बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)
Brihan Naradiya Purana with Sanskrit & Hindi Commentary
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)
इस ग्रन्थ के बारे में
बृहन्नारदीय पुराण, जिसे नारदपुराण भी कहा जाता है, परम्परा में महर्षि व्यास से जोड़ा जाता है। इसका पूर्वभाग सनक आदि कुमारों द्वारा नारद को दिए गए उपदेशों के रूप में है, जिनमें धर्म, भक्ति, व्रत, तीर्थ, मन्त्र-साधना और वेदाङ्गों (शिक्षा, कल्प, व्याकरण, निरुक्त, ज्योतिष और छन्द) का विस्तृत वर्णन आता है। इसकी एक विशेषता अठारह पुराणों की विषय-सूची है, जिसमें प्रत्येक पुराण की श्लोक-संख्या और विषय बताए गए हैं; स्कैन में 'पञ्चविंशतिसाहस्रं...' और 'प्रभासस्य च माहात्म्यं...' जैसे श्लोक इसी अंश के हैं।
यह संस्करण हिन्दी साहित्य सम्मेलन, प्रयाग की पुराण-प्रकाशन योजना के अन्तर्गत छपा 'बृहन्नारदीयपुराणम् (पूर्वभागः)' है, जिसमें संस्कृत मूल के साथ व्याकरण-वेदान्ताचार्य तारिणीश झा का हिन्दी अनुवाद है। प्रथम संस्करण शक 1910, अर्थात् 1989 ई. में प्रकाशित हुआ; प्रकाशक सम्मेलन के प्रधान मन्त्री डॉ. प्रभात मिश्र शास्त्री थे।
प्रकाशकीय वक्तव्य इस पुराण के ही एक श्लोक से आरम्भ होता है, जिसमें कहा गया है कि जैसे नदियों में गंगा और सरोवरों में पुष्कर श्रेष्ठ है, वैसे ही पुराणों में नारदीय। पुस्तक 1008 पृष्ठों की है।
६५० नारदीयपुराणम्
प्रजपेदयुतं यस्तु संधिं कुर्याद्विद्वद्वयोः । ध्यात्वा लंकां दहंतं तमयुतं प्रजपेन्मनुम् ।।११५।।
अचिरादेव शत्रूणां ग्रामात्संप्रदहेत्सधीः । ध्यात्वा प्रयाणसमये हनुमन्तं जपेन्मनुम् ।।११६।।
यो याति सोऽचिरात्स्वेष्टं साधयित्वा गृहे व्रजेत् । हनुमंतं सदा गेहे योऽर्चयेज्जपतत्परः ।।११७।।
आरोग्यं च श्रियं कांतिं लभते निरुपद्रवम् । कानने व्याघ्रचौरेभ्यो रक्षेन्मनुरयं स्मृतः ।।११८।।
प्रस्वापकाले शय्यायां स्मरेन्मंत्रमनन्यधीः । तस्य दुःस्वप्नचौरादिभयं नैव भवेत्क्वचित् ।।११९।।
वियत्संदुहंनुमते ततो रुद्रात्मकाय च । वर्मास्त्रांतो महामंत्रो द्वादशार्णोऽष्टसिद्धिकृत् ।।१२०।।
रामचन्द्रो मुनिश्चास्य जगती छन्द ईरितम् । हनुमान्देवता बीजमाद्यं शक्तिर्हृमीरिता ।।१२१।।
षड्दीर्घभाजा बीजेन षडंगानि समाचरेत् । महाशैलं समुत्पाट्य धावंतं रावणं प्रति ।।१२२।।
लाक्षारक्तारुणं रौद्रं कालांतकयमोपमम् । ज्वलदग्निसमं जैत्रं सूर्यकोटिसमप्रभम् ।।१२३।।
अंगदाद्यैमहावीरैर्वेष्टितं रुद्ररूपिणम् । तिष्ठ तिष्ठ रणे दुष्ट सृजंतं घोरनिःस्वनम् ।।१२४।।
शैवरूपिणमभ्यर्च्य ध्यात्वा लक्षं जपेन्मनुम् । दशांशं जुहुयाद्वीह्योपयोदध्याज्यमिश्रितान् ।।१२५।।
पूर्वोक्ते वैष्णवे पीठे विमलादिसमन्विते । मूर्तिं संकल्प्य मूलेन पूजा कार्या हनूमतः ।।१२६।।
ध्यानैकमात्रोऽपि नृणां सिद्धिरेव न संशयः । अथास्य साधनं वक्ष्येलोकानां हितकाम्यया ।।१२७।।
हनुमत्साधनं पुण्यं महापातकनाशनम् । एतद्गुह्यतमं लोके शीघ्रसिद्धिकरं परम् ।।१२८।।
मंत्रो यस्य प्रसादेन त्रैलोक्यविजयी भवेत् । प्रातः स्नात्वा नदीतीरे उपविश्य कुशासने ।।१२६।।
है । जो साधक लंकादाह करते हुए हनुमान् का स्मरण कर दश हजार मन्त्र का जप करता है, वह शीघ्र ही
शत्रुओं के गाँवों को जला डालता है। यात्राकाल में जो हनुमान् का ध्यान कर मन्त्र का जप करता है, वह शीघ्र
अपना कार्य साधन कर घर लौट आता है ।।११३-११६।। जो अपने घर में सदा हनुमान् का ध्यान कर मन्त्र का
जप करता है, वह आरोग्य, एवम् कांति लाभ करता है, विघ्न-बाधायें उसे कभी नहीं सताती । वन में बाघों
एवम् चोरों से यह मन्त्र बचाता है। जो व्यक्ति सोने के समय शय्या पर तन्मयतापूर्वक इस मन्त्र का जप करता
है, उसे दुःस्वप्न तथा चोर आदि का भय कभी भी नहीं होता ।।११७-११९।। वियत् (ह) इंदु (अनुस्वार) से
युक्त हो, उसके बाद 'हनुमते रुद्रात्मकाय' ये दो पद हों, फिर वर्म (हूं) और अस्त्र (फट्) हो तो (हं हनुमते
रुद्रात्मकाय हुं फट्) यह बारह अक्षरों का महामन्त्र (अणिमा आदि) आठ सिद्धियों को देने वाला है ।।१२०।। इसके
मुनि रामचन्द्र, छंद जगती, देवता हनुमान्, बीज हुं और शक्ति 'हृम्' है। छः दीर्घमात्राओं से युक्त बीजमन्त्र से
षडंगन्यास कर शैवरूपी हनुमान् का ध्यान करे कि वे महापर्वत को उखाड़ कर रावण के ऊपर टूट पड़े हैं। लाक्षा
(अलता) के समान उनका वर्ण लाल है। रूप कालांतक यम के समान उनका भयंकर है। कान्ति जाज्वल्यमान
अग्नि एवम् कोटि सूर्यों के समान है ।।१२१-१२३।। अङ्गद आदि महावीर उन रुद्र रूपी हनुमान् को घेरे रहते
हैं। रण में 'दुष्ट ! खड़ा रह !' इस तरह वे गर्जना करते हैं। ध्यानोपरान्त एक लाख मन्त्र का जप कर उसका
दशांश दूध, दही तथा घी मिलाये धान्य से हवन करे । इसके बाद पूर्वोक्त वैष्णव पीठ पर मूल मन्त्र से मूर्ति को
स्थापित कर हनुमान् की पूजा करे । इस मन्त्र के ध्यान मात्र से भी मनुष्यों को सिद्धि मिलती है, इसमें संशय
करने की आवश्यकता नहीं ।।१२४-१२६३।।
अब मैं लोगों के कल्याण की दृष्टि से हनुमान् की साधना बतलाता हूँ। उनकी साधना पवित्र, महापाप-
नाशक, गोपनीय तथा लोक में शीघ्र सिद्धिदायक है। उस साधन के प्रभाव से मनुष्य त्रैलोक्यविजयी होता है ।
प्रातःकाल स्नान कर नदी के तट पर कुशासन पर बैठ कर प्राणायाम करते हुए मूलमन्त्र से सविधि षडंगन्यास
६५१
चतुःसप्ततितमोऽध्यायः
प्राणायामषडंगे च मूलेन सकलं चरेत् । पुष्पांजल्यष्टकं दत्त्वा ध्यात्वा रामं ससीतकम् ॥१२७॥
ताम्रपात्रे ततः पद्ममष्टपत्रं सकेशरम् । कुचन्दनेन घृष्टेन संलिखेत्तच्छलाकया ॥१२८॥
कणिकायां लिखेन्मंत्रं तत्रावाह्य कपीश्वरम् । मूर्ति मूलेन संकल्प्य ध्यात्वा पाद्यादिकं चरेत् ॥१२९॥
गंधपुष्पादिकं सर्वं निवेद्य मूलमन्त्रतः । केसरेषु षडंगानि दलेषु च ततोऽर्चयेत् ॥१३०॥
सुग्रीवं लक्ष्मणं चैव ह्यंगदं नलनीलकौ । जांबवंतं च कुमुदं केसरीशं दलेऽर्चयेत् ॥१३१॥
दिक्पालांश्चापि वज्रादीन्पूजयेत्तदनंतरम् । एवं सिद्धे मनो मन्त्री साधयेत्स्वेष्टमात्मनि ॥१३२॥
नदीतीरे कानने वा पर्वते विजनेऽथवा । साधयेत्साधकश्रेष्ठो भूमिग्रहणपूर्वकम् ॥१३३॥
जिताहारो जितश्वासो जितवाक्च जितेंद्रियः । दिग्बन्धनादिकं कृत्वा न्यासध्यानादिपूर्वकम् ॥१३४॥
लक्षं जपेन्मंत्रराजं पूजयित्वा तु पूर्ववत् । लक्षांते दिवसं प्राप्य कुर्याच्च पूजनं महत् ॥१३५॥
एकाग्रमनसा सम्प्रध्यायत्वा पवननन्दनम् । दिवारात्रौ जपं कुर्याद्यावत्संदर्शनं भवेत् ॥१३६॥
सुदृढं साधकं मत्वा निशीथे पवनात्मजः । सुप्रसन्नस्ततो भूत्वा प्रयाति साधकाग्रतः ॥१४०॥
यथेप्सितं वरं दत्त्वा साधकाय कपीश्वरः । वरं लब्ध्वा साधकेंद्वो विहरेदात्मनः सुखैः ॥१४१॥
एतद्धि साधनं पुण्यं लोकानां हितकाम्यया । प्रकाशितं रहस्यं वै देवानामपि दुर्लभम् ॥१४२॥
अन्यानविप्रयोगांश्च साधयेदात्मनो हितान् । वियद्विन्दुयुतं पश्चाङेन्तं पवननंदनम् ॥१४३॥
वह्निप्रियान्तो मन्त्रोऽयं दशार्णः सर्वकामदः । मुन्यादिकं च पूर्वोक्तं षडंगान्यपि पूर्ववत् ॥१४४॥
ध्यायद्रेणे हनूमंतं सूर्यकोटिसमप्रभम् । धावंतं रावणं जेतुं दृष्ट्वा सत्वरमुत्थितम् ॥१४५॥
करे । तदनन्तर सीता सहित राम का ध्यान कर केसर के साथ घिसे हुए लाल चन्दन से उसी की शलाका द्वारा
ताम्रपात्र में अष्टदल कमल लिखे । कर्णिका मन्त्र लिखकर उस पर कपीश्वर का आवाहन करे ॥१२७-
१३१३॥ ध्यानपुरस्सर मूलमन्त्र से मूर्ति की प्रतिष्ठा कर पाद्य, गंध, पुष्प आदि सब कुछ मूलमन्त्र से ही समर्पित
करे । केसरों पर छः अङ्ग देवों और पत्रों पर सुग्रीव, लक्ष्मण, अङ्गद, नल, नील, जांबवंत, कुमुद, केसरोश दिक्पाल
तथा वज्र आदि की पूजा करे । इस प्रकार मन्त्र को सिद्ध कर मन्त्री इष्टसिद्धि करे । नदी तीर या वन या पर्वत
या विजनस्थान में साधक साधन प्रारंभ करे ॥१३२-१३६॥ जिताहार, जितश्वास, जितवाक् तथा जितेन्द्रिय
होकर न्यास, ध्यान तथा दिग्बंधन आदि करने के उपरान्त एक लाख मन्त्र जपकर पूर्ववत् पूजा करे । जिस
दिन मन्त्रजप पूर्ण हो जाय, उस दिन विशिष्ट पूजा करनी चाहिये । एकाग्रमन से अच्छी तरह पवननंदन का
ध्यान कर दिन-रात तब तक जप करते रहना चाहिये, जब तक दर्शन न हो । जब हनुमान् जो साधक को सुदृढ
समझते हैं, तब वे प्रसन्न होकर रात्रि में उसके आगे आते हैं और यथेच्छ वर प्रदान करते हैं । उत्तम साधक वर
प्राप्त कर सुख से विहरण करता है ॥१३७-१४१॥
यह साधना अत्युत्तम है । लोगों के कल्याण की कामना से मैंने इस रहस्य को प्रकाशित किया है, जो
देवताओं के लिये भी दुर्लभ है । आत्मकल्याण के लिये अन्य प्रयोगों को भी करना चाहिये । इन्दु (अनुस्वार)
युक्त वियत् (ह) अर्थात् (हं) के पश्चात् ङे विभक्त्यन्त पवननंदन शब्द हो और अन्त में वह्निप्रिया (स्वाहा)
हो तो (हं पवननंदनाय स्वाहा) यह दशाक्षर मन्त्र सकल कामनाओं को पूर्ण करता है। इसके मुनि आदि पूर्ववत्
ही हैं । षडंगन्यास आदि भी पहिले ही की तरह करे । तदनन्तर हनुमान् का ध्यान करे कि-उनकी कान्ति कोटि
