बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)
Brihan Naradiya Purana with Sanskrit & Hindi Commentary
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)
इस ग्रन्थ के बारे में
बृहन्नारदीय पुराण, जिसे नारदपुराण भी कहा जाता है, परम्परा में महर्षि व्यास से जोड़ा जाता है। इसका पूर्वभाग सनक आदि कुमारों द्वारा नारद को दिए गए उपदेशों के रूप में है, जिनमें धर्म, भक्ति, व्रत, तीर्थ, मन्त्र-साधना और वेदाङ्गों (शिक्षा, कल्प, व्याकरण, निरुक्त, ज्योतिष और छन्द) का विस्तृत वर्णन आता है। इसकी एक विशेषता अठारह पुराणों की विषय-सूची है, जिसमें प्रत्येक पुराण की श्लोक-संख्या और विषय बताए गए हैं; स्कैन में 'पञ्चविंशतिसाहस्रं...' और 'प्रभासस्य च माहात्म्यं...' जैसे श्लोक इसी अंश के हैं।
यह संस्करण हिन्दी साहित्य सम्मेलन, प्रयाग की पुराण-प्रकाशन योजना के अन्तर्गत छपा 'बृहन्नारदीयपुराणम् (पूर्वभागः)' है, जिसमें संस्कृत मूल के साथ व्याकरण-वेदान्ताचार्य तारिणीश झा का हिन्दी अनुवाद है। प्रथम संस्करण शक 1910, अर्थात् 1989 ई. में प्रकाशित हुआ; प्रकाशक सम्मेलन के प्रधान मन्त्री डॉ. प्रभात मिश्र शास्त्री थे।
प्रकाशकीय वक्तव्य इस पुराण के ही एक श्लोक से आरम्भ होता है, जिसमें कहा गया है कि जैसे नदियों में गंगा और सरोवरों में पुष्कर श्रेष्ठ है, वैसे ही पुराणों में नारदीय। पुस्तक 1008 पृष्ठों की है।
७२० नारदीयपुराणम्
सायाह्नोक्तेन विधिना संपूज्य हवनं पुनः । कृत्वा पूर्वोक्तविधिना मंत्री तद्गतमानसः ॥१५३॥
एवं यो भजते नित्यं विद्वान् गोपालनंदनम् । समुत्तीर्य भवांभोधिं स याति परमं पदम् ॥१५४॥
मध्ये कोणेषु वाह्येऽध्वनलपुरपुटस्यालिखेत्कर्णिकायां
कंदर्प साध्ययुक्तं विवरगतषडर्णद्विशः केशरेषु ।
शक्तिः श्रीपूर्विकाणि द्विनवलिपिमनेारक्षराणिच्छदानां
मध्ये वर्णान्दशान्तो दशलिपिमनुवर्यस्य वैकैकशोऽब्जम् ॥१५५॥
भूसद्मनाभिवृतमलग्मन्मथेन गोरोचनाविलिखितं तपनीयसूच्या ।
पट्टे हिरण्यरचिते गुलिकीकृतं तद्गोपालयंत्रमखिलार्थदमेतदुक्तम् ॥१५६॥
संपातसिक्तमभिजप्तमिमं महद्धिमर्धायं जगत्त्रयवशीकरणैकदक्षम् ।
रक्षायशः सुतमहीधनधान्यलक्ष्मी सौभाग्यलिप्सुभिरजस्रमनर्ध्यवीर्यम् ॥१५७॥
स्मरस्त्रिविक्रमाक्रांतश्चाक्रीष्टचाय हृदिष्यसो । षडक्षरोऽयं संप्रोक्तः सर्वसिद्धिकरो मनुः ॥१५८॥
क्रोडः शान्तो॑ऽवुवह्नयाढ्यो मायाबीजं प्रकीर्तितम् । गोविद्वह्रिचन्द्राढ्यो मनुः श्रीबीजमीरितम् ॥१५९॥
आठ बार दूध वाले वृक्षों (आम, पीपल आदि) की समिधाओं से या घी, मधु तथा चीनी सहित पायस से हवन
करे । इस तरह प्रतिदिन अपने हृदयारविन्द में लोकों के अधिपति तथा आराध्य कृष्णदेव का ध्यान करते हुए तीन
हजार मंत्र का जप करना चाहिये । साधक उन्ही में अपने मन को लगा कर सायंकालीन विधि के अनुसार
पूजन तथा हवन भी करे । जो विद्वान् इस प्रकार नित्य गोपालनंदन की आराधना करते हैं, वे संसारसागर
से पार होकर विष्णुलोक को जाते हैं ॥१४९-१५४॥
पहले दो त्रिभुज अंकित करे, जिसमें एक ऊर्ध्वमुख ओर दूसरा अधोमुख हो । एक के ऊपर दूसरा
त्रिकोण होना चाहिए। इस प्रकार छह कोण हो जाएँगे । कोण बाह्य भाग में होंगे । उनके बीच में
जो षट्कोण चक्र होगा, उसे अग्निपुर कहते हैं । उस अग्निपुर की कर्णिका (मध्यभाग) में 'क्लीं' यह बीजमंत्र
अंकित करे । उसके साथ साध्य पुरुष एवं कार्य का भी उल्लेख करे । बहिर्गत कोणों के विवर में षडक्षर मंत्र
लिखे । छह कोणों के ऊपर एक गोलाकार रेखा खींचकर उसके बाह्यभाग में दशदल कमल अंकित करे । उन दश-
दलों के केसरो में एक-एक में दो-दो अक्षर के क्रम से 'ह्रीं' और 'श्रीं' पूर्वक अष्टादशाक्षर मंत्र के अक्षरों का
उल्लेख करे । तदनन्तर दलों के मध्य भाग में दशाक्षर मंत्र के एक-एक अक्षर को लिखे । इस प्रकार लिखे हुए
दशदल चक्र को भूपुर (चौकोर रेखा) से आवृत करे । भूपुर में अस्त्रों के स्थान में कामबीज (क्लीं) का उल्लेख
करे । इस यंत्र को सोने के पत्र पर सोने की ही शलाका से गोरोचन द्वारा लिखकर उसकी गुटिका बना ले । यही
गोपाल यंत्र है । यह सम्पूर्ण मनोरथों को देने वाला कहा गया है । जो रक्षा, यश, पुत्र, पृथ्वी, धन-धान्य,
लक्ष्मी और सौभाग्य के इच्छुक हों, उन श्रेष्ठ पुरुषों को निरन्तर यह यन्त्र धारण करना चाहिए। इसका अभि-
षेक करके मंत्रजपपूर्वक इसे धारण करना उचित है। यह तीनों लोकों को वश में करने के लिए एकमात्र उपाय
है । इसकी महती शक्ति अवर्णनीय है ॥१५५-१५७॥
स्मर (क्लीं), त्रिविक्रम (ऋ) युक्त चक्री (क्) अर्थात् कृ, इसके पश्चात् ष्णाय तथा हृत् (नमः) - यह
(क्लीं कृष्णाय नमः) षडक्षर-मंत्र कहा गया है जो संपूर्ण मनोरथों को सिद्ध करने वाला है । वाराह (हृ.) अग्नि
यहाँ प्रस्तुत पृष्ठ का देवनागरी लिप्यान्तरण है:
अशीतितमोऽध्यायः ७२१
आभ्यामष्टादशलिपिः स्याद्विंशत्यक्षरो मनुः । शालग्रामे मणौ यंत्रे मंडले प्रतिमासु वा ॥१६०॥
नित्यं पूजा हरेः कार्या न तु केवलभूतले । एवं यो भजते कृष्णं स याति परमां गतिम् ॥१६१॥
विशाणंशय मुनिर्ब्रह्मा गायत्री छन्द ईरितम् । कृष्णश्च देवता कामो बीजं शक्तिर्द्विठो बुधैः ॥१६२॥
रामाग्निवेदवेदाब्दैर्नेत्रार्णैरंगकल्पनम् । मूलेन व्यापकं कृत्वा मनुना पुटितानथ ॥१६३॥
मातृकार्णान्न्यसेत्तत्तत्स्थानेषु सुसमाहितः । दशतत्त्वानि विन्यस्य मूलेन व्यापकं चरेत् ॥१६४॥
मंत्रन्यासं ततः कुर्याद्देवताभावसिद्धये । शीर्षे ललाटे भ्रूमध्ये नेत्रयोः कर्णयोस्तथा ॥१६५॥
नसोर्वक्त्रे च चिबुके कण्ठे दोर्मूलके हृदि । उदरे नाभिदेशे च लिंगे मूलसरोरुहे ॥१६५॥
कट्यां जान्वोर्जंघयोश्च गुल्फयोः पादयोः क्रमात् । न्यसेद्गदंतान्मंत्राणां सृष्टिन्यासोऽयमीरितः ॥१६७॥
हृदये चोदरे नाभौ लिंगे मूलसरोरुहे । कट्यां जान्वोर्जंघयोश्च गुल्फयोः पादयोस्तथा ॥१६८॥
मूर्ध्नि कपोले भ्रूमध्ये नेत्रयोः कर्णयोर्नसोः । वदने चिबुके कंठे दोर्मूले विन्यसेत्क्रमात् ॥१६६॥
नमोऽन्तान्मंत्रवर्णांश्च स्थितिन्यासोऽयमीरितः । पादयोर्गुल्फयोश्चैव जंघयोर्जानुनोस्तथा ॥१७०॥
कट्यां मूले ध्वजे नाभौ जठरे हृदये पुनः । दोर्मूले कंठदेशे च चिबुके वदने नसोः ॥१७१॥
कर्णयोर्नेत्रयोश्चैव भ्रूमध्ये निटिले तथा । मूर्ध्नि न्यसेन्मंत्रवर्णान्संहाराह्वयोऽयमीरितः ॥१७२॥
पुनः सृष्टिस्थितिन्यासौ विधाय वैष्णवोत्तमः । मूर्तिपंजरनामानं विन्यसेत्पूर्ववत्ततः ॥१७३॥
पुनः षडंगं कृत्वाथ ध्यायेत्कृष्णं हृदंबुजे । द्वारवत्यां सहस्रार्कभास्वरैर्भवनोत्तमैः ॥१७४॥
अनल्पैः कल्पवृक्षैश्च परीते मणिमण्डपे । ज्वलद्रत्नमयस्तं भद्वारतोरणकुड्यके ॥१७५॥
(२), शान्ति (ईं) और इन्दु (अनुस्वार) से युक्त हो तो श्रीबीज—'श्रीं' कहा गया है। इन दोनों बीजों से युक्त
होने पर अष्टादशाक्षर मन्त्र (ह्रीं श्रीं क्लीं कृष्णाय गोविन्दाय गोपीजनवल्लभाय स्वाहा) बीस अक्षरों का हो
जाता है । हरि की नित्य पूजा शालग्राम, मणि, यंत्र, मंडल तथा प्रतिमाओं में करनी चाहिये, केवल भूमि पर
न करे । उक्त प्रकार से कृष्ण की आराधना करने वाला व्यक्ति उत्तम गति को प्राप्त करता है । उक्त बीस अक्षर
वाले मंत्र का ऋषि ब्रह्मा, छंद गायत्री, देवता कृष्ण; बीज क्लीं और शक्ति स्वाहा है। मन्त्र के बीस अक्षरों से
अङ्गन्यास करना चाहिये। मन्त्रसंपुटित मूल से व्यापकन्यास कर देवभाव की सिद्धि के लिये मन्त्रन्यास भी करे ।
शिर, ललाट, भ्रू मध्य, नेत्र, कर्ण, नासिका, मुख, ठुड्डी, कंठ, बाहुमूल, हृदय, उदर, नाभि, लिंग, मूलाधार
पद्म, कटि, जानु, ऊरु, जंघा, गुल्फ तथा चरणों में 'नमः' पर्यन्त मन्त्राक्षरों का क्रमशः न्यास करे । इसका
नाम सृष्टिन्यास है । १५८-१६७।। हृदय, उदर, नाभि, लिंग, मूलाधारपद्म, कटि, जानु, ऊरु, जंघा, गुल्फ, चरण,
मस्तक, कपोल, भ्रू मध्य, नेत्र, कर्ण, नासिका, मुख, ठुड्डी, कंठ तथा बाहुमूल, में 'नमः' पर्यन्त मन्त्रवर्णों का
क्रमशः न्यास करना स्थितिन्यास कहलाता है। चरण, गुल्फ, जंघा, जानु, कटि, मूलाधार, लिंग, नाभि, उदर,
हृदय, बाहुमूल, कंठ, ठुड्डी, वदन, नासिका, कर्ण, नेत्र, भ्रू मध्य ललाट तथा मस्तक में मंत्रवर्णों का न्यास
करना संहारन्यास कहलाता है। उत्तम वैष्णव को इन न्यासों के कर लेने के बाद पुनः सृष्टिन्यास तथा स्थितिन्यास
करना चाहिये। तत्पश्चात् मूर्तिपंजरन्यास एवम् षडंगन्यास करके अपने हृदयारविन्द में श्रीकृष्ण का इस प्रकार
ध्यान करे कि द्वारका में सहस्र दिनकरों के समान चमकनेवाले कतिपय उत्तम भवनों तथा कल्पवृक्षों से वेष्टित एक
मणिमय मंडप है, जिसके स्तंभ, द्वार, तोरण तथा कुड्य जाज्वल्यमान रत्नों के बने हैं। उस मण्डप में तरह-तरह
के चित्र लिखे हैं। उसमें टंगे वितान से मोतियां लटक रही हैं ॥१६८-१७५॥ उसके मध्य में पद्मरागमणि
६१ ना० पु०
७२२ नारदीयपुराणम्
फुल्लप्रफुल्लसच्चित्रवितानालंबिमौक्तिकै । पद्मरागस्थलीराद्रत्नसंघैश्च मध्यतः ॥१७६॥
अनारतगलद्रत्नधाराढ्यस्वस्तरोधः । रत्नप्रदीपावलिभिः प्रदीपितदिगंतरे ॥१७७॥
उद्यदादित्यसंकाशमणिसिंहासनांबुजे । समासीनोऽच्युतो ध्येयो द्रुतहाटकसन्निभः ॥१७८॥
समानोदितचंद्राकतडित्कोटिसमद्युतिः । सर्वांगसुंदरः सौम्यः सर्वाभरणभूषितः ॥१७९॥
पीतवासाः शंखचक्रगदांभोजलसत्करः । अनाहतोच्छलद्रत्नधारौघकलशं स्पृशन् ॥१८०॥
