपमृत्युं जयेन्मन्त्री गुडूच्या दुग्धयुक्तया ॥३५॥
यथोक्तदूर्वाहोमेन नीरोगार्युः समश्नुते । ज्ञानं कवित्वं लभते चन्द्रागुरुसुरुंहतैः ॥३६॥
पलाशपुष्पैर्वाक्सिद्धिरन्नाप्तिश्चान्नहोमतः । सुरभीक्षीरदध्वक्ताँल्लाजान्हुत्वा रुजो जयेत् ॥३७॥
रक्तचन्दनकर्पूरकचूरगुरुरोचनाः । चन्दनं केशरं मांसी क्रमाद्भागैनियोजयेत् ॥३८॥
भूमिचन्द्रैकनन्दाब्धिविक्सप्तनिगमोन्मितैः । श्मशाने कृष्णभूतस्य निशि नीहारपाथसा ॥३९॥
कुमार्या पेषयेत्तानि मंत्रेणाथाभिमंत्र्य च । विदध्यात्तिलकं तेन दर्शनाद्वशयेज्जनान् ॥४०॥
गजाँसिहादिसत्त्वानि राक्षसाञ्छाकिनीपि । प्रयोजनानां सिद्ध्यै तु देव्याः शापं निवर्त्य च ॥४१॥
विद्यायोत्कीलितां पश्चाज्जपमस्य समाचरेत् । यो जपेदादिमे बीजे वराहभृगुपावकान् ॥४२॥
मध्यामादौ नमो हंसौ मध्यमांते तु पावकम् । आदावंते च तार्तीयक्रमात्स्वं धूम्रकेतनम् ॥४३॥
एवं जप्त्वा शतं विद्या शापहीना फलप्रदा । यद्वाद्ये चरमे बीजे नैव रेफं वियोजयेत् ॥४४॥
चाहिये। पत्रों के अग्रभाग पर कामरूप, मलय, कोल्लगिरि, चौहार, कुलांतक, जालंधर, उन्नास तथा कोट-
पीठ—इन आठ पीठों का पूजन करना चाहिये। भूगृह की दशों दिशाओं में हेतुक, त्रिपुरांतक, वैताल, अग्नि-
जिह्व, कमलांत, कपाली, एकपाद; भीमरूप, विमल तथा हाटकेश्वर की अर्चना करे। पुनः अपनी-अपनी
दिशा में आयुध सहित इन्द्रादि देवों की पूजा करनी चाहिये। उसके बाहर बटुक, योगिनी, क्षेत्रनायक
और गणेश को पूजा करे ॥२८-३२॥ विदिशाओं में वसु, सूर्य तथा शिव का पूजन करे। इस प्रकार भूतों
का उपासक व्यक्ति वनिताओं का स्वामी, धनवान् तथा विद्यावान् होता है। रक्त कमलों से हवन करने पर
स्त्रियां वस में आती हैं और सरसों से होम करने पर राजा वशीभूत होते हैं। नंद्यावर्त (तगर), राजवृक्ष,
(सोन्दाल), कुन्द, पाटल, चम्पापुष्प तथा विल्वफलों से हवन करने पर लक्ष्मी अचल होती है। साधक दुग्धयुक्त
गुडूच से हवन कर अपमृत्यु को जीतता है ॥३३-३५॥ उसी तरह दूर्वा से हवन करने वाला दीर्घायु होता है।
कर्पूर, अगर तथा गुडूच से हवन करने पर ज्ञान एवम् कवित्वशक्ति की प्राप्ति होती है। पलाश पुष्पों से हवन
करने पर वाक्सिद्धि तथा अन्न-होम से अन्न की प्राप्ति होती है। गोदुग्ध एवम् दधियुक्त लावा से होम करने
से रोग का क्षय होता है। रक्तचन्दन, कर्पूर, कचूर, अगर, गोरोचन, चन्दन, केसर और जटामांसी को क्रमशः
एक, एक, एक, नौ, सात, दश, सात और चार भागों में विभक्त कर श्मशान में कृष्णचतुर्दशी की रात नीहार
(बर्फ़) के जल से कुमारी कन्या के द्वारा पिसाये ॥३६-३९॥ फिर मन्त्र से अभिमन्त्रित करके उसका तिलक
लगाये। तब जिसके ऊपर उसकी दृष्टि पड़ेगी, वह वशीभूत हो जाएगा। यहाँ तक कि हाथी, सिंह, राक्षस,
शाकिनी आदि भी वश में आ जायेंगे। कामनासिद्धि के लिये देवी का शापोद्धार करके उनके कील का पाठ
करे और पश्चात् जप करे। आदिम बीज में वराह, भृगु तथा पावक का, मध्यमादि में अन्तरिक्ष तथा हंस
का, मध्यमान्त में पावक का और आदि-अन्त में तार्तीयक्रम से धूम्रकेतन का सौ बार जप करके फलदायिनी
विद्या को शापहीना बनाये। अथवा अंतिम बीज में रेफ को न जोड़े। अथवा शापोद्धार का प्रकारान्तर भी
षडशीतितमोऽध्यायः ७८६
शापोद्धारप्रकारोऽन्यो यद्वाय॑ कीर्तितो बुधैः । आद्यमाद्यं हि तार्तीयं कामः कामोऽथ वाग्भवम् ॥४५॥
अंत्यमंत्यमनंगश्च नवार्णः कीर्तितो मनुः । जप्तोयं शतधा शापं बालाया विनिवर्तयेत् ॥४६॥
चैतन्याह्लादिनीमन्त्रौ जप्तौ निष्कीलताकरी । विस्वराश्चेतनं मन्त्री धरः शांतिरनुग्रहः ॥५७॥
तारादिहृदयांतः स्यात्काम आह्लादिनोमनुः । तथा त्रयाणां बीजानां दीपनैर्मनुभिस्त्रिभिः ॥४८॥
सुदीप्तानि विधायादौ जपेत्तानीष्टसिद्धये । वद्द्वयुग्मं सदर्घांबु स्मृतिर्भालावनंगतौ ॥४९॥
सत्यः सनेत्रो नस्तादृग्वा वाग्वर्णाद्यदीपिनि । क्लिन्ने क्लेदिनि वैकुण्ठी दीर्घं स्वं सद्यगोंतिमः ॥५०॥