सूर्यों के समान है । रण में भागते हुए रावण को देखकर शीघ्र ही उसका पीछा करने के लिये उठ खड़े हुए हैं ।
६५२ नारदीयपुराणम्
लक्ष्मणं च महावीरं पतितं रणभूतले । गुरुं च क्रोधमुत्पाद्य ग्रहीतुं गुरुपर्वतम् ॥१४६॥
हाहाकारैः सदर्पैश्च कंपयंतं जगत्त्रयम् । आब्रह्मांडं समाव्याप्य कृत्वा भीमं कलेवरम् ॥१४७॥
लक्षं जपेद्दशांशेन जुहुयात्पूर्ववत्सुधीः । पूर्ववत्पूजनम् प्रोक्तं मन्त्रस्यास्य विधानतः ॥१४८॥
एवं सिद्धे मनौ मन्त्री साधयेदात्मनो हितम् । अस्यापि मन्त्रवर्यस्य रहस्यं साधनं तु वै ॥१४९॥
सुगोप्यं सर्वतन्त्रेषु न देयं यस्य कस्यचित् । ब्राह्मे मुहूर्ते चोत्थाय कृतनित्यक्रियः शुचिः ॥१५०॥
गत्वा नदीं ततः स्नात्वा तीर्थमावाह्य चाष्टधा । मूलमन्त्रं ततो जप्त्वा सिंचेदादित्यसंख्यया ॥१५१॥
एवं स्नानादिकं कृत्वा गंगातीरेऽथवा पुनः । पर्वते वा वने वापि भूमिग्रहणपूर्वकम् ॥१५२॥
आद्यवर्णैः पूरकं स्यात्पञ्चवर्गैश्च कुम्भकम् । रेचकं च पुनर्ग्राह्यैरेवं प्राणान्नियम्य च ॥१५३॥
विधाय भूतशुद्ध्यादि पीठन्यासावधि पुनः । ध्यात्वा पूर्वोक्तविधिना संपूज्य च कपीश्वरम् ॥१५४॥
तदग्रे प्रजपेन्नित्यं साधकोऽयुतमादरात् । सप्तमे दिवसे प्राप्ते कुर्याच्च पूजनम् महत् ॥१५५॥
एकाग्रमनसा मन्त्री दिवारात्रं जपेन्मनुम् । महाभयं प्रदत्त्वा त्रिभागशेषामु निश्चितम् ॥१५६॥
यामिनीषु समायाति नियतं पवनात्मजः । यथेप्सितं वरं दद्यात्साधकाय कपीश्वरः ॥१५७॥
विद्यां वापि धनं वापि राज्यं वा शत्रुनिग्रहम् । तत्क्षणादेव चाप्नोति सत्यं सत्यं न संशयः ॥१५८॥
इह लोकेऽखिलान्कामान्भुक्त्वा॑ते मुक्तिमाप्नुयात् । सद्योचितं वायुयुग्मं हनूमंतेति चोद्धरेत् ॥१५९॥
फलांते फक्रियानेत्रयुक्ता च कामिका ततः । धग्गंते धगितेत्युक्त्वा आयुरास्व पदं ततः ॥१६०॥
रणभूमि में गिरे हुए महावीर लक्ष्मण को देखकर वे अत्यन्त क्रोध करते हैं तथा महाशैल को उखाड़ कर लाने
के लिये चल पड़ते हैं। उस समय तीनों लोक में हाहाकार मच जाता है । उनके भयानक शरीर को देख कर
ब्रह्मांड कांप उठता है । विद्वान् साधक एक लाख इस मन्त्र का जप कर पहिले की तरह उसका दशांश हवन करे।
इस मन्त्र की पूजा भी पूर्ववत् ही विधिपूर्वक करनी चाहिये ॥१४२-१४८॥
इस प्रकार मन्त्र सिद्ध कर लेने पर मन्त्री अपना इष्टसाधन करे। इस मन्त्र-राज का भी रहस्य एवम्
साधन समस्त तंत्रों में गुप्त करके रखा गया है। यह सबको नहीं बतलाना चाहिये। ब्राह्ममुहूर्त में उठकर नित्य
कर्म से निवृत्त हो, नदी में जाकर स्नान करे। आठ तीर्थों का आवाहन कर मूलमन्त्र को जपते हुए बारह बार
जल से अपने को सिक्त करे। पुनःस्नानोपरान्त गङ्गातीर या पर्वत या वन में आसन पर बैठ कर आद्य अक्षरों से
पूरक, पंचवर्गों से कुंभक और य आदि अक्षरों से रेचक प्राणायाम करे। पश्चात् पीठन्यास, भूतशुद्धि आदि कर
के पूर्वोक्त विधि से हनुमान् का ध्यानपूर्वक पूजन करे और उनके आगे नित्य आदरपूर्वक दश हजार मन्त्र
जपे। सातवें दिन महापूजा करनी चाहिये ॥१४९-१५५॥ साधक एकाग्रमन से दिन-रात मन्त्र को जपता रहे।
ऐसा करने से वह निर्भय हो जाता है। रात्रि में आकर हनुमान् जो उसे अभिलषित वर देते हैं। विद्या या धन या
राज्य या शत्रु निग्रह जो कुछ वह चाहता है, तत्काल उसे मिल जाता है। यह ध्रुव सत्य है, इसमें संशय करने की
आवश्यकता नहीं। वह साधक इस लोक में अखिल भोगों को भोग कर अन्त में मोक्ष पाता है ॥१५६-१५८॥
सद्योजात (ओ) सहित दो वायु (य् यू-यो यो) 'हनुमन्त' का उच्चारण करे। फिर 'फल' के अन्त में
'फ' तथा नेत्र (इ) युक्त क्रिया (ल) एवं कामिका (त) का उच्चारण करे। तत्पश्चात् 'धग्धगित' बोलकर
'आयुराष्' पद का उच्चारण करे । तदनन्तर लोहित (प) तथा 'रुद्राह' का उच्चारण करना चाहिए। मन्त्र--नों
यो यो हनुमन्त फल-फलितं धग्धगित आयुराष पड्डाह) यह २५ अक्षरों का मन्त्र है। इसके मुनि आदि तो पूर्वोक्त
६५३
चतुःसप्ततितमोऽध्यायः
लोहितो गरुडो हेतिर्वाणनेत्राक्षरो मनुः । मुन्यादिकं तु पूर्वोक्तं प्लीहरोगहरो हरिः ॥१६१॥
देवता च समुद्दिष्टा प्लीहयुक्तोदरे पुनः । नागवल्लीदलं स्थाप्यमुपर्याच्छादयेत्ततः ॥१६२॥
वस्त्रं चैवाष्टगुणितं ततः साधकसत्तमः । शकलं वंशजं तस्योपरि मुंचेत्कपिं स्मरेत् ॥१६३॥
आरण्यसानलोत्पन्ने वह्नौ यष्टिं प्रतापयेत् । बदरीभूरुहोत्थां तां मन्त्रेणानेन सप्तधा ॥१६४॥
तया संताडयेद्वंशशकलं जठरस्थितम् । सप्तकृत्वः प्लीहरोगो नाशमायाति निश्चितम् ॥१६५॥
तारो नमो भगवते आंजनेयाय चोच्चरेत् । अमुकस्य श्रृंखलां त्रोटय द्वितयमीरयेत् ॥१६६॥
बंधमोक्षं कुरुयुगं स्वाहांतोऽयं मनुर्मतः । ईश्वरोऽस्य मुनिश्च्छन्दोऽनुष्टुप्च देवता पुनः ॥१६७॥
श्रृंखलामोचकः श्रीमान्हनुमान्पवनात्मजः । हं बीजं ठद्वयं शक्तिर्बंधमोक्षे नियोगता ॥१६८॥
षड्दीर्घवह्निसंयुक्तेन बीजेनांगानि कल्पयेत् । बामे शैलं वेरिमदं विशुद्धं टंकमन्यतः ॥१६९॥
दधानं स्वर्णवर्णं च ध्यायेत्कुंडलिनं हरिम् । एवं ध्यात्वा जपेल्लक्षदशांशं चूतपल्लवैः ॥१७०॥
जुहुयात्पूर्ववत्प्रोक्तं यजनं वास्य सुरिभिः । महाकारागृहे प्राप्तो ह्ययुतं प्रजपेन्नरः ॥१७१॥
शीघ्रं कारागृहान्मुक्तः सुखी भवति निश्चितम् । यंत्रं चास्य प्रवक्ष्यामि बन्धमोक्षकरं शुभम् ॥१७२॥
अष्टच्छदांतः षट्कोणं साध्यनामसमन्वितम् । षट्कोणेषु ध्रुवं ङेऽतमांजनेयपदं लिखेत् ॥१७३॥
अष्टच्छदेषु विलिखेतप्रणवौ वातुद्वात्विति । गोरोचनाकुंकुमेन लिखित्वा यंत्रमुत्तमम् ॥१७४॥
धृत्वा मूर्ध्नि जपेन्मंत्रमयुतं बन्धमुक्तये । यन्त्रमेतल्लिखित्वा तु मृत्तिकोपरि मार्जयेत् ॥१७५॥
दक्षहस्तेन मन्त्रज्ञः प्रत्यहं मंडलावधि । एवं कृते महाकारागृहान्मंत्री विमुच्यते ॥१७६॥
मन्त्र के समान ही हैं। परन्तु देवता प्लीहरोग (प्लीहा) का हरण करने वाले हरि हैं ॥१५९-१६१॥ जिसके पेट
में यह रोग हो उसके पेट पर पान का पत्ता रख आठ (तहके) वस्त्रों से उसे ढांक दे। फिर हनुमान् का ध्यान
कर बाँस का एक टुकड़ा उस पर रख छोड़े। अनन्तर इस मन्त्र को पढ़ते हुए बेर की लाठी से सात बार उस टुकड़े
का ताड़न करे। वह लाठी दावाग्नि में तपी होनी चाहिये। उससे उदरस्थित वंशखंड का सात बार ताड़न करने
से प्लीहा निश्चय छूट जातो है ॥१६२-१६५॥ "ओं नमो भगवते आंजनेयाय, अमुकस्य श्रृंखलां त्रोटय, बंधमोक्षं
कुरु युगं स्वाहा" यह मन्त्र है। इसके मुनि ईश्वर, छंद अनुष्टुप् और देवता श्रृंखला (बंधन) को तोड़ने वाले
वायुसुत श्रीमान् हनुमान् हैं। इसका बीज 'हं' है और शक्ति ठद्वय। बंधनमोक्ष में इसका नियोग किया जाता है,
छः दीर्घ मात्रा और वह्नियुक्त बीज से अंगन्यास करना चाहिये। तत्पश्चात् बाँयें हाथ पर पर्वत और दाहिने हाथ
में गदा धारण करने वाले स्वर्णवर्ण हनुमान् का ध्यान करे, जिनके कानों में कुण्डल सुशोभित होते हैं। ध्यानोपरान्त
इस मन्त्र का एक लाख जप करे और उसका दशांश आम्रपल्लवों से हवन करे। विद्वान् साधक इस मन्त्र का
पूजन आदि पूर्व मन्त्र की तरह करे। जो मनुष्य कारागार में पड़ा है, वह दश हजार इस मन्त्र के जप
करने से शीघ्र कारागार से मुक्त होकर सुखी होता है ॥१६७-१७१॥ इसका यंत्र भी मैं बता देता हूँ, जो शुभकारी
तथा बंधन से छुड़ाने वाला है। अष्टदल कमल के भीतर षटकोण बनाकर उनकी कर्णिका में साध्य पुरुष का नाम
लिखे। छह कोणों में 'ओं आञ्जनेयाय' का उल्लेख करे। अष्टपत्रों पर प्रणव तथा 'वातु, वातु' लिखना चाहिये।
बंधन से मुक्ति पाने के लिये गोरोचन तथा कुंकुम से इस उत्तम यंत्र को लिखकर मस्तक पर धारण करके
उक्त मन्त्र का दश हजार जप करे। इस मन्त्र को लिख कर साधक प्रति दिन दाहिने हाथ से मिट्टी के ऊपर
मंडलाकार में इसे घुमाये। ऐसा करने से वह कारागार से मुक्त हो जाता है ॥१७२-१७६॥ गगन (ह), नेत्र (इ)
६५४ नारदीयपुराणम्
गगनं ज्वलनः साक्षी मर्कटेति द्वयं ततः । तोयं शशेषे मकरे परिमुंचति मुंचति ॥१७७॥
ततः शृंखलिकां चेति वेदनेत्राक्षरो मनुः । इमं मंत्रं दक्षकरे लिखित्वा वामहस्ततः ॥१७८॥
दूरीकृत्य जपेन्मंत्रमष्टोत्तरशतं बुधः । विसप्ताहात्प्रबद्धोऽसो मुच्यते नात्र संशयः ॥१७९॥
मुन्याद्यर्वादिकं सर्वमस्य पूर्ववदाचरेत् । लक्षं जपो दशांशेन शुभैर्द्रव्यैश्च होमयेत् ॥१८०॥
पुच्छाकारे सुवस्त्रे च लेखन्या खुरकोत्थया । गन्धाष्टकैर्लिखेद्रूपं कपिराजस्य सुन्दरम् ॥१८१॥
तन्मध्येऽष्टदशार्णं तु शत्रुनामान्वितं लिखत् । तेन मन्त्राभिजप्तेन शिरोबध्देन भूमिपः ॥१८२॥
जयत्यरिगणं सर्वं दर्शनादेव निश्चितम् । चन्द्रसूर्योपरागादौ पूर्वोक्तं लेखयेद्ध्वजे ॥१८३॥
ध्वजमादाय मन्त्रतः संस्पर्शान्मोक्षणावधि । मातृकां जापयेत्पश्चाद्दशांशेन च होमयेत् ॥१८४॥
तिलैःसर्षपसंमिश्रैः संस्कृते हव्यवाहने । गजे ध्वजं समारोप्य गच्छेद्युद्धाय भूपतिः ॥१८५॥
गजस्थं तं ध्वजं दृष्ट्वा पलायन्तेऽरयो ध्रुवम् । महारक्षाकरं यन्त्रं वक्ष्ये सम्यग्धनूमतः ॥१८६॥
लिखेद्द्षदलं पद्मं साध्याख्यायुक्तकर्णिकम् । दलेऽष्टकोणमालिख्य मालामन्त्रेण वेष्टयेत् ॥१८७॥
तद्वहिर्माययावेष्ट्य प्राणस्थापनमाचरेत् । लिखितं स्वर्णलेखन्या भूर्जपत्रे सुशोभने ॥१८८॥
काश्मीररोचनाभ्यां तु त्रिलोहेन च वेष्टितम् । सम्पातसाधितं यंत्रं भुजे वा मूर्ध्नि धारयेत् ॥१८९॥
