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बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)

Brihan Naradiya Purana with Sanskrit & Hindi Commentary

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)

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DevanagariSanskritpublished1,008 पृष्ठ

इस ग्रन्थ के बारे में

बृहन्नारदीय पुराण, जिसे नारदपुराण भी कहा जाता है, परम्परा में महर्षि व्यास से जोड़ा जाता है। इसका पूर्वभाग सनक आदि कुमारों द्वारा नारद को दिए गए उपदेशों के रूप में है, जिनमें धर्म, भक्ति, व्रत, तीर्थ, मन्त्र-साधना और वेदाङ्गों (शिक्षा, कल्प, व्याकरण, निरुक्त, ज्योतिष और छन्द) का विस्तृत वर्णन आता है। इसकी एक विशेषता अठारह पुराणों की विषय-सूची है, जिसमें प्रत्येक पुराण की श्लोक-संख्या और विषय बताए गए हैं; स्कैन में 'पञ्चविंशतिसाहस्रं...' और 'प्रभासस्य च माहात्म्यं...' जैसे श्लोक इसी अंश के हैं।

यह संस्करण हिन्दी साहित्य सम्मेलन, प्रयाग की पुराण-प्रकाशन योजना के अन्तर्गत छपा 'बृहन्नारदीयपुराणम् (पूर्वभागः)' है, जिसमें संस्कृत मूल के साथ व्याकरण-वेदान्ताचार्य तारिणीश झा का हिन्दी अनुवाद है। प्रथम संस्करण शक 1910, अर्थात् 1989 ई. में प्रकाशित हुआ; प्रकाशक सम्मेलन के प्रधान मन्त्री डॉ. प्रभात मिश्र शास्त्री थे।

प्रकाशकीय वक्तव्य इस पुराण के ही एक श्लोक से आरम्भ होता है, जिसमें कहा गया है कि जैसे नदियों में गंगा और सरोवरों में पुष्कर श्रेष्ठ है, वैसे ही पुराणों में नारदीय। पुस्तक 1008 पृष्ठों की है।

६२६ नारदीयपुराणम्

नृसिंहायाग्निजायांते शिरोमंत्रः प्रकीर्तितः । तारः क्षं तप्तस्वहेमाभमास्फुरत्केशालं ईरयेत् ॥२१॥
ज्वलत्यावकलो कमों दीर्घा वज्राधिकेति च । नखस्पर्शाद्दिव्यसिंह नमोऽस्तु भगवन् हरिः ॥२२॥
महाध्वस्त जगद्रूप नृंशिवाय द्वयंद्वयम् । अनेन च शिखा प्रोक्ता कवचं तदनन्तरम् ॥२३॥
तारः क्षैं च सुवर्णं ते मदमत्तपदं ततः । विह्वलिलनृसिंहाय स्वाहांतं कवचं स्मृतम् ॥२४॥
तारः क्षौं च सहस्राक्ष विश्वरूपपदं वदेत् । धारणेऽग्निप्रियांलोऽयं नेत्रमंत्रः प्रकीर्तितः ॥२५॥
तारो क्षश्च सहस्रांते वारावेपदमीरयेत् । सहस्रांते बुधायोच्च नृसिंहायाग्निसुंदरी ॥२६॥
अस्त्रमंत्रः समाख्यातस्ततो ध्यायेन्नृकेसरी । उद्यदर्कसहस्राभं वीक्षणं भीमभूषणम् ॥२७॥
सुतीक्ष्णाग्रभुजो दंडेर्देत्यदारणकं स्मरेत् । एवं ध्यात्वा जपेन्मंत्री सहस्रं पायसेन च ॥२८॥
आज्यप्लुतेन जुहुयात्सम्यक्सिद्धो भवेन्मनुः । प्रागुक्ते वैष्णवे पीठे मूर्तिं संकल्प्य मूलतः ॥२९॥
संपूज्य नृहरिं पश्चादादावंगानि पूजयेत् । चक्रं शंखं च पाशं बांकुशं कुलिशमेव च ॥२०॥
गदाकृपाणिश्वेदानि दलेषु परिपूजयेत् । लोकेशानपि वज्राद्यान्पूजयेत्तदनंतरम् ॥२२१॥
एवं सिद्धे मनो मन्त्री प्रयोगान्कर्तुमर्हति । भस्मामिमंत्रितं कृत्वा ग्रहग्रस्तं विलेपयेत् ॥२२२॥
भस्मसंलेपनादेव सर्वग्रहविनाशनम् । अनेनैव विधानेन यक्षराक्षसकिन्नरः ॥२२३॥
भूतप्रेतपिशाचाश्च नश्यंत्येव न संशयः । पराभिचारकृत्यानि मनुनानेन मंत्रितम् ॥२२४॥
भस्म संलेपयेत्सद्यो दुराधर्षो भवेन्नरः । सुदिने स्थापयेत्कुम्भे सर्वतोभद्रमण्डले ॥२२५॥
तीर्थतोयेन संपूयं जपेदष्टोत्तरं शतम् । तेनाभिषिक्तो मनुजः सर्वापत्तिं तरेद् ध्रुवम् ॥२२६॥
किं बहुत्वेन सर्वेष्टदायकोऽयं मन्नूत्तमः । वज्रनखाय विद्महे तीक्षणदंष्ट्राय धीमहि
तन्नो नृसिंहः शब्दान्ते वदेच्चैव प्रचोदयात् ॥२२७॥
एषा नृसिंहगायत्री सर्वाभीष्टप्रदायिनी । एतस्याः स्मरणादेव सर्वपापक्षयो भवेत् ॥२२८॥
इति श्रीबृहन्नारदीयपुराणे पूर्वभागे बृहदुपाख्याने नृसिंहोपासनामन्त्रगायत्र्यादिनिरूपणं
नामैकसप्ततितमोऽध्यायः ॥७१॥