निद्रा सचन्द्रा कुर्वोतं शिवर्णा मध्यदीपिनो । तारो मोक्षं च कुरुते नायं वर्णास्यदीपिनी ॥५१॥
दीपिनीमंतरा बाला साधितापि न सिध्यति । वागंत्यकासान् प्रजपेदरीणां क्षोभहेतवे ॥५२॥
कामवागंत्यबीजानि त्रैलोक्यस्य वशीकृतौ । कामांत्यवाणीबीजानि मुक्तये नियतो जपेत् ॥५३॥
पूजारंभे तु बालायास्त्रिविधानर्चयेद्गुरून् । दिव्यौघश्चैव सिद्धौघा मानवौध इति त्रिधा ॥५४॥
परप्रकाशः परमेशातः परशिवस्तथा। कामेश्वरस्ततो मोक्षः षष्ठः कामोऽमृतोऽन्तिमः ॥५५॥
एते दप्तैव दिव्यौघा आनन्दपदपश्चिमाः । ईशानास्यस्त्वघुरषोऽघोराख्यो वामदेवकः ॥५६॥
सद्योजात इमे पंच सिद्धौघाख्याः स्मृता मुने । मानवौघाः परिज्ञेयाः स्वगुरोः सम्प्रदायतः ॥५७॥
नवयोन्यात्मके यन्त्रे विलिखेन्मध्ययोनितः । प्रदाक्षिण्येन बीजानि त्रिवारं साधकोत्तमः ॥५८॥
त्रींस्त्रीन्वर्णोस्तु गायत्र्या अष्टपत्रेषु सल्लिखेत् । बरिर्मातृकयाऽऽवेष्ट्य तद्बहिर्भू१पुरद्वयम् ॥५९॥
कामबोजलसत्कोण व्यतिभिन्नं परस्परम् । पत्रे त्रैपुरमाख्यातं जपसंपातसाधितम् ॥६०॥
बाहुना विधृते दद्याद्धनं कीर्ति सुखं सुतान् । कामांते त्रिपुरा देवी विद्महे कविशं महिमू ॥६१॥
बकः खङ्गी समारूढः सनेत्रोऽग्निश्च धोमहि । तत्र क्लिन्ने प्रचोदांते यादित्येषा प्रकीर्तिता ॥६२॥
गायत्री त्रैपुरा सर्वसिद्धिदा सुरसेविता । अथ लक्ष्यवतारोऽन्यः कीर्त्यते सिद्धिदो नृणाम् ॥६३॥
विद्वान् लोग बतलाते हैं। आदि में तार्तीय, मध्य में वाग्भव तेवता तथा काम और अन्त में अनंग के जोड़ने से
जो मन्त्र बनता है, उसके सौ बार जप करने से देवी का शाप निवृत्त हो जाता है ॥४०-४६॥ साधक इष्टसिद्धि
के लिये "चैतन्य........ आह्नादिनी"--इस मन्त्र का तथा तीन बीज मन्त्रों का जप करे। "वद युग्मम्....
दीपिनीम्"--इस मन्त्र को विना जप किये विद्या के साधन करने पर भी वह सिद्ध नहीं होती। शत्रुनाश के
लिये वाक्....."--इस मन्त्र का जप करे। त्रैलोक्य को वश में करने के लिये "कामवान्........"
और मोक्ष के लिये "कामांत्यत्राणी......" का जप करना चाहिये। देवों के पूजारंभ में तीन प्रकार के
गुरुओं की अर्चना करनी चाहिये । दिव्यौघ, सिद्धोध तथा मानवोध-ये त्रिविध गुरु हैं। परप्रकाश, परमेशान,
परशिव, कामेश्वर, मोक्ष काम तथा अमृत--ये सात दिव्यौष कहलाते हैं। मुने ! आनंदपद, ईशान, अघोर,
वामदेव और सद्योजात-ये पांच सिद्धौघ कहलाते हैं ॥४७-५६॥ मानवौघों को तो अपने गुरु के संप्रदाय से
समझना चाहिये । साधकश्रेष्ठ नव योन्यात्मक यन्त्र में मध्ययोनि से आरंभ कर तोन बार बीज मन्त्रों को लिखे।
फिर गायत्री के तीन-तीन वर्णों को अष्ट पत्रों पर लिखे । उसके बारह मातृकावर्णों को लिख कर दो भूपुरों
का उल्लेख करे। कोने में कामबीज (क्लीं) को लिखे । परन्तु वे परस्पर भिन्न हो। पत्र पर जप, संपात और साधित
नामक तीन पुरों का पूजन करे ॥५७-६०॥ फिर उसे बाहु पर धारण करके दान करने से धन, कीर्ति, सुख
तथा पुत्रों की प्राप्ति होती है। कामबीज के अन्त में ऐसा सोचे कि हम त्रिपुरा देवी को जान रहे हैं। विष
आदि का नाश करने वाली है। हम वक, खङ्गी तथा सवारी पर चढ़े दृग नेत्र सहित अग्नि का ध्यान करते हैं।
१. यंत्र बहिः स्थित रेखासन्निवेश युक्त भूम्याकार स्थान ।
७६० नारदीयपुराणम्
वेदादिगिरिजा पद्मा मन्मथो हृदयं भृगुः । भगवति माहेश्वरी ङेन्तेऽन्नपूर्णे दहनांगना ॥६४॥
प्रोक्ता विंशतिवर्णेयं विद्या स्याद्द्द्रुहिणो मुनिः । धृतिश्छंदोऽन्नपूर्णेशी देवता परिकीर्तिता ॥६५॥
षड्दीर्घाढ्येन हृल्लेखाबीजेन स्यात्षडंगकम् । मुखनासार्क्षिकर्णा सपुटेषु नवसु न्यसेत् ॥६६॥
पदानि नव तद्वर्णसंख्येदानोमुदीर्यते । भूमिवन्द्रधरेकाक्षिवेदबिधुयुगवाहुभिः ॥६७॥
पदसंख्यामिता वर्णैस्ततो ध्यायेत्सुरेश्वरीम् । स्वर्णाभांगीं त्रिनयनां वस्त्रालंकारशोभिताम् ॥६८॥
धूरमासं युतां देवीं स्वर्णाभित्रकरांबुजाम् । लक्षं जपोऽयुतं होमो घृताक्तचरण तथा ॥६६॥