रणे दुरोदरे वादे व्यवहार जयं लभेत् । ग्रहैर्विघ्नैर्विषैः शस्त्रैश्चौरैर्नैवाभिभूयते ॥१९०॥
सर्वान्रोगानपाकृत्य चिरं जीवेच्छतं समाः । षड्दीर्घयुक्तं गगनं वह्निचाढ्यं तारसंपुटम् ॥१९१॥
युक्त ज्वलन (र) अर्थात् हरि पद के पश्चात् दो बार 'मर्कट' शब्द बोलकर शेष (आ) सहित तोय (व) अर्थात्
'वा' का उच्चारण करके 'मकरे' पद बोले । फिर 'परिमुञ्चति मुञ्चति शृङ्खलिकाम्' का उच्चारण करे ।
पूरा मन्त्र-(हरि मर्कट मर्कट वाम करे परिमुञ्चति शृङ्खलिकाम्) यह २४ अक्षरों का मन्त्र है। इसको बाँये
हाथ से लिख कर दाहिने हाथ में धारण करके एक सौ आठ बार जप करे । तीन सप्ताह ऐसा करने से बंधन
से मुक्ति मिल जाती है इसमें संशय नहीं । इसके मुनि आदि पूर्ववत् हैं। अर्चना आदि भी पूर्ववत् ही करनी
चाहिये । एक लाख मन्त्र जप करने के उपरान्त उसका दशांश पवित्र द्रव्यों से हवन करे । खुर की बनाई हुई
लेखनी से पुच्छाकार सुवस्त्र पर अष्टगन्धों से कपिराज का सुन्दर चित्र बनाये ।।१७७-१८१।।
उसके मध्य में शत्रुनाम सहित अट्ठारह अक्षरों वाला मन्त्र लिखे । पुनः मन्त्र से अभिमंत्रित कर उसे शिर
में बांध ले । ऐसा करने वाला राजा शत्रुसमूह को देखते ही जीत लेता है, यह निश्चित बात है । चन्द्र-सूर्य-ग्रहण
के समय पूर्वोक्त मन्त्र को पताका पर लिख कर स्पर्श से लेकर मोक्षकाल पर्यन्त उसका धारण करते हुए मातृका
जप करे । पश्चात् सुसंस्कृत अग्नि में तिलमिश्रित सरसों से हवन कर उस पताका को हाथी पर फहराये और
फिर उस हाथी पर चढ़कर राजा युद्ध करने के लिये जाय । रणभूमि में हाथी पर फहराते हुए उस पताका को
देखते ही शत्रु भाग जाते हैं ।।१८२-१८५३॥
अब मैं महारक्षाकारी हनुमान् के मन्त्र को बतलाता हूँ । कर्णिका सहित अष्टदलकमल लिख कर उस
पर साध्य का नाम लिखे । पुनः पत्रों पर अष्टकोण लिखकर मालामन्त्र से उसे वेष्टित करे । उसके बाहर माया
बीज से आवृत कर प्राणप्रतिष्ठा करे । सुन्दर भोजपत्र पर सोने की लेखनी से यंत्र लिखना चाहिये । गोरोचन तथा
कुंकुम से यदि लिखे तो त्रिलोह से उसे वेष्टित कर दे । जो इस प्रकार संसाधित यंत्र को भुजा या मस्तक पर
धारण करता है, वह घोर संग्राम, शास्त्रार्थ तथा व्यवहार में विजयी होता है। उसके ऊपर ग्रह, विघ्न, विष, शस्त्र
तथा चोरों का प्रभाव नहीं पड़ता । वह समस्त व्याधियों से मुक्त होकर सौ वर्ष जीता है ।।१८६-१९०३॥ यह
दीर्घ स्वर से युक्त गगन (ह) और वह्नि (र) को तार (ओ) से संपुटित कर देने से आठ अक्षरों का महामन्त्र
६५५
चतुःसप्ततितमोऽध्यायः
अष्टार्णोऽयं महामंत्रो मालामंत्रोऽथ कथ्यते । प्रणवो वज्रकायेति वज्रतुंडेति संपठेत् ॥१६२॥
कपिलांते पिंगलेति ऊर्ध्वकेशमहापदम् । बलरक्तमुखांते तु तडिज्जिह्व महा ततः ॥१६३॥
रौद्रदंष्ट्रोत्कटं पश्चात्कहद्वंद्वं करालिति । महद्दृढप्रहारेण लंकेश्वरवधाततः ॥१६४॥
वायुमंहासेतुपदं बंधांते च महा पुनः । शैलप्रवाह गगनेचर एह्येहि संवदेत् ॥१६५॥
भगवन्महाबलांते पराक्रमपदं वदेत् । भैरवाज्ञापयैह्येहि महारौद्रपदं ततः ॥१६६॥
दीर्घपुच्छेन वर्णांते वद्वेष्टय वैरिणम् । जंभयद्वयमाभाष्य वर्मस्त्रांतो मनुर्मतः ॥१६७॥
मालाह्वयो द्विजश्रेष्ठ शरनेत्रधराक्षरः । मालामंत्राष्टांर्णयोश्च मुन्याद्यर्चा तु पूर्ववत् ॥१६८॥
जप्तो युद्धे जयं दद्याद्व्याधौ व्याधिविनाशनः । एवं यो भजते मंत्री वायुपुत्रं कपिश्वरम् ॥१६९॥
सर्वांन्स लभते कामान्देवेरपि सुदुर्लभान् । धनं धान्यं सुतान्पौत्रान्सौभाग्यमतुलं यशः ॥२००॥
मेधां विद्यां प्रभां राज्यं विवादे विजयं तथा । वश्याद्यानि च कर्माणि संगरे विजयं तथा ॥२०१॥
उपासितोऽञ्जनागर्भसंभूतः प्रददात्यलम् । ॥२०२॥
इति श्रीबृहन्नारदीयपुराणे पूर्वभागे बृहदुपाख्याने सनत्कुमारविभागे तृतीयपादे
हनुमन्मंत्रकथनं नाम चतुःसप्ततितमोऽध्यायः ॥७४॥
बनता है। अब मालामन्त्र को बताता हूँ। प्रणव (ओं) के बाद वज्रकाय और वज्रतुण्ड का पाठ करे। उसके बाद
क्रमशः कपिल, पिंगल, ऊर्ध्वकेश, बलरक्तमुख, तडिज्जह्व, रौद्रदंष्ट्र, कट, कहद्वन्द्व, कराल, महद्दृढप्रहारेण
लंकेश्वरवधाततः। वायुमंहासेतुपदं बंधांते च महा पुनः । शैलप्रवाह, गगनेचर एहि एहि मह उच्चारंण करने
के बाद 'भगवन्' महाबल, महापराक्रम, भैरव, आज्ञापय, एहि एहि, महारौद्र। दीर्घपुच्छेन वैरिणं वेष्टय,
द्वयं जम्भय, यह कहने के बाद 'हूं' तथा 'फट्' जोड़ देना चाहिए। द्विजश्रेष्ठ ! इस मालामन्त्र के तथा अष्टाक्षर
मन्त्र के मुनि आदि पूर्ववत् हैं और अर्चना आदि भी पूर्ववत् ही करनी चाहिये। युद्ध में इसका जप करने से विजय
प्राप्त होती है और व्याधिनिवारणार्थ जपने से रोग का नाश होता है। जो व्यक्ति पूर्वोक्त रीति से वायुपुत्र
हनुमान् की आराधना करता है, उसे देवदुर्लभ कामनाओं की प्राप्ति होती है। धन, धान्य, पुत्र, पौत्र, सौभाग्य
तथा अतुलनीय यश उसे लाभ होता है। अंजना के गर्भ से उत्पन्न होने वाले हनुमान् का उपासक प्रचुर मेधा,
विद्या, प्रभा, राज्य, विवाद में विजय, रण में विजय और वशीकरण आदि सिद्धियों को प्राप्त करता
है॥१९१-२०२॥
श्रीनारदीयपुराण के बृहदुपाख्यानयुक्त पूर्वार्ध में सनत्कुमार-विभागीय तृतीयपाद में हनुमन्मन्त्रकथन नामक
चौहत्तरवां अध्याय समाप्त ॥७४॥
पञ्चसप्ततितमोऽध्यायः
सनत्कुमार उवाच
अथ दीपविधिं वक्ष्ये सरहस्यं हनूमतः । यस्य विज्ञानमात्रेण सिद्धो भवति साधकः ॥१॥
दीपपात्रप्रमाणं च तैलमानं क्रमेण तु । द्रव्यस्य च प्रमाणं वै तत्तु जानमनुक्रमात् ॥२॥
स्थानभेदं च मंत्रं च दीपदानमनुं पृथक् । पुष्पवासिततैलेन सर्वकामप्रदं मतम् ॥३॥
तिलतैलं श्रियः प्राप्त्यै पथिकागमनं प्रति । अतसीतैलमुद्दिष्टं वश्यकर्मणि निश्चितम् ॥४॥
सार्षपं रोगनाशाय कथितं कर्मकोविदैः । मारणे राजिकोत्थं वा विभीतकसमुद्भवम् ॥५॥
उच्चाटने करंजोत्थं विद्वेषे मध्वृक्षजम् । अलाभे सर्वतैलानां तिलजं तैलमुत्तमम् ॥६॥
गोधूमाश्च तिला माषा मुद्गा वै तंडुलाः क्रमात् । पंचधान्यमिदं प्रोक्तं नित्यदीपं तु मारुतेः ॥७॥
पंचधान्यसमुद्भूतं पिष्टमात्रं सुशोभनम् । सर्वकामप्रदं प्रोक्तं सर्वदा दीपदानके ॥८॥
वश्ये तंडुलपिष्टोत्थं मारणे माषपिष्टजम् । उच्चाटने कृष्णतिलपिष्टजं च प्रकीर्तितम् ॥९॥
पथिकागमने प्रोक्तं गोधूमोत्थं सतंडुलम् । मोहने त्वाढकीजातं विद्वेषे च कुलत्थजम् ॥१०॥
अध्याय ७५
हनुमान् के लिए दीपदान का विधान
सनत्कुमार बोले--अब इसके उपरान्त हनुमान् के उद्देश्य से दीपदान करने का विधान रहस्य सहित
बता देता हूँ, जिसके ज्ञानमात्र से साधक सिद्ध हो जाता है। दीपदान का प्रमाण, तेल का मान तथा द्रव्य का
प्रमाण मैं अनुक्रम से बतलाऊँगा। दीपदान के विविध स्थान तथा मन्त्र को भी कहूँगा। पुष्प-वासित तेल से दीपक
को जलाना समस्त अभिलाषाओं को पूर्ण करने वाला है। तिल के तेल से दीप जलाने से श्री प्राप्त होती है
और पथिक (बटोही) सकुशल मार्ग को तय करता है। वशीकरण के लिये अलसी का तेल कहा गया है ॥१-४॥
कर्म के ज्ञाताओं ने रोगनाश के लिये सरसों का तेल बतलाया है। मारण में पीले सरसों या बहेड़ा का तेल प्रयोग
कर सकते हैं। उच्चाटन में करंज का तेल और विद्वेष में महुए का तेल व्यवहार करना चाहिये। समस्त तेलों
के अभाव में तिल का तेल ही उत्तम माना गया है। गेहूँ, तिल, उड़द, मूंग और चावल--इन पाँचों अन्नों का
बनाया हुआ दीप नित्यदीप के रूप में हनुमान् को समर्पित किया जाता है ॥५-७॥ पञ्चधान्यों को पीस कर
उससे बनाया गया सुन्दर दीप सकल कामनाओं को देने वाला है। वह सदा दीपदान के लिये प्रशस्त माना गया
है। चावल के पिसान का बनाया दीप वशीकरण में, उड़द का मारण में, काले तिल का उच्चाटन में, चावल
मिश्रित गेहूँ का यात्री के सकुशल लौट आने में, अरहर का मोहन में, कुलथी का विद्वेष में, केवल उड़द का संग्राम
६५७
पञ्चसप्ततितमोऽध्यायः
संग्रामे केवला माषाः प्रोक्ता दीपस्य पात्रके । संधौ त्रिपिष्टजं लक्ष्मीहेतोः कस्तूरिकामवम् ॥११॥
एलालवंगकर्पूरमृगनाभिसमुद्भवम् । कन्याप्राप्त्यै तथा राजवश्ये सख्ये तथैव च ॥१२॥
अलाभे सर्ववस्तूनां पंचधान्यं वरं स्मृतम् । अष्टमुष्टिर्भवेत्कुञ्चित्कुञ्चिदष्टौ च पुष्कलम् ॥१३॥
पुष्कलानां चतुर्णां च ह्याढकः परिकीर्तितः । चतुराढको भवेद्द्रोणः खारी द्रोणचतुष्टयम् ॥१४॥
खारीचतुष्टयं प्रस्थसंज्ञा च परिकीर्तिता । अथवान्यप्रकारेण मानमत्र निगद्यते ॥१५॥
पलद्वयं तु प्रसृतं द्विगुणं कुडवं मतम् । चतुर्भिः कुडवैः प्रस्थस्तैश्चतुर्भिस्तथाढकः ॥१६॥
चतुराढको भवेद्द्रोणः खारी द्रोणचतुष्टयम् । क्रमेणैतेन ते ज्ञेयाः पात्रे षट्कर्मसंभवे ॥१७॥
पञ्च सप्त नव तथा प्रमाणास्ते यथाक्रमम् । सौगन्धे नैव मानं स्यात्तद्यथारुचि संमतम् ॥१८॥
नित्यपात्रे तु तैलानां नियमो वार्तिकोद्भवः । सोमवारे गृहीत्वा तद्धान्यं तोयप्लुतं घरेत् ॥१९॥
पश्चात्प्रमाणतो ज्ञेयं कुमारीहस्तपेषणम् । तत्पिष्टं शुद्धपात्रे तु नदीतोयेन पीडितम् ॥२०॥
दीपपात्रं ततः कुर्याच्छुद्धः प्रयतमानसः । दीपपात्रे ज्वाल्यमाने मारुतेः कवचं पठेत् ॥२१॥