वामपादांबुजाग्रेण मुष्णता पल्लवच्छविम् । रुक्मिणीसत्यभामेऽस्य मूर्ध्नि रत्नोघधारया ॥१८१॥
सिंचंत्यौ दक्षवामस्थे स्वदोस्थकलशोत्थया । नाग्नजिती सुनंदा च दिशंत्यौ कलशौ तयोः ॥१८२॥
ताभ्यां च दक्षवामस्थमित्रविंदासुलक्ष्मणे । रत्ननद्याः समुद्धृत्य रत्नपूर्णौ घटौ तयोः ॥१८३॥
जांबवती सुशीला च दिशंत्यौ दक्षवामके । बहिः षोडश साहस्त्रसंख्याकाः परितः प्रियाः ॥१८४॥
ध्येयाः कनक रत्नोघधारायुक्तकलशोज्ज्वलाः । तद्बहिश्चाष्टनिधयः पूरयंतो धनैर्धराम् ॥१८५॥
तद्बहिर्वृष्णयः सर्वे पुरोवच्च स्वरादयः । एवं ध्यात्वा जपेलक्षपंचकं तद्दशांशतः ॥१८६॥
अरुणैः कमलैर्हुत्वा पीठे पूर्वोदिते यजेत् । विलिप्य गंधपंकेन लिखेद्दष्टदलांबुजम् ॥१८७॥
कर्णिकायां च षट्कोणं साध्यं तत्र मन्मथम् । शिष्टैस्तु सप्तदशभिरक्षरैर्वेष्टयेत्स्वरम् ॥१८८॥
प्राग्रक्षोऽनीलकोणेषु श्रियं शिष्टेषु संविदम् । षट्सु संधिषु षट्कर्णे केसरेषु त्रिंशस्त्रिशः ॥१८९॥
विलिखेत्स्मरणायत्रीं मालामंत्रं दलाष्टके । षट्शः संलिख्य तद्बाह्ये वेष्टयेन्मातृकाक्षरैः ॥१९०॥
तथा बहुमूल्य रत्नों का काम इस तरह किया हुआ है कि देखते ही बनता है । वहीं कल्पवृक्ष के नीचे सतत प्रल-
वित होनेवाले रत्नों से मानों धारायें निकल रही हैं । रत्नों की बनी दीपावलियां दिग्-दिगन्त को प्रकाशित कर
रही हैं, उसी मण्डप में उदित होते हुए आदित्य के समान मणिमय सिंहासनकमल पर संतप्त सुवर्ण के सदृश
कांतिवाले केशव समासीन हैं । उनकी द्युति एक काल में उदित होते हुए करोड़ों सूर्य, चन्द्र तथा विद्युत् के
समान है । वे सर्वाङ्गसुन्दर, सौम्य तथा समस्त आभूषणों से आभूषित हैं । पीताम्बर पहने हुए हैं। हाथों में
शंख, चक्र, गदा एवम् पद्म धारण किये हैं। और एक ऐसे कलश को उठाये हैं, जो बिना टकराये ही रत्नों की
धारा बहा रहा है ।। १७६-१८०।। उनके बाँयें पैर का नाखून नवकिसलय की छवि को लज्जित कर रहा है । उनके
बाँयें तथा दाहिने भाग में रुक्मिणी तथा सत्यभामा खड़ी होकर अपने हाथों में दिव्य कलश ले उनसे निकलती
हुई रत्नराशिमयी धाराओं से उन (श्री कृष्ण) के मस्तक पर अभिषेक कर रही हैं । नाग्नजिती और सुनन्दा उन
दोनों को कलश पकड़ा रही हैं । मित्रविन्दा और सुलक्ष्मणा रत्ननदी से रत्न ले-ले कर कलशों को भर रही हैं।
उनके दाहिने और बाँयें भाग में जांबवती तथा सुशीला और चतुर्दिक्षु सोलह हजार स्त्रियां सुवर्ण एवम् रत्नों की
धारा बहानेवाले शुक्ल कलश धारण किये खड़ी हैं । उनके पीछे आठों निधियां धन से धरा को परिपूर्ण कर रही
हैं ।।१८१-१८५।। निधियों के पीछे समस्त वृष्णिवंशी उपस्थित हैं। इस प्रकार ध्यान कर पाँच लाख मंत्र का
जप करे और उसका दशांश लाल कमल से पूर्वोक्त पीठ पर हवन करे । तदनन्तर अष्टगंध से अष्टदलकमल लिखे
जिसकी कर्णिका पर षट्कोण, साध्यनाम तथा क्लीं लिख कर मन्त्र के सत्रह अक्षरों से स्वर को वेष्टित करे ।
पूर्व, नैर्ऋत्य तथा वायव्यकोण में श्री, अवशिष्ट कोणों में संवित्, छः संधियों, षट्कर्ण तथा केसरों के ऊपर तीस
तीस प्रणव लिख कर अष्ट दल पर काम गायत्री तथा मालामंत्र को लिखे। उसे मातृकाक्षरों से वेष्टित कर
अशीतितमोऽध्यायः
७२३
भूबिंबं च लिखेद्वाह्ये श्रीमायादिग्वििदक्ष्वपि । भूग्रहं चतुरस्रं स्यादष्टवज्रविभूषितम् ॥१८६॥
एतद्यंत्रं हाटकादिपट्टेष्वालिख्य पूर्ववत् । संस्कृतं धारयेद्यो वै सोऽर्च्यते त्रिदशैरपि ॥१८२॥
स्याद्गायत्री वामदेवपुष्पबाणौ तु ङेतिमौ । विद्महेधीमहियुतौ तन्नोऽनंगः प्रचोदयात् ॥१८३॥
जप्य जप्यौ गोपालमूलां जनरंजनी । हृदयं कामदेवाय ङेतं सर्वजनप्रियम् ॥१८४॥
उक्त्वा सर्वजनांते तु संमोहनपदं तथा । ज्वल ज्वल प्रज्वलेति प्रोच्य सर्वजनस्य च ॥१८५॥
हृदयं मम च ब्रूयाद्वशं कुरु युगं शिरः । प्रोक्तो मदनमंत्रोऽष्टचत्वारिंशद्भिभक्षरैः १८६॥
जपादौ स्मरबीजाद्यो जगत्त्रयवशीकरः । पीठं प्राग्वत्समभ्यर्च्य मूर्ति संकल्प्य मूलतः ॥१८७॥
तत्रावाहाच्युतं भक्त्या सकलीकृत्य पूजयेत् । आसनादिविभूषांतं पुनर्न्यासक्रमाद्यजेत् ॥१८८॥
सृष्टि स्थितिं षडंगं च किरीटं कुंडलद्वयम् । शंखं चक्रं गदां पद्मं मालां श्रीवत्सकौस्तुभौ ॥१८६॥
गन्धपुष्पैः समभ्यर्च्य मूलेन वैष्णवोत्तमः । षट्कोणेषु षडंगानि दिग्दलेषु क्रमाद्यजेत् ॥२००॥
वासुदेवाविकान्कोणेषु तु शांत्यादिकांस्ततः । पत्राग्रगा महिष्योऽष्टौ यजेत्साधकत्तमः ॥२०१॥
ततः षोडशसाहस्रं सकृद्देवार्चयेत्प्रियाः । इंद्रनीलमुकुन्दांश्च करालांनद कच्छपान् ॥२०२॥
शंखपद्मौ ततः पश्चात्वान्निधीनष्टौ क्रमाद्यजेत् । तद्वर्हिलोकपालांश्च वज्राद्यानपि पूजयेत् ॥२०३॥
एवं सप्तावृतितवृतं कृष्णमभ्यर्च्य चादरात् । प्रीणयेद्दधिखंडाज्यमिश्रेण तु पयोऽधसा ॥२०४॥
दिव्योपचारं दत्त्वाथ स्तुत्त्वा नत्वा च केशवम् । उद्वासयेत्स्वहृदये परिवारगणैः सह ॥२०५॥
न्यस्यात्मानं समभ्यर्च्य तन्मयो विहरेत्सुधीः । रत्नाभिषेकध्यानेज्या विंशत्यर्णाश्रितेरिता ॥२०६॥
बाहर भूबिम्ब लिखे। फिर दिशा-विदिशाओं में श्री, माया आदि लिखकर भूग्रह तथा अष्टवज्रविभूषित चतुरस्र
लिखे। यह यंत्र सुवर्ण आदि के पट्ट पर लिखना चाहिये। इस यन्त्र को सुसंस्कृत करके जो धारण करता है,
वह देवताओं से भी पूजित होता है। "वामदेव पुष्पबाणौ विद्महे धीमहि तन्नोऽनंगः प्रचोदयात्" यह काम गायत्री
है ॥१८६-१८६॥ कृष्णमंत्रों के जप करने से पहिले इसका जप करना चाहिये। यह मनुष्यों को आनन्द देनेवाली
है। "हृदयम्.....युगं शिरः" यह काममन्त्र है, जिसमें चालीस अक्षर होते हैं। जप के आदि में इस स्मर-
बीजमन्त्र को जपने से तीनों लोक वशीभूत होते हैं।
पूर्वोक्त रीति से पीठ की अर्चना कर उस पर मूलमंत्र से मूर्ति की स्थापना करके उसमें कृष्ण का आवा-
हन करे और उसमें पूर्णता की भावना से पूजा करे। आसन से लेकर आभूषण तक भगवान् को अर्पण करके फिर
न्यासक्रम से आराधना करे। सृष्टि, स्थिति, षडंग किरीट, दोनों कुण्डल, शंख, चक्र, गदा, पद्म, माला, श्रीवत्स
तथा कौस्तुभ की गंध पुष्पों से पूजा कर श्रेष्ठ वैष्णव मूलमंत्र द्वारा छह कोणों में छह अंगों का और पूर्वादि दलों
में क्रमशः वासुदेव आदि तथा कोणों में शान्ति आदि का क्रमशः पूजन करे। तत्पश्चात् श्रेष्ठ साधक दलों के
अग्रभाग में आठ राजमहिषियों की अर्चना कर सोलह हजार कृष्ण-प्रियाओं का एक ही साथ पूजन करे ॥१९४-
२०१३॥ तदनन्तर इन्द्र, नील, मुकुन्द, कराल, आनन्द, कच्छप, शंख तथा पद्म इन अष्ट निधियों का क्रमशः
पूजन कर लोकपालों तथा उनके अस्त्रों की भी पूजा करे। इस प्रकार सात बार आदर पूर्वक कृष्ण की आरा-
धना कर उन्हें दही, मिश्री, घी, दूध, अन्न तथा दिव्य उपहार समर्पण कर स्तुति एवम् नमस्कार करे। पुनः अपने
हृदय में सपरिवार कृष्ण का ध्यान कर भगवत्स्वरूप आत्मा का पूजन करके विद्वान् पुरुष तन्मय होकर विचरे ।
उनका रत्नाभिषेक, ध्यान, पूजन आदि बीस अक्षरों वाले मंत्र के अधीन है-ऐसा कहा गया है ॥२०२-२०६॥
७२४ नारदीयपुराणम्
एवं यो भजते मन्त्रं स समृद्धेः पदं भवेत् । जपहोमार्चनध्यानैयों मनुं प्रजपेदमुम् ॥२०७॥
तद्देश्म पूर्यते रत्नैः स्वर्णधान्यैरनारतम् । पृथ्वी पृथ्वी करे तस्य सर्वसस्यसमाकुला ॥२०८॥
पुत्रैर्मित्रैः सुसंपन्नः प्रयात्यंते परां गतिम् । वह्नावभ्यर्च्य गोविन्दं शुक्लपुष्पैः सतंडुलैः ॥२०६॥
आज्याक्तै रयुतं हुत्वा भस्म तन्मूर्ध्नि धारयेत् । तस्यान्नादिसमृद्धिः स्यात्तद्वशं सर्वयोषितः ॥२१०॥
रक्तांभोजैस्त्रिमध्वक्तैर्हुनेल्लक्षं समाहितः । श्रिया तस्यैद्रमैश्वर्यं तृणलेशायते ध्रुवम् ॥२११॥
त्रिमध्वक्तैः सितैः पुष्पैराष्टोत्तरसहस्रकम् । या हुनेत्प्रत्यहं मासात्पुरोधा नृपतेर्भवेत् ॥२१२॥
एवमादिप्रयोगांश्च साधयेन्मनुनामुना । मन्त्रराजमथो वक्ष्ये दशार्णं सर्वसिद्धिदम् ॥२१३॥
स्मृतिः सद्यान्विता साक्षिलोहितो जनवल्लभा । पवनोऽग्निप्रियांतोऽयं दशार्णो मन्त्र ईरितः ॥२१४॥
नारदोऽस्य मुनिश्च्छंदो विराट् कृष्णोऽस्य देवता ।
कामो बीजं वह्निजाया शक्तिः प्रोक्ता मनीषिभिः ॥२१५॥
आचक्रं च विचक्रं च सुचक्रं तदनन्तरम् । त्रैलोक्यरक्षणं चक्रंसुरांतकचक्रकम् २१६॥
एतैरैंङद्वयांतैश्च चक्रैः पंचांगकं मनोः । ततस्तारपुटं मन्त्रं व्याप्य करयोस्त्रिशः ॥२१७॥
सेंदून्हृदंतान्मंत्रवर्णान्प्रणवांतरितान्यसेत् । दक्षांगुष्ठाच्च वामांगुष्ठांतमंगुलिपर्वसु ॥२१८॥
सृष्टिन्यासोऽयमुदितः स्थितिन्यासोऽधुनोच्यते । न्यसेद्दामकनिष्ठानिकनिष्ठांतं स्थितौ सुधीः ॥२१६॥
वामांगुष्ठान्न्यसेद्दक्षांगुष्ठांतं संहृतौ तथा । संहृतिर्दोषसंघातहारिणी परिकीर्तिता ॥२२०॥
जो विद्वान् उक्त प्रकार से कृष्णमन्त्र को उपासना करते हैं, वे समृद्धिशाली होते हैं। जो मनुष्य जप,
होम, अर्चन तथा ध्यान पुरस्सर उक्त मन्त्र का जप करता है, उसका घर सतत धन-धान्य तथा स्वर्ण से परिपूर्ण
रहता है। उसके खेतों में सब प्रकार के अन्न उपजते हैं। वह पुत्र-मित्रों से सुसम्पन्न होकर अन्त में उत्तम गति
को प्राप्त करता है। जो गोविन्द की अर्चना कर तन्दुल, घी तथा श्वेत पुष्पों से अग्नि में हवन करता है, उसे
प्रचुर अन्न आदि तथा रमणियाँ प्राप्त होती हैं। जो त्रिमधुयुक्त रक्त कमलों से एक लाख हवन करता है
उसके ऐश्वर्य के सामने इन्द्र का भी ऐश्वर्य नगण्य-सा हो जाता है, जो एक मास तक प्रत्येक दिन त्रिमधुयुक्त