जयादिनवशक्त्याढ्ये पीठे पूजा समीरिता । त्रिकोणा वेदपत्राष्टपत्रषोडशपत्रके ॥७०॥
भूपुरेण युते यन्त्रे प्रदद्यान्मायया मनुम् । अग्न्यादिकोणत्रितये शिववाराहमाधवान् ॥७१॥
अर्चयेत्स्वस्वमंत्रैस्तु प्रोच्यते मनवस्तु ते । प्रणवो मनुचंद्राढ्यं गगनं हृदयं शिवा ॥७२॥
मारुतः शिवमन्त्रोऽयं सप्ताण्र्णः शिवपूजने । वाराहनारायणयोर्मन्त्रौ पूर्वं मुदोरयेत् ॥७३॥
षडंगानि ततोऽभ्यर्च्य वामे दक्षे धरा रमाम् । यजेत्स्वस्वमनुभ्यां तु तावुच्येते मुनीश्वर ॥७४॥
अन्नं महान्नमित्युक्त्वा मे देह्यन्नाधिपोर्णकाः । नयेन्मन्त्रं प्राणान्ते दापयानन्तसुन्दरी ॥७५॥
द्वाविंशत्यक्षरो मंत्रो भूमोष्टौ भूमिसंपुटः । लक्ष्म्योष्टौ श्रीपुटो विप्र स्मृतिलंमनुचंद्रयुक्त ॥७६॥
भुवो बीजमिति प्रोक्तं श्रीबीजं प्रागुदाहृतम् । मंत्रादिस्थचतुर्बीजपूर्विकाः परिपूजयेत् ॥७७॥
शक्तीश्चतस्रो वेदास्त्रे परा च भुवनेश्वरी । कमला सुभग चेति बाह्ययाथ्या अष्टपत्राः ॥७८॥
षोडशारे स्मृते चैव मानदातुष्टिपुष्टयः । प्रीती रतिर्ह्रीः श्रीश्चापि स्वधा स्वाहा दशम्यथ ॥७६॥
कल्पांत में वही त्रिपुरा देवी अदिति नाम से पुकारी जाती हैं त्रिपुरा गायत्री समस्त सिद्धियों को देने वाली है।
देवगण उनकी सेवा करते हैं ।
इसके बाद मनुष्यों को सिद्धि प्रदान करने वाले लक्ष्मी के अन्य अवतारों का वर्णन करता हूँ । “वेदादि
......... अंगना” यह है । द्रुहिण इसके ऋषि हैं । धृति छंद है और पूर्णेशी देवता है ॥६४-६५॥ छह
दीर्घों से युक्त हृल्लेखा नामक बीज मन्त्र से मुख, नासिका, नेत्र, कर्ण स्कन्ध और मुदा में षडंग न्यास करना
चाहिये । तदनन्तर नौ पदों का भी न्यास करे, जिनकी वर्णसंख्या १११२४७२२ हैं । उसके बाद भुवनेश्वरी का
ध्यान करे, जिनके तीन नेत्र हैं, अंगों की आभा सुवर्ण के समान हैं, करकमल सोने की अंगूठी से सुशो-
भित है, पृथ्वी और लक्ष्मी साथ में रहती हैं, वस्त्र तथा अलंकार शोभा बढ़ाते है । तत्पश्चात् एक लाख मन्त्र का
जप करके दश हजार घृतमिश्रित चरु से उसका हवन करे । जया आदि नौ शक्तियों से युक्त पीठ पर पूजा
करनी चाहिये ॥६६-६९॥ भूपुर से युक्त, त्रिकोण तथा चतुष्पत्र, अष्टपत्र एवम् षोडश पत्रात्मक यन्त्र पर
माया (ह्रीं) सहित मंत्र को लिखे । अग्नि आदिति न कोण में शिव, वाराह तथा माधव के अपने-अपने मन्त्र से पूजन
करना चाहिये । अब मंत्र बताया जा रहा है-“प्रणवा मारुतः”-यह शिव पूजन का मन्त्र है ।
वाराह और नारायण का मन्त्र पहले पढ़ना चाहिये । मुनीश्वर ! तदन्तर षडंगों का पूजन करके वाम और
दक्षिण भाग में धरा और रमा की अपने-अपने मन्त्रों से पूजा करना चाहिये । "अन्नम् सुन्दरी"-
यह भूमि का मन्त्र है और "लक्ष्मी बीजम्"- यह लक्ष्मी का मन्त्र है । मत्रादिस्थ चतुर्बीज पूर्वक इनकी
पूजा करनी चाहिये ॥७०-७७॥ चार शक्तियां, वेदाश्रा, परा भुवनेश्वरी, कमला, सुभगा ब्राह्मी और-इनको
अष्टपत्र पर अर्चना करनी चाहिये । षोडश पत्र मानदा, तुष्टि, पुष्टि, प्रीति, रति, ह्री, श्री स्वधा, स्वाहा,
षडशीतितमोऽध्यायः ७६१
ज्योत्स्ना हैमवती छाया पूर्णिमा संहतिस्तथा । अमावास्येति संपूज्य मंत्रेशे प्राणपूर्विका ॥८०॥
भूपुरे लोकपालाः स्युस्तदस्त्राणि तदग्रतः । इत्थं जपादिभिः सिद्धे मंत्रेऽस्मिन्धनसंचयैः ॥८१॥
कुबेरसदृशो मंत्री जायते जनवंदितः । अथ लक्ष्म्यवतारोऽन्यः कीर्त्यते मुनिसत्तम ॥८२॥
प्रणवः शांतिरुणाक्रियाढ्याचन्द्रभूषिताः । बगलामुखिसर्वांते इंद्विकाहादिनीयुता ॥८३॥
पीताजरायुक्प्रतिष्ठा पुनर्दीर्घोदसंयुता । वाचं मुखं पदं स्तंभयंति जिह्वापदं वदेत् ॥८४॥
कीलयंति च बुद्धिं विनाशयंते स्वबीजकम् । तारोऽग्निसुन्दरी मंत्रो बगलायाः प्रकीर्तितः ॥८५॥
मुनिस्तु नारदश्छंदो बृहती बगलमुखी । देवता नेत्रपंचेषुनवपंचवर्णकैः ॥८६॥
अंगानि कल्पयित्वा च ध्यायेत्पीताम्बरां ततः । स्वर्णासनस्यां हेमाभां स्तंभिनीमिंदुशेखराम् ॥८७॥
दधतों मुद्गरं पाशं वज्रं च रसनां करैः । एवं ध्यात्वा जपेल्लक्षमयुतं चंपकोद्भवैः ॥८८॥