शुद्धभूमौ समास्थाप्य भौमे दीपं प्रदापयेत् । मालामन्तूनां ये वर्णाः साध्यनामसमन्विताः ॥२२॥
वर्तिकायां प्रकर्त्तव्यास्तंतवस्तत्प्रमाणकाः । तंस्त्रिंशंशेन वा ग्राह्या गुरुकार्येऽखिलाढ्यता ॥२३॥
कूटतुल्याः स्मृता नित्ये सामान्येऽथ विशेषके । रुद्राः कूटगणाः प्रोक्ता न पात्रे नियमो मतः ॥२४॥
एकविंशतिसंख्याकास्तन्तवोऽथाध्वनि स्मृताः । रक्तसूत्रं हनुमतो दीपदाने प्रकीर्तितम् ॥२५॥
कृष्णमुच्चाटने द्वेषेऽरुणं मारणकर्मणि । कूटतुल्यपलं तैलं गुरुकार्ये शिवैर्गुणम् ॥२६॥
त्रिपिष्ट (?) का संधि करने में, कस्तूरी का लक्ष्मी प्राप्ति में, और इलायची, लवंग तथा कपूर का कन्या-प्राप्ति,
मित्रता तथा राजा के वशीकरण में उपयोग करना चाहिये । अन्य सब वस्तुओं के न मिलने पर पञ्चधान्य उत्तम माना
गया है । आठ मुट्ठियों की एक कुञ्चि १ होती है, आठ कुञ्चियों का एक पुष्कल, १ चार पुष्कलों का एक आढक,
चार आढकों का एक द्रोण, चार द्रोणों की एक खारी और चार खारियों का एक प्रस्थ होता है । अथवा इस संबन्ध
में अन्य प्रकार का भी मान कहा गया है । १८-१५॥ दो पलों २ का एक प्रसृत, दो प्रसूतों का एक कुडव, चार
कुडवों का एक प्रस्थ, चार प्रस्थों का एक आढकं, चार आढकों का एक द्रोण और चार द्रोणों की एक खारी होती है।
इस क्रम से षट्कर्मोपयोगी पात्र में ये मान समझने चाहिए । पाँच, सात तथा नौ-ये क्रमशः दीपक के प्रमाण
हैं । सुगंधित तेल से जलने वाले दीपक का कोई मान नहीं है। उसका मान अपनी रुचि के अनुसार ही माना
गया है। तेलों के नित्य पात्र में केवल बत्ती का विशेष नियम होता है। सोमवार को धान्य लेकर उसे जल में
डुबोकर रखे । फिर प्रमाण के अनुसार कुमारी के हाथ से उसे पिसा कर शुद्ध पात्र में नदी के जल से उसे गूंधे
॥१६-२०॥ तदनन्तर पवित्र मन से दीपपात्र तैयार कर उसे जला कर हनुमान् का कवच पाठ करे। मंगल दिन
पवित्र भूमि पर दीपक को रख कर दान करे। साध्यनाम सहित मालाओं में जितने अक्षर हैं उतने ही तंतु (सूत)
दीपक की बत्ती में होने चाहिये । अथवा अक्षरों के तीसवें अंश के बराबर (अर्थात् तीस अक्षरों को छोड़कर बचे
अक्षरों के प्रमाण) तंतुओं को रखे। भारी काम करना हो तो पूर्व प्रमाण के ही अनुसार तंतु रखना चाहिये ।
नित्यपात्र में कूटतुल्य (ग्यारह) और विशेषपात्र में पूर्व कथितानुसार तंतु रखे। कूट ग्यारह संख्या को कहते हैं।
पात्र में कोई नियम नहीं है। रास्ते पर जलाये जाने वाले दीपक की बत्ती में इक्कीस तंतु चाहिये । हनुमान् को
समर्पित किये जाने वाले दीप की बत्ती लाल रंग की होनी चाहिये। उच्चाटन कार्य के लिये काले रंग की और
१-ये सब मान (तौल) के भेद हैं। २. आठ रत्ती और दो मासे की तोल ।
८३ ना० पृ०
६५८ नारदीयपुराणम्
॥२७॥
नित्ये पंचपलं प्रोक्तमथवा मानसी रुचिः
हनुमत्प्रतिमायास्तु सन्निधौ दीपदापनम् । शिवालयॆऽथवा कुर्यान्नित्यनैमित्तिके स्थले ॥२८॥
विशेषोऽस्त्यत्र यः कश्चिन्मारुतेरुच्यते मया ॥२६॥
प्रतिमाये प्रमोदेन ग्रहभूतग्रहेषु च । चतुष्पथे तथा प्रोक्तं षट्सु दीपप्रदापनम् ॥३०॥
सन्निधौ स्फाटिके लिंगे शालग्रामस्य सन्निधौ । नानाभोगश्रियै प्रोक्तं दीपदानम् हनूमतः ॥३१॥
गणेशसन्निधौ विघ्नमहाकंटकनाशने । विषव्याधिभये घोरे हनुमत्सन्निधौ स्मृतम् ॥३२॥
दुर्गायाः सन्निधौ प्रोक्तं संग्रामे दोपदानम् । चतुष्पथे व्याधिनष्टौ दुष्टदृष्टौ तथैव च ॥३३॥
राजद्वारे बंधमुक्तौ कारागारेऽथवा मतम् । अश्वत्थवटमूले तु सर्वकार्यप्रसिद्धये ॥३४॥
वश्ये भये विवादे च वेश्मसंग्रामसंकटे । द्यूते दृष्टेस्तंभने च विद्वेषे मारणे तथा ॥३५॥
मृतकोत्थापने चैव प्रतिमाचालने तथा । विचे व्याधौ ज्वरे भूतग्रहे कृत्याविमोचने ॥३६॥
क्षतग्रंथौ महारण्ये दुर्गे व्याघ्रे च दंतिनि । क्रूरसत्त्वेषु सर्वेषु शश्वद्बंधविमोक्षणे ॥३७॥
पथिकागमने चैव दुःस्थाने राजमोहने । आगमे निर्गमे चैव राजद्वारे प्रकीतितम् ॥३८॥
दीपदानं हनुमतो नात्र कार्या विचारणा ॥३६॥
रुद्रैर्कावशत्पिडांश्च त्रिधा मंडलमानकम् । लघुमानं स्मृतं पंच सप्त वा नव वा तथा ॥४०॥
क्षीरेण नवनीतेन दध्ना वा गोमयेन च । प्रतिमाकरणं प्रोक्तं मारुतेर्दीपदापने ॥४१॥
दक्षिणाभिमुखं वीरं कृत्वा केसरिविक्रमम् ॥४२॥
द्वेष तथा मारण कर्म के लिये लाल रंग की बत्ती बनाये। किसी महान् कार्य की सिद्धि करनी हो तो ग्यारह
पलों के प्रमाण से तेल दीपक में डाले। नित्यदीप में पाँच पल अथवा जितनी रुचि हो उतना तेल डाले। हनुमान्
को प्रतिमा के समीप में दीपदान करना चाहिये ॥२५-२७१/२॥ शिवालय में या नित्य-नैमित्तिक स्थान में दीपदान
कर सकते हैं। इस दोपदान के सन्दर्भ में जो विशेष बातें हैं, वह मैं बतलाता हूँ ॥२१-२९॥
प्रतिमा के आगे हर्षपूर्वक दीप समर्पण करे। इससे दुष्ट ग्रहों एवम् भूतों का उपद्रव शान्त होता है।
चौराहे पर, स्फटिकमय शिवलिंग के समीप तथा शालग्राम के निकट दीप चढ़ाना चाहिये। हनुमान् को दीपक
चढ़ाने से विविध प्रकार के भोग तथा श्री की प्राप्ति होती है। गणेश के समीप दीपदान करने से विघ्न तथा
महासंकट का नाश होता है। भयंकर व्याधि तथा विष का भय दूर करना हो तो हनुमान् को दीप समर्पित
करे ॥३०-३२॥ दुर्गा को दीपदान करने से संग्राम में विजय प्राप्त होती है। चौराहे पर दीप जलाने से व्याधि
एवम् दृष्टि दोष नष्ट हो जाता है। राजद्वार पर दोप जलाने से बंधनमुक्ति या कारागार से मुक्ति मिलती है ॥३३३॥
पीपल तथा वटवृक्ष के मूल में दीप जलाने से अशेष कार्यों की सिद्धि होती है। वशीकरण, भय, विवाद, घरेलू
संकट, रण-संकट, द्यूत, दृष्टि-दोष-निवारण, विद्वेष, मारण, मृतकोत्थापन, प्रतिमाचालन, विष, व्याधि, ज्वर,
भूतग्रह, कृत्यामोचन, विस्फोटक, महारण्य, दुर्गम स्थान, बाघ, हाथी तथा भयानक जन्तुओं के भय, बंधनमोचन,
पथिक के आगमन, दुष्ट स्थान, राजमोहन और राजद्वार में प्रवेश तथा निर्गमन-इन कार्यों में हनुमान् को
दीपदान करने से सफलता मिलती है, इसमें विचार करने की आवश्यकता नहीं। ग्यारह, इक्कीस और पिण्ड-तीन
प्रकार का मण्डलमान होता है। पाँच, सात अथवा नौ-इन्हें लघुमान कहा गया है ॥३४-४०॥ दीपदान के समय
दूध या मक्खन या दही या गोबर से हनुमान् की प्रतिमा बनानी चाहिये। दीवाल पर या वस्त्र पर या पीठ पर
वायुनन्दन का ऐसा चित्र बनाये, जो वीर तथा सिंह तुल्य पराक्रमी दिखाई पड़े, जिसका मुख दक्षिण दिशा की
पञ्चसप्ततितमोऽध्यायः ६५६
ऋक्षविन्यस्तपादं च किरीटेन विराजितम् । लिखेदिमत्तौ पटे वापि पीठे वा मारुतेः शुभे ॥४३॥
मालामंत्रेण दातव्यं दीपदानं हनूमतः । नित्यदीपः प्रकर्त्तव्यो द्वादशाक्षरविद्यया ॥४४॥
विशेषस्तत्र यस्तं वै दीपदानेऽवधारय । षष्ठ्यादौ च द्वितीयादाविमं दीपमितोरयेत् ॥४५॥
गृहाणेति पदं पश्चाच्छेषं पूर्ववदुच्चरेत् । कूटार्दो नित्यदीपे च मंत्रं सूर्याक्षरं वदेत् ॥४६॥
तत्र मालाद्वयमनुना तत्तत्कार्येषु कारयेत् । गोमयेनोपलिप्तायां भूमौ तद्गतमानसः ॥४७॥
षट्कोणं वमुपत्रं च भूमौ रेखासमन्वितम् । कमलं च लिखेद्भद्रं तत्र दीपं निधापयेत् ॥४८॥
शैवे वा वैष्णवे पीठे पूजयेदंजनासुतम् । कूटषट्कं च षट्कोणे अंतराले परं लिखेत् ॥४६॥
षट्कोणेषु षडंगानि बीजयुक्तानि संलिखेत् । सौम्यं मध्यगतं लेख्यं तत्र संपूज्य मारुतिम् ॥५०॥
षट्कोणेषु षडंगानि नामानि च पुरोक्तवत् । वसुपत्रे क्रमात्पूज्या अष्टावेते च वानराः ॥५१॥
सुग्रीवायांगदायाथ सुषेणाय नलाय च । नीलायाथो जांबवते प्रहस्ताय तथैव च ॥५२॥
सुवेषाय ततः पश्चाद्यजेत्षडंगदेवताः । आदावंजनापुत्राय ततश्च रुद्रमूर्तये ॥५३॥
ततो वायुसुतायाथ जानकीजीवनाय च । रामदूताय ब्रह्मास्त्रनिवारणाय तत्परम् ॥५४॥
पंचोपचारैः संपूज्य देशकालौ च कीर्तयेत् । कुशोदकं समादाय दीपमंत्रं समुच्चरेत् ॥५५॥
उत्तराभिमुखो जप्त्वा साधयेत्साधकोत्तमः । तं मंत्रं कूटघा जप्त्वा जलं भूमौ विनििक्षिपेत् ॥५६॥
ततः करपुटं कृत्वा यथाशक्ति जपेन्मनुम् । अनेन दीपवर्येण उदङ्मुखगतेन वै ॥५७॥
तथा विधेहि हनुमन्ममस्युर्न मनोरथाः । त्रयोदशैव द्रव्याणि गोमयं मृत्तिका मसी ॥५८॥
ओर हो, पैर ऋक्ष (एतन्नामक पर्वत या रीछ ?) पर अवस्थित हो और मस्तक मुकुट से सुशोभित हो । हनुमान्
को दीपदान मालामन्त्र से करना चाहिये । परन्तु नित्यदीप का दान द्वादशाक्षर मन्त्र से करे ॥४१-४४॥
अब दीपदान के संबन्ध में जो विशेष बातें हैं, उन्हें सुन लो । षष्ठी, द्वितीया आदि तिथियों में 'यह दीप
स्वीकार कीजिये' यह कहकर शेष क्रिया पहिले ही की तरह करनी चाहिये । कूटदीप (राजद्वार आदि पर दिये
जाने वाले दीप) तथा नित्यदीप दान करने के समय द्वादशाक्षर मन्त्र को पढ़े । अन्य दीपों के दान में तो माला
मन्त्र से ही काम लेना चाहिये । गोबर से लिपी हुई भूमि पर एकाग्रचित्त हो षट्कोण अंकित करे । उसके बाह्य
भाग में अष्टदल कमल बनावे तथा उसके बाह्य भाग में भूपुर-रेखा खींचे। उस कमल में दीपक रखे । शैव अथवा
वैष्णव पीठ पर अञ्जनीनन्दन हनुमान् की पूजा करे । छह कोणों के अन्तराल में 'ह्रीं ह्स्फें स्फ्रें ह्स्त्रौं हुस्ख्फ्रें
ह्सौं' इन छह कूटों का उल्लेख करे ।।४-४६।। छहो कोणों में वीज युक्त षडंग देवताओं का मन्त्र लिख कर मध्य