कोणों में शंख, चक्र, पाश, अंकुश, कुलिश, गदा, कृपाण, वंशशलाका, लोकपालों एवम् वज्र आदि आयुधों की
अर्चना करे ॥१६२-२२१॥ इस प्रकार मंत्र सिद्ध कर लेने पर साधक प्रयोगों को कर सकता है। मंत्र से भस्म को
अभिमंत्रित कर ग्रहपीड़ित व्यक्ति के अंग में लेप कर देने से समस्त ग्रहों का नाश हो जाता है। इस विधान से
यक्ष, राक्षस, किन्नर, भूत, प्रेत और पिशाचों का भी नाश होता है, इसमें संशय नहीं। इस मंत्र से अभिमंत्रित
भस्म शत्रुओं का निवारण करता है। इसके लेप से मनुष्य महापुरुष हो जाता है। सुदिन में सर्वतोभद्रमंडल
बना कर उस पर घटस्थापन करे। घट को तीर्थजल से भरकर एक सौ आठ बार मंत्र से अभिमंत्रित
करे ॥२२२-२२५॥ उस जल से अभिषिक्त किया हुआ मनुष्य सकल बाधाओं को पार कर जाता है, इसमें तनिक
भी संदेह नहीं। बहुत क्या कहूँ? यह मंत्र समस्त वांछित फलों को देने वाला है। "वज्रनखाय ··· प्रद्यो-
दयात्" यह सकल कामनाओं को पूर्ण करने वाली नृसिंहगायत्री है। इसके स्मरणमात्र से समस्त पापों का
क्षय होता है ॥२२६-२२८॥
श्रीनारदीय पुराण के पूर्वार्ध में बृहदुपाख्यानयुक्त तृतीय पाद में नृसिंह की उपासना, मंत्र तथा गायत्री
आदि का निरूपण नामक इकहत्तरवां अध्याय समाप्त ॥७१॥