कुसुमैर्जुहुयात्पीठे बालायाः पूजयेदिमाम् । चंदनागुरुचंद्राद्यैः पूजार्थं यंत्रमालिखेत् ॥८६॥
त्रिकोणं षड्दलाष्टाम्रषोडशारे यजेदिमाम् । मंगला स्तंभिनी चैव जृंभिणी मोहिनी तथा ॥६०॥
वश्या चला बलाका च भूधरा कल्मषाभिधा । धात्री च कलना कालकर्षिणी भ्रामिकापि च ॥६१॥
मंदगापि च भोगस्था भाविका षोडशी स्मृता । भूपृहस्य चतुर्दिक्षु पूर्वादिषु यजेत्क्रमात् ॥६२॥
गणेशं बटुकं चापि योगिनीः क्षेत्रपालकम् । इंद्रादींश्च ततो बाह्ये निजायुधसमन्वितान् ॥६३॥
इत्थं सिद्धे मंत्रौ मंत्री स्तंभयेद्देवतादिकान् । पीतवस्त्रपदासीनः पीतमाल्यानुलेपनः ॥६४॥
पीतपुष्पैर्यजेद्देवीं हरिद्रोत्थस्रजा जपेत् । पीतां ध्यायन्भगवतीं पयोमध्येऽयुतं जपेत् ॥६५॥
ज्योत्स्ना, हेमवती, छाया, पूर्णिमा, संहति और अमावास्या का प्राणपूर्वक पूजन करना चाहिये । भूपुर में
लोकपालों की और उनके आगे उनके अस्त्रों की पूजा करे । इस प्रकार जप आदि से मन्त्र को सिद्ध कर लेने पर
मन्त्री धन में कुबेर के तुल्य तथा जनवंदित होता है ।
मुनिश्रेष्ठ ! अब लक्ष्मी का दूसरा अवतार मैं बतलाता हूँ ॥७८-८२॥ "प्रणवः ..... अग्निसुन्दरी"—
यह बगला देवी का मन्त्र है । इसके ऋषि नारद हैं, छंद बृहती है और देवता बगलामुखी हैं । २५५९१० वर्णों
से अंगों की कल्पना करके पीताम्बर पहनने वाली, सुवर्ण के आसन पर बैठनेवाली स्वर्ण के समान कान्ति
वाली, स्तंभन करने वाली, ललाट पर चन्द्रमा को धारण करने वाली और हाथों में मुद्गर, पाश, बज्र तथा
मेखला रखनेवाली देवी का ध्यान करे । अनन्तर एक लाख मन्त्र का जप करके दश हजार चंपा के पुष्पों से
पीठ पर हवन करे । फिर चंदन, अगर, कपूर, आदि से देवी का पूजन करके मन्त्र को लिखे । वह यंत्र त्रिकोण,
तथा षड्दल, अष्टदल, एवम् षोडश दल कमलों से युक्त होना चाहिये । उस पर मंगला, स्तंभिनो, जृम्भिणी,
मोहिनी, वश्या, चला बलाका, भूधरा, कल्मषा, धात्री, कलना, कालकर्षिणी, भ्रामिका, मंगला, भोगस्था और
भाविका इन देवियों का पूजन करना चाहिये । भूपृह की चारों और पूर्व आदि दिशा में क्रमशः गणेश, बटुक,
योगिनी और क्षेत्रपाल की पूजा करे । बाहर में आयुध सहित इन्द्र आदि देवों का पूजन करना चाहिये ।
॥८३-९३॥
इस प्रकार मन्त्र सिद्ध हो जाने पर मन्त्री देव आदि का स्तंभन कर सकता है । पीत वस्त्र, पीत माला,
पीत चन्दन, तथा पीत आसन से युक्त होकर, पीत पुष्पों से देवी का अर्चना करे और हल्दी का माला पर
जप करे । जल के मध्य में स्थित होकर पीतवर्ण भगवती का ध्यान करते हुए दश सहस्र मन्त्र का जप करके
त्रिमधु, घी, तथा तिल से हवन करे । ऐसा करने से वशीकरण सिद्ध होता है । त्रिमधु से युक्त लवण से होम
७६२ नारदीयपुराणम्
त्रिमध्वाज्यतिलैर्होमो नृणां वश्यकरो मतः । मधुरत्रितयाक्तैः स्यादाकर्षो लवणैश्च वम् ॥९६॥
तैलाभ्यक्तैर्निम्बपत्रैर्होमो विद्वेषकारकः । ताललोणहरिद्राभिर्द्विषां संस्तंभनं भवेत् ॥९७॥
आगारधूमं राजीश्च माहिषं गुग्गुलं निशि । श्मशाने पावके हुत्वा नाशयेदचिरादरीनू ॥९८॥
गरुतो गृध्रकाकानां कटुतैलं बिभीतकम् । गृहधूमं चितावह्लौ हुत्वा प्रोच्चाटयेद्रिपून् ॥९९॥
दूर्वागुडूचीलाजाभ्यो मधुरत्रितयान्वितान् । जुहोति सोऽखिलान् रोगान् शमयेद्दर्शनादपि ॥१००॥
पर्वताग्रे महारण्ये नदीसंगे शिवालये । ब्रह्मचर्यरतो लक्षं जपेदखिलसिद्धये ॥१०१॥
एकवर्णगवीदुग्धं शर्करामधुसंयुक्तम् । त्रिशतं मंत्रितं पीतं हन्याद्विषपरामवम् ॥१०२॥
श्वेतपालाशकाष्ठेन रचिते रम्यपादुके । अलक्त.रंजिते लक्षं मन्त्रयेन्मनुनामुना ॥१०३॥
तदारूढः पुमान् गच्छेत्क्षणेन शतयोजनम् । पारदं च शिलां तालं पिष्टं मधुसमन्वितम् ॥१०४॥
मनुना मन्त्रयेल्लक्षं लिपेत्तेनाखिलां तनुम् । अदृश्यः स्यान्नृणामेष आश्चर्यं दृश्यतामिदम् ॥१०५॥
षट्कोणं विलिखेद्बीजं साध्यनामान्वितं मनाः । हरितालनिशाचूर्णैरुन्मत्तरससंयुतः ॥१०६॥