में चन्द्रमन्त्र लिखे । उस पर वायुपुत्र को पूजा कर षट्कोण में षडंगदेवों के नाम भी पूर्वोक्त प्रकार से लिखे ।
अनन्तर अष्टदल पर सुग्रीव, अंगद, सुषेण, नल, नील, जांबवान, प्रहस्त तथा सुवेष नामक आठो बन्दरों का क्रमशः
पूजन करे । तत्पश्चात् षडंगदेवताओं को भी पूजा करनी चाहिये । पहिले अंजनिपुत्र की अर्चना कर क्रमशः रुद्र-
मूर्ति, वायुसुत, जानकीजीवन, रामदूत तथा ब्रह्मास्त्रनिवारक का पंचोपचार पूजन करे । तब देश, काल का
उच्चारण कर कुश, जल लेकर दीपमन्त्र को पढ़े । उत्तम साधक उत्तर मुंह होकर पाँच बार इस मन्त्र को जप
कर भूमि पर जल गिरा दे । तदुपराम्त अंजलि बांध कर यथाशक्ति मन्त्र का जप करते हुए प्रार्थना करे - "हे
हनुमान् जो ! इस उत्तराभिमुख मनोरम दोप के दान से मेरे सकल मनोरथ पूर्ण हों।" ॥५०-५७३॥
(हनुमान् की पूजा का दूसरा विधान इस तरह है कि) गांबर, मिट्टी, स्याही, महावर, दरद (खस),
६६० नारदीयपुराणम्
अलक्तं दरदं रक्तचंदनं चंदनं मधु । कस्तूरिका दधि क्षीरं नवनीतं घृतं तथा ॥५८॥
गोमयं द्वि विधं तत्र प्रोक्तं गोमहिषीभवम् । पश्चाद्विनष्टद्रव्याप्तौ माहिषं गोमयं स्मृतम् ॥६०॥
पथिकागमने दूरान्महादुर्गस्य रक्षणे । बालादिरक्षणे चैव चौरादिभयनाशने ॥६१॥
स्त्रीवश्यादिषु कार्येषु शस्तं गोगोमयं मुने । भूमिस्पृष्टं न तद्ग्राह्यमंतरिक्षाच्च भाजने ॥६२॥
चतुर्विधा मृत्तिका तु श्वेता पीतारुणासिता । तत्र गोपीचंदनं तु हरितालं च गैरिकम् ॥६३॥
मषी लाक्षारसोद्भूता सर्वं वान्यत्स्फुटं मतम् । कृत्वा गोपीचंदनेन चतुरस्रं गृहं सुधीः ॥६४॥
तन्मध्ये माहिषेणाथ कुर्यान्मूर्ति हनूमतः । बीजं क्रोधाच्च तत्पुच्छं लिखेन्मन्त्री समाहितः ॥६५॥
तैलेन स्नापयेन्मूर्तिं गुडेन तिलकं चरेत् । शतपत्रसमो धूपः शालनिर्याससंभवः ॥६६॥
कुर्याच्च तैलदीपं तु वर्तिपंचकसंयुतम् । दध्योदनेन नैवेद्यं दद्यात्साधकत्तमः ॥६७॥
वारत्रयं कठदेशे सशेषविषमुच्चरन् । एवं कृते तु नष्टानां महिषीणां गवामपि ॥६८॥
दासीदासादिकानां च नष्टानां प्राप्तिरीरिता । चौरादिदुष्टसत्त्वानां सर्पादीनां भये पुनः ॥६९॥
तालेन च चतुर्द्वारं गृहं कृत्वा सुशोभनम् । पूर्वद्वारे गजः स्थाप्यो दक्षिणे महिषस्तथा ॥७०॥
सर्पस्तु पश्चिम द्वारे व्याघ्रश्चैवोत्तरे तथा । एवं क्रमेण खङ्गं च क्षुरिकादण्डमुद्गरान् ॥७१॥
विलिख्य मध्ये मूर्ति च महिषीगोमयेन वै । कृत्वा डमरुहस्तां च चकिताक्षीं प्रयत्नतः ॥७२॥
रक्तचन्दन, चन्दन, मधु, कस्तूरी, दही, दूध, मक्खन और घी--इन तेरह वस्तुओं को एकत्रित करे । जिनमें गोबर
गाय या भैंस का होना चाहिये। खोई हुई वस्तु की प्राप्ति के लिये भैंस के गोबर का उपयोग करे और दूर देश
से पथिक के आगमन, दुर्ग की रक्षा, बालक आदि की रक्षा, चोर आदि के भयनाश तथा स्त्री वशीकरण आदि
कार्यों के लिये गाय का गोबर उपयोग में लाना चाहिए। धरती पर गिरा हुआ गोबर नहीं लेना चाहिए, अपितु
(गोबर करते समय) आकाश से ही किसी पात्र में रोक लिये गये गोबर से कार्य करना चाहिए। मृत्तिका चार
प्रकार की होनी चाहिए-उजली, पीली, लाल तथा काली। जिनमें गोपीचन्दन, हरिताल और गेरु प्रशस्त मानी
गई है ।। ५८-६३।। मसी लाक्षा के रस में बनी होनी चाहिए। अन्य चीजें तो स्पष्ट ही हैं। विद्वान् व्यक्ति गोपी-
चन्दन से चौकोर मण्डल का निर्माण कर उसके मध्य में भैंस के गोबर से हनुमान् की मूर्ति बनाये । अनन्तर
साधक सावधान होकर बीज और क्रोध (ह्रं) से उनकी पूँछ अंकित करे। फिर मूर्ति को तेल से नहा कर गुड़ से
तिलक लगाये। शाल (साखू) के रस से बना धूप, जो कमल के समान सुगंधित हो, हनुमान् को समर्पित करे ।
उत्तम साधक पाँच बत्तियों से युक्त तेल दीप तथा दही-भात का नैवेद्य समर्पण करे। उस समय वह तीन वार
शेष (आ) सहित विष (म्) का उच्चारण करे'। ऐसा करने से खोई भैंस, गाय, दासी एवम् दास की पुनः प्राप्ति
हो जाती है । ॥६४-६८॥
चार आदि तथा सर्प आदि दुष्ट जीवों के भय को दूर करने के लिए हरिताल से चार द्वार वाला मनोहर
घर बनाये । पूर्व द्वार पर हाथी, दक्षिण द्वार पर भैंस, पश्चिम द्वार पर सांप और उत्तर द्वार पर बाघ की
प्रतिमाओं का स्थापित कर उसो क्रम से तलवार, छुरी, दंड तथा मुद्गर का चित्र खींचे। फिर मध्य में भैंस के
गोबर से मूर्ति बनाये । जिसके हाथ में डमरू हो और आंखें आश्चर्य-चकित-सी मालूम पड़ती हों। उस मूर्ति की
१. 'मा मा मा' इस प्रकार उच्चारण करना चाहिए।
६६१
पञ्चसप्ततितमोऽध्यायः
पयसा स्नपनं रक्तचंदनेनानुलेपनम् । जातीपुष्पैस्तु संपूज्य शुद्धधूपं प्रकल्पयेत् ॥७३॥
घृतेन दीपं दत्त्वाथ पायसान्नं निवेदयेत् । गगनं दीपिकेंद्वार्य्यं शास्त्रं च पुरतो जपेत् ॥७४॥
एवं सप्तदिनं कृत्वा मुच्यते महतो भयात् । अनयोर्भौमवारे तु कुर्य्यादारंभमादरात् ॥७५॥
शत्रुसेनाभये प्राप्ते गैरिकेण तु मंडलम् । कृत्वा तदंतरे तालमीषन्नम्रं समालिखेत् ॥७६॥
तवावलंबमानां च प्रतिमां गोमयेन तु । वामहस्तेन तालाग्रं दक्षिणे ज्ञानमुद्रिका ॥७७॥
तालमूलात्स्रवत्काष्ठार्थी मार्गे हस्तमिते गृहम् । चतुरस्रं विधायथ तन्मध्ये मूर्त्तिमालिखेत् ॥७८॥
दक्षिणाभिमुखीं रम्यां हृदये विहितांजलिम् । तोयेन स्नानगंधादि यथासंभवमर्पयेत् ॥७९॥
कृशरान्नं च नैवेद्यं साज्यं तस्यै निवेदयेत् । किलिद्वयं जपं प्रोक्तमेवं कुर्याद्दिने दिने ॥८०॥
एवं कृते भवेच्छीघ्रं पथिकानां समागमः । श्यामपाषाणखण्डेन लिखित्वा भूपतेर्गृहम् ॥८१॥
प्राकारं तु चतुर्द्वारयुक्तं द्वारेषु तत्र वै । अन्योन्यपुच्छपरिधित्रययुक्तां हनूमतः ॥८२॥
कुर्यान्मूर्त्तिं गोमयेन धत्तूरकुसुमैर्यजेत् । जठामांसीभवं धूपं तैल क्तवृतदीपकम् ॥८३॥
नैवेद्यं तिलतैलाक्तसक्षारा माषरोटिका । ध्येयो दक्षिणहस्तेन रोटिकां भक्षयन्हरिः ॥८४॥
वामहस्तेन पाषाणैस्त्रासयन्परसैनिकान् । मारयन्भ्रुकुटीं बद्ध्वा भीषणन्मथयन्स्थितः ॥८५॥
जपेच्च भुकुभुकिति वै सहस्रं ध्यानतत्परः । एवं कृतविधानेन परसैन्यं विनाशयेत् ॥८६॥
रक्षा भवति दुर्गाणां सत्यं सत्यं न संशयः । प्रयोगा बहवस्तत्र संक्षेपादूगदिता मया ॥८७॥
दूध से नहा कर रक्तचन्दन का लेप लगाये ॥६९-७२॥ फिर जूही के फूलों से उसकी अर्चना कर शुद्ध धूप, घृतदीप
तथा पायस नैवेद्य समर्पण करते हुए गगन (ह), दीपिका (ऊ) और इन्दु (अनुस्वार) अर्थात् 'हूँ' शस्त्र (फट्) यह
आराध्य देवता के आगे जपे । सात दिनों तक ऐसा करने से महाभय का नाश होता है । इन दोनों कार्यों को
सिद्धि के लिये मंगल दिन आदरपूर्वक पूजा आरंभ करनी चाहिए। शत्रुसेना का भय उपस्थित होने पर गेरू से
मंडल बनाकर उसके भीतर थोड़ा-सा झुका हुआ एक तालवृक्ष का चित्र लिखे। फिर उस वृक्ष से लटकती हुई एक
गोबर की प्रतिमा बनाये । जिसके बाँये हाथ में ताल का अग्रभाग और दाहिने हाथ में ज्ञानमुद्रा हो । तालमूल
से एक हाथ अपनी दिशा में एक चौकोर घर का निर्माण कर उसके मध्य में एक सुन्दर प्रतिमा बनाये ॥७३-७८॥
जिसका मुख दक्षिण दिशा की ओर हो और हाथों की अंजलि हृदय पर बंधी हो । उस मूर्ति को जल से स्नान
करा कर यथाशक्ति गंध आदि उपचार समर्पण करे एवम् घी-खीर नैवेद्य चढ़ाये । उसके आगे 'किलि-किलि'
का जप बताया गया है। ऐसा प्रति दिन करना चाहिये। ऐसा करने से पथिक शीघ्र आ जाता है। काले पत्थर के
टुकड़े से राजगृह का निर्माण कर चार द्वार वालो चहारदीवारी बनाये ॥७९-८१॥ तीन द्वारों पर मंडलाकार
में हनुमान् की पूँछ की रेखा खींचे और चौथे द्वार पर गोबर से हनुमान् की मूर्ति बनाये । उस मूर्ति की धतूरे
के फूलों से पूजा कर जटामांसी के रस से बना धूप, तेल मिलाये घी का दीपक और उड़द की नमकीन पूरी, जो
तिल से बनी हुई हो, नैवेद्य समर्पण करे । तदनन्तर हनुमान् के इस स्वरूप का ध्यान करे कि वे दाहिने हाथ से
रोटी खा रहे हैं, बाँयें हाथ में पत्थर के टुकड़े लेकर शत्रुसैनिकों को मार रहे हैं और भ्रुकुटी टेढी करके उन्हें
डराते हुए मानो कुचल रहे हैं ॥८२-८५॥ पश्चात् ध्याननिष्ठ होकर "भुकू भुकू" इसका एक सहस्र जप
करे । ऐसा करने से शत्रुसेना का नाश और दुर्गों की रक्षा होती है। यह बिल्कुल सत्य है । इसमें संदेह करने की
१६२ नारदीयपुराणम्
प्रत्यहं यो विधानेन दीपदानं हनूमतः । तस्यासाध्यं न वै किंचिद्विद्यते भुवनत्रये ॥८८॥
न देयं दुष्टहृदये दुष्टचित्तनबुद्धये । अविनीताय शिष्याय पिशुनाय कदाचन ॥८९॥
कृतघ्नाय न दातव्यं दातव्यं च परीक्षिते । बहुना किमिहोक्तेन सर्वं दद्यात्कपीश्वरः ॥९०॥
अथ मन्त्रान्तरं वक्ष्ये तत्त्वज्ञानप्रदायकम् । तारो नमो हनुमते जाठरत्रयमीरयेत् ॥९१॥
दनक्षोभं समाभाष्य संहरद्वयमीरयेत् । आत्मतत्त्वं ततः पश्चात्प्रकाशयुगं ततः ॥९२॥
वर्मास्त्रवह्निजायांतः सार्द्धषड्विंशदर्णवान् । वसिष्ठोऽस्य मुनिश्चन्दोऽनुष्टुप् च देवताः पुनः ॥९३॥
हनुमान्मुनिसप्ततु वेदाष्टनिगमैः क्रमात् । मंत्रांगैश्च षडंगानि कृत्वा ध्यायेत्कपीश्वरम् ॥९४॥
जानुस्थवामबाहुं च ज्ञानमुद्रापरं हृदि । अध्यात्मचित्तमासीनं कदलीवनमध्यगम् ॥९५॥
बालार्ककोटिप्रतिमं ध्यायेज्ज्ञानप्रदं हरिम् । ध्यात्वैवं प्रजपेल्लक्षं दशांशं जुहुयात्तिलैः ॥९६॥