द्विसप्ततितमोऽध्यायः
सनत्कुमार उवाच
प्रणवो हृदयं विष्णोर्नान्तः सुरपतिस्तथा। महाबलाय स्वाहांतो मंत्रो वसुधराक्षरः ॥१॥
मुनिर्बिंदुर्विराट्छन्दो देवता दधिवामनः। तारो बीजं तथा शक्तिर्वह्निजाया प्रकीर्तिता ॥२॥
चंद्राक्षिशरामबाणेषु नेत्रसंख्यैर्मनूद्भवैः। वर्णैः षडंगं कृत्वा च मूर्ध्नि भाले च नेत्रयोः ॥३॥
कर्णयोर्घ्राणयोरोष्ठतालुकण्ठभुजेषु च। पृष्ठे हृद्युदरे नाभौ गुह्ये चोरुस्थले पुनः ॥४॥
जानुद्वयं जङ्घयोश्च पादयोर्विन्यसेत्क्रमात्। अष्टादशैव मंत्रोत्थास्ततो देवं विचिंतयेत् ॥५॥
मुक्तागौरं रत्नभूषं चन्द्रस्थं भृङ्गसन्निभैः। अलकैर्विलसद्वक्त्रं कुम्भं शुद्धांबुपूरितम् ॥६॥
दध्यन्नपूर्णंचषकं दोर्भ्यां संदधतं भजेत्। लक्षत्रयं जपेन्मन्त्रं तद्दशांशं घृतप्लुतः ॥७॥
पायसान्नैः प्रजुहुयाद्दध्यन्नेन यथाविधि। चन्द्रांते कल्पिते पीठे पूर्वोक्ते पूजयेच्च तम् ॥८॥
संकल्पमूर्तिमूलेन संपूज्य च विधानतः। केसरेषु षडंगानि संपूज्य दिगलेषु च ॥६॥
वासुदेवं संकर्षणं प्रद्युम्नमनिरुद्धकम्। कोणपत्रेषु शांति च श्रियं सरस्वतीं रतिम् ॥१०॥
ध्वजं च वैनतेयं च कौस्तुभं वनमालिकाम्। शंखं चक्रं गदां शार्ङ्ग दलेष्वष्टसुपूजयेत् ॥११॥
दलाग्रेषु केशवादीन्दिक्पालांस्तदनंतरम्। तवस्त्राणि च सम्पूज्य गजानष्टौ समर्चयेत् ॥१२॥
अध्याय ७२
हयग्रीव-मंत्रोपासना-कथन
सनत्कुमार बोले- "प्रणवः...स्वाहा" यह मंत्र तेईस अक्षरों का है। इसके मुनि बिन्दु, छंद विराट्
ओर देवता दधिवामन हैं। तार बीज और स्वाहा शक्ति मानी गई है। मंत्र के तेरह वर्णों से षडंग
न्यास कर मस्तक, भाल, नेत्र, कर्ण, नासिका, ओष्ठ, तालु, कंठ, भुजा, पृष्ठ, हृदय, उदर, नाभि,
गुह्य, ऊरु, जंघा, जानु तथा चरणों में क्रमशः मंत्राक्षरों का न्यास करे। तदनन्तर मोती के समान
गौर वर्ण, रत्नों के आभूषण धारण करने वाले, भौंरे जैसे बालों से सुशोभित मुख वाले, दोनों हाथों
में शुद्ध जल से परिपूर्ण घट तथा दही एवम् अन्न से परिपूर्ण चषक (पात्र) धारण करने वाले देव का ध्यान
कर तीन मंत्र का जप करे और उसका दशांश घृतमिश्रित खीर से या दही युक्त अन्न से हवन करे। होमान्त
में पूर्वोक्त पीठ पर मूलमंत्र से मूर्ति का संकल्प कर विधानपूर्वक पूजन करे ॥१-८½॥ फिर केसरों पर षडंगों की
पूजा कर दिग्भागों में वासुदेव, संकर्षण, प्रद्युम्न, अनिरुद्ध, शांति, श्री, सरस्वती, रति, ध्वजा, गरुड़, कौस्तुभ
(मणि), वनमाला, शंख, चक्र, गदा और शार्ङ्ग (धनुष) की पूजा करे। तदनन्तर केशव आदि देवों, दिक्पालों,
उनके अस्त्रों एवम् आठ दिग्गजों की पूजा कर क्रमशः उनकी हथनियों की भी पूजा करे। ऐरावत, पुंडरीक, वामन
कुमुद, अंजन, पुष्पदंत, सार्वभौम, तथा सुप्रतीक- ये आठों दिग्गज कहलाते हैं। अभ्रमु, कपिला, पिंगला, अनुपमा,
ताम्रकर्णी, शुभ्रदंती, अंगना तथा अंजनावती- ये आठों हथनियां हैं ॥६-१४॥