शेषाक्षरैः समानीतं धरागृहविराजितम् । तद्यंत्रं स्थापितप्राणं पीतसूत्रेण वेष्टयेत् ॥१०७॥
भ्राम्यत्कुलालचक्रस्थां गृहीत्वा मृत्तिकां तथा । रचयेद्वृषभं रम्यं यंत्रं तन्मध्यतः क्षिपेत् ॥१०८॥
हरितालेन संलिप्य वृषं प्रत्यहमर्चयेत् । स्तम्भयेद्विद्विषां वाचं गति कार्यपरंपराम् ॥१०९॥
आदाय वामहस्तेन प्रेतभूस्थितकर्परम् । अंगारेण चितास्थेन तत्र यंत्रं समालिखेत् ॥११०॥
मंत्रितं निहितं भूमौ रिपूणां स्तम्भयेद्गतिम् । प्रेतवस्त्रे लिखेद्यंत्रं अंगारेणैव तत्पुनः ॥१११॥
करने पर आकर्षण सिद्ध होता है। तेल युक्त निम्बपत्रों से हवन करने पर विद्वेषकरण सिद्ध होता है।
।।९४-६६३।। ताल, लवण तथा हलदी से हवन करने पर शत्रुओं का स्तम्भन होता है। रात्रि के समय श्मशान
में अगर, राजसर्षप, भैंस के घी तथा गुग्गुल से अग्नि में हवन करने पर शीघ्र शत्रुओं का नाश हो जाता है।
गीध और कौए के पंख, कड़ुआ तेल, बहेड़ा तथा गृहधूम से चिता की अग्नि में हवन करने से शत्रुओं का उच्चा-
टन होता है। जो दूर्वा त्रिमधुयुक्त गुडूच तथा लावा से हवन करता है, वह दर्शनमात्र से भी अखिल रोगों को
शान्त कर देता है। सर्व सिद्धि के लिये पर्वत की चोटी पर, महावन में, नदी संगम पर तथा शिवालय में
ब्रह्मचर्य निरत होकर एक लाख जप करना चाहिये। एक वर्णवाली गाय के दूध, शक्कर तथा मधु को तीन सौ
बार अभिमन्त्रित करके पीने पर विष का दोष दूर हो जाता है ॥९७-१०२॥ श्वेत पलाश की लकड़ी के बने हुए
सुन्दर खड़ाऊं को अलता से रंग कर लाख बार इस मन्त्र से अभिमन्त्रित करके जो मनुष्य इसे पहनेगा, वह एक
क्षण में सौ योजन तक चला जाएगा। पारद (पारा) शिला तथा ताल को मधु के साथ पीस कर उसे इस मन्त्र
से लाख बार अभिमन्त्रित करके संपूर्ण शरीर में लेप करने से मनुष्य अदृश्य हो जाता है, यह आश्चर्य की बात
है ॥१०३-१०५॥ साध्य वस्तु का नाम एवम् बीज मन्त्र षट्कोण यंत्र पर लिखे। उसे हरिताल, निशाचूर्ण,
तथा धतूरे के रस से संयुक्त कर शेष अक्षरों के साथ लाकर भूमिगृह में रख छोड़े। फिर उस यन्त्र को पीत सूत्र से
बांध दे। अनन्तर कुम्हार के घूमते हुए चक्र की मृत्तिका को लाकर उसका सुन्दर बैल बनाये। पुनः यन्त्र को
उसके मध्य में रख कर हरिताल से लीप कर वृष को प्रतिदिन पूजा किया करे। ऐसा करने वाला व्यक्ति शत्रुओं
की वाणी तथा कार्यकारिणी गति का स्तम्भन कर सकता है। बायें हाथ से श्मशान की कौड़ी तथा चिता का
अंगार लेकर उससे यन्त्र का निर्माण करे। पुनः यन्त्र को अभिमन्त्रित करके भूमि पर रख दे। इससे शत्रुओं
सप्तशीतितमोऽध्यायः ७६३
मण्डूकवदने न्यस्येतपीतसूत्रेण वेष्टितम् । पूजितं पीतपुष्पैस्तद्वाचं संस्तंभयेद्विषाम् ॥११२॥
यद्भूमो भविता दिव्यं तत्र यंत्रं समालिखेत् । मार्जितं तद्विषां पात्रैर्दिव्यस्तम्भनकृद्भवेत् ॥११३॥
इन्द्रवारुणिकामूलं सप्तशो ह्यनुमंत्रितम् । क्षिप्तं जले दिव्यकृतं जलस्तंभनकारकम् ॥११४॥
किं बहुक्त्या साधकेन मन्त्रः सम्यगुपासितः । शत्रूणां गतिबुद्ध्यादेः स्तंभनो नात्र संशयः ॥११५॥
इति श्री बृहन्नारदीयपुराणे पूर्वभागे बृहदुपाख्याने तृतीयपादे यक्षिणीमन्त्रसाधननिरूपणं
नाम षडशीतितमोऽध्यायः ॥८६॥
सप्ताशीतितमोऽध्यायः
सनत्कुमार उवाच
अवतारत्रयं लक्ष्म्याः कथितं ते द्विजोत्तम । दुर्गायाश्चाभिधास्यामि सर्वलोकोपकारकान् ॥१॥
प्रणवः श्रीः शिवायुग्मं वाणीवैरोचनीपदम् । वज्रायं क्षुधिता सुक्ष्मा मृता स्वाग्नीन्दुसंयुता ॥२॥
प्रतिष्ठाप्य शिवा फट् च स्वाहांतोऽष्टाष्टिवर्णवान् । भैरवोऽस्य मुनिः सम्राट् छन्दो मन्त्रस्य देवता ॥३॥
का गतिस्तम्भन होता है । प्रेत वस्त्र पर अंगार ही से मन्त्र को लिखकर पीत सूत्र से वेष्टित करके मेढक के मुह में
रख दे और पीले फूलों से उसकी पूजा करे । ऐसा करने से शत्रुओं का वाक्स्तंभन होता है ॥११०-११२॥
भूमि पर लवंग से यन्त्र लिखे और उसको शत्रु के पात्र से मिटा दे। ऐसा करने से दिव्यस्तंभन होता है।