साज्यैः संपूजयेत्पीठे पूर्वोक्ते पूर्ववत्प्रभुम् । जप्तोऽयं मदनक्षोभं नाशयत्येव निश्चितम् ॥९७॥
तत्त्वज्ञानमवाप्नोति कपींद्रस्य प्रसादतः । अथ मंत्रांतरं वक्ष्ये भूतविद्रावणं परम् ॥९८॥
तारः कार्शीकुक्षिपखराहश्चांजनापदम् । पवनो वनपुत्रांते आवेशिद्वयमीरयेत् ॥९९॥
तारः श्रीहनुमत्पश्चाद्वस्वरचभुजाक्षरः । ब्रह्मा मुनिः स्याद्गायत्री छंदोऽत्र देवता पुनः ॥१००॥
हनुमान्कमला बीजं फट् शक्तिः परिकीर्तितः । षड्दीर्घाढ्येन बीजेन षडङ्गानि समाचरेत् ॥१०१॥
आंजनेयं पाटलास्यं स्वर्णाद्रिसमविग्रहम् । पारिजातद्रुमूलस्थं चिंतयेत्साधकोत्तमः ॥१०२॥
आवश्यकता नहीं है । मैंने संक्षेप से अनेक प्रयोगों को बता दिया । जो व्यक्ति प्रतिदिन हनुमान् को दीप चढ़ाता
है, उसके लिये तीनों लोक में कुछ भी असाध्य नहीं है । यह रहस्य दुष्ट हृदय, दुर्बुद्धि, अविनीत, पिशुन और
कृतघ्न व्यक्ति को नहीं बतलाना चाहिए । किसी भी व्यक्ति की अच्छी तरह परीक्षा करके तब बताना चाहिये ।
बहुत क्या कहें, यह दीपदान करने से हनुमान् जी सब कुछ दे देते हैं ।।८६-९०।।
अब मैं तत्त्वज्ञान प्रदान करने वाले दूसरे मन्त्र का वर्णन करूंगा । 'तार (ओं) नमो हनुमते' इतना
कहकर तीन बार जाठर (म) का उच्चारण करे । फिर 'दनक्षोभम्' कहकर दो बार 'संहर' यह क्रियापद बोले ।
उसके बाद 'आत्मतत्त्वम्' बोलकर दो बार 'प्रकाशय' का उच्चारण करे । उसके बाद वर्म (हूँ), अस्त्र (फट्)
और वह्निजाया (स्वाहा) का उच्चारण करे । (पूरा मंत्र--ओं नमो हनुमते मम मदनक्षोभं संहर संहर आत्म-
तत्त्वं प्रकाशय प्रकाशय हुं फट् स्वाहा, यह साढ़े छत्तीस अक्षरों का मन्त्र है । इसके मुनि वशिष्ठ, छंद अनुष्टुप्
और देवता हनुमान् हैं । सात, सात, छह, चार, आठ तथा चार मंत्राक्षरों द्वारा षडंगन्यास करके कपीश्वर का
इस प्रकार ध्यान करे--पवननंदन आजानबाहु हैं । उनके हाथ में ज्ञानमुद्रा सुशोभित है । वह बैठकर सदा
अध्यात्मचिन्तन में लगे रहते हैं । केले के वन में विचरण करते हैं। करोड़ों बालसूर्यों के समान उनकी कान्ति
है । वे ज्ञानदायक हैं ।' इस प्रकार ध्यान कर एक लाख मंत्र को जपे और उसका दशांश घृतयुक्त तेल से हवन
करे । पूर्वोक्त पीठ पर पहिले ही की तरह महावीर का पूजन करना चाहिये । उक्त मंत्र का जप करने से
कामोद्वेग नहीं होता, प्रत्युत हनुमान् की कृपा से तत्त्वज्ञान की प्राप्ति होती है ।।६१-६७॥
इसके उपरान्त भूतों को छुड़ाने वाला एक अन्य मंत्र बतलाता हूँ, 'ओं श्री महाह्वजनाय पवनपुत्रावेशया-
वेशय ओं श्री हनुमते फट् ।' यह पचीस अक्षर का मन्त्र है । इस मन्त्र के मुनि ब्रह्मा, छंद गायत्री, देवता हनुमान्,
बीज, लक्ष्मी और शक्ति 'फट्' है । छह दीर्घ मात्राओं से युक्त बीज मन्त्र से षडंगन्यास कर किंचित् रक्तमुख
बाले सुवर्ण पर्वत के समान शरीरवाले और पारिजात वृक्ष के मूल में अवस्थित होनेवाले हनुमान् का ध्यान करे।
पञ्चसप्ततितमोऽध्यायः ६६३
एवं ध्यात्वा जपेल्लक्षं दशांशं जुहुयात्तिलैः । त्रिमध्वक्तैर्यजेत्पीठे पूर्वोक्ते पूर्ववत्सुधीः ॥१०३॥
अनेन मनुना मंत्री ग्रहग्रस्तं प्रमार्जयेत् । आक्रंदस्तं विमुच्याथ ग्रहः शीघ्रं पलायते ॥१०४॥
मनवोऽमी सदा गोप्या न प्रकाश्या यतस्ततः । परीक्षिताय शिष्याय देया वा निजसूनवे ॥१०५॥
हनुमद्भजनासक्तः कार्तवीर्यार्जुनं सुधीः । विशेषतः समाराध्य यथोक्तं फलमाप्नुयात् ॥१०६॥
इति श्रीबृहन्नारदीयपुराणे पूर्वभागे बृहदुपाख्याने तृतीयपादे दीपविधि
निरूपणं नाम पञ्चसप्ततितमोऽध्यायः ॥७५॥
अथषट्सप्ततितमोऽध्यायः
नारद उवाच
कार्तवीर्यप्रभृतयो नृपा बहुविधा भुवि । जायतेऽथ प्रलीयन्ते स्वस्वकर्मानुसारतः ॥१॥
तत्कथं राजवर्योऽसौ लोके सेव्यत्वमागतः । समुल्लंघ्य नृपानन्यानेतंन्मे नुद संशयम् ॥२॥
पश्चात् इस मन्त्र का एक लाख जप कर उसका दशांश त्रिमधुयुक्त तिल से हवन करे । फिर पूर्वोक्त पीठ पर
पहिले की तरह पूजन कर विद्वान् साधक इस मन्त्र से ग्रहगृहीत व्यक्ति को झाड़ दे। ऐसा करने से ग्रह
रोते हुए उस व्यक्ति को छोड़ कर शीघ्र भाग जाता है। ॥६८-१०४॥ ये मन्त्र सदा गोपनीय हैं। यत्र-तत्र
इनको प्रकाशित नहीं करना चाहिये । परीक्षित शिष्य या अपने पुत्र को ये बताने चाहिये। हनुमान् के भजन में
आसक्त विद्वान् कार्तवीर्यार्जुन की विशेष आराधना करके यथा वर्णित फल को प्राप्त करे ।। १०५-१०६।।
श्रीनारदीयपुराण के पूर्वार्ध में बृहदुपाख्यानयुक्त तृतीयपाद में दीपविधिनिरूपण नामक पचहत्तरवाँ
अध्याय समाप्त ।।७५।।
अध्याय ७६
कार्तवीर्य की महिमा
नारद बोले-पृथ्वी पर कार्तवीर्य प्रभृति राजा अपने-अपने कर्म के अनुसार उत्पत्ति एवम् लय को
प्राप्त करते हैं। तब अन्य राजाओं का अतिक्रमण करके केवल नृपवर कार्तवीर्य ही कैसे लोगों के सेव्य
कहलाये ? — यह मेरा संशय है। इसका निराकरण कीजिये ॥१-२॥
६६४ नारदीयपुराणम्
सनत्कुमार उवाच
शृणु नारद वक्ष्यामि संदेहविनिवृत्तये । यथा सेव्यत्वमापन्नः कार्तवीर्यार्जुनो भुवि ॥३॥
यः सुदर्शनचक्रस्यावतारः पृथिवीतले । दत्तात्रेयं समाराध्य लब्धवांस्तेज उत्तमम् ॥४॥
तस्य क्षितीश्वरेंद्रस्य स्मरणादेव नारद । शत्रूञ्जयति संग्रामे नष्टं प्राप्नोति सत्वरम् ॥५॥
तेनास्य मंत्रपूजादि सर्वतंत्रेषु गोपितम् । तुभ्यं प्रकाशयिष्येऽहं सर्वसिद्धिप्रदायकम् ॥६॥
वह्नितारयुता रौद्री लक्ष्मीरग्नींदुशांतियुक् । वेधाघरेन्दुशांत्याढ्यो निद्राशाग्नि बिंदुयुक् ॥७॥
पाशो मायां कुशं पद्मावर्मास्त्रे कार्तवीर्यपद्म । रेफोवा द्यासनेोऽनन्तो वह्निजौ कर्णसंस्थितौ ॥८॥
मेघः सदीर्घः पवनो मनुह्वतो हृदंतिमः । ऊनविंशतिवर्णोऽयं तारादिर्नखवर्णकः ॥६॥
दत्तात्रेयो मुनिश्चास्यच्छन्दोनुष्टुबुदाहृतम् । कार्तवीर्यार्जुनोदेवो बीजशक्तिध्रुवश्च हृत् ॥१०॥
शेषाढ्यबीजयुग्मेन हृदयं विन्यसेदधः । शांतियुक्तचतुर्थेन कामाढ्येन शिरोऽगकम् ॥११॥
इन्द्राढ्यं वामकर्णाद्यमाययोर्वीशयुक्तया । शिखामंकुशपद्माभ्यां सर्वाग्भ्यां वर्म विन्यसेत् ॥१२॥
वर्मास्त्राभ्यामस्त्रमुक्तं शेषाणैर्व्यापकं पुनः । हृदये जठरे नाभौ जठरे गुह्यदेशतः ॥१३॥
दक्षपादे वामपादे सव्थिन जानुनि जंघयोः । विन्यसेद्द्बोजदशकं प्रणवद्वयमध्यगम् ॥१४॥
ताराद्यानथ शेषाणन्मस्तके च ललाटके । भ्रुवोः श्रुत्योस्तथैवाक्ष्णोर्नासि वक्त्रे गलेंऽसके ॥१५॥
सर्वमन्त्रेण सर्वाङ्गे कृत्वा व्यापकमादृतः । सर्वैष्टसिद्धये ध्यायेत्कार्तवीर्यं जनेश्वरम् ॥१६॥
उद्यदर्कसहस्त्राभं सर्वभूपतिवन्दितम् । दोर्भिः पञ्चाशता दक्षैर्बाणान्वामैर्धर्नूषि च ॥१७॥
दधतं स्वर्णमालाद्यं रक्तवस्त्रसमावृतम् । चक्रावतारं श्रीविष्णोध्र्यायेदर्जुनभूपतिम् ॥१८॥
लक्षमेकं जपेन्मन्त्रं दशांशं जुहुयात्तिलैः । सतण्डुलैः पायसेन विष्णुपीठे यजेत्तु तम् ॥१९॥
सनत्कुमार बोले- नारद ! पृथ्वो पर जिस प्रकार कार्तवीर्यार्जुन सेव्यत्व को प्राप्त हुए, वह मैं बत-
लाता हूँ। तुम सुन कर संदेह मिटा लो। भूतल पर कार्तवीर्य सुदर्शनचक्र का अवतार माने जाते हैं। उन्होंने
दत्तात्रेय की आराधना करके उत्तम तेज को प्राप्त किया। नारद ! उस पृथिवीपति के स्मरणमात्र से संग्राम में
विजय मिलती है तथा शत्रु शीघ्र नष्ट हो जाता है। इसलिये उनके मंत्र, पूजन आदि समस्त तंत्रों में गुप्त है।
आज उस सिद्धिदायक मंत्र को मैं तुमसे बता देता हूँ। "वह्नितारयुतारौद्री......" यह उन्नीस अक्षरों का
मंत्र है ॥३-९॥ इसके मुनि दत्तात्रेय, छंद अनुष्टुप्, देवता कार्तवीर्यार्जुन, बीज 'ध्रुव' और शक्ति 'हृत्' है।
शेषाढ्यबीजयुग्म से हृदयन्यास, शान्तियुक्त चतुर्थाक्षर से शिरोन्यास, 'इन्द्राढ्यम्' इससे नामकणर्न्यास, अंकुश तथा
पद्म से शिखान्यास, वाणी से वर्मन्यास, वर्मास्त्र से अस्त्रन्यास और शेष अक्षरों से पुनः व्यापकन्यास करे, हृदय,
उदर, नाभि, गुह्यदेश, दक्षिणपाद, वामपाद, ऊरु, जानु तथा जांघों में प्रणवद्वयमध्यगामी दश बीजों का न्यास
करे। तारक आदि नव वर्णां का मस्तक, ललाट, भौंह, कान, नेत्र, नाक, मुख, कण्ठ तथा कन्धे में न्यास करे।
पुनः समस्त अंगों में संपूर्ण मन्त्र से व्यापकन्यास कर सकल प्रयोजनों की सिद्धि के लिये जननाथकार्तवीर्य का
इस प्रकार ध्यान करे ॥१०-१६॥ कार्तवीर्य की कांति उदित होते हुए सहस्रों सूर्य के समान है। सकलराजगण
उनकी वंदना करते हैं। उनके पचास दाहिने हाथों में बाण और पचास बाँयें हाथों में धनुष विद्यमान हैं। वे सोने
की माला तथा रक्तवस्त्र धारण किये हुए हैं। ऐसे विष्णु के चक्रावतार राजा अर्जुन का ध्यान कर एक लाख
षट्सप्ततितमोऽध्यायः ६६५
षट्कोणेषु षडंगानि ततो दिक्षु विदिक्षु च । चोरमदविभञ्जनं मारीमदविभंजनम् ॥२०॥
अरिमदविभंजनं दैत्यमदविभंजनम् । दुष्टनाशं दुःखनाशं दुरितापद्विनाशनम् ॥२१॥
दिक्ष्वष्टशक्तयः पूज्याः प्राच्यादिष्वसितप्रभाः । क्षेमंकरी वश्यकरी श्रीकरी च यशस्करी ॥२२॥
आयुःकरी तथा प्रज्ञाकरी विद्याकरी पुनः । धनकर्यष्टमी पश्चाल्लोकेशा अस्त्रसंयुताः ॥२३॥
एवं संसाधितो मंत्रः प्रयोगार्हः प्रजायते । कार्त्तवीर्यार्जुनस्याथ पूजायंत्रमिहोच्यते ॥२४॥
स्वबीजानंगध्रुववाक्कर्णिकं दिग्दलं लिखेत् । तारादिवर्मा तद्दलं शेषवर्णदलांतरम् ॥२५॥