ऐरावतः पुण्डरीको वामनः कुमुदोऽञ्जनः । पुष्पदंतः सार्वभौमः सुप्रतीकश्च दिग्गजाः ॥१३॥
करिण्योऽभ्रमुकपिलांपिंगलानुषमाः क्रमात् । ताम्रकर्णी शुभ्रदंती चांगना ह्यंजनावती ॥१४॥
एवमाराधितो मंत्री दद्यादिष्टानि मंत्रिणे । श्रीकामः पायसाज्येन सहस्रं जुहुयात्सुधीः ॥१५॥
महतीं श्रियमाप्नोति धान्याप्तिर्धान्यहोमतः । शतपुष्पासमुत्थैश्च बीजैर्हुत्वा सहस्रतः ॥१६॥
महाभयं नाशयेद्धि नात्र कार्या विचारणा । दद्ध्योदनेन शुद्धेन हुत्वा मुच्येत दुर्गतैः ॥१७॥
ध्यात्वा त्रैविक्रमं रूपं जपेन्मंत्रं समाहितः । कारागृहाद्भवन्मुक्तो बद्धो मंत्रप्रभावतः ॥१८॥
भित्तौ संपाद्य देवेशं फलके वा प्रपूजयेत् । नित्यं सुगंधकुसुमैर्महतीं श्रियमाप्नुयात् ॥१९॥
हुत्वा रक्तोत्पलैर्मंत्री वशयेत्सकलं जगत् । अन्नाज्यैर्जुहुयान्नित्यमष्टाविंशतिसंख्यया ॥२०॥
सिताज्य़ान्नं च विधिवत्प्राप्नुयादन्नमक्षयम् । अपूपैः षड्रसोपेतैर्हुनेद्वासुसहलकम् ॥२१॥
अलक्ष्मीं च पराभूय महतीं श्रियमाप्नुयात् । जुहुयादयुतं मंत्री दध्यन्नं च सितान्वितम् ॥२२॥
यत्र यत्र वसेत्सोऽपि तत्रान्नगिरिमाप्नुयात् । पद्माक्षरैर्युतं बिल्वांतिकस्थो जुहुयान्नरः ॥२३॥
महालक्ष्मीं स लभते तत्र तत्र न संशयः । जुहुयात्पायसैर्लक्षं वाचस्पतिसमो भवेत् ॥२४॥
लक्षं जप्त्वा तद्दशांशं पुत्रजीवफलैर्हुनेत् । तत्काष्ठैरेधिते वह्नौ श्रेष्ठं पुत्रमवाप्नुयात् ॥२५॥
ससाध्यतारं विलसत्कर्णिकं च सुवर्णकंः । विलसतकेसरं मंत्राक्षरद्वंद्वाष्टपत्रकम् ॥२६॥
शेषयुग्मार्णाष्टपत्रं द्वादशाक्षरवेष्टितम् । तद्बहिर्मातृकावर्णैर्यत्रं सम्पदप्रदं नृणाम् ॥२७॥
रक्तं त्रिविक्रमं ध्यात्वा प्रसूनै रक्तवर्णकैः । जुहुयादयुतं मंत्री सर्वत्र विजयो भवेत् ॥२८॥
ध्यायेच्चंद्रासनगतं पद्मानांमयुतं हुनेत् । लभेदकंटकं राज्यं सर्वलक्षणसंयुतम् ॥२९॥
इस प्रकार आराधना करने से इष्टसिद्धि होती है। लक्ष्मी का इच्छुक विद्वान् दूध एवम् घी से सहस्र
बार हवन करे। ऐसा करने से प्रचुर धन मिलता है। धान्य से होम करने से धान्य की प्राप्ति होती है। साँफ से
सहस्र बार हवन करने से महाभय का नाश होता है, इसमें विचार करने की आवश्यकता नहीं। शुद्ध दही और
भात से होम करने से दुर्गति नष्ट होती है। त्रिविक्रम के रूप का ध्यान कर समाहितचित्त से मंत्र जपने से
कारागार (जेल) से छुटकारा मिल जाता है, ऐसा मंत्र का प्रभाव है। भीत या तख्ते पर देवेश का चित्र लिख कर
नित्य सुगंधित पुष्पों से पूजा करने वाला व्यक्ति महती श्री को प्राप्त करता है। रक्तकमल से होम करने से
तीनों लोक वशीभूत होते हैं। नित्य अट्ठाईस बार घी एवम् चीनी मिश्रित अन्न से विधिवूर्वक हवन करने से
क्षयरहित अन्न की प्राप्ति होती है। जो व्यक्ति षड्रसयुक्त पुओं से आठ हजार हवन करता है, वह दरिद्रा को
जीतकर महतो लक्ष्मी को प्राप्त करता है ॥१५-२१३॥ जो दही, चीनी तथा अन्न से दश हजार बार हवन
करता है, वह जहाँ-कहीं भी वास करेगा, वहीं उसे अन्न पर्वत (प्रचुर अन्न) प्राप्त होगा। बिल्ववृक्ष के समीप
पद्मपरागयुक्त दही एवम् अन्न से हवन करने वाला साधक जन्म-जन्मान्तर में महालक्ष्मी को प्राप्त करता है,
इसमें संशय नहीं। खीर से एक लाख बार हवन करने वाला व्यक्ति बृहस्पति-तुल्य होता है ॥२२-२४॥ लक्ष
बार मंत्र-जप कर उसका दशांश पुत्रजीव (जियापुता) वृक्ष की लकड़ी से प्रज्वलित अग्नि में उसके फल से होम
करने से उत्तम पुत्र की प्राप्ति होती है। साध्य एवम् तार मंत्र से युक्त, कर्णिका एवम् केसर से सुशोभित और
बारह मंत्राक्षरों से वेष्टित स्वगंयंत्र मनुष्यों को संपत्ति प्रदान करता है। रक्त वर्ण वाले त्रिविक्रम का ध्यान कर
लाल रंग के पुष्पों से हवन करने वाला साधक सर्वत्र विजयी होता है। चंद्रासन पर आसीन त्रिविक्रम का