इन्द्रवारुणी की जड़ को सात बार अभिमंत्रित करके जल में फेंक दे। ऐसा करने से जल-स्तंभन होता है। बहुत
क्या कहें ? अच्छी तरह मन्त्र की उपासना करने वाला साधक शत्रुओं की गति, बुद्धि आदि का स्तम्भन कर
सकता है, इसमें संशय नहीं ॥११३-११५॥
श्री नारदीयपुराण के पूर्वार्ध में बृहदुपाख्यानयुक्त तृतीयपाद में यक्षिणी मन्त्रसाधन निरूपण
नामक छियासीवां अध्याय समाप्त ॥८६॥
अध्याय ८७
विधान सहित दुर्गा-मन्त्रों का निरूपण
सनत्कुमार बोले-द्विजोत्तम ! लक्ष्मी के तीन अवतारों का वर्णन तो मैंने कर दिया । अब दुर्गा
के अखिल लोकोपकारक अवतारों को सुनाऊँगा । 'प्रणवः...........'स्वाहा" यह दुर्गा का मन्त्र है। इसके
ऋषि भैरव, छंद सम्राट्, देवता छिन्नमस्ता, बीज रमा और शक्ति स्वाहा कही जाती है। "आं खड्गाय" इत्यादि
१०० ना० पु०
७६४ नारदीयपुराणम्
छिन्नमस्ता रमा बीजं स्वाहा शक्तिरुदीरिता । आं खङ्गाय हृदयाख्यातमों खङ्गाय शिरः स्मृतम् ॥१४॥
ऊँ वज्राय शिखा प्रोक्ता ऐं पाशाय तनुच्छदम् । ओमंकुशाय नेत्रं स्याद्विसर्गो वसुरक्षयुक् ॥१५॥
मायायुग्मं चास्त्रमंगम् मनवः प्रणवादिकाः । स्वाहांताश्चैवमंगानि कृत्वा ध्यायेदथांबिकाम् ॥१६॥
भानुमंडलसंस्थानां प्रविकीणालकं शिरः । छिन्नं स्वकं स्फारमुखं स्वरक्तं प्रपिबद्गलात् ॥१७॥
उपरिस्थां रतासक्तरतिमन्मथयोर्निजे । डाकिनीवर्णनीसख्यौ दृष्ट्वा मोदभराकुलाम् ॥१८॥
ध्यात्वैवं प्रजपेल्लक्षचतुष्कं तद्दशांशतः । पालाशैर्बिल्वजैर्वापि जुहुयात्कुसुमैः फलैः ॥१९॥
आधारशक्तिमारभ्य परतत्त्वांतपूजिते । पीठे जयाख्या विजया जिता चापि पराजिता ॥२०॥
नित्या विलासिनी षष्ठी दोग्ध्र्यघोरा च मंगला । दिक्षु मध्ये च संपूज्या नव पीठस्य शक्तयः ॥२१॥
सर्वबुद्धिप्रदे वर्णनीये सर्वभृगुः सदृक् । सिद्धिप्रदे डाकिनीये तारो वज्रः सभौतिकः ॥२२॥
खङ्गीशो रोचनीयंते भगं धेहि नमोन्तकः । तारादिपीठमन्त्रोऽयं वेदरामाक्षरो मतः ॥२३॥
समर्प्यसनमेतेन तत्र संपूजयेच्छिवाम् । त्रिकोणमध्यषट्कोणपद्मभूपुरमध्यतः ॥२४॥
बाह्यावरणमारभ्य पूजयेत्प्रतिलोमतः । भूपुरे बाह्यमार्गेषु वज्रादीनि प्रपूजयेत् ॥२५॥
तदंतः सुरराजादीन्पूजयेद्धरितां पतीन् । भूपुरस्य चतुर्द्वार्वु द्वारपालान्यजेदथ ॥२६॥
करालविकरालाख्यावर्तिकालस्तृतीयकः । महाकालश्चतुर्थः स्यादाथ पद्मेऽष्टशक्तयः ॥२७॥
एकलिंगा योगिनी च डाकिनी भैरवी तथा । महाभैरवकैंद्राक्षी त्वसितांगी तु सप्तमी ॥२८॥
संहारिण्यष्टमी चेति षट्कोणेष्वंगमूर्तयः । त्रिकोणगा छिन्नमस्ता पार्श्वयोस्तु सखीद्वयम् ॥२९॥
डाकिनीवर्णनीसंज्ञं तारावाग्भ्यां प्रपूजयेत् । एवं पूजादिभिः सिद्धे मन्त्रे मंत्री मनोरथान् ॥३०॥
मन्त्र से अंगन्यास करके अंबिका का इस प्रकार ध्यान करे-“देवी सूर्यमंडल में स्थित हैं, शिर के बाल बिखरे हुए
हैं, अपने आप शिर को काट लिया है, मुख फैला हुआ है, अपने बहते हुए रक्त को पी रही हैं, रतिक्रीड़ा में
आसक्त रति और कामदेव के ऊपर अवस्थित हैं, अपनी डाकिनी और वर्णिनी नामक सखियों को देखकर
वे आमोद विह्वल हो रही हैं ॥१-८॥
इस प्रकार ध्यान करके एक लाख मन्त्र का जप करे और उसका दशांश पलाश या बिल्व के फूल-फलों से
पीठ पर हवन करे, जो आधार शक्ति से लेकर परतत्त्व के अंत तक पूजित हो । जया, विजया, जिता, अपरा-
जिता, नित्या, विलासिनी, दोग्धी, अघोरा, मंगला-इन नौ पीठ शक्तियों को दिशाओं के मध्य में पूजा करे ।
“सर्व बुद्धिप्रदे・・・・・・” यह पीठमन्त्र कहलाता है । इस मन्त्र से आसन समर्पित कर उस पर शिवा का
पूजन करे । त्रिकोण, षट्कोण और पद्मभूपुर के मध्य में बाह्यावरण से लेकर प्रतिलोमभाव से पूजा करनी
चाहिये ॥९-१४१/२॥ भूपुर के बाह्य भाग में वज्र आदि का पूजन करे । उसके भीतर देवराज आदि दिक्पालों
की पूजा करके भूपुर के चारों द्वारों पर द्वारपालों की अर्चना करनी चाहिये । कराल, विकराल, अतिकाल और
महाकाल--ये चार द्वारपाल कहलाते हैं । इसके बाद एकलिंगा, योगिनी डाकिनी, भैरवी, महाभैरवी इंद्राक्षी,
