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बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)

बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)

Brihan Naradiya Purana with Sanskrit & Hindi Commentary

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)

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DevanagariSanskritpublished1,008 पृष्ठ

पृष्ठ 688, कुल 1008 में से

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पृष्ठ 688

षट्सप्ततितमोऽध्यायः ६६६
विमुंचेद्दक्षिणे पात्रमध्ये चाग्रे कृताग्निकाम् । पात्रदक्षिणदिग्देशे मुक्त्वांगुलचतुष्टयम् ॥८०॥
अधोग्रां दक्षिणाधारां निखनेच्छुरिकां शुभाम् । दीपं प्रज्वालयेत्तत्र गणेशस्मृतिपूर्वकम् ॥८१॥
दीपात्पूर्वेत्त दिग्भागे सर्वतोभद्रमंडले । तंडुलाष्टदले वापि विधिवत्स्थापयेद्घटम् ॥८२॥
तत्रावाह्य नृपाधीशं पूजयेत्पूर्ववत्सुधीः । जलाक्षतान्समादाय दीपं संकल्पयेत्ततः ॥८३॥
दीपसंकल्पमंत्रोऽयं कथ्यते द्विषद्भूमितः । प्रणवः पाशमाये च शिखा कार्ताक्षराणि च ॥८४॥
वीर्यार्जुनाय माहिष्मतीनाथाय सहस्र च । बाहवे इति वर्णांते सहस्रपदमुच्चरेत् ॥८५॥
ऋतुदीक्षितहस्ताय दत्तात्रेयप्रियाय च । आत्रेयायानुसुयांते गर्भरत्नाय तत्परम् ॥८६॥
नमो ग्रीवामकण्ठेदुस्थितौ पाश इमं ततः । दीपं गृहाण अमुकं रक्ष रक्ष पदं पुनः ॥८७॥
दुष्टान्नाशययुग्मं स्यात्तथा पातय घातय । शत्रून् जहि द्वयं माथा तारः स्वं वोजमात्मभूः ॥८८॥
वह्निप्रिया अनेनाथ दीपवर्येण पश्चिमा । भिमुखेनामुकं रक्ष अमुकांते वरप्रद ॥८९॥
मायाकाशद्वयं वामनेत्रचंद्रयुतं शिवा । वेदान्तिकामच्वामुंडाः स्वाहा तु पूर्वबिंदुकौ ॥९०॥
प्रणवोऽग्निप्रिया मंत्रो नेत्रबाणाधराक्षरः । दत्तात्रेयो मुनिर्मालामंत्रस्य परिकीर्तितः ॥९१॥
छन्दोऽमितं कार्तवीर्यार्जुनो देवोऽखिलाप्तिकृत् । चामुंडया षडंगानि चरेत्खड्गीर्घयुक्तया ॥९२॥
ध्यात्वा देवं ततो मंत्रं पठित्वाऽन्ते क्षिपेज्जलम् । गोविंदाढ्यो हली सेंदुश्चामुं डाबीजमीरितम् ॥९३॥
ततो नवाक्षरं मंत्रं सहस्रं तत्पुरो जपेत् । तारोऽनंतो बिंदुयुक्तो मायास्वं वामनेत्रयुक् ॥९४॥
कूर्माग्नी शांतिबिद्वाद्व्यो वह्नि जा यांकुशं ध्रुवम् । ऋषिः पूर्वोदितोऽनुष्टुप्छंदोऽन्यत्पूर्ववत्पुनः ॥९५॥
सहस्रं मंत्रराजं च जपित्वा कवचं पठेत् । एवं दीपप्रदानस्य कर्ताप्नोत्यखिलेऽप्सितम् ॥९६॥
दीपप्रबोधकाले तु वर्जयेदशुभां गिरम् । विप्रस्य दर्शनं तत्र शुभदं परिकीर्तितम् ॥९७॥
शूद्राणां मध्यमं प्रोक्तं म्लेच्छस्य वधबन्धनम् । आख्वोत्वोदर्शनं दुष्टं गवाश्वस्य सुखावहम् ॥९८॥
उलटा करके छोड़ दे । पात्र से दक्षिण चार अंगुलि हटकर भूमि में एक सुन्दर छुरो को दक्षिणाधार तथा निम्न
मुख करके गाड़ दे और वहाँ गणेश का स्मरण करते हुए दीप जलाये, दीप से पूर्व दिशा में सर्वतोभद्र मंडल या
तंडूलचूर्ण से अष्टदल बनाकर उस पर विधिपूर्वक घट-स्थापना करे । विद्वान् व्यक्ति उस घट पर राजराज
का आवाहन कर पूर्ववत् उनकी पूजा करे । फिर जल-अक्षत लेकर दीप के लिये संकल्प करे ॥८०-८३॥ दीप
संकल्प का यह मन्त्र है--"प्रणवः... स्वाहा" । इसमें आठ अक्षर हैं । दत्तात्रेय इसके मुनि हैं, अनुष्टुप् छन्द है
और कार्तवीर्यार्जुन देवता हैं; जो सकल कामनाओं को सफल करनेवाले हैं। वह दीर्घ मात्राओं से युक्त चामुण्डा-
मन्त्र से षडंगन्यास कर कार्तवीर्य देव का ध्यान करे और मन्त्र को पढ़ कर अन्त में जल हाथ से गिरा दे ।
"गोविन्दाढ्य....." यह चामुण्डाबीज मन्त्र है। इसके बाद नवाक्षर मंत्र का एक हजार जप करना चाहिये ।
"तारोऽनन्तः ...." यह नवाक्षर मन्त्र है। इसके ऋषि दत्तात्रेय, छंद अनुष्टुप् और देवता आदि पूर्ववत्
समझना चाहिये । इस मन्त्रराज का एक सहस्र जप कर कवच का पाठ करना चाहिये । उक्त रीति से दीपदान
करनेवाला व्यक्ति अभीष्ट फल को प्राप्त करता है॥८४-९६॥ दीप जलाने के समय अशुभ बात नहीं बोलनी
चाहिये। उस समय ब्राह्मण का दर्शन शुभ माना गया है; शूद्रों का दर्शन मध्यम तथा म्लेच्छों का वधकारक
या बंधनकारक होता है। चूहे तथा बिलाड को देखना दुःखदायक है; किन्तु गाय एवं घोड़े को देखना सुखकारक
है। दीप की ज्वाला यदि सीधी हो तो सिद्धि मिलती है, परन्तु टेढ़ी होने पर नाश होता है ॥९७-९८३॥