श्वेत पुष्पों से एक सौ आठ बार हवन करता है, उसे राजपुरोहित का पद प्राप्त होता है। इस प्रकार अनेक
प्रयोग उक्त मंत्र से सिद्ध किये जा सकते हैं।
अब मैं दस अक्षरोंवाले सर्वसिद्धिदायक मंत्रराज को बतलाता हूँ ॥२०७-२१३॥ स्मृति (ग्) यह सद्य
(ओ) से युक्त हो और लोहित (प्) वामनेत्र (ई) से संलग्न हो। इसके बाद 'जनवल्लभा' ये अक्षर समुदाय हों
तत्पश्चात् पवन (य) हो और अन्त में अग्निप्रिया (स्वाहा) हों तो यह (गोपीजनवल्लभाम स्वाहा) दशाक्षर मंत्र है।
इसके मुनि नारद, छंद विराट्, देवता कृष्ण, बीज क्लीं और स्वाहा शक्ति है। आचक्र, विचक्र, सुचक्र, त्रैलोक्यरक्षण
चक्र और सुरांतकचक्र ये पाँचों चक्र मन्त्र के अंग कहलाते हैं। इन शब्दों के अन्त में ङे विभक्ति और स्वाहा पद
जोड़ कर इन पंचविधचक्रों द्वारा पंचांगन्यास करे। तदनन्तर प्रणवसंपुटित मन्त्र पढ़कर दोनों हाथों में तीन बार
व्यापक न्यास तत्पश्चात् मन्त्र के प्रत्येक अक्षर को अनुस्वारयुक्त करके उनके आदि में प्रणव और अन्त में नमः
जोड़कर उनका दाहिने हाथ के अंगूठे से लेकर बाँयें हाथ के अंगूठे तक के अंगुलिपर्वों में भी न्यास करे। इसका
नाम सृष्टिन्यास है। अब स्थितिन्यास कहा जाता है ॥२१४-२१८॥
वाम हस्त की कनिष्ठा से लेकर दक्षिण हस्त की कनिष्ठा तक पूर्वोक्त रूप से मंत्राक्षरों का न्यास
अशीतितमोऽध्यायः ७२५
विद्याप्रदश्च सृष्ट्यंतो वर्णिनां शुद्धचेतसाम् । स्थित्यंतः स्याद्गृहस्थानामेवं काम्यादिरूपतः ॥२२१॥
संहारान्तो मुनींद्राणां विरक्तानां च सर्वशः । पुनः स्थितिक्रमेणार्णान्मनोरंगुलिषु न्यसेत् ॥२२२॥
पुनश्चक्रैश्च पूर्वोक्तैः पंचांगं करयोर्न्यसेत् । ततो मूलेन पुटितान्मातृकार्णान्सबिंदुकान् ॥२२३॥
विन्यसेन्मातृकान्यासस्थानेषु प्रणतः सुधीः । ततस्तारपुटं मूलं व्यापकत्वेन विन्यसेत् ॥२२४॥
संहारसृष्टिभेदेन दशत्तत्वानि विन्यसेत् । नमोंतमूलमंत्राणंपदायाम्यानि चात्मने ॥२२५॥
मत्यंतानि च तत्त्वानि पृथिव्याद्यानि च क्रमात् । पृथ्वी जलं तथा वह्निर्वायुराकाशमेव च ॥२२६॥
अहंकारो महत्तत्त्वं प्रकृतिं पुरुषं परम् । प्रविन्स्येन्मस्तके च नेत्रयोः श्रोत्रयोर्नसोः ॥२२७॥
वदने हृदये नाभौ लिंगे जान्वोश्च पादयोः । प्रणवांतरितान्वर्णान्हृदंतान्विन्यसेन्मतोः ॥२२८॥
सृष्टिन्यासोऽयमाख्यातः स्थितिन्यासं शृणु द्विज । हृदि नाभौ ध्वजे जान्वोः पाद्योर्मस्तके पुनः ॥२२८ 1/2॥
नेत्रयोः कर्णयोर्घ्राणे वदने विन्यसेत्क्रमात् । पदोर्जान्वोलिंगदेशे नाभौ हृदि मुखे नसोः ॥२३०॥
कर्णयोर्नेत्रयोर्मूर्ध्नि संहाराख्योऽयमीरितः । सृष्ट्यंतो वर्णिनां न्यासः स्थित्यंतो गृहमेधिनाम् ॥२३१॥
यतेर्वैराग्ययुक्तस्य संहारान्तः प्रकीर्तितः । चतुर्द्धा वर्णिनां चैव गृहस्थानां च पंचधाः ॥२३२॥
यतीनां च त्रिधा न्यासः प्रोक्तोऽयं क्रमशः शुभः । केचिद्विरक्ते गृहगे संहारान्तं विदुबुधाः ॥२३३॥
विभूतिपंजरं न्यासं कुर्यादिष्टप्तये ततः । मनोर्दशावृत्तिमयं कृष्णसांनिध्यकारकम् ॥२३४॥
आधारे च ध्वजे नाभौ हृदि कंठे मुखे शये । ऊर्ध्वांच कंधरायां च नाभौ कुक्षौ तथा हृदि ॥२३५॥
करे। संहारन्यास में वामांगुष्ठ से लेकर दक्षिणांगुष्ठ तक उक्त मन्त्राक्षरों का न्यास करे। क्योंकि संहारन्यास
दोषसमूह का नाश करने वाला है। शुद्ध चित्त वाले संन्यासियों के लिये उक्त न्यासद्वय के साथ सृष्टि
न्यास विद्या को देने वाला है। अन्त में किया जाने वाला स्थितिन्यास गृहस्थों की कामनाओं को सफल करता है।
अन्त में किया जाने वाला संहारन्यास मुनीन्द्रों और विरक्तों के लिये लाभदायक है। तदनन्तर साधक
पुनः स्थितिन्यासक्रम से मंत्राक्षरों को अंगुलियों में न्यस्त करे। तदनन्तर पूर्वोक्त चक्रों से हाथों में पंचाङ्ग-
न्यास करे। पश्चात् मूलमन्त्र से संपुटित तथा सबिंदुक मातृकाक्षरों का मातृकान्यासस्थानों में प्रणामपूर्वक न्यास
करे। पश्चात् प्रणव संपुटित मूलमन्त्र का उच्चारण करके व्यापकन्यास करे। संहार और सृष्टि के भेद से दस
तत्त्वों का विन्यास करे। मस्तक, नेत्रों, कर्णों, नासिकापुटों, मुख, हृदय, नाभि, लिंग, जानुओं तथा चरणों में
पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु, आकाश, अहंकार, महत्तत्त्व, प्रकृति तथा पुरुष का न्यास कर मन्त्र के हृदंत अक्षरों को
प्रणवान्तरित करके न्यस्त करना चाहिये। यह सृष्टिन्यास कहलाता है। अब स्थितिन्यास सुनो ॥२१९-२२८ 1/2॥
हृदय, नाभि, लिंग, जानुओं, चरणों, मस्तक, नेत्रों, कर्णों, नासिका तथा मुख में क्रमशः न्यास करने का नाम
सृष्टि न्यास है। चरणों, जानुओं, लिंग, नाभि, हृदय, मुख, नासिका, कर्णों, नेत्रों तथा मस्तक में न्यास करने
का नाम संहारन्यास है। संन्यासियों के लिये सृष्टिन्यास, गृहस्थों के लिये स्थितिन्यास और वैराग्ययुक्त यतियों
के लिये संहारन्यास करना चाहिये। सन्यासियों को चार प्रकार के, गृहस्थों को पांच प्रकार के और यतियों को
तीन प्रकार के न्यास क्रमशः करने चाहिये। कोई कहते हैं कि जो घर छोड़कर विरक्त हो गये हैं, उनके लिये
संहारन्यास ही ठीक है। ॥२२९-२३३॥ इष्ट प्राप्ति के लिये विभूतिपंजरन्यास करना चाहिये। यह न्यास मन
को सुस्थिर करने वाला तथा कृष्णसान्निध्यमोक्ष को देने वाला है। मूलाधार, लिंग, नाभि, हृदय, कंठ, मुख,
स्कंधों, ऊरुओं, नाभि, कुक्षि, स्तनों, पार्श्वों, श्रोणियों, मस्तक, नेत्रों, कर्णों, नासापुटों, कपोलों, दक्षिण
भुजा के मूल तथा अंगुलियों में न्यास कर शिर, पूर्व आदि दिशाओं, अपनी कलाओं, भुजाओं, सबन्धियों, शिर,
७२६ नारदीयपुराणम्
स्तनयोः पार्श्वयोः श्रोण्योर्मस्तके वदने तथा । नेत्रयोः कर्णयोर्नासापुटयोश्च कपोलयोः ॥२३६॥
एवं दक्षिणदोर्मूलसंध्यग्रेष्वंगुलीषु च । ततः शिरसि तत्पूर्वाद्याशासु स्वकलासु च ॥२३७॥
दोष्णोः सक्थ्नोः शिरोश्वास्यकंठहृज्जठरेषु च । मूलाधारे लिंगदेशे जानुनोः पादयोस्तथा ॥२३८॥
श्रोत्रगंडांसवक्षोजपार्श्वलिंगेषु विन्यसेत् । ऊर्वोर्जान्वोर्जंघयोश्च पादयोर्विन्यसेत्क्रमात् ॥२३९॥
विभूतिपंजराख्योऽयं न्यासः सर्वार्थसिद्धिदः । अनेन न्यासवर्येण साक्षात्कृष्णतनुर्भवेत् ॥२४०॥
मूर्तिपंजरनामानं न्यासं पूर्वोदितं न्यसेत् । ततो दशांगपंचांगौ न्यासवर्यौ न्यसे क्रमात् ॥२४१॥
हृदि मूर्ध्नि शिखायां च सर्वांगे दिक्षु पार्श्वयोः । कट्यां पृष्ठे तथा मूर्ध्नि विन्यसेद्वैष्णवोत्तमः ॥२४२॥
पंचांगानि न्यसेद्भूयश्चक्रैः प्राग्वत्समाहितः । अन्योऽप्यष्टादशार्णोक्तः कर्तव्यो न्याससंचयः ॥२४३॥
ततः किरीटमंत्रेण व्यापकं रचयेत्सुधीः । वेणुबिल्वादिमुद्रांश्च दर्शयेत्साधकोत्तमः ॥२४४॥
सुदर्शनस्य मंत्रेण कुर्याद्दिग्बंधनं ततः । अनंगुष्ठाश्च ऋजवः करशाखा भवंति चेत् ॥२४५॥
हृन्मुद्रेयं समाख्याता शिरोमुद्रा तथा भवेत् । अधोगुष्ठा तु या मुष्टिः शिखामुद्रेयमीरिता ।
प्रसारितांगुल्योवर्ममुद्रेयमीरिता ॥२४६॥
नाराचमुष्ट्या धृतबाहुयुग्मकांगुष्ठतर्जन्यदितो ध्वनिस्तु ।
विश्वग्विमुक्ता कथितास्त्रमुद्रा यत्राक्षिणी तर्जनीमध्यमे च ॥२४७॥
ओष्ठे वामकरांगुष्ठो लग्नस्तस्य कनिष्ठिका । दक्षिणांगुष्ठसंसक्ता तत्कनिष्ठा प्रसारिता ॥२४८॥
नेत्रों, मुख, कंठ, हृदय, उदर, मूलाधार, लिंग, जानुओं, चरणों, कर्णों, कपोलों, स्तनों, पाश्वों तथा लिंग में न्यास
करे । पुनः ऊरुओं, जानुओं, जंघाओं तथा चरणों में क्रमशः न्यास करना चाहिये । इसीका नाम विभूतिपंजर-
न्यास है । यह सकल कामनाओं को पूर्ण करता है । इस उत्तम न्यास के करने से साक्षात् कृष्ण-शरीर की प्राप्ति
होती है । इसके कर लेने के बाद न्यासों में श्रेष्ठ दशांग तथा पंचांग-न्यास क्रमशः करना चाहिए ॥२३४-२४१॥
उत्तम विष्णुभक्त हृदय, मस्तक, शिखा, समस्त अङ्गों, दिशाओं, पाश्वों, कटि, पृष्ठ तथा शिखर—
इन अङ्गों में एक-एक अक्षर का न्यास करे । फिर एकाग्रचित्त हो पूर्वोक्त चक्रों द्वारा पुनः पूर्ववत् पंचांगन्यास करे ।
अष्टादशाक्षर मन्त्र के अनुसार अन्य-अन्य न्यास भी करने चाहिये । तदनन्तर किरीटमन्त्र से व्यापकन्यास कर
वेणु, बिल्व आदि मुद्रायें दिखलाये । पश्चात् सुदर्शनमन्त्र से दिग्बन्ध करे । अंगुष्ठों को छोड़कर अन्य अंगुलियों को
सीधी करने का नाम हृदयमुद्रा है । शिरोमुद्रा भी इसी तरह बनाई जाती है । अंगुष्ठ को नीचे करके मुट्ठी
बाँधने का नाम शिखामुद्रा है । करांगुलियों को फैला देने का नाम वर्ममुद्रा है ॥२४२-२४६॥
बाण की मुट्ठी तरह उठी हुई दोनों भुजाओं के अंगुष्ठ ओर तर्जनी से चुटकी बजाकर उसकी ध्वनि को
सब ओर फैलाना, इसे अस्त्र मुद्रा कहा गया है । तर्जनी और मध्यमा-ये दो अंगुलियां नेत्र मुद्रा हैं । जहाँ तीन
नेत्र का न्यास करना हो, वहाँ तर्जनी, मध्यमा के साथ अनामिका अंगुलि को भी लेकर नेत्रत्रय का प्रदर्शन
कराया जाता है । बाँयें हाथ का अंगूठा ओष्ठ में लगा हो । उसकी कनिष्ठिका अंगुलि दाहिने हाथ के अंगूठे से सटी
हो, दाहिने हाथ की कनिष्ठिका फैली हुई हो और उसकी तर्जनी, मध्यमा और अनामिका अंगुलियां कुछ सिकोड़-
कर हिलाई जाती हों तो यह वेणुमुद्रा कही गई है । यह अत्यन्त गुप्त होने के साथ ही भगवान् श्रीकृष्ण को
बहुत प्रिय है । वनमाला, श्रीवत्स और कौस्तुभ नामक मुद्रायें प्रसिद्ध हैं । अतः उनका वर्णन नहीं किया
जाता है। बाँये अंगूठे को ऊर्ध्वमुख खड़ा करके उसे दाहिने हाथ के अंगूठे से बाँध ले और उसके अग्रभाग को दाहिने