असितांगी और संहारिणी नामक आठ पद्मेष्ट शक्तियों की पूजा करके षट्कोण में त्रिकोणगा, छिन्नमस्ता
आदि अंगमूर्तियों की अर्चना करे । दोनों बगल में डाकिनी और वर्णिनी नामक दो सखियों का तारक अथवा
बीज मन्त्र से पूजा करनी चाहिये ।
इस प्रकार पूजा आदि से मंत्र सिद्ध हो जाने पर मंत्री उसके प्रभाव से तुरन्त सकल दुर्लभ मनोरथों को
सप्ताशीतितमोऽध्यायः $\quad$ ७९५
प्राप्नुयान्निखिलान्सद्यो दुर्लभंस्तत्प्रसादतः । श्रीपुष्पैर्लभते लक्ष्मीं तत्फलैश्च समीहितम् ॥२१॥
वाक्सिद्धिं मालतीपुष्पैश्चम्पकैर्हवनात्सुखम् । घृताक्तं छागमांसं यो जुहुयात्प्रत्यहं शतम् ॥२२॥
मासमेकं तु वशगास्तस्य स्युः सर्वपार्थिवाः । करवीरसुमैः श्वेर्तैर्लक्षसंख्यैर्जुहोति यः ॥२३॥
रोगजालं पराभूय सुखी जीवेच्छतं समाः । रक्तैस्तत्संख्यया हुत्वा वशयेन्मन्त्रिणो नृपान् ॥२४॥
फलैर्हुत्वाप्नुयाल्लक्ष्मीमुदुंबरपलाशजैः । गोमायुमांसैस्तामेव कवितां पायसांधसा ॥२५॥
बंधूककुसुमैर्भाग्यं कर्णिकारैः समीहितम् । तिलतंडुलहोमेन वशयेन्निखिलाञ्जनान् ॥२६॥
नारीरजोमिश्राकृष्टैमृगमांसैः समीहितम् । स्तंभनं माहिषैर्मांसैः पंकजैः सघृतैरपि ॥२७॥
चिताग्नौ परभृत्पक्षैर्जुहुयादरिमृत्यवे । उन्मत्तकाष्ठदीप्तेऽग्नौ तत्फलं वायसच्छदैः ॥२८॥
द्यूते वने नृपद्वारे समरे वैरिसंकटे । विजयं लभते मंत्री ध्यायन्देवी जपन्मनुम् ॥२९॥
भुक्तये मुक्तये सितां ध्यायेदुच्चाटे नीलरुचिषम् । रक्तां वश्ये मृतौ धूम्नां स्तंभने कनकप्रभाम् ॥३०॥
निशि दद्याद्बलिं तस्यै सिद्धये मदिरादिना । गोपनीयः प्रयोगोऽयं प्रोच्यते सर्वसिद्धिदः ॥३१॥
भूताहे कृष्णपक्षस्य मध्यरात्रे तमोधने । स्नात्वा रक्ताम्बरधरो रक्तमाल्यानुलेपनः ॥३२॥
आनीय पूजयेन्नारीं छिन्नमस्तास्वरूपिणीम् । सुन्दरीं यौवनाक्रांतां नरपञ्चकगामिनीम् ॥३३॥
सुस्मितां मुक्तकबरीं भूषावानप्रतोषिताम् । विवस्त्रां पूजयित्वैनमयुतं प्रजपेन्मनुम् ॥३४॥
प्राप्त कर लेता है ॥१५-२०$\frac{१}{२}$॥ श्रीपुष्पों से हवन करने से लक्ष्मी, श्रीफलों से मनःकामना, मालती पुष्पों से
वाक्सिद्धि और चंपा से सुख की प्राप्ति होती है। जो एक मास तक प्रतिदिन घृतमिश्रित छाग के मांस से हवन
करता है, उसके वश में समस्त नृपगण आ जाते हैं। जो श्वेत करवीर के पुष्पों से एक लाख होम करता है,
वह रोग-समूह को जीत कर सौ वर्षों तक सुख से जीता है। उतनी ही संख्या में रक्त करवीर के पुष्पों से हवन
करनेवाला व्यक्ति मंत्रियों तथा राजाओं को वश में करता है। गूलर और पलाश के फलों से होम करने से लक्ष्मी की
प्राप्ति होती है ॥२१-२४$\frac{१}{२}$॥ बन्धूक (दोपहरिया फूल) कुसुमों से हवन करने पर सौभाग्य की प्राप्ति होती है
और कर्णिकार (कनेल) से होम करने से मनः-कामना पूर्ण होती है॥ तिल और तंडुल से हवन करने वाला
व्यक्ति अखिल जनों को वश में करता है। नारी के रज से संमिश्रित मृगमांस से हवन करने पर अभिलाषा
की पूर्ति होती है। महिष के मांस तथा घृत मिश्रित कमलों से होम करने पर स्तंभन सिद्ध होता है। शत्रु को
मारने के लिए चिता की अग्नि में कौए के पंख से हवन करे । धतूरे की लकड़ी से जलाये गए अग्नि में भी कौए
के पंख से वही फल मिलता है। द्यूतक्रीड़ा, वन, नृपद्वार, समर तथा शत्रुसंकट में देवी का ध्यान तथा मंत्रजप
करने वाला साधक जन-विजय लाभ करता है। भुक्ति-मुक्ति प्राप्त करने के लिये शुक्लवर्णा देवी का ध्यान
करे और उच्चाटन के लिये नीलवर्णा का। वशीकरण के लिये रक्तवर्णा, मृत्यु के लिये धूम्रवर्णा और स्तम्भन
के लिये स्वर्णवर्णा का ध्यान करना चाहिये ॥२५-३०॥ सिद्धि के निमित्त रात्रि में उन्हें मद्य आदि की बलि
चढ़ाये । इस सर्व सिद्धिदायक प्रयोग को गुप्त ही रखना चाहिये । कृष्णपक्ष की चतुर्दशी की घोर अन्धकारपूर्ण
मध्यरात्रि में छिन्नमस्ता देवी की-सी आकृति वाली, सुन्दरी, पूर्ण यौवना, पांच पुरुषों से गमन करने वाली,