ऊष्मान्त्यस्वरौकजल्कं शेषाणैः परिवेष्टितम् । कोणालंकृतभूतार्णभूगृहं यन्त्रमीशितुः ॥२६॥
शुद्धभूमावष्टगन्धैर्लिखित्वा यन्त्रमादरात् । तत्र कुंभं प्रतिष्ठाप्य तत्रावाह्यार्चयेन्नृपम् ॥२७॥
स्पृष्ट्वा कुम्भं जपेन्मन्त्रं सहस्रं विजितेन्द्रियः । अभिषिञ्चेतदंभाभिः प्रियं सर्वेष्टसिद्धये ॥२८॥
पुत्राञ्यशो रोगनाशमायुः स्वजनरंजनम् । वाक्सिद्धि सुदृशः कुम्भाभिषिक्तो लभते नरः ॥२९॥
शत्रूपद्रव आपन्ने ग्रामे वा पुटभेदने । संस्थापयेदिदं यन्त्रं शत्रुभीतिनिवृत्तये ॥३०॥
सर्षपारिष्टलशुनकार्पासैर्मार्यते रिपुः । धत्तूरैः स्तभ्यते निम्बैर्द्वेष्यते वश्यतैऽम्बुजैः ॥३१॥
उच्चाटने विभीतस्य समिद्भिः खदिरस्य च । कटुतैलमहिष्याज्यैर्होमद्रव्यांजनं स्मृतम् ॥३२॥
यवैर्हुते श्रियः प्राप्तिस्तिलैराज्यैरघक्षयः । तिलतंडुलसिद्धार्थजालैर्वश्यो नृपो भवेत् ॥३३॥
मन्त्र जप करे और उसका दशांश तिल-चावल से हवन करे। अनन्तर विष्णुपोठ पर उनका पूजन कर षट्-
कोण तथा दिशा-विदिशाओं में षडंग देवताओं की पूजा करे। ऐसा करने से चोरमद, नारोमद, शत्रुमद, दैत्य-
मद, दुष्ट, दुःख तथा पाप का नाश होता है ॥१७-२१॥ पुनः पूर्व आदि दिशाओं में आठ कृष्ण वर्ण शक्तियों की
पूजा करे। क्षेमंकरी', वश्यकरो, श्रीकरी, यशस्करी, आयुःकरी, प्रज्ञाकरी, विद्याकरी और धनकर्यष्टमी ये आठों
लोकपालिकायें शक्ति कहलाती हैं। पश्चात् अस्त्र समेत लोकपालों की पूजा करनी चाहिये। इस प्रकार मन्त्र
की साधना करने पर ही वह प्रयोग में लाया जा सकता है ॥२२-२३॥
अब कार्त्तवीर्यार्जुन का पूजायंत्र बतलाता हूँ। बीजमंत्र, काम, ध्रुव, वाक् तथा कर्णिका सहित दिक्पत्र
लिखे। उसमें स्वरवर्ण कमल का अंतिम पत्र होता है, शेष वर्ण अन्य पत्र होते हैं। श ष स ह और ओ वर्ण
उस कमल के (केसर) हैं, शेष वर्षों से वह परिवेष्टित है। कोण से अलंकृत चौदह वर्णों का भू-गृह यंत्र
कार्त्तवीर्य का माना गया है। २४-२६॥ पवित्र भूमि पर अष्ट गंधों से आदरपूर्वक लिखकर घट स्थापन करे।
उस घट पर कार्त्तवीर्य का आवाहन करके पूजन करे। तदनन्तर घट स्पर्श करके इन्द्रियसंगमपूर्वक एक हजार
मन्त्र जप करके उस जल से अभिषेक (स्नान) करे। ऐसा करने से सकल कामनायें सफल होती हैं। उस जल
से अभिषिक्त मानव पुत्र, यश, आरोग्य, लोकांप्रयता, वाक्सिद्धि तथा सुन्दर दृष्टि प्राप्त करता है। यदि शत्रु
का उपद्रव बढ़ जाय तो उसकी निवृत्ति के लिये गाँव या नगर में इस यंत्र को स्थापना करनी चाहिये। (उक्त
मंत्र को पढ़कर) सरसों, नीम, लशुन तथा कपास से होम करने से शत्रु भाग जाता है ॥२७-३०॥ धतूरों से
होम करने से शत्रु का स्तंभन होता है। नीम से हवन करने पर (शत्रु को आपस में) द्वेष होता है। कमल
से होमने पर वशीकरण होता है। बहेड़े तथा खैर की लकड़ी और कड़ुआ तेल एवम् भैंस के घी से होम
करने से उच्चाटन होता है। यव से होम करने से लक्ष्मी की प्राप्ति और घृतमिश्रित तिल से पाप का क्षय
होता है। तिल, चावल तथा श्वेत सरसों से होम करने से राजा वशीभूत होता है। अपामार्ग (चिचड़ा) तथा
८४ ना० पु०
यहाँ प्रस्तुत पृष्ठ का सटीक पाठ्यांतरण (Transcription) दिया गया है:
६६६ नारदीयपुराणम्
अपामार्गार्कदूर्वाजां होमो लक्ष्मीप्रदोऽघनुत् । स्त्रीवश्यकृत्प्रियंगूणां मुराणां भूतशांतिदः ॥३४॥
अश्वत्थोदुम्बरप्लक्षवटबिल्वसमुद्भवाः । समिधो लभते हुत्वा पुत्रानायुर्द्धनं सुखम् ॥३५॥
निर्मोकहेमसिद्धार्थलवणैश्चौरनाशनम् । रोचनागोमयैस्तम्भो भूप्राप्तिः शालिमिर्हुतैः ॥३६॥
होमसंख्या तु सर्वत्र सहस्रादयुतावधि । प्रकल्पनीया मन्त्रज्ञैः कार्यगौरवलाघवात् ॥३७॥
कार्तवीर्यस्य मन्त्राणामुच्यते लक्षणं बुधाः । कार्तवीर्यार्जुनं ङेन्तं सर्वमंत्रेषु योजयेत् ॥३८॥
स्वबीजाद्यो दशार्णोऽसौ अन्ये नवशिवाक्षराः । आद्यबीजद्वयेनासी द्वितीयो मन्त्र ईरितः ॥३९॥
स्वकामाभ्यां तृतीयोऽसौ स्वभ्रूभ्यां तु चतुर्थकः । स्वपाशाभ्यः पञ्चमोऽसौ षष्ठः स्वेन च मायया ॥४०॥
स्वांकुशाभ्यां सप्तमः स्यात्स्वरमाभ्यामथाष्टमः । स्ववाग्भवाभ्यां नवमो वर्मास्त्राभ्यामथांतिमः ॥४१॥
द्वितीयादिनवांतेषु बीजयोः स्याद्वयतिक्रमः । मंत्रे तु दशमे वर्णा नववर्मस्त्वमध्यगाः ॥४२॥
एतेषु मंत्रवर्यैषु स्वानुकूलं मनुं भजेत् । एषामाद्ये विराट्छंदोऽन्येषु त्रिष्टुबुदाहृतम् ॥४३॥
दश मंत्रा इमे प्रोक्ता यदा स्युः प्रणवादिकाः । तदादिमः शिवार्णः स्यादन्ये तु द्वादशाक्षराः ॥४४॥
त्रिष्टुप् छन्दस्तथाद्ये स्यादन्येषु जगती मता । एवं विंशतिमंत्राणां यजनं पूर्ववन्मतम् ॥४५॥
दीर्घाढचमूलबीजेन कुर्यादेषां षडंगकम् । तारो हृत्कार्तवीर्यार्जुनाय वर्मास्त्रठद्वयम् ॥४६॥
चतुर्दशार्णो मंत्रोऽयमस्येज्या पूर्ववन्मता । मूनैत्रसमनेत्राक्षिवर्णैरस्यांगपंचकम् ॥४७॥
तारो हृद्भगवान् ङेन्तः कार्तवीर्यार्जुनस्तथा । वर्मास्त्राग्निप्रियामंतः प्रोक्तो ह्यष्टादशार्णकः ॥४८॥
दूर्वा से हवन करने से श्रीप्राप्ति तथा पाप क्षय होता है। प्रियंगु (कंगनी) से होमने से स्त्री वशीभूत होती है।
मुरा से होम करने से भूतोपद्रव शान्त होता है ॥३१-३४॥ पीपल, गूलर, वट तथा बिल्व की समिधा से होम
करने से पुत्र, आयु, धन, सुख की प्राप्ति होती है। निर्मोक (सर्पकंचुक), सुवर्ण, श्वेत सरसों तथा नमक से हवन
करने से चोर का नाश होता है। गोरोचन तथा गोबर से होमने से स्तंभन होता है। चावल से होमने से भूमि-
प्राप्ति होती है। मन्त्रज्ञाता पुरुष कार्य की लघुता एवम् गुरुता को दृष्टि में रखते हुए एक हजार से दस हजार
तक मन्त्र का जप करे ॥३५-३७॥ कार्तवीर्य के मन्त्रों का लक्षण बुधगण इस तरह बतलाते हैं कि समस्त मन्त्रों
में 'कार्तवीर्यार्जुनाय' यह पद जोड़ना चाहिए। "स्वबीज........." यह दश अक्षरों का पहिला मन्त्र है। आद्य
दोनों बीज मन्त्र ही द्वितीय मन्त्र कहे गए हैं। "स्वकामाभ्याम्" यह तीसरा मन्त्र है। स्वभ्रूभ्याम्" यह चौथा
है। "स्वपाशाभ्याम्" यह पाँचवाँ, "स्वेन च मायया" यह छठा, "स्वांकुशाभ्याम्" यह सातवाँ, "स्वरमाभ्याम्"
यह आठवाँ, "स्ववाग्भवाभ्याम्" यह नवाँ और "वर्मास्त्राभ्याम्" यह दशवाँ मन्त्र है। द्वितीय मन्त्र से लेकर
नवें तक दोनों बीजो का व्यतिक्रम होता है। दशम मन्त्र में नौ कवचों के मध्यवर्ती वर्ण होने चाहिए। इन
उत्तम मन्त्रों में जो अपने अनुकूल मालूम पड़े, उसका जप करना चाहिए ॥३८-४२॥
इनमें प्रथम मन्त्र का छन्द विराद् है और दूसरों का त्रिष्टुप् । ये दशों मन्त्र जब प्रणव से युक्त होते हैं
तब आदिम मन्त्र ग्यारह अक्षरों का और अन्य बारह अक्षरों के होते हैं। तथा आद्य मन्त्र का छन्द त्रिष्टुप् और
अन्यों का जगती छन्द होता है। इस तरह बीसों मन्त्रों की अर्चना पूर्ववत् करनी चाहिए। मन्त्र दीर्घ मात्रा से
सम्पन्न हैं। मूलबीज से इनका षडंगन्यास करना चाहिए। "तार......" यह चौदह अक्षरों का मन्त्र है। इसकी
भी उपासना पहिले की तरह करनी चाहिए। नौ अक्षरों से इसका पंचांगन्यास किया जाता है। "तारो
हृत्......"यह अठारह अक्षरों का मन्त्र है। अट्ठारहों अक्षरों से इसका पंचांगन्यास करना चाहिए।
६६७
षट्सप्ततितमोऽध्यायः
त्रिवेदसप्तयुग्माक्षिवर्णैः पंचांगकं मनोः । नमो भगवते श्रोति कार्तवीर्यार्जुनाय च ॥४६॥
सर्वदुष्टांतकायेति तपोबलपराक्रमः । परिपालितसप्तांते द्वीपाय सर्वरापदम् ॥५०॥
जन्यचूडामणांते ये महाशक्तिमते ततः । सहस्रदहनप्रांते वर्मस्त्रांतो महामनुः ॥५१॥
त्रिषष्टिवर्णवान्प्रोक्तः स्मरणात्सर्वविघ्नहृत् । राजन्यचक्रवर्ती च वीरः शूरस्तृतीयकः ॥५२॥
माहिष्मतीपतिः पश्चाच्चतुर्थः समुदीरितः । रेवांबुपरितृप्तश्च काणो हस्तप्रबाधितः ॥५३॥
दशास्येति च षड्भिः स्यात्पदैर्ङेन्तैः षडंगकम् । सिच्यमानं युवतिभिः क्रीडंतं नर्मदाजले ॥५४॥
हस्तैर्जलौघं रुंधंतं ध्यायेन्मत्तं नृपोत्तमम् । एवं ध्यात्वा युतं मंत्रं जपेदन्यत्तु पूर्ववत् ॥५५॥
पूर्वं तु प्रजपेल्लक्षं पूजायोगश्च पूर्ववत् । कार्तवीर्यार्जुनो नाम राजा बाहुसहस्रवान् ॥५६॥
तस्य संस्मरणादेव हृतं नष्टं च संवदेत् । लभ्यते मंत्रवर्येोऽयं द्वात्रिंशद्वर्णसंयुतः ॥५७॥
पादैः सर्वेण पंचांगं ध्यानपूजावि पूर्ववत् । कार्तवीर्याय शब्दांते विद्महे पदमुच्चरेत् ॥५८॥
महावीर्याय वर्णांते धीमहीति पदं वदेत् । तन्नोऽर्जुनः प्रवणान्ते चोदयात्पदमीरेयेत् ॥५९॥
गायत्र्येषाऽर्जुनस्योक्ता प्रयोगादौ जपेत्तु ताम् । अनुष्टुभं मनुं रात्रौ जपतां चौरसंचयाः ॥६०॥
पलायंते गृहाद्दूरं तर्पणाद्धवनादपि । अथो दीपविधिं वक्ष्ये कार्तवीर्यप्रियंकरम् ॥६१॥
वैशाखे श्रावणे मार्गे कार्तिकाश्विनपौषतः । माघफाल्गुनयोर्मासोर्दीपांरभं समाचरेत् ॥६२॥
तिथौ रिक्ताविहीनायां वारे शनिकुजौ विना । हस्तोत्तराश्विरौद्रेयपुष्यवैष्णववायुभे ॥६३॥
द्विदैवते च रोहिण्यां दीपारंभो हितावहः । चरमे च व्यतीपाते धृतौ वृद्धौ सुकर्मणि ॥६४॥
प्रीतौ हर्षं च सौभाग्ये शोभनायुष्मतोराप । करणे विष्टिरहिते ग्रहणेऽर्कोदयादिषु ॥६५॥
"नमो भगवते......"यह तिरसठ अक्षरों का मन्त्र है। इसके स्मरण मात्र से विघ्नों का नाश होता है।