अशीतितमोऽध्यायः ७२७
तर्जनी मध्यमानामा किञ्चित्संकुच्य चालिता। वेणुमुद्रेयमुदिता सुगुप्ता प्रेयसी हरेः ।
नोच्यंते तत्र सिद्धत्वान्मालाश्रीवत्सकौस्तुभाः ॥२४६॥
वामांगुष्ठं सनुद्रं तमपरकरांगुष्ठकेनाथ बद्ध्वा
संपीड्याग्रं च दक्षांगुलिभिरपि च तां वामहस्तांगुलीभिः ।
गाढं बद्ध्वा स्वकीये हृदयसरसिजे स्थापयेत्कामबीजं
प्रोच्चार्यैषा तु गोप्या सकलसुखकरी बिल्वमुद्रा मुनींद्रैः ॥२५०॥
कायेन मनसा वाचा यत्पापं समुपाजितम् । मुद्रया ज्ञानमात्रेण सर्वं नाशमुपैष्यति ॥२५१॥
ध्यानं जपस्त्रिकालाद्यौ कार्या पूर्वोदिता मनोः । सर्वेष्वेकः क्रमः प्रोक्तो दशाष्टाष्टादशार्णयोः ॥२५२॥
एवं सिद्धे मनौ मंत्री प्रयोगान्कर्तुमर्हति । उद्द्बाहुदोर्दंडधृतगोवर्द्धनाचलम् ॥२५३॥
अन्यहस्तांगुलीव्यक्तस्वरवं शार्पिताननम् । ध्यायन्कृष्णं जपेन्मंत्रं व्रजेच्छत्रं विना सुधीः ॥२५४॥
वर्षवाताशनिभ्योऽपि भयं तस्य न जायते । मोघमेघौघवाताद्गतेन्द्रं तं स्मरन्हुनेत् ॥२५५॥
लोणेरयुतसंख्यैः स्यादानावृष्टिर्न संशयः । क्रीडंतमर्कजातीरे मज्जनस्नापनादिभिः ॥२५६॥
तच्छीकरजलासारैः सिच्यमानं प्रियाजनैः । ध्यात्वायुतं पयः सिक्तैहुनेद्वा नीरतर्पणैः ॥२५७॥
वृष्टिर्भवत्यकालेऽपि महती नात्र संशयः । सबाहमोहैरातंस्य विस्फोटकज्वरादिभिः ॥२५८॥
अमुमेव स्मरन्मूर्ध्नि जपेच्छांतिर्भवेत्क्षणात् । अथवा गरुडारूढं प्रद्युम्नबलसंयुतम् ॥२५६॥
निजज्वरनिष्पिष्टज्वराभिष्टुतमच्युतम् । ध्यात्वा मूर्ध्नि जपेन्मंत्रं ज्वरमुक्तो भवेज्ज्वरी ॥२६०॥
हाथ की अंगुलियों से दबाकर फिर उन अंगुलियों बाँये हाथ की अंगुलियों से खूब कस कर बांध ले और उसे अपने
हृदय कमल में स्थापित करे। साथ ही कामबीज (क्लीं) का उच्चारण करता रहे। इसको मुनीन्द्रों ने बिल्वमुद्रा कहा है
॥२४७-२५०॥ यह सब को सुख देनेवाली तथा गोपनीय है। शरीर, मन, एवम् वाणी से जो पाप किया गया हो, वह
सब इस मुद्रा के ज्ञानमात्र से नष्ट हो जायगा। ध्यान, जप तथा त्रिकालपूजन ये तीनों चीजें मंत्राराधन में की जाती
हैं। मन्त्र चाहे दशाक्षर हो या अष्टादशाक्षर, सब में एक ही क्रम चलता है। मंत्र को भलीभांति सिद्ध कर लेने
पर साधक उसका प्रयोग करे । जो श्रीकृष्ण अपनी भुजारूपी दंड पर गोवर्धन पर्वत को धारण कर एक हाथ की
अंगुलियों से स्वर मिलाते हुए वंशी को मुंह से बजाते रहे, उनका ध्यान कर पूर्वोक्त मन्त्र का जप करे । जो
विद्वान् ऐसा करते हैं, वे यदि बिना छत्र के भी चलें तो वर्षा, वायु एवम् वज्र उनका कुछ नहीं बिगाड़ सकते ।
मेघों एवम् पवनों समेत इन्द्र के कर्तव्य को व्यर्थ कर देने वाले कृष्ण ध्यान कर यदि दश हजार कोणों (क्षुद्र आंवला
या लोनी साग ) से हवन किया जाय तो निःसन्देह वर्षा नहीं होगी ॥२५१-२५५३॥ यमुना तट पर स्नान,
मज्जन आदि विविध प्रकार के क्रीडा करते हुए और प्रियाओं द्वारा जल के फुहारों से सिक्त किये जानेवाले कृष्ण
का ध्यान कर दश हजार जलसिक्त लोणों से हवन या जलतर्पण किया जाय तो असमय में भी वृष्टि हो जायगी ।
इसमें संशय नहीं। जिसके शरीर में जलन होती है या जो विस्फोट क ज्वर आदि से पीडित है, उसके मस्तक पर
यदि उक्त मन्त्र का जप कर दिया जाय तो तत्क्षण शांति हो जायगी ॥२५६-२५८३॥ कृष्ण गरुड पर आरूढ हैं,
प्रद्युम्न तथा बलराम उनके साथ हैं, उनके ज्वर द्वारा पीड़ित हो (शंकर का) ज्वर उनकी स्तुति कर रहे हैं-
ऐसा ध्यान कर ज्वरी के मस्तक पर उक्त मन्त्र का जप करने से ज्वर उतर जाता है। ऐसे ही रूप का ध्यान
७२८ नारदीयपुराणम्
ध्यात्वैवमग्नावभ्यर्च्य यथोक्तैश्चतुरंगुलैः । जुहुयादमृताखण्डैरयुतं ज्वरशांतये ॥२५९॥
शिलीमुखविनिर्मिन्नभीष्मतापहरं हरिम् । ध्यात्वा जपेत्स्पृशन्नार्तं पाणिभ्यां ज्वरशांतये ॥२६०॥
सांदीपनाय दत्तं पुत्रं ध्यात्वायुतं हुनेत् । यथोक्तैरमृताखंडैरपमृत्युर्निवृत्तये ॥२६१॥
सपार्थं मृतपुत्रायार्पयंतं च द्विजन्मने । सुतं ध्यात्वा जपेल्लक्षं पुत्रपौत्रादिवृद्धये ॥२६४॥
पुत्रजीवफलैर्हुत्वायुतं मधुरसप्लुतैः । तत्काष्ठैरेधिते वह्नौ सुतान्दीर्घायुषो लभेत् ॥२६५॥
क्षीरद्रुक्वथसंपूर्णमभ्यर्च्य कलशं निशि । प्रातर्जप्त्वायुतं नारीमभिषिंचेद्द्विषड्दिनम् ॥२६६॥
एवं कृते तु वंध्यापि लभेत्पुत्रांश्चिरायुषः । प्रातर्वर्चायमाश्र्वत्थदलसंंपुटकं जलम् ॥२६७॥
अष्टोत्तरशतं जप्तं मासं पुत्रार्थिनी पिबेत् । सर्वलक्षणसंपन्नं वंध्यापि लभते सुतम् ॥२६८॥
जित्वा कृत्यां काशिराजप्रेषितां च निजारिणः । तेजसा तस्य नगरं दहंतं भावयन्हरिम् ॥२६९॥
हुनेत्सप्तदिनं मंत्री सुस्नेहाक्तैश्च सर्षपैः । कृत्याकर्तारमेवास्मै कुपिता नाशयेद्ध्रुवम् ॥२७०॥
बदरीद्रुमसंकीर्णे स्थितं दिव्याश्रमे शुभे । स्पृशंतं करपद्माभ्यां घंटाकर्णकलेवरम् ॥२७१॥
ध्यात्वैवं जुहुयाल्लक्षं तिलैस्त्रिमधुराप्लुतैः । महापापयुतोऽप्येवं पूतो भवति तत्क्षणात् ॥२७२॥
द्यूतासक्तौ रुक्मबलौ द्वेषयंतं हरिं स्मरन् । जुहुयाद्विष्टयोर्द्विष्टय गुलिका गोमयोद्भवाः ॥२७३॥
नित्यं सहस्रं सप्ताहान्मिथ्यो विद्वेषयेदरीन् । वर्षंतं गरुडारूढं ज्वलदग्निमुखैः शरैः ॥२७४॥
धावंतं रिपुसंघातमनुधावतमच्युतम् । ध्यात्वा सप्तसहस्रं तु जपेन्मंत्रमनन्यधीः ॥२७५॥
कर कृष्ण पूजन करके अग्नि में चार अंगुलि प्रमाण बहेड़े की लकड़ियों से हवन करने से ज्वर शांत हो जाता है,
बाणों से विद्ध शरीरवाले भीष्म के ताप को हरनेवाले कृष्ण का ध्यान कर मन्त्र जप करते हुए हाथो से ज्वरी का
स्पर्श करने से ज्वर छूट जाता है ॥२५९-२६२॥ सांदीपन मुनि को पुत्र देते हुए हरि का ध्यान कर बहेड़े की
समिधाओं से दश हजार होमने से अपमृत्यु का निवारण होता है, मृतपुत्र ब्राह्मण को पुत्र समर्पित करते हुए
अर्जुन सहित कृष्ण का ध्यान कर एक लाख मंत्र का जप करने से पुत्र-पौत्र आदि की वृद्धि होती है । मधु-
मिश्रित पुत्रजीव (जियापुता) के फलों से उसी की समिधा से प्रज्वलित अग्नि में दश हजार होम करने से दीर्घायु
पुत्र उत्पन्न होते हैं । रात्रि में गूलर के काढ़े से कलश को भर कर रख छोड़े । प्रातःकाल उसे दस हजार मन्त्र से
अभिमन्त्रित कर स्त्री को सींचे बारह दिनों तक ऐसा करने से वंध्या भी दीर्घायु पुत्रों को उत्पन्न करती है । जो
नारी पुत्र चाहती हो, वह प्रातःकाल मौन होकर पीपल के पत्तों के बने दोने में जल भर कर एक सौ आठ बार
कृष्णमन्त्र से अभिमंत्रित करके पान करे । ऐसा करने से वंध्या के भी सर्वलक्षण संपन्न पुत्र उत्पन्न होता है २६३-
२६८॥ काशिराज (पौंडू) द्वारा भेजी हुई कृत्या को जीत कर अपने तेज से शत्रु की नगरी को जलाने वाले
हरि का ध्यान कर सात दिन स्नेहाक्त सरसों से हवन करने से कृत्या कुपित हो कर प्रयोग करने वाले को ही
अर्थात् शत्रु को निश्चय मार देती है । बेर के वृक्षों से व्याप्त पवित्र दिव्याश्रम में अपने करकमलों से घंटाकर्ण के
शरीर का स्पर्श करते हुए हरि का ध्यान कर त्रिमधुयुक्त तिलों से एक लाख हवन करने वाला महापापी भी
तत्क्षण पवित्र हो जाता है । द्यूतक्रीड़ा करने में आसक्त रुक्मी तथा बल से द्वेष करते हुए हरि का स्मरण कर
गोबर की बनी गुलियों से नित्य एक हजार हवन करना चाहिये । सात दिनों तक ऐसा करने से शत्रुओं में पर-
स्पर फूट हो जाती है ॥२६९-२७३॥ गरुड़ पर चढ़ कर आग की ज्वाला उगलनेवाले बाणों की वर्षा करते हुए तथा
भागने वाले शत्रुओं का पीछा करते हुए हरि का ध्यान कर उन्हीं में चित्त को लगाते हुए सात हजार मंत्र का
अशीतितमोऽध्यायः ७२६
उच्चाटनं भवत्येव शत्रूणां सप्तभिर्दिनैः । ध्यायन्नुत्क्षिप्तवत्सं तु कपित्थफलहारिणम् ॥२७६॥
प्रजपेदयुतं शत्रुमुच्चाटयति तत्क्षणात् । आत्मानं कंसमथनं ध्यायन्मंचान्निपातितम् ॥२७७॥
कंसात्मानं व्यकर्षन्तं गतासुं तं जपेन्मनुम । रिपुजन्मर्क्षवृक्षोत्थसमिद्भिर्मरयुतं निशि ॥२७८॥
जुहुयादेवमुग्रोऽपि सपत्नो निधनं व्रजेत् । अथवा निबंतैलाक्तैहुनेवेधोभिरक्षजैः ॥२७९॥
अयुतं नियतो रात्रौ मारयेदचिराद्वरीन् । निशाविष्टदलव्योषकार्पासास्थिकरैर्निशि ॥२८०॥
हुनेवेरंडतैलाक्तैः श्मशाने रिपुशांतये । न शस्तं मारणं कर्म कुर्याच्चेदेयुतं हुनेत् ॥२८१॥
पायसैर्वा हुनेत्तावच्छांतये शांतमानसः । पारिजातहरं कृष्णं ध्यायन् लक्षं जपेन्मनुम् ॥२८२॥
सर्वत्रैव जयस्तस्य न कदापि पराजयः । व्याख्यामुद्राकरं कृष्णं रथस्थं भावयज्जपेत् ॥२८३॥
पार्थे दिशंतं गीतार्थं धर्मवृद्धं सुमानवः । पालाशपुष्पमध्वक्तैलक्षं विद्याप्तये हुनेत् ॥२८४॥
राष्ट्रपूर्ग्रामवस्तूनां शरीरस्यापि रक्षणे । विश्वरूपधरं प्रोद्यद्भानुकोटिसमप्रभम् ॥२८५॥
अग्नीषोमात्मकं कृष्णं द्रुतचामीकरप्रभम् । अर्कानिद्योतितास्यांघ्रिपंकजं दिव्यभूषणम् ॥२८६॥
नानायुधधरं प्राप्तं विश्वाकाशावकाशकम् । ध्यात्वा लक्षं जपेन्मन्त्रं रक्षणाय समाहितः ॥२८७॥
रक्तैर्वन्यप्रसूनैर्यो दिनादौ पूजयेद्धरिम् । दिनमध्योक्तविधिना जपेदष्टोत्तरं शतम् ॥२८८॥
सहस्रमंडलामन्त्री वशयेन्मुखरान्द्विजान् । जातिपुष्पैः क्षत्रियांश्च गोपवेषधरं स्मरन् ॥२८९॥
जप करना चाहिये। ऐसा करने से सात ही दिनों के भीतर शत्रुओं का उच्चाटन हो जाता है। कपित्थ (कैथ)
का फल तोड़नेवाले तथा वत्सासुर को ऊपर उठा कर फेंकनेवाले कृष्ण का ध्यान कर दस हजार मन्त्र जपते से