सुन्दर मुसकान करने वाली, खुली वेणी वाली और आभूषणों से विभूषित ललना को विवस्त्र करके उसकी पूजा
करे। फिर दश हजार मंत्र का जप करके बलि समर्पित करे। इस तरह रात्रि व्यतीत कर वनिता को धन से
७६६ नारदीयपुराणम्
बलिं दत्त्वा निशां नीत्वा संप्रेष्य धनतोषिताम् । भोजयेद्विविधैरन्नैर्ब्राह्मणान्भोजनादिना ॥३५॥
अनेन विधिना लक्ष्मीं पुत्रान्पौत्रान्धनं यशः । नारीमायुः सुखं धर्ममिष्टं च समवाप्नुयात् ॥३६॥
तस्यां रात्रौव्रतं कार्यं विद्याकामेन मन्त्रिणा । मनोरथेषु चान्येषु गच्छेत्तां प्रजपन्मनुम् ॥३७॥
उषस्युत्थाय शय्यायामुपविष्टो जपेच्छतम् । षण्मासाभ्यन्तरे मन्त्री कवित्वेन जयेत्कविम् ॥३८॥
शिवेन कीलिता चेयं तदुत्कीलनमुच्यते । मायां तारपुटां मंत्री जपेदष्टोत्तरं शतम् ॥३९॥
मन्त्रस्यादौ तथैवांते भवेत्सिद्धिप्रदा तु सा । उदिता छिन्नमस्तेयं कलौ शीघ्रमभीष्टदा ॥४०॥
अवतारांतरं देव्या वच्मि ते मुनिसत्तम । ज्ञानामृतारुणा श्वेता क्रोधिनी ढुंसमन्विता ॥४१॥
शांतिस्तथाविधा चापि नीच सर्वान्वितास्तयः । वाग्भवं कामराजाख्यं शक्तिबीजाह्वयं तथा ॥४२॥
त्रिभिर्बीजैः पंचकूटात्मिका त्रिपुरभैरवी । ऋषिः स्याद्दक्षिणामूर्त्तिश्छन्दः पंक्तिरुदीरिता ॥४३॥
देवता देशिकैरुक्ता देवी त्रिपुरभैरवी । नाभेरधश्चरणं न्यस्य वाग्भवं मन्त्रवित्पुनः ॥४४॥
हृदयान्नाभिपर्यंतं कामबीजं प्रविन्द्वसेत् । शिरसो हृत्प्रदेशांतं तार्तीयं विन्यसेत्ततः ॥४५॥
आद्यं द्वितीयं करयोस्तार्तीयमुभयं न्यसेत् । मूलाधारे हृदि न्यस्य भूयो बीजत्रयं क्रमात् ॥४६॥
नवयोन्यात्मकं न्यासं कुर्याद्वीजैस्त्रिभिः पुनः । बालोदितप्रकारेण मूर्तिन्यासमथाचरेत् ॥४७॥
स्वस्वबीजादिकं पूर्वं मूर्द्धीशानमनोभवम् । न्यसेद्दक्षौ तत्पुरुषं मकरध्वजमात्मवित् ॥४८॥
हृद्यघोरकुमारादिकंदर्पं तदनंतरम् । गुह्यदेशे प्रविन्त्यस्येद्वामदेवादिमन्मथम् ॥४९॥
सद्योजातं कामदेवं पादयोर्विन्यसेत्ततः । ऊर्ध्वं प्राग्दक्षिणोदीच्यपश्चिमेषु मुखेषु तान् ॥५०॥
संतुष्ट करके लौटा दे ॥३१-३४॥ पश्चात् विविध प्रकार की भोज्य-सामग्रियों से ब्राह्मणों को भोजन कराये ।
ऐसा करने से लक्ष्मी, पुत्र, पौत्र, धन, यश, नारी, आयु, सुख, धर्म और कल्याण की प्राप्ति होती है। विद्या के
इच्छुक साधक उस रात्रि में व्रत करे। अन्य मनोरथों की सिद्धि के लिये उस रात्रि में मंत्र का जप करे और
प्रातःकाल उठकर शय्या पर ही सौ बार मन्त्र को जपे । ऐसा करने वाला साधक छह मास के भीतर ही
अपनी कवित्वशक्ति से कवियों को पराजित कर देता है ॥३५-३८॥
शिव ने छिन्नमस्ता को कीलित (बद्ध) किया था। इसलिये उनका उत्कीलन भी कहा जाता है। अर्थात
माया (ह्रीं) को तार (ओं) से संपुटित करके मंत्र के आदि तथा अन्त में एक सौ आठ बार जप करे। ऐसा करने से
देवी सिद्धि प्रदान करती हैं। कलियुग में तो छिन्नमस्ता शीघ्र ही कामना को पूर्ण कर देती हैं ॥३९-४०॥
मुनिश्रेष्ठ ! अब मैं देवी के अन्य अवतार का वर्णन करता हूँ। "ज्ञानामृता....." यह त्रिपुर भैरवी का
मंत्र है । इसके ऋषि दक्षिणामूत्ति, छंद पंक्ति और देवता-देशिकों के कथनानुसार-त्रिपुर भैरवी
हैं। मंत्रवेत्ता व्यक्ति नाभि में वाग्भव आचरण का न्यास करके हृदय से नाभि पर्यंत कामबीज का न्यास कर
शिर से हृदय पर्यन्त तार्तीय बीज का न्यास करना चाहिये । आद्य, द्वितीय और तृतीय बीज का दोनों हाथों में
न्यास करे। पुनः मूलाधार हृदय में क्रमशः तीनों बीजों का न्यास करके बीजत्रय से नवयोन्यात्मक न्यास भी
करे ॥४१-४६॥ अनन्तर देवी के कथनानुसार मूर्तिन्यास करे । आत्मज्ञानी व्यक्ति मस्तक तथा मुख में अपने-
अपने बीज आदि के साथ क्रमशः शिव तथा कन्दर्प का न्यास करे । हृदय में अघोर, कुमार तथा काम का
न्यास करके गुह्य देश में वामदेव आदि मदन का न्यास करना चाहिये । सद्यः उत्पन्न कामदेव का दोनों
चरणों में न्यास करे । ऊपर, पूरब, दक्षिण, उत्तर और पश्चिम दिशा में पूर्वोक्त देवों का ही न्यास करे