"राजन्य-चक्रवर्ती......" इस मन्त्र के छह पदों से षडंगन्यास करके ध्यान करे कि नर्मदा के जल में स्नान
करते हुए कार्तवीर्य युवतियों के साथ जलकेलि कर रहे हैं। और क्रीड़ोन्मत्त होकर हाथों से जलतरंग को रोकते
हैं। ऐसे नृपवर का ध्यान कर दश हजार मन्त्र-जप करे और अन्य कार्य पूर्ववत् ही करे। पहिले एक लाख मन्त्र
का जप कर पूजा आदि यथापूर्वं करनी चाहिए। "कार्तवीर्यार्जुनः............"यह बत्तीस अक्षरों का मन्त्र
है। इसके समस्त पादों से पंचांगन्यास कर ध्यान, पूजन आदि पूर्ववत् ही करना चाहिए। "कार्तवीर्याय" इसके
अन्त में "विद्महे" और "महावीर्याय धीमहि, तन्नोऽर्जुनः प्रचोदयात्" इतने को जोड़ देने से अर्जुनगायत्री बन
जाती है। इसको प्रयोग के आदि में जपना चाहिये। रात्रि में इसके जप करने से चोर घर से दूर भाग जाते हैं।
इससे तर्पण तथा हवन करने से भी यही फल होता है ॥४३-६० १/२॥
अब मैं दीप का विधान बतलाऊंगा, जो कार्तवीर्य को अत्यन्त प्रिय है। वैशाख, श्रावण, अगहन, कार्तिक,
आश्विन, पौष, माघ तथा फाल्गुन मास में दीपारंभ करना चाहिए। रिक्ता' विहीन तिथि, शनि और मङ्गल
रहित दिन, हस्त, उत्तराषाढ, अश्विनी, रौद्रेय, पुष्य, वैष्णव, वायु तथा द्विदैवताक नक्षत्र और रोहिणी नक्षत्र में
दीपारंभ कल्याणकारक होता है। चरम, व्यतीपात, धृति तथा वृद्धि, प्रीति, हर्ष, सौभाग्य, शोभन, तथा आयुष्मान्
नामक योग में, विष्टि रहित करण में, ग्रहणों में तथा अर्कोदय आदि योग में पूर्व रात्रि के समय दीपारंभ करना
१. चौथ, चतुर्दशी, नवमी-ये रिक्ता कहलाती हैं।
६६८ नारदीयपुराणम्
योगेषु रात्रौ पूर्वाह्ने दीपारंभः कृतः शुभः । कार्तिके शुक्लसप्तम्यां निशीथेऽतीव शोभनः ॥६६॥
यदि तत्र रवेर्वारः श्रवणं भं च दुर्लभम् । अत्यावश्यककार्येषु मासादीनां न शोधनम् ॥६७॥
आद्ये ह्युपोष्य नियतो ब्रह्मचारी सपीतकैः । प्रातः स्नात्वा शुद्धभूमौ लिप्तायां गोमयोदकैः ॥६८॥
प्राणानायम्य संकल्प्य न्यासान्पूर्वोदितांश्चरेत् । षट्कोणं रचयेद्भूभौ रक्तचंदनतंडुलैः ॥६९॥
अतः स्मरं समालिख्य षट्कोणेषु समालिखेत् । नवार्णैर्वेष्टयेत्तच्च त्रिकोणं तद्बहिः पुनः ॥७०॥
एवं त्रिलिखिते यन्त्रे निदध्याद्दीपभाजनम् । स्वर्णजं रजतॊत्थं वा ताम्रजं तदभावतः ॥७१॥
कांस्यपात्रं मृन्मयं च कनिष्ठं लोहजं मृतौ । शांतये मुद्गचूर्णोत्थं संधौ गोधूमचूर्णजम् ॥७२॥
आज्ये पलसहस्रे तु पात्रं शतपलं स्मृतम् । आज्येऽयुतपले पात्रं पलपंचशता स्मृतम् ॥७३॥
पंचसप्ततिसंख्ये तु पात्रं षष्टिपलं स्मृतम् । त्रिसहस्त्री घृतपले शर्करापलभाजनम् ॥७४॥
द्विसाहस्र्यां द्विशतमितं च भाजनमिष्यते । शतेऽकिंचरसंख्यातमेवमन्यत्र कल्पयेत् ॥७५॥
नित्यदीपे वह्निपलं पात्रमाज्यं पलं स्मृतम् । एवं पात्रं प्रतिष्ठाप्य वर्तीः सुवोत्थिताः क्षिपेत् ॥७६॥
एका तिस्रोऽथवा पंचसप्ताद्या विषमा अपि । तिथिमानादासहस्रं तंतुसंख्या विनिर्मिता ॥७७॥
गोघृतं प्रक्षिपेत्तत्र शुद्धवस्त्रविशोधितम् । सहस्रपलसंख्यादिदशांशं कार्यगौरवात् ॥७८॥
सुवर्णादिकृतां रम्यां शलाकां षोडशांगुलाम् । तदर्द्धा वा तदर्द्धा वा सूक्ष्माग्रां स्थूलमूलिकाम् ॥७९॥
शुभदायक है। कार्तिक-शुक्ल-सप्तमी को रात्रि में दीपारंभ अत्यन्त शोभन है। यदि उस दिन रविवार तथा
श्रवण नक्षत्र पड़ जाय तो सोने में सुगंध समझो। अत्यावश्यक कार्यों में मास आदि का विचार नहीं करना
चाहिए ॥६१-६७॥
प्रथम दिन ब्रह्मचर्य आदि नियमों का पालन करते हुए उपवास करके दूसरे दिन प्रातःकाल स्नानोपरान्त
भूमि को गोवर से लीप-पात कर पवित्र करे। अनन्तर प्राणायाम तथा संकल्प करके पूर्वोक्त प्रकार से न्यास करे।
फिर भूमि पर रक्तचंदन तथा चावल से षट्कोण का निर्माण कर उस पर काम का चित्र खींचे। उस चित्र को
नव अक्षरों से वेष्टित कर बाहर त्रिकोण की रचना करे, इस तरह यंत्र लिख जाने पर उसके ऊपर दीप पात्र को
स्थापित करे। दीपत्र सुवर्ण या चांदी या तांबे का होना चाहिये। यदि वे न मिलें तो काँसा या मिट्टी का पात्र
बनाये, मारण कार्य के लिये लौह का, शान्तिकार्य के लिये मूंग के पिसान का, और संधिकार्य के लिये गेहूँ के आटे
का दीप पात्र बनाना चाहिये । ६८-७२॥ यदि सहस्र पल परिमित घी हो तो (पात्र के लिये) एक सौ पल के हिसाब
से द्रव्य होना चाहिये। दस हजार पलपरिमित घी के लिये पाँच सौ पल के परिमाण में द्रव्य होना चाहिये,
पचहत्तर पलपरमित घी के लिये साठ पल द्रव्य, तीन हजार पल घी के लिये सत्रह सौ पल द्रव्य, दो हजार
पल घी के लिये दो सौ पल द्रव्य और सौ पल घी के लिये दस पल द्रव्य आवश्यक है। नित्य दीप के लिये तीन
द्रव्य का पात्र और एक पल घी होना चाहिये। इस तरह पात्र की प्रतिष्ठा कर सूत की बनी बत्तियां उसमें
डाले ॥७३-७६॥ बत्तियों की संख्या एक या तीन या पाँच या सात होनी चाहिये। बत्ती के तंतुओं की संख्या
पन्द्रह से लेकर एक हजार तक अपेक्षित है। दीप में गाय का घी डालना चाहिये, जो पहले वस्त्र से छान
लिया गया हो। कार्यगौरव की दृष्टि से सहस्र पलपरिमित घी पात्र में छोड़े। उसमें एक सुवर्ण की बनाई
हुई सोलह अगुलियों की रमणीय शलाका भी रखे। शलाका सोलह या आठ या चार ही अंगुलियों की होनी
चाहिये; परन्तु उसका अग्रभाग सूक्ष्म और आदि भाग स्थूल हो ॥७७-७९॥ उस शलाका को पात्र के मध्य में
षट्सप्ततितमोऽध्यायः ६६६
विमुंचेद्दक्षिणे पात्रमध्ये चाग्रे कृताग्निकाम् । पात्रदक्षिणदिग्देशे मुक्त्वांगुलचतुष्टयम् ॥८०॥
अधोग्रां दक्षिणाधारां निखनेच्छुरिकां शुभाम् । दीपं प्रज्वालयेत्तत्र गणेशस्मृतिपूर्वकम् ॥८१॥
दीपात्पूर्वेत्त दिग्भागे सर्वतोभद्रमंडले । तंडुलाष्टदले वापि विधिवत्स्थापयेद्घटम् ॥८२॥
तत्रावाह्य नृपाधीशं पूजयेत्पूर्ववत्सुधीः । जलाक्षतान्समादाय दीपं संकल्पयेत्ततः ॥८३॥
दीपसंकल्पमंत्रोऽयं कथ्यते द्विषद्भूमितः । प्रणवः पाशमाये च शिखा कार्ताक्षराणि च ॥८४॥
वीर्यार्जुनाय माहिष्मतीनाथाय सहस्र च । बाहवे इति वर्णांते सहस्रपदमुच्चरेत् ॥८५॥
ऋतुदीक्षितहस्ताय दत्तात्रेयप्रियाय च । आत्रेयायानुसुयांते गर्भरत्नाय तत्परम् ॥८६॥
नमो ग्रीवामकण्ठेदुस्थितौ पाश इमं ततः । दीपं गृहाण अमुकं रक्ष रक्ष पदं पुनः ॥८७॥
दुष्टान्नाशययुग्मं स्यात्तथा पातय घातय । शत्रून् जहि द्वयं माथा तारः स्वं वोजमात्मभूः ॥८८॥
वह्निप्रिया अनेनाथ दीपवर्येण पश्चिमा । भिमुखेनामुकं रक्ष अमुकांते वरप्रद ॥८९॥
मायाकाशद्वयं वामनेत्रचंद्रयुतं शिवा । वेदान्तिकामच्वामुंडाः स्वाहा तु पूर्वबिंदुकौ ॥९०॥
प्रणवोऽग्निप्रिया मंत्रो नेत्रबाणाधराक्षरः । दत्तात्रेयो मुनिर्मालामंत्रस्य परिकीर्तितः ॥९१॥
छन्दोऽमितं कार्तवीर्यार्जुनो देवोऽखिलाप्तिकृत् । चामुंडया षडंगानि चरेत्खड्गीर्घयुक्तया ॥९२॥
ध्यात्वा देवं ततो मंत्रं पठित्वाऽन्ते क्षिपेज्जलम् । गोविंदाढ्यो हली सेंदुश्चामुं डाबीजमीरितम् ॥९३॥
ततो नवाक्षरं मंत्रं सहस्रं तत्पुरो जपेत् । तारोऽनंतो बिंदुयुक्तो मायास्वं वामनेत्रयुक् ॥९४॥
कूर्माग्नी शांतिबिद्वाद्व्यो वह्नि जा यांकुशं ध्रुवम् । ऋषिः पूर्वोदितोऽनुष्टुप्छंदोऽन्यत्पूर्ववत्पुनः ॥९५॥
सहस्रं मंत्रराजं च जपित्वा कवचं पठेत् । एवं दीपप्रदानस्य कर्ताप्नोत्यखिलेऽप्सितम् ॥९६॥
दीपप्रबोधकाले तु वर्जयेदशुभां गिरम् । विप्रस्य दर्शनं तत्र शुभदं परिकीर्तितम् ॥९७॥
शूद्राणां मध्यमं प्रोक्तं म्लेच्छस्य वधबन्धनम् । आख्वोत्वोदर्शनं दुष्टं गवाश्वस्य सुखावहम् ॥९८॥
उलटा करके छोड़ दे । पात्र से दक्षिण चार अंगुलि हटकर भूमि में एक सुन्दर छुरो को दक्षिणाधार तथा निम्न
मुख करके गाड़ दे और वहाँ गणेश का स्मरण करते हुए दीप जलाये, दीप से पूर्व दिशा में सर्वतोभद्र मंडल या
तंडूलचूर्ण से अष्टदल बनाकर उस पर विधिपूर्वक घट-स्थापना करे । विद्वान् व्यक्ति उस घट पर राजराज
का आवाहन कर पूर्ववत् उनकी पूजा करे । फिर जल-अक्षत लेकर दीप के लिये संकल्प करे ॥८०-८३॥ दीप
संकल्प का यह मन्त्र है--"प्रणवः... स्वाहा" । इसमें आठ अक्षर हैं । दत्तात्रेय इसके मुनि हैं, अनुष्टुप् छन्द है
और कार्तवीर्यार्जुन देवता हैं; जो सकल कामनाओं को सफल करनेवाले हैं। वह दीर्घ मात्राओं से युक्त चामुण्डा-
मन्त्र से षडंगन्यास कर कार्तवीर्य देव का ध्यान करे और मन्त्र को पढ़ कर अन्त में जल हाथ से गिरा दे ।
"गोविन्दाढ्य....." यह चामुण्डाबीज मन्त्र है। इसके बाद नवाक्षर मंत्र का एक हजार जप करना चाहिये ।
"तारोऽनन्तः ...." यह नवाक्षर मन्त्र है। इसके ऋषि दत्तात्रेय, छंद अनुष्टुप् और देवता आदि पूर्ववत्
समझना चाहिये । इस मन्त्रराज का एक सहस्र जप कर कवच का पाठ करना चाहिये । उक्त रीति से दीपदान
करनेवाला व्यक्ति अभीष्ट फल को प्राप्त करता है॥८४-९६॥ दीप जलाने के समय अशुभ बात नहीं बोलनी
चाहिये। उस समय ब्राह्मण का दर्शन शुभ माना गया है; शूद्रों का दर्शन मध्यम तथा म्लेच्छों का वधकारक
या बंधनकारक होता है। चूहे तथा बिलाड को देखना दुःखदायक है; किन्तु गाय एवं घोड़े को देखना सुखकारक
है। दीप की ज्वाला यदि सीधी हो तो सिद्धि मिलती है, परन्तु टेढ़ी होने पर नाश होता है ॥९७-९८३॥