तत्क्षण शत्रु का उच्चाटन हो जाता है। मंच पर से कंस को गिरा कर घसीटते-घसीटते निष्प्राण कर देने वाले
हरि का ध्यान कर शत्रु के जन्मक्षत्र में लगाये गये वृक्ष की समिधाओं से रात्रि में दस हजार हवन करने से
भयंकर शत्रु भी मृत्यु को प्राप्त हो जाता है। अथवा नीम का तेल मिलाकर बहेड़े की लकड़ी से रात्रि में नियम
पूर्वक दश हजार होम करने से शत्रु शीघ्र यमलोक को चला जाता है ॥२७४-२८०॥ यदि शत्रु को मारना हो
तो रात्रि में श्मशान जाकर दक्षिणदिशावस्थित अग्नि में रेंडी के तेल में भिगोई हुई कपास की लकड़ियों से दश
सहस्र हवन करे। यदि मारण कर्म को दोषावह समझे तो दोषशान्ति के लिये स्वस्थचित्त हो कर खीर से दश
हजार हवन कर देना चाहिये। जो व्यक्ति कल्पवृक्ष हरण करने वाले कृष्ण का ध्यान तथा मंत्र जप करता है
उसका कभी पराजय नहीं होता ॥२८१-२८२॥ व्याख्या मुद्रा लगाये रथ पर आसीन होकर धर्मवृद्धार्थ अर्जुन
को गीता का उपदेश करते हुए कृष्ण का ध्यान कर मधुयुक्त पलाश-कुसुमों से एक लाख हवन करने वाला व्यक्ति
विद्या प्राप्त करता है। राष्ट्र, नगर, ग्राम, वस्तु तथा शरीर की रक्षा चाहने वाला व्यक्ति कृष्ण के इस रूप का
ध्यान करे कि वे विश्व का रूप धारण करने वाले हैं। उदित होते हुए करोड़ों सूर्य के समान उनकी कान्ति है।
अग्नि और सोम उनका रूप है। तपे सोने के सदृश वे चमक रहे हैं। उनके मुख तथा चरणारविन्द भानु तथा
अग्नि के समान प्रकाशमान हैं। वे अनेक अस्त्र-शस्त्रों को धारण किये हुए हैं तथा निखिल ब्रह्माण्ड में व्याप्त
हैं। इस तरह ध्यान कर समाहित चित्त से एक लाख मंत्र जप करे। जो व्यक्ति प्रातःकाल वन्य रक्तपुष्पों से
हरि का पूजन कर मध्याह्न में पूर्वोक्त विधि से एक सौ आठ बार मंत्र का जप करता है, वह सहस्रों वाचाल
द्विजों को वशीभूत कर लेता है। गोपवेशधारी कृष्ण का ध्यान कर जूही के फूलों से होम करने से क्षत्रिय वश्य
६२ ना० पु०
७३० नारदीयपुराणम्
ध्यायन् क्रीडारतं कृष्णं रक्तैरश्वारिपुष्पकैः । वशयेद्वैश्यजातीयान् शूद्रान्नीलोत्पलैः स्मरन् ॥२८०॥
गीतनृत्यरतं श्वेतपुष्पैः साज्यैश्च तंडुलैः । हुत्वान्वहं सप्तदिनं भस्म भाले च मूर्द्धनि ॥२८१॥
धारयन्वशयेत्कांतांसापि तद्वत्पतिं ध्रुवम् । तांबूलं कुसुमं वासोंऽजनं चंदनमेव च ॥२८२॥
सहस्रं मनुना जप्तं दद्याद्यस्मै नराय च । सोऽचिरादेव वशगः सपुत्रपशुबांधवः ॥२८३॥
वृन्दावनस्थितं ध्यायन्बल्लवीसयुतं हरिम् । अपामार्गसमिद्भिस्तु हुत्वा तु वशयेज्जगत् ॥२८४॥
संप्राप्य सद्गुरोर्दीक्षां कृष्णं यो विधिनामुना । अर्चयेद्वैष्णवश्रेष्ठः सोऽष्टसिद्धीश्वरो भवेत् ॥२८५॥
तस्य दर्शनमात्रेण वादिनो निष्प्रभाः स्मृताः । वसेत्सरस्वती वक्त्रे गृहे चापि सभासदः ॥२८६॥
भुक्त्वा नानाविधान्भोगानंते विष्णुपदं व्रजेत् ॥२८७॥
इति श्रीबृहन्नारदीयपुराणे पूर्वभागे तृतीयपादे कृष्णमन्त्रनिरूपणं
नामाशीतितमोऽध्यायः ॥ ८० ॥
होते हैं ॥२८३-२८९॥ क्रीडासक्त कृष्ण का ध्यान कर लाल करवीर के फूलों से हवन करने से वैश्य वश्य
होते हैं। नृत्य-गीत करने में निरत कृष्ण का ध्यान कर नील कमलों से होम करने से शूद्र वश्य होते हैं। श्वेत
पुष्प, घृत तथा तन्दुल से सात दिन हवन कर भस्म को ललाट एवम् मस्तक पर धारण करने से पत्नी वशीभूत
होती है। पत्नी यदि ऐसा करे तो पति उसके वश्य होता है इसमें संशय नहीं। तांबूल, कुसुम, वस्त्र, अंजन
तथा चन्दन को कृष्णमन्त्र से सहस्रबार अभिमन्त्रित कर जिसको दिया जायेगा, वह पुत्र, पशु तथा इष्ट-मित्रों
समेत तुरन्त उस (देने वाले) के वशीभूत हो जायगा ॥२९०-२९३॥
वृन्दावन में गोपियों के साथ अवस्थित हरि का ध्यान कर अपामार्ग (चिचिड़े) से हवन करनेवाला व्यक्ति
तीनों लोक को वश में कर लेता है। जो वैष्णवश्रेष्ठ सद्गुरु से कृष्णमन्त्र की दीक्षा लेकर उस विधि से अर्चना
करता है, वह अष्ट सिद्धियों का ईश्वर होता है। उसके देखते ही वादी निष्प्रभ हो जाता है। सभाभवन में भी
सरस्वती उसके मुख में विराजती है। वह ऐहलोकिक विविध भोगों को भोग कर अन्त में विष्णुलोक को जाता
है ॥२६४-२६७॥
श्री नारदीय पुराण के पूर्वार्ध के तृतीयपाद में कृष्णमंत्रनिरूपण नामक अस्सीवां अध्याय समाप्त ॥८०॥
एकाशीतितमोऽध्यायः
सनत्कुमार उवाच
अथ कृष्णस्य मंत्राणां वक्ष्ये भेदान् मुनीश्वर । यान्समाराध्य मनुजाः साधयंतीष्टमात्मनः ॥१॥
शक्तिश्रीमारापूर्वश्च श्रीशक्तिस्मरपूर्वकः । मारशक्तिरमापूर्वा दशाणर्णा मनवस्त्रयः ॥२॥
मुनिः स्यान्नारदश्छन्दो गायत्री देवता पुनः । कृष्णो गोविंदनामात्र सर्वकामप्रदो नृणाम् ॥३॥
चक्रैः पूर्ववदंगानि त्रयाणामपि कल्पयेत् । ततः किरीटमनुना व्यापकं हि समाचरेत् ॥४॥
सुदर्शनस्य मनुना कुर्याद्दिग्बंधनं तथा । विंशत्यर्णोक्तवत्कुर्यादाद्ये ध्यानाचनादिकम् ॥५॥
द्वितीये तु दशाणोक्तं ध्यानपूजादिकं चरेत् । तृतीये तु हरि ध्यायेत्समाहितमनाः सुधीः ॥६॥
शंखचक्रधनुर्बाणपाशांकुशधरारुणम् । दोर्भ्यां धृतं धमंतं च वेणुं कृष्णदिवाकरम् ॥७॥
अध्याय ८१
कामना-भेद से कृष्ण-मंत्रों का भेद-निरूपण
श्री सनत्कुमार बोले-मुनिवर्य ! अब मैं कृष्णमंत्रों का भेद बतलाऊँगा, जिनकी आराधना करने से
मनुष्यों की इष्टसिद्धि होती है। दशाक्षर मंत्र के तीन नूतन भेद हैं- 'ह्रीं श्रीं क्लीं' इन तीन बीजों के साथ
'गोपीजनवल्लभाय स्वाहा' यह प्रथम भेद है। 'श्रीं ह्रीं क्लीं' इस क्रम से बीज जोड़ने पर दूसरा भेद होता है।
'क्लीं ह्रीं श्रीं' इस क्रम से बीज मन्त्र जोड़ने पर तीसरा भेद बनता है। इनके मुनि नारद, छंद गायत्री और देवता
मनुष्यों की समस्त कामनाओं को सफल करनेवाले गोविन्द कृष्ण हैं। तीनों मन्त्रों का चक्रों से पूर्ववत् अंगन्यास
करके किरीट मन्त्र से व्यापक न्यास करे । पश्चात् सुदर्शन मन्त्र से दिग्बन्ध करके पहिले मन्त्र में बीस अक्षरों वाले
मन्त्र की तरह ध्यान, पूजन आदि करे । दूसरे मन्त्र में दशाक्षर मन्त्र की तरह ध्यान, पूजन आदि करे ॥१-५॥
तीसरे मन्त्र में समाहित चित्त से कृष्ण का इस प्रकार ध्यान करे कि वे हाथों में शंख, चक्र, धनुष, बाण, पाश
तथा अंकुश धारण किये हुए हैं। इससे उनका हाथ रक्तवर्ण का मालूम पड़ता है। फिर वे हाथों में वंशी
लेकर बजा रहे हैं। इससे उनका हाथ कृष्ण एवम् श्वेत रंग का भी दिखाई देता है। ऐसा ध्यान कर पांच लाख
मन्त्रों का जप करे और उसका दशांश घी एवम् खीर से हवन करे । मन्त्र सिद्ध हो जाने पर साधक पहिले की
तरह सकाम कर्मों को कर सकता है। "ह्रीं क्लीं कृष्णाय गोविन्दाय स्वाहा" यह बारह अक्षरों का मन्त्र है ।
इसके ब्रह्मा ऋषि, गायत्री छंद और श्रीकृष्ण देवता हैं । पृथक्-पृथक् तीन बीजों तथा तीन, चार एवं दो मन्त्रा-
क्षरों से षडङ्गन्यास करे । बीस अक्षरवाले मन्त्र की भाँति इसके भी ध्यान, होम और पूजन आदि करने चाहिए।
यह मन्त्र संपूर्ण अभीष्ट फलों को देने वाला है। दशाक्षर मन्त्र (गोपीजनवल्लभाय स्वाहा) के आदि में श्रीं ह्रीं
क्लीं तथा अन्त में क्लीं ह्रीं श्रीं जोड़ने से षोडशाक्षर मन्त्र बनता है। इसी प्रकार केवल आदि में ह्रीं श्रीं जोड़ने
से बारह अक्षरों का मन्त्र होता है। पूर्वोक्त चक्रों द्वारा अंगन्यास करे, फिर भगवान् का इस प्रकार ध्यान करे कि
वे अपने वर तथा अभय देने वाले दो हाथों से अपने प्रिय अंगों का स्पर्श कर रहे हैं और पद्म तथा उत्पल के
७३२ नारदीयपुराणम्
एवं ध्यात्वा जपेन्मंत्रान्पञ्चलक्षं पृथक् सुधीः । जुहुयात्तद्दशांशेन पायसेन ससर्पिषा ॥८८॥
एवं सिद्धे मनौ मंत्री कुर्यात्काम्यानि पूर्ववत् । श्रीशक्तिकामः कृष्णाय गोविन्दायाग्निसुन्दरी ॥८९॥
रव्यर्णो ब्रह्मगायत्रीकृष्णा ऋष्यादयोऽस्य तु । बीजं रमान्धिद्युग्मार्णैः षडंगानि प्रकल्पयेत् ॥९०॥
विंशत्यर्णोदितजपध्यानहोमार्चनादिकम् । किं बहुक्तेन मंत्रोऽयं सर्वाभीष्टफलप्रदः ॥९१॥
श्रीशक्तिस्मरपूर्वांगजन्मा शक्तिरमांतकः । दशाक्षरः स एवादौ प्रोक्तः शक्तिरमायुतः ॥९२॥
मन्त्रो षोडशरव्यणों चक्रैरंगानि कल्पयेत् । वरदाभयहस्ताभ्यां श्लिष्टंतं स्वांगके श्रिये ॥९३॥
पद्मोत्पलकरे ताभ्यां श्लिष्टं चक्रद प्रोज्ज्वलम् । ध्यात्वैवं प्रजपेल्लक्षदशकं तद्दशांशतः ॥९४॥
आज्यैर्हुत्वा ततः सिद्धौ भवेतां मन्त्रनायकौ । सर्वकामप्रदौ सर्वसम्पत्सौभाग्यदौ नृणाम् ॥९५॥
अष्टादशार्णः कामांतो मनुः सुतधनप्रदः । नारदोऽस्य मुनिश्चंदो गायत्री देवता मनोः ॥९६॥
कृष्णः कामो बीजमुक्तं शक्तिर्वह्निप्रिया मता । षड्वोर्याढ्येन बीजेन षडंगानि समाचरेत् ॥९७॥
पाणौ पायसपात्रं च दक्षे हैयंगवीनकम् । वामं दधद्दिव्यदिगंबरो गोपीसुतोऽवतु ॥९८॥
ध्यात्वैवं प्रजपेन्मंत्रं द्वात्रिंशल्लक्षमानतः । दशांशं जुहुयादग्नौ सिताढ्येन पयोऽधसा ॥९९॥
पूर्वोक्तवैष्णवे पीठे यजेदष्टादशार्णवत् । पद्मस्थं कृष्णमभ्यर्च्यं तर्पयेत्तन्मुखांबुजे ॥१००॥
क्षीरेण कदलीपक्वैर्दध्ना हैयंगवेन च । पुत्रार्थी तर्पयेदेवं वत्सराल्लभते सुतम् ॥१०१॥
यद्यदिच्छति तत्सर्वं तर्पणादेव सिद्ध्यति । वाक्कामो ङेयुतं कृष्णपदं माया ततः परम् ॥१०२॥
गोविन्दाय रमा पश्चाद्दशाणं च समुद्धरेत् । मनुस्वरयुतौ सर्गयुक्तौ भृगुतदूद्ध्वंगौ ॥१०३॥
द्वाविंशत्यक्षरो मन्त्रो वागीशत्वप्रदायकः । ऋषिः स्यान्नारदश्छन्दो गायत्री देवता पुनः ॥१०४॥
समान दो हाथों में चक्र एवम् गदा धारण किये हैं। ऐसा ध्यान करके दस लाख मन्त्र जप करे और उसका दशांश
