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बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)

बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)

Brihan Naradiya Purana with Sanskrit & Hindi Commentary

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)

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DevanagariSanskritpublished1,008 पृष्ठ

पृष्ठ 796, कुल 1008 में से

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पृष्ठ 796

पञ्चाशीतितमोऽध्यायः
सनत्कुमार उवाच
वाग्देवतावतारोऽन्यः कालिकेति प्रकीर्तिता । तस्या मन्त्रं प्रवक्ष्यामि भुक्तिमुक्तिप्रदं नृणाम् ॥१॥
सृष्टिक्रियान्विता शांतिर्बिंद्वाढ्या च त्रिधा पुनः । अरुणाख्यादीपिका च बिंदुयुक्ता द्विधा ततः ॥२॥
मायाद्वयं ततः पश्चाद्दक्षिणे कालिके पदम् । पुनश्च सप्तबीजानि स्वाहांतोऽयं मनूत्तमः ॥३॥
भैरवोऽस्य ऋषिश्छन्द उष्णिक्काली तु देवता । बीजं मायादीर्घवत्सं शक्तिरुक्ता मुनीश्वर ॥४॥
षड्दीर्घाढ्येन बीजेन विद्याया अंगमीरितम् । मातृकार्णान्वश दश हृदये भुजयोः पदोः ॥५॥
विन्यस्य व्यापकं कुर्यान्मूलमंत्रेण साधकः । शिरः कृपाणमभयं वरं हस्तैश्च बिभ्रतीम् ॥६॥
मुंडस्रङ्मस्तकां मुक्तकेशां पितृवनस्थिताम् । सर्वालंकृतवर्णां च श्यामांगीं कालिकां स्मरेत् ॥७॥
एवं ध्यात्वा जपेल्लक्षं जुहुयादयुतं ततः । प्रसूनैः करवीरोत्थैः पूजायन्त्रमथोच्यते ॥८॥
विलिख्य पूर्वं षट्कोणं त्रिकोणत्रितयं ततः । पद्ममष्टदलं बाह्ये भूपुरं तत्र पूजयेत् ॥६॥
जया च विजया चापि अजिता चापराजिता । नित्या विलासिनी वापि दोग्ध्यघोरा च मंगला ॥१०॥
पीठस्य शक्तयो मायात्मनेहृत्पीठमंत्रकः । शिवरूपशवस्थां च शिवाभिर्दिक्षु वेष्टिताम् ॥११॥
महाकालरतासक्तां ध्यात्वांगान्यर्चयेत्पुरा । कालीं कपालिनीं कुल्लां कुरुकुल्लां विरोधिनीम् ॥१२॥
अध्याय ८५
वाग्देवता की अवतार-काली आदि के मन्त्रों का निरूपण
सनत्कुमार बोले- वाग्देवता का दूसरा अवतार कालिकारूप में हुआ है । अब मैं मानवों के लिये मुक्ति-
मुक्ति प्रदान करने वाले कालिका-मन्त्र के विषय में कहूँगा । सृष्टि क्रिया से युक्त, शान्ति, विद्यापूर्ण, अरुणाक्षी,
आदीविका, बिंदुयुक्ता, माया, दक्षिण कालिका, सात बीज और अन्त में स्वाहा-ये उत्तम मन्त्र हैं। इसके
ऋषि भैरव, छंद उष्णिक् और देवता काली हैं । मुनीश्वर ! माया इसका बीज है और दीर्घवत्सं शक्ति है । बीज
सहित छः दीर्घ विद्या के अंग कहलाते हैं ।॥१-४।। साधक मातृक (अकारादि ४९ अक्षर) वर्णों में से दश-दश को
हृदय, भुजा और चरणों में न्यस्त करके मूलमन्त्र से व्यापक' न्यास करे । तत्पश्चात् शिर, कृपाण तथा अभयास्त्र
को हाथों में धारण करनेवाली, मुण्डमाला को मस्तक पर पहनने वाली, बिखरे केश वाली, श्मशान में रहने वाली,
समस्त अलंकारों से विभूषित तथा श्यामांगी कालिका का ध्यान करे। ध्यानोत्तर एक लाख मन्त्र का जप करे और
दश हजार करवीर के पुष्पों से हवन करे । अब पूजायंत्र के बारे में कहता हूँ। पहले षट्कोण को लिख कर तीन
त्रिकोण का निर्माण करे । तदनन्तर अष्टदल कमल को लिखकर उस पर भूपुर की पूजा करे । जया, विजया,
अजिता, अपराजिता, नित्या, विलासिनी, दोग्धी, अघोरा और मंगला-ये पीठ शक्तियाँ हैं। "मायात्मने... "-यह
हृत्पीठ का मन्त्र है ॥५-१०३॥ पहिले शिवरूपा, शवस्था, चारों ओर शृगालियों से वेष्टिता, महाकालनिरता तथा
आसक्ता काली का ध्यान करके अंगों की अर्चना करे । षट्कोण में काली, कपालिनी, कुल्ला, कुरुकुल्ला, विरोधिनी
१. तन्त्रप्रसिद्ध सर्वाङ्ग सम्बन्धी न्यास ।
१८ ना० पु०