बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)
Brihan Naradiya Purana with Sanskrit & Hindi Commentary
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)
पृष्ठ 755, कुल 1008 में से
संदर्भ में पढ़ें७३६ नारदीयपुराणम्
चतुष्कपिङ्गुलां पीतपिङ्गुलां चोत्तमां शुभाम् । गोगणाष्टकमभ्यर्च्य लोकेशानायुधैर्यतान् ॥६३॥
संपूज्यैवं मनौ सिद्धे कुर्यात्काम्यानि मंत्रवित् । अष्टोत्तरसहस्रं यः पयोभिर्दिनशो हुनेत् ॥६४॥
पक्षात्सगोगणो मुक्तो दशार्णे चाप्ययं विधिः । तारो हृद्भगवाञ् डेंतः श्रीगोविंदस्तथा भवेत् ॥६५॥
द्वादशार्णो मनुः प्रोक्तो नारदोऽस्य मुनिर्मतः । छंदः प्रोक्तं च गायत्री श्रीगोविन्दोऽस्य देवता ।
चन्द्राक्षियुग्भूतार्णैः सर्वैः पंचांगकल्पनम् ॥६६॥
ध्यायेत्कल्पद्रु मूलाश्रितमविकसदिव्यसिंहासनस्थं
मेघश्यामंपिशंगांशुकमतिसुभगं शंखवेत्रे कराभ्याम् ॥६७॥
बिभ्राणं गोसहस्रैर्वृतममरपतिं प्रौढहस्तै ककुं
प्रप्रद्योतत्सौधधारास्नपितमभिनवां भोजपत्रामनेत्रम् ॥६८॥
रविलक्षं जपेन्मंत्रं दुग्धैहुत्वा दशांशतः । यजेच्च पूर्ववद्गोष्ठस्थितं वा प्रतिमादिषु ॥६६॥
पूर्वोक्ते वैष्णवे पीठे मूर्ति संकल्प्य मूलतः । तत्रावाह्य यजेत्कृष्णं गुरुपूजनपूर्वकम् ॥७०॥
रुक्मिणीं सत्यभामां च पार्श्वयोरिद्रमग्रतः । पृष्ठतः सुरभिं चेट्ष्वा केसरेष्वंगपूजनम् ॥७१॥
कालिंद्याद्या महिष्योऽष्टौ वसुपत्रेषु संस्थिताः । पीठकोणेषु बद्धार्दिकिंकणीं च तथा पुनः ॥७२॥
दामानि पृष्ठयोर्वेणुं पुरः श्रीवत्सकौस्तुभौ । अग्रतो वनमालादिदिक्ष्वष्टसु तथा स्थिताः ॥७३॥
पांचजन्यं गदा चक्रं वसुदेवश्च देवकी । नंदगोपो यशोदा च सगोगोपालगोपिकाः ॥७४॥
इंद्राद्याश्च स्थिता बाह्ये वज्राद्याश्च ततः परम् । कुमुदः कुमुदाक्षश्च पुंडरीकोऽथ वामनः ॥७५॥
शंकुकर्णः सर्वनेत्रः सुमुखः सुप्रतिष्ठितः । विष्वक्सेनश्च संपूज्यः स्वात्मा चार्च्यस्ततः परम् ॥७६॥
उनके आयुधों की अर्चना करे। इस तरह पूजन आदि से मन्त्र को सिद्ध कर लेने पर मन्त्रवेत्ता उसके द्वारा
कामनापूर्ति के लिये प्रयोग करे ॥५६-६३३॥ जो व्यक्ति (इस मन्त्र को पढ़ते हुए) दूध से एक हजार आठ बार
हवन करता है, वह स्वयं तथा गौओं सहित अपने को यक्ष के उपद्रव से बचा लेता है। दशाक्षर मन्त्र में भी
यही विधि है। 'ओं नमो भगवते श्रीगोविंदाय' यह द्वादशाक्षर मंत्र है। इसके मुनि नारद, छन्द गायत्री और
देवता श्री गोविन्द हैं। मन्त्र के बारहों अक्षरों से पंचांगन्यास कर ध्यान करे कि सुरपति कृष्ण कल्पद्रुम के नीचे
मणिमय दिव्य सिंहासन पर आसीन हैं। उनका वर्ण मेघ के समान श्याम है। वे पीताम्बर पहने हुए हैं।
हाथों में शंख तथा बेंत लिए हुए हैं। हजारों गौओं से घिरे हैं। देखने में सलोने हैं। उनके नेत्र नवीन कमलदल
के समान हैं। प्रौढ़ गोपियां सुधाधारा से उनका स्नपन करा रही हैं। ऐसा ध्यान कर बारह लाख मन्त्र को जपे
और उसका दशांश दूध से हवन करे। पश्चात् गोष्ठस्थित प्रतिमा आदि में कृष्ण की पूजा करनी चाहिये
॥६४-६९॥ पूर्वोक्त वैष्णव पीठ पर मूल मन्त्र से मूर्ति की स्थापना कर उसमें कृष्ण का आवाहन करके पूजा
करे। परन्तु कृष्ण पूजा के पहिले ही गुरुपूजा कर लेनी चाहिये। कृष्ण के दोनों पावों में रुक्मिणी तथा
सत्यभामा की, सामने इन्द्र को और पृष्ठ भाग में सुरभि (गाय) की पूजा कर केसरों पर अंग देवों का पूजन
करे। पुनः आठ दलों में कालिंदी आदि आठ राज महिषियों की अर्चना करे। पश्चात् पीठ के चतुर्दिक् कोणों में
आभूषणबद्ध किंकणियों, पृष्ठभाग में मालाओं, अग्रभाग में श्रीवत्सचिह्न तथ कौस्तुभमणि की पूजा कर आठों
दिशाओं में वनमाला आदि का पूजन करे। बाह्य देश में पांचजन्य (शंख), गदा, चक्र, वसुदेव, देवकी, नन्दगोप,
यशोदा, गोप-गोपियों, इन्द्र आदि देवों, वज्र आदि आयुधों, कुमुद, कुमुदाक्ष, पुण्डरीक, वामन, शंकुकर्ण, सर्वनेत्र,
सुमुख, सुप्रतिष्ठित, तथा विष्वक्सेन की अर्चा कर अपनी आत्मा का पूजन करे। जो व्यक्ति एक काल या