घृत से हवन करे ॥६-८॥ ऐसा करने से सकल सम्पत्ति तथा सौभाग्य को देने वाले और अखिल कामनाओं को
पूर्ण करने वाले दोनों मन्त्रश्रेष्ठ सिद्ध हो जाते हैं। अष्टादशाक्षर मन्त्र के अंत में क्लीं जोड़ दिया जाय तो वह
पुत्र एवम् धन देने वाला होता है। उसके मुनि नारद, छंद गायत्री, देवता कृष्ण, बीज क्लीं और शक्ति स्वाहा
है। उसकी सिद्धि के लिये छह दीर्घ मात्राओं से युक्त बीज मन्त्र से षडंगन्यास कर कृष्ण का इस तरह ध्यान करे
कि 'उनके दाहिने हाथ में खीर तथा बायें हाथ में मक्खन है। ऐसे दिगम्बर गोपीपुत्र श्रीकृष्ण मेरी रक्षा करें।
ऐसा ध्यान कर बत्तीस लाख मन्त्र जप करे। और उसका दशांश अग्नि में चीनी या मिश्री मिलायी हुई खीर से
हवन करे। अनन्तर पूर्वोक्त वैष्णव पीठ पर अष्टादशाक्षर मन्त्र की तरह पूजन करे। कमल के आसन पर
विराजमान श्रीकृष्ण की अर्चना कर उनके मुखारविन्द में दूध, पका केला, दही तथा ताजा मक्खन डालकर
उन्हें तृप्त करे। पुत्र की कामना से जो इस तरह तर्पण करता है, उसे एक वर्ष के भीतर ही पुत्र हो जाता
है ॥९-२१॥ वह जिस वस्तु की इच्छा करता है, वह उस तर्पण के प्रभाव से प्राप्त हो जाती है। वाक् (ऐं),
काम (क्लीं) ङे विभक्त्यन्त कृष्ण शब्द (कृष्णाय) तत्पश्चात् माया (ह्रीं), उसके बाद 'गोविन्दाय' फिर रमा (श्रीं),
तदनन्तर दशाक्षर मन्त्र (गोपीजनवल्लभाय स्वाहा) उद्धृत करे, फिर ह् और स् ये दोनों ओकार और विसर्ग
से संयुक्त होकर अन्त में जुड़ जाय तो (ऐं क्लीं कृष्णाय ह्रीं गोविन्दाय श्रीं गोपीजनवल्लभाय स्वाहा ह् सौं)
बाईस अक्षर का मन्त्र होता है, जो वागीशत्व प्रदान करता है। इसके ऋषि नारद, छंद गायत्री, देवता विद्याप्रद
गोपाल, बीज क्लीं और शक्ति ऐं है। विद्या प्राप्ति के लिये इसका विनियोग किया जाता है। इसकी सिद्धि के
एकाशीतितमोऽध्यायः ७३३
विद्याप्रदश्च गोपालः कामो बीजं प्रकीर्तितम् । शक्तिस्तु वाग्भवं विद्याप्राप्तये विनियोजना ॥२५॥
वामोर्ध्वहस्ते दधतं विद्यापुस्तकमुत्तमम् । अक्षमालां च वक्षोर्ध्वस्फार्टिकों मातृकामयीम् ॥२६॥
शब्दब्रह्ममयं वेणुमधः पाणिद्वये पुनः । गायत्रीगीतवसनं श्यामलं कोमलच्छविम् ॥२७॥
बर्हावतंसं सर्वज्ञं सेवितं मुनिपुंगवैः । ध्यात्वैवं प्रमदावेशविलासं भुवनेश्वरम् ॥२८॥
वेवलक्षं जपेन्मन्त्रं किंशुकैस्तद्दशांशतः । हुत्वा तु पूजयेन्मन्ती विशत्यर्णं विधानतः ॥२९॥
एवं यो भजते मन्त्रं भवेद्वागीश्वरस्तु सः । अदृष्टान्यपि शास्त्राणि तस्य गंगातरंगवत् ॥३०॥
तारः कृष्णयुगं पश्चान्महाकृष्ण इतीरयेत् । सर्वज्ञ त्वंप्रशब्दांते सीदमेऽग्निश्च मारम ॥३१॥
णांते विद्येश विद्यामाशु प्रयच्छ ततश्च मे । त्रर्यास्त्रंशदक्षरोऽयं महाविद्याप्रदो मनुः ॥३२॥
नारदोऽस्य मुनिश्च्छन्दोऽनुष्टुप् कृष्णोऽस्य देवता । पादैः सर्वेण पंचांगं कृत्वा ध्यायेत्ततो हरिम् ॥३३॥
दिव्योद्याने विवस्वत्प्रतिममणिमयेमण्डपे योगपीठे
मध्ये यः सर्ववेदांतमयसुरतरोः संनिविष्टो मुकुन्दः ।
वेदैः कल्पद्रुरूपैः शिखरिशतसमालंबिकोशैश्चतु- ॥३४॥
र्भिर्न्यायैस्तर्कैः पुराणैः स्मृतितिमिरविवृत्तस्तादृशैश्चामरायैः
दद्यादिध्वक्षकराग्रैरवि वरमुरलीपुष्पबाणेक्षुचापा-
नक्षस्पृक्पूर्णकुंभौ स्मरललितवपुर्दिव्यभूषांगरागः ।
व्याख्यां वामे वितन्वन् स्फुटरुचिरपदो वेणुना विश्वमात्रे ॥३५॥
शब्दब्रह्मोद्भवने श्रियमरुणरुचिर्बल्खलीवल्लभो नः
लिये कृष्ण का इस प्रकार ध्यान करे कि वे अपने बाँये हाथ में उत्तम विद्यापुस्तक तथा दाहिने हाथ में रुद्राक्षमाला
तथा मातृकामयी स्फटिकमाला धारण किये हुए हैं ॥२२-२६॥ शब्द ब्रह्ममय वेणु को दोनों हाथों में लेकर
बजा रहे हैं । गायत्री को वे जपते हैं, गीत गाते हैं और वस्त्राभूषणों से विभूषित हैं । उनका रंग साँवला है ।
छवि कोमल (सुन्दर) है, वे मयूरपिच्छ का मुकुट धारण किए हुए हैं, सर्वज्ञ हैं । मुनिगण उनकी सेवा करते हैं ।
ललनावेश उन्हें बहुत प्रिय हैं। ऐसे भुवनेश्वर का ध्यान कर चार लाख मन्त्र जप करे और उसका दशांश पलाश
पुष्पों से हवन करे । हवनोपरान्त बीस अक्षरों वाले मन्त्र के लिये कहे हुए विधान के अनुसार पूजन करे । जो
इस प्रकार मंत्र की आराधना करता है, वह वागीश्वर होता है । बिना देखे शास्त्र भी गंगातरंग की तरह
उसकी जिह्वा पर लहराते हैं 'ओं कृष्ण कृष्ण महाकृष्ण सर्वज्ञ त्वं प्रसीद मे । रमारमण विद्येश विद्यामाशु
प्रयच्छ मे' । (हे कृष्ण ! हे कृष्ण ! हे महाकृष्ण ! आप सर्वज्ञ हैं । मुझ पर प्रसन्न होइए । हे रमारमण ! हे विद्ये-
श्वर ! मुझे शीघ्र विद्या दीजिए)' यह तैंतीस अक्षरोंवाला मंत्र महाविद्या को देने वाला है । इसके मुनि नारद,
छंद अनुष्टुप् और देवता कृष्ण हैं । मन्त्र के चारों चरणों और संपूर्ण मन्त्र से पंचांगन्यास कर हरि का इस तरह
ध्यान करे कि रमणीय उद्यान में दिनकर किरण की तरह चमकते हुए मणिमय मंडप के भीतर योगपीठ पर
संपूर्ण वेदान्तमय कल्पवृक्ष के नीचे मुकुन्द भगवान् विराजमान हैं। उन्हें अमरगण तथा कल्पद्रुम रूपी वेद,
जिनकी शाखायें कोश, न्याय, पुराण एवम् स्मृतियां हैं, चारों ओर से घेरे हुए हैं, ॥२७-३४॥ स्वयं कृष्ण
अपने कर कमलों में गदा, मुरली, पुष्पबाण, इक्षुचाप (ईख के धनुष) अक्षमाला तथा पूर्ण कुम्भ धारण किये हुए
हैं । उनका शरीर कामदेव के समान सुललित है । वे दिव्य आभूषण तथा दिव्य अंगराग धारण करते हैं । शब्द
७३४ | नारदीयपुराणम्
एवं ध्यात्वा जपेल्लक्षं दशांशं पायसैर्हुनेत् । अष्टादशार्णवत्कुर्याद्यजनं चास्य मन्त्रवित् ॥३६॥
तारो नमो भगवते नन्दपुत्राय संवदेत् । आनन्दवपुषे द्वयाहशार्ण तदनंतरम् ॥३७॥
अष्टाविंशतिवर्णोऽयं मंत्रः सर्वेष्टदायकः । नंदपुत्रपदं ज्ञेयं श्यामलांगपदं तथा ॥३८॥
तथा बालवपुःकृष्णं गोविंदं च तथा पुनः । दशार्णोऽतो भवेन्मंत्रो द्वात्रिंशदक्षरान्वितः ॥३९॥
अनयोर्नारदऋषिश्छंदस्तूष्णिगनुष्टुभौ । देवता नन्दपुत्रस्तु विनियोगोऽखिलाप्तये ॥४०॥
चक्रैः पंचांगमर्चास्यादंगदिक्पालहेतिभिः । दक्षिणे रत्नचषकं वामे सौवर्णनेत्रकम् ॥४१॥
करे दधानं देवीभ्यां श्लिष्टं संचितयेद्विभुम् । लक्षं जपो दशांशेन जुहुयात्पायसेन तु ॥४२॥
एताभ्यां सिद्धमंत्राभ्यां मंत्री कुर्याद्यथेप्सितम् । प्रणवः कमला माया नमो भगवते ततः ॥४३॥
नंदपुत्राय तत्पश्चाद्वालान्ते वपुषे पदम् । ऊनविंशतिवर्णोऽयं मुनिर्ब्रह्मा समीरिरतः ॥४४॥
छंदोऽनुष्टुप् देवता च कृष्णो बालवपुः स्वयम् । मन्त्रोऽयं सर्वसंपत्तिसिद्धये सेव्यते बुधैः ॥४५॥
तारो हृद्भगवाञ्छेतो रुक्मिणीवल्लभाय च । वह्निजायावधिः प्रोक्तो मंत्रः षोडशवर्णवान् ॥४६॥
नारदोऽस्य मुनिश्चन्दोऽनुष्टुप् च देवता मनोः । रुक्मिणीवल्लभश्चंद्रदृग्वेदांगाक्षिवर्णकैः ॥४७॥
पञ्चांगानि प्रकुर्वीत ततो ध्यायेत्सुरेश्वरम्
तापिच्छच्छविरंगनां प्रियतमां स्वर्णप्रभांबुज-
प्रोद्यद्धामभुजां स्ववामभुजयाश्लिष्यन्स्वचित्ताशया ।
श्लिष्यन्तों स्वयमन्यहस्तविलसत्सौवर्णवेत्रश्चिरं
पायान्नः सुविशुद्धपीतवसनो नानाविभूषो हरिः ॥४८॥
ब्रह्म से प्रकट हुई तथा बायें हाथ में ली हुई वेणु द्वारा स्पष्ट एवम् रुचिर पद का उच्चारण करते हुए विश्व मात्र
में विशद व्याख्या कर विस्तार करते हैं । उनकी अंगकान्ति अरुण वर्ण की है, ऐसे गोपीवल्लभ श्रीकृष्ण हमें लक्ष्मी
प्रदान करें । ऐसा ध्यान कर एक लाख मन्त्र जप करे और उसका दशांश खीर से हवन करे । मन्त्रवेत्ता साधक
अष्टादशाक्षर मन्त्र की तरह उसका भी पूजन करे । ‘ओं नमो भगवते नन्दपुत्राय आनन्दवपुषे गोपीजनवल्लभाय
स्वाहा' यह अट्ठाईस अक्षरों वाला मन्त्र समस्त कामनाओं को देने वाला है । 'नन्दपुत्राय श्यामलाङ्गाय बालवपुषे
कृष्णाय गोविन्दाय गोपीजनवल्लभाय स्वाहा' यह मन्त्र बत्तीस अक्षरों का है । इन दोनों मन्त्रों के ऋषि नारद,
छन्द क्रमशः उष्णिक् तथा अनुष्टुप्, देवता श्रीकृष्ण और विनियोग सर्व प्राप्ति के लिये किया जाता है । इनकी
सिद्धि के लिये पंचांगन्यास कर अंग देवता दिक्पाल तथा आयुधों की अर्चना करे ॥३५-४०१/२॥ अनन्तर दायें हाथ
में रत्नपात्र तथा बायें हाथ में सुवर्णवेत्र (लाठी) धारण करनेवाले और दो देवियों से आलिंगित किये जाने वाले
विभु का ध्यान कर एक लाख मन्त्र जप करे और उसका दशांश खीर से होमे । इन दोनों मन्त्रों के सिद्ध हो जाने
पर उपासक अभिलषित फलों को प्राप्त करता है । यह उनतीस अक्षरों का मन्त्र है, इसके मुनि ब्रह्मा, छन्द
अनुष्टुप् और देवता बालशरीरधारी स्वयं कृष्ण हैं। सकल ऐश्वर्यों की प्राप्ति के लिये बुधगण इनकी सेवा करते
हैं ॥४१-४५॥
'ओं नमो भगवते रुक्मिणीवल्लभाय स्वाहा' यह सोलह अक्षरों का मन्त्र है। इसके मुनि नारद, छन्द
अनुष्टुप् और देवता रुक्मिणीवल्लभ हैं । सोलह अक्षरों से पंचांगन्यास कर सुरेश्वर (कृष्ण) का इस तरह ध्यान
क कि वे तमालपत्र के समान छवि वाले कृष्ण अपनी स्वर्णवर्णा प्रियतमा को, जिनकी भुजा में कमल की माला है
और जो छाती से लगाकर लिपट रही है, गोद में लेकर अपनी बाँयी भुजा से आलिंगन कर रहे हैं। उनके दूसरे
हाथ में सोने की यष्टिका है। वे अनेक आभूषणों से आभूषित तथा पवित्र पीतवस्त्र धारण किये हुए
एकाशीतितमोऽध्यायः ७३५
ध्यात्वैवं प्रजपेल्लक्षं रक्तैः पद्मैर्दशांशतः ॥४६॥
त्रिमध्वक्तैर्हुनेत्पीठे पूर्वोक्ते पूजयेद्धरिम् । अंगैनारदमुख्यैश्च लोकेशैश्च तदायुधैः ॥५०॥
एवं सिद्धो मनुर्दद्यात्सर्वान्कामांश्च मंत्रिणे । लीलादंडपदाम्भोजोऽपि जनसंसक्तदोः पदम् ॥५१॥
दंडांते वा धरावह्नि नरधीशोढचोऽथ लोहितः । मेघश्यामपदं पश्चाद्भगवन् सलिलं सद्क् ॥५२॥
विष्णो इत्युक्त्वा ठद्वयं स्यादेकोनत्रिंशद्वर्णवान् । नारदोऽस्य मुनिश्चंदोऽनुष्टुप् च देवता मनोः ॥५३॥
लीलादंडहरिः प्रोक्तो मन्वब्धियुगवह्नि नभिः । वेदैः पंचांगकं भांगैर्मंत्रवर्णोत्थितैः क्रमात् ॥५४॥
संमोहयंश्च निजवामकरस्थलीलादण्डेन गोपयुवतीः परसुंदरीश्च ।
विश्रन्निजप्रियसखांसगदक्षहस्तो देवश्रियं निहतकंस उरुक्रमो नः ॥५५॥
लक्षं जपो दशांशेन जुहुयात्तिततण्डुलैः । त्रिमध्वक्तैस्ततोऽभ्यर्चेदंगं दिक्पालहेतिभिः ॥५६॥
लीलादंडहरि यो वै भजते नित्यमादरात् । स सर्वैः पूज्यते लोकैस्तस्य गेहे स्थिरा रमा ॥५७॥
सद्यारूढा स्मृतिस्तोयं केशवाढधरायुगम् । भयाग्निवल्लभामंत्रः सप्ताणः सर्वसिद्धिदः ॥५८॥
ऋषिः स्यान्नारदश्छंदो उष्णिक्गोवेल्लभोस्य तु । देवतापूर्ववच्चक्रैः पञ्चांगानि तु कल्पयेत् ॥५९॥
ध्येयो हरिः सकपिलागणमध्यसंस्थस्ता आह्वयन्वद्धदक्षिणदोस्थ्यवेणुम् ।
पाशं स्रग्यष्टिमपरत्र पयोदनीलः पीताम्बराहरिपिच्छकृतावतंसः ॥६०॥
सप्तलक्षं जपेन्मंत्रं दशांशं जुहुयात्ततः । गोदुग्धैः पूजयेत्पीठं स्यादंगैः प्रथमावृतिः ॥६१॥
सुवर्णपिंगलां गौरपिंगलां रक्तपिंगलाम् । गुडपिंगां बभ्रुवर्णां चोत्तमां कपिलां तथा ॥६२॥
हैं ॥४६-४८॥ इस प्रकार ध्यान कर एक लाख मन्त्र को जपे और उसका दशांश त्रिमधुयुक्त रक्त पद्मों से
हवन करे। पश्चात् पूर्वोक्त पीठ पर नारद आदि अंग देवों, लोकपालों तथा आयुधों समेत हरि की अर्चना करे।
इस प्रकार मन्त्र सिद्ध होने से साधक को सकल कामनायें प्राप्त होती हैं। "लीलादंड गोपीजनसंसक्तदोर्दण्ड
वालरूप मेघश्याम भगवन् विष्णो स्वाहा" यह उन्नीस अक्षरों का मन्त्र है। इसके मुनि नारद, छन्द अनुष्टुप् और
देवता लीलादण्डधारी हरि हैं। उसकी सिद्धि के लिये उन्नीसों मंत्रवर्णों से क्रमशः अंगन्यास कर इस प्रकार ध्यान
करे कि कृष्ण अपने वामकरस्थ लीलादण्ड से परमसुन्दरी गोप युवतियों को मोहित कर रहे हैं। और दाहिना हाथ
प्रिय मित्र के कंधे पर रख कर चल रहे हैं। उन्होंने कंस को निहत किया है। उनका पराक्रम महान् है
॥४९-५५॥ ऐसा ध्यान कर एक लाख मंत्र जप करे और उसका दशांश त्रिमधुयुक्त तिल और चावलों से हवन
करे। अनन्तर अंग देवता, दिक्पाल तथा आयुधों की पूजा करे। जो व्यक्ति लीलादंडधारी हरि की नित्य आदर-
पूर्वक आराधना करता है, वह सब का पूज्य होता है तथा उसके घर लक्ष्मी स्थिर होकर रहती है। सद्य (ओ),
परस्थित स्मृति (ग्) अर्थात् (गो), केशव (अ) युक्त तोय (व्), ध्ररायुग (ल्ल), 'भाय', अग्निवल्लभा (स्वाहा) -
यह सप्ताक्षर मंत्र सकल सिद्धियों को देने वाला है। इसके ऋषि नारद, छंद उष्णिक् और देवता गोपाल हैं।
पूर्व मंत्र की तरह चक्रों से पंचांगन्यास कर ध्यान करे कि हरि गौओं के बीच अवस्थित होकर उन्हें बुला रहे हैं।
जिनका वर्ण मेघ के समान नील हैं। वे पीताम्बर तथा मयूरपुच्छ का मुकुट पहने हुए हैं। दाहिने हाथ में बंशी
तथा बाँये हाथ में पाश एवम् यष्टि धारण किये हुए हैं। ऐसा ध्यान कर सात लाख मन्त्र जप करे और उसका
दशांश गोदुग्ध से हवन करे। अनन्तर पीठ पर अंगदेवताओं के साथ सुवर्णपिंगला, गौरपिंगला, रक्तपिंगला,
गुडपिंगा, बभ्रुवर्णा, कपिला, चतुष्कपिंगला और पोत पिंगला- इन आठ गौओं का पूजन कर लोकपालों तथा
७३६ नारदीयपुराणम्
चतुष्कपिङ्गुलां पीतपिङ्गुलां चोत्तमां शुभाम् । गोगणाष्टकमभ्यर्च्य लोकेशानायुधैर्यतान् ॥६३॥
संपूज्यैवं मनौ सिद्धे कुर्यात्काम्यानि मंत्रवित् । अष्टोत्तरसहस्रं यः पयोभिर्दिनशो हुनेत् ॥६४॥
पक्षात्सगोगणो मुक्तो दशार्णे चाप्ययं विधिः । तारो हृद्भगवाञ् डेंतः श्रीगोविंदस्तथा भवेत् ॥६५॥
द्वादशार्णो मनुः प्रोक्तो नारदोऽस्य मुनिर्मतः । छंदः प्रोक्तं च गायत्री श्रीगोविन्दोऽस्य देवता ।
चन्द्राक्षियुग्भूतार्णैः सर्वैः पंचांगकल्पनम् ॥६६॥
ध्यायेत्कल्पद्रु मूलाश्रितमविकसदिव्यसिंहासनस्थं
मेघश्यामंपिशंगांशुकमतिसुभगं शंखवेत्रे कराभ्याम् ॥६७॥
बिभ्राणं गोसहस्रैर्वृतममरपतिं प्रौढहस्तै ककुं
प्रप्रद्योतत्सौधधारास्नपितमभिनवां भोजपत्रामनेत्रम् ॥६८॥
रविलक्षं जपेन्मंत्रं दुग्धैहुत्वा दशांशतः । यजेच्च पूर्ववद्गोष्ठस्थितं वा प्रतिमादिषु ॥६६॥
पूर्वोक्ते वैष्णवे पीठे मूर्ति संकल्प्य मूलतः । तत्रावाह्य यजेत्कृष्णं गुरुपूजनपूर्वकम् ॥७०॥
रुक्मिणीं सत्यभामां च पार्श्वयोरिद्रमग्रतः । पृष्ठतः सुरभिं चेट्ष्वा केसरेष्वंगपूजनम् ॥७१॥
कालिंद्याद्या महिष्योऽष्टौ वसुपत्रेषु संस्थिताः । पीठकोणेषु बद्धार्दिकिंकणीं च तथा पुनः ॥७२॥
दामानि पृष्ठयोर्वेणुं पुरः श्रीवत्सकौस्तुभौ । अग्रतो वनमालादिदिक्ष्वष्टसु तथा स्थिताः ॥७३॥
पांचजन्यं गदा चक्रं वसुदेवश्च देवकी । नंदगोपो यशोदा च सगोगोपालगोपिकाः ॥७४॥
इंद्राद्याश्च स्थिता बाह्ये वज्राद्याश्च ततः परम् । कुमुदः कुमुदाक्षश्च पुंडरीकोऽथ वामनः ॥७५॥
शंकुकर्णः सर्वनेत्रः सुमुखः सुप्रतिष्ठितः । विष्वक्सेनश्च संपूज्यः स्वात्मा चार्च्यस्ततः परम् ॥७६॥
उनके आयुधों की अर्चना करे। इस तरह पूजन आदि से मन्त्र को सिद्ध कर लेने पर मन्त्रवेत्ता उसके द्वारा
कामनापूर्ति के लिये प्रयोग करे ॥५६-६३३॥ जो व्यक्ति (इस मन्त्र को पढ़ते हुए) दूध से एक हजार आठ बार
हवन करता है, वह स्वयं तथा गौओं सहित अपने को यक्ष के उपद्रव से बचा लेता है। दशाक्षर मन्त्र में भी
यही विधि है। 'ओं नमो भगवते श्रीगोविंदाय' यह द्वादशाक्षर मंत्र है। इसके मुनि नारद, छन्द गायत्री और
देवता श्री गोविन्द हैं। मन्त्र के बारहों अक्षरों से पंचांगन्यास कर ध्यान करे कि सुरपति कृष्ण कल्पद्रुम के नीचे
मणिमय दिव्य सिंहासन पर आसीन हैं। उनका वर्ण मेघ के समान श्याम है। वे पीताम्बर पहने हुए हैं।
हाथों में शंख तथा बेंत लिए हुए हैं। हजारों गौओं से घिरे हैं। देखने में सलोने हैं। उनके नेत्र नवीन कमलदल
के समान हैं। प्रौढ़ गोपियां सुधाधारा से उनका स्नपन करा रही हैं। ऐसा ध्यान कर बारह लाख मन्त्र को जपे
और उसका दशांश दूध से हवन करे। पश्चात् गोष्ठस्थित प्रतिमा आदि में कृष्ण की पूजा करनी चाहिये
॥६४-६९॥ पूर्वोक्त वैष्णव पीठ पर मूल मन्त्र से मूर्ति की स्थापना कर उसमें कृष्ण का आवाहन करके पूजा
करे। परन्तु कृष्ण पूजा के पहिले ही गुरुपूजा कर लेनी चाहिये। कृष्ण के दोनों पावों में रुक्मिणी तथा
सत्यभामा की, सामने इन्द्र को और पृष्ठ भाग में सुरभि (गाय) की पूजा कर केसरों पर अंग देवों का पूजन
करे। पुनः आठ दलों में कालिंदी आदि आठ राज महिषियों की अर्चना करे। पश्चात् पीठ के चतुर्दिक् कोणों में
आभूषणबद्ध किंकणियों, पृष्ठभाग में मालाओं, अग्रभाग में श्रीवत्सचिह्न तथ कौस्तुभमणि की पूजा कर आठों
दिशाओं में वनमाला आदि का पूजन करे। बाह्य देश में पांचजन्य (शंख), गदा, चक्र, वसुदेव, देवकी, नन्दगोप,
यशोदा, गोप-गोपियों, इन्द्र आदि देवों, वज्र आदि आयुधों, कुमुद, कुमुदाक्ष, पुण्डरीक, वामन, शंकुकर्ण, सर्वनेत्र,
सुमुख, सुप्रतिष्ठित, तथा विष्वक्सेन की अर्चा कर अपनी आत्मा का पूजन करे। जो व्यक्ति एक काल या
एकाशीतितमोऽध्यायः ७३७
एककालं त्रिकालं वा यो गोविन्दं यजेन्नरः । स चिरायुर्निर्रातङ्को धनधान्यपतिर्भवेत् ॥७७॥
स्मृतिः सद्यान्विता चक्री दक्षकर्णयुतोधरा । नाथाय हृदयांतोऽयं वसुवर्णो महामनुः ॥७८॥
मुनिर्ब्रह्मास्य गायत्री छंदः कृष्णोऽस्य देवता । वर्णद्वंदैश्च सर्वेण पंचांगन्यासस्य कल्पयेत् ॥७९॥
पंचवर्षमतिलोलमंगणे धावमानमतिचंचलेक्षणम् ।
किंकिणीवलयहारनूपुरै रंजितं नमत गोपबालकम् ॥८०॥
एवं ध्यात्वा जपेदष्टलक्षं मंत्री दशांश । ब्रह्मवृक्षसमिद्भिम्श्च जुहुयात्पायसेन वा ॥८१॥
प्रागुक्ते वैष्णवे पीठे मतिं संकल्प्य मूलतः । तत्रावाह्यार्चयेत्कृष्णं मंत्री वै स्थिरमानसः ॥८२॥
केसरेषु चतुर्दिक्षु विविक्ष्वांगानि पूजयेत् । वासुदेवं बलं दिक्षु प्रद्युम्नमनिरुद्धकम् ॥८३॥
विदिक्षु रुक्मिणीसत्यभामे वै लक्ष्मणसंज्ञे । लोकेशांस्तायुधान्बाह्ये एवं सिद्धो भवेन्मनुः ॥८४॥
तारः श्रीभुवनाकाबो ङेन्तं श्रीकृष्णमीरयेत् । श्रीगोविंदं ततः प्रोच्य गोपीजनपदं ततः ॥८५॥
वल्लभाय ततः पद्मात्रयं तत्त्वाक्षरो मनुः । मुन्यादिकं च पूर्वोक्तं सिद्धगोपालकं स्मरेत् ॥८६॥
माधवीमंडपासीनौ गरुडेनाभिपालतौ । दिव्यक्रीडासु निरतौ रामकृष्णौ स्मरन् जपेत् ॥८७॥
पुजनं पूर्ववच्चास्य कर्तव्यं वैष्णवोत्तमैः । चक्री मुनिस्वरोपेतः सर्गी चैकाक्षरो मनुः ॥८८॥
कृष्णेति द्वयक्षरः प्रोक्तः कामादिः स्यात्त्रिवर्णकः । सैव ङेन्तो युगार्णः स्यात्कृष्णाय नम इत्यपि ॥८९॥
पंचाक्षरश्च कृष्णाय कामरुद्धस्तथा परः । गोपालायाग्निजायांतो रसवर्णः प्रकीर्तितः ॥९०॥
कामः कृष्णपदं ङन्तं वह्निजायांतकः परः । कृष्णगोविंदकौ ङन्तौ सप्तार्णः सर्वसिद्धिदः ॥९१॥
त्रिकाल गोविन्द की पूजा करता है, वह चिरायु, सुखी तथा धन-धान्यों का अधिपति होता है ॥७७-७७॥ सद्य
(अ), सहित स्मृति (ग्) अर्थात् 'गो' दक्षिण कर्ण (उ) युक्त चक्री (क्) अर्थात् 'कु', धरा (ल) इन अक्षरों के
पश्चात् 'नाथाय' पद और अन्त में हृदय (नमः) यह- 'गोकुलनाथाय नमः' महामन्त्र आठ अक्षरों का है ।
इसके मुनि ब्रह्मा, छंद गायत्री ओर देवता कृष्ण हैं। मंत्र के अष्टाक्षरों से पंचांगन्यास कर ध्यान करे कि कृष्ण
पांच वर्षों के अत्यंत चंचल बालक हैं। वे आंगन में इधर-उधर दौड़ रहे हैं। उनकी आँखें अति चपल हैं। किंकिणी,
वलय, नूपुर तथा हार से उनका शरीर सुशोभित है । ऐसे गोपबालक को नमस्कार करो । साधक इस तरह ध्यान
कर आठ लाख मन्त्र को जपे और उसका दशांश पलाश की समिधाओं से या पायस से हवन करे। पश्चात्
पूर्वोक्त वैष्णव पीठ पर मूलमन्त्र से मूर्ति की स्थापना कर उसमें स्थिर चित्त से कृष्ण का आवाहनपूर्वक पूजन
करे। फिर दिशा-विदिशाओं में केसरों पर अंग देवताओं की पूजा करनी चाहिये। दिशाओं में वासुदेव तथा
बलराम की, विदिशाओं में प्रद्युम्न तथा अनिरुद्ध की और बाह्य प्रदेश में रुक्मिणी, सत्यभामा, लक्ष्मणा, जांबवती,
लोकपालों तथा आयुधों की अर्चना करे। ऐसा करने से मन्त्र सिद्ध हो जाता है ॥७८-८४॥
तार (ॐ), श्री (श्रीं), भुवना (ह्रीं), काम (क्लीं) ङे विभक्तयन्त श्रीकृष्ण शब्द अर्थात् 'श्रीकृष्णाय' ऐसा
ही गोविन्द पद (गोविन्दाय), फिर 'गोपीजनवल्लभाय' तत्पश्चात् तीन पद्मा (श्रीं श्रीं श्रीं) - यह (ॐ श्रीं ह्रीं
क्लीं श्रीकृष्णाय गोविन्दाय गोपीजनवल्लभाय श्रीं श्रीं श्रीं) तेईस अक्षरों का मन्त्र हैं। इसके मुनि आदि पूर्व मन्त्र
को ही तरह समझना चाहिये। इसकी सिद्धि के लिये सिद्ध गोपाल का स्मरण करना चाहिये। पुनः माधवी लता
के बने मण्डप में आसीन, गरुड़ द्वारा सुसेवित, दिव्य क्रीड़ा करने में निरत राम और कृष्ण का ध्यान करे।
उत्तम विष्णुभक्त इस मन्त्र का पूजन पूर्ववत् ही करे। "चक्री (क्) आठवें स्वर (ऋ) से युक्त हो और उसके साथ
विसर्ग भी हो तो 'कृः' यह एकाक्षर मन्त्र हो है। 'कृष्ण' यह दो अक्षरों का मन्त्र है। इसके आदि में क्लीं
फा० १३
७३८ नारदीयपुराणम्
श्रीशक्तिकामाः कृष्णाय कामः सप्ताक्षरः परः । कृष्णगोविंदकौ डेंतौ हृदंतोऽन्यो नवाक्षरः ॥८२॥
डेंतौ च कृष्णगोविंदौ तथाः कामः पुटः परः । कामः शाङ्गी धरासंस्थो मन्द्रिद्वादशश्च मन्मथः ॥८३॥
श्यामलांगाय हृदयं दशार्णः सर्वसिद्धिदः । बालांते वपुषे कृष्णायवह्निजायांतमोऽपरः ॥८४॥
द्वितांते बालवपुषे कामः कृष्णाय संवदेत् । ततो ध्यायन्स्वहृदये गोपीजनमनोहरम् ॥८५॥
श्रीवृन्दावनप्रतोलिषु नमत्संकुल्लवल्लीततिष्वंतर्जालविघट्टनैः सुरभिना वातेन संसेविते ।
कालिंदीपुलिने विहारिणमथो राधेकजीवातुकं वंदे नन्दकिशोरमिन्दुवदनं स्निग्धांबुडाडंबरम् ॥८६॥
पूर्वोक्तवर्त्मना पूजा ज्ञेयाह्येषां मुनीश्वर । देवकीसूतवर्णांते गोविन्दपदमुच्चरेत् ॥८७॥
वासुदेवपदं प्रोच्य संबुद्धयंतं जगत्पतिम् । देहि मे तनयं पश्चात्कृष्ण त्वामहमीरयेत् ॥८८॥
शरणं गत इत्यंतो मंत्रो द्वात्रिंशदक्षरः । नारदोऽस्य मुनिश्चंदो गायत्री वाप्यनुष्टुभम् ।
॥८६॥
देवः सुतप्रदः कृष्णः पादैः सर्वेण चांगकम्
विजयेन युतो रथस्थितः प्रसभानीय समुद्रमध्यतः । प्रददत्तनयान् द्विजन्मने स्मरणीयो वसुदेवनन्दनः ॥१००॥
लक्षं जपोऽयुतं होमस्तिलैर्मधुरसंप्लुतैः । अर्चा पूर्वोदिते पीठे अंगलोकेश्वरायुधैः ॥१०१॥
एवं सिद्धे मनौ मंत्री वंध्यायामपि पुत्रवान् । तारो माया ततः सांत संदुष्वांतश्च सर्ववान् ॥१०२॥
जोड़ने पर 'क्लीं कृष्ण' यह तीन अक्षरों का मन्त्र बनता है । वही ङे विभक्त्यन्त होने पर चार अक्षरों का 'क्लीं
कृष्णाय' मन्त्र होता है । 'कृष्णाय नमः' यह पंचाक्षर मन्त्र है । 'क्लीं' संपुटित कृष्ण पद भी अपर पंचाक्षर मन्त्र
है । यथा-क्लीं कृष्णाय क्लीं । 'गोपालाय स्वाहा' यह षडक्षर मन्त्र कहा गया है। 'क्लीं कृष्णाय स्वाहा' यह
भी दूसरा षडक्षर मन्त्र है। 'कृष्णाय गोविन्दाय' यह सप्ताक्षर मन्त्र सम्पूर्ण सिद्धियों को देने वाला है। श्रीं ह्रीं
क्लीं कृष्णाय क्लीं यह दूसरा सप्ताक्षर मन्त्र है। 'कृष्णाय गोविन्दाय नमः' यह दूसरा नवाक्षर मन्त्र
है । 'क्लीं कृष्णाय गोविन्दाय क्लीं' यह भी इतर नवाक्षर मन्त्र है। 'क्लीं ग्लौं क्लीं श्यामलाङ्गाय नमः' यह
दशाक्षर संपूर्ण सिद्धियों को देने वाला है। 'बालवपुषे कृष्णाय स्वाहा' यह दूसरादशाक्षर मन्त्र है । 'बालवपुषे क्लीं
कृष्णाय स्वाहा' यह एकादशाक्षर मन्त्र है । तदनन्तर गोपीजन मनोहर श्रीकृष्ण का इस प्रकार ध्यान करे कि वे
कालिन्दी के तट पर विहार करते हैं, जहाँ वृन्दावन की प्रतोलियों (ग्राममध्यमार्ग) पर गिरती हुई प्रफुल्लित
लताओं के आभ्यन्तर जाल को तितर-बितर करते हुए सुगन्धित वायु बह रहा है। उनका मुख इन्द्र के समान है
वर्ण सघनघन के सदृश है, वे राधा के एक मात्र प्राण हैं। मुनीश्वर ! ऐसा ध्यान कर पूर्वोक्त रीति से पूजा
करनी चाहिये । "देवकीसुत गोविन्द वासुदेव जगत्पते ! देहि मे तनयं कृष्ण त्वामहं शरणं गतः" । यह बत्तीस
अक्षरों का मन्त्र है ॥८५-९८३॥ इसके मुनि नारद, छन्द गायत्री तथा अनुष्टुप् और देवता पुत्र देने वाले कृष्ण
हैं । मन्त्राक्षरों से अंगन्यास कर ध्यान करे कि वसुदेवपुत्र विजयी हैं, रथ पर अवस्थित हैं। वे समुद्र के बीच
से लाकर ब्राह्मण के मरे पुत्र को उन्हें वापस दे रहे हैं, उनका स्मरण करना चाहिये ऐसा ध्यान कर एक लाख
मन्त्र जप करे और दश हजार त्रिमधुयुक्त तिलों से हवन करे। पश्चात् पूर्वोक्त पीठ पर अंग देवताओं, लोक-
पालों तथा आयुधों की पूजा करनी चाहिये । इस तरह मन्त्र की सिद्धि हो जाने से साधक को वन्ध्या स्त्री से
भी पुत्र हो सकता है ॥९९-१०१३॥
एकाशीतितमोऽध्यायः ७३६
सोऽहं वह्निप्रियांतोऽयं मंत्रो वस्वक्षरः परः । पंचब्रह्मात्मकस्यास्य मंत्रस्य मुनिसत्तमः ॥१०३॥
ऋषिर्ब्रह्मा च परमा गायत्री छंद ईरितम् । परं ज्योतिः परं ब्रह्म देवता परिकीर्तितम् ॥१०४॥
प्रणवो बीजमाख्यातं स्वाहा शक्तिरुदाहृता । स्वाहेति हृदयं प्रोक्तं सोऽहं वेति शिरो मतम् ॥१०५॥
हंसश्चेति शिखा प्रोक्ता हृल्लेखा कवचं स्मृतम् । प्रणवो नेत्रमाख्यातमस्त्रं हरिहरेति च ॥१०६॥
स ब्रह्मा स शिवो विप्र स हरिः सैव देवराट् । स सर्वरूपः सर्वाख्यः सोऽक्षरः परमः स्वराट् ॥१०७॥
एवं ध्यात्वा जपेदष्टलक्षहोमो दशांशतः । पूजाप्रणवपीठेऽस्य सांगावरणकैर्मता ॥१०८॥
एवं सिद्धे मनौ ज्ञानं साधकेंद्रस्य नारद । जायते तत्त्वमस्यादिवाक्योक्तं निर्विकल्पकम् ॥१०८॥
कामो ङेंतो हृषीकेशो हृदयांतो गजाक्षरः । ऋषिर्ब्रह्मास्य गायत्री छंदो गायत्रमीरितम् ॥११०॥
देवता तु हृषीकेशो विनियोगोऽखिलाप्तये । कामो बीजं तथायेति शक्तिरस्य ह्युदाहृता ॥१११॥
बीजेनैव षडंगानि कृत्वा ध्यानं समाचरेत् । पुरुषोत्तममंत्रोक्तं सर्वं वास्य प्रकीर्तितम् ॥११२॥
लक्षं जपोऽयुतं होमो घृतेनैव प्रकीर्तितः । तर्पणं सर्वकामाप्त्यै प्रोक्तं संमोहिनीसुमैः ॥११३॥
श्रीबीजं च चतुर्थ्यन्तः श्रीधरो ङैंतकस्तथा । त्रैलोक्यमोहनः शब्दो नमोऽन्तो मनुरीरितः ॥११४॥
ऋषिर्ब्रह्मा च गायत्री छन्दः श्रीधरदेवता । श्रीबीजं शक्तिरापेति बीजेनैव षडंगकम् ॥११५॥
पुरुषोत्तमवद्ध्यानपूजादिकमिहोदितः । लक्षं जपस्तथा होम आज्येनैव दशांशतः ॥११६॥
सुगंधश्वेतपुष्पैस्तु पूजां होमादिकं चरेत् । एवं कृते तु विप्रेन्द्र साक्षात्स्याच्छ्रीधरः स्वयम् ॥११७॥
अच्युतानन्तगोविंदपदं ङैंतं नमोतिमम् । मंत्रोऽस्य शौनकऋषिर्विराट् छंदः प्रकीर्तितम् ॥११८॥
'ओं ह्रीं हंसः सोऽहं स्वाहा' यह दूसरा अष्टाक्षर मंत्र है । इस पंचब्रह्मात्मक मंत्र के मुनि ब्रह्मा, छंद गायत्री,
देवता परं ज्योति परब्रह्म, बीज प्रणव और शक्ति स्वाहा है । स्वाहा हृदयाय नमः । सोहं शिरसे स्वाहा ।
हंसः शिखायै वषट् । हृल्लेखा कवचाय हुम् । ओं नेत्राभ्यां वौषट् । 'हरिहर' अस्त्राय फट् । इस प्रकार
अंगन्यास करे (वही कृष्ण) ब्रह्मा हैं, वही शिव हैं, वही हरि और वही इन्द्र हैं। वहीं सर्वरूप हैं तथा सब नाम
उन्हीं के हैं। वही स्वयं प्रकाशमान अविनाशी परमात्मा हैं—ऐसा ध्यान कर आठ लाख मंत्र को जपे और उसका
दशांश हवन करे । अनन्तर प्रणवपीठ पर अंगदेवताओं के साथ कृष्ण का पूजन करे । नारद ! ज्ञानी साधक इस
तरह मंत्र को सिद्ध कर 'तत्त्वमसि' इत्यादि वाक्योक्त निर्विकल्प ज्ञान को प्राप्त करता है । 'क्लीं हृषीकेशाय
नमः' यह अष्टाक्षर मंत्र है । इसके मुनि ब्रह्मा, छंद गायत्री और देवता हृषीकेश हैं । सर्वप्राप्ति के लिये इसका
विनियोग किया जाता है ॥१०२-११०॥
'क्लीं' इसका बीज तथा 'आय' शक्ति कही गई है । बीजमंत्र से षडंगन्यास कर ध्यान करे । अथवा
पुरुषोत्तम मंत्र के लिए कही हुई सब बातें इसके लिए भी समझनी चाहिये । अनन्तर एक लाख मंत्र जप कर
दश हजार घी से हवन करे । समस्त कामनाओं की प्राप्ति के लिये (इस मंत्र को पढ़ कर) कर्पूरमिश्रित जल
से तर्पण करना चाहिये । 'श्रीं श्रीधराय त्रैलोक्यमोहनाय नमः' यह चौदह अक्षरों का मंत्र है। इसके ऋषि
ब्रह्मा, छंद गायत्री, देवता श्रीधर, बीज श्री और शक्ति 'आय' है । बीज से ही षडंगन्यास कर पुरुषोत्तम मन्त्र
की तरह ध्यान-पूजन आदि करना चाहिये । अनन्तर एक लाख मंत्र-जप करके उसका दशांश घी से हवन करे ।
पुनः सुगंधित श्वेत पुष्पों से पूजा, होम आदि करे। विप्रेन्द्र ! जो इस तरह करता है, वह साक्षात् श्रीधर होता
है । "अच्युतानन्तगोविन्दाय नमः" यह एक मंत्र है । अच्युताय नमः, अनन्ताय नमः, गोविन्दाय नमः--ये तीन