त्रिसप्ततितमोऽध्यायः ६२६
हुत्वा लवंगैर्मध्वाक्तैरपामार्गदलैस्तु वा । अयुतं साध्यनामाद्यं स वश्यो जायते ध्रुवम् ॥३०॥
अष्टोत्तरशतं हुत्वा ह्यपामार्गदलैः शुभैः । तावज्जप्त्वा च सप्ताहान्महारोगात्प्रमुच्यते ॥३१॥
उहिरत्पद्ममाभाष्य प्रलवोहीय शब्दतः । सर्ववागीश्वरेत्यंते प्रवदेदीश्वरेत्यथ ॥३२॥
सर्ववेदमयांदित्यथपदान्ते सर्वमीरयेत् । बोधयद्वितवांतोऽयं मन्त्रस्तारादिरिरितः ॥३३॥
ऋषिर्ब्रह्मास्य निर्दिष्टश्छंदोऽनुष्टुबुवाहृतम् । देवता स्याद्धयग्रीवो वागीश्वर्यप्रदो विभुः ॥३४॥
तारेण पादैर्मलस्थ पञ्चांगानि प्रकल्पयेत् । तुषाराद्रिसमच्छायं तुलसीदाम भूषितम् ॥३५॥
तुरङ्गवदनं वन्दे तुंगसारस्वतः पदम् । ध्यात्वैवं प्रजपेन्मंत्रमयुतं तद्दशांशतः ॥३६॥
मध्वक्तैः पायसैर्हुत्वा विमलादिसमन्विते । पूजयेद्वैष्णवे पीठे मूर्ति संकल्य्य मूलतः ॥३७॥
कणिकायां चतुर्दिक्षु यजेत्पूर्वादितः क्रमात् । सनंदनं च सनकं श्रियं च पृथिवीं तथा ॥३८॥
तद्बहिर्दिक्षु वेदांश्च षट्कोणेब ततोऽर्चयेत् । निरुक्तं ज्योतिषं पश्चाद्यजेद्व्याकरणं ततः ॥३६॥
कल्पं शिक्षां च छंदांसि वेदांगानि त्विमानि वै । ततोऽष्टदलमूले तु मातरोऽष्टौ समर्पयेत् ॥४०॥
वक्रतुं डादिकानष्टौ दलमध्ये प्रपूजयेत् । दलाग्रेष्वर्चयेत्पश्चात्साधकश्चाष्टभैरवान् ॥४१॥
असितांगं रुरुं चैव भीषणं रक्तनेत्रकम् । वटुकं कालदमनं दंतुरं विकटं तथा ॥४२॥
तद्बहिः षोडशदलेष्ववतारान्हरेर्दश । शंखं चक्रं गदां पद्मं नंदकं शाङ्ग मेव च ॥४३॥
तद्बहिर्भूगृहे शक्रमुखान्दश दिगीश्वरान् । वज्राद्यांस्तद्बहिश्श्वेष्ट्वा द्वारेषु च ततः क्रमात् ॥४४॥
महागणपतिं दुर्गा क्षेत्रेशं बटुकं तथा । समस्तप्रकटाद्याश्च योगिन्यस्तद्बहिर्भवेत् ॥४५॥
संस्मरण कर दश हजार कमलों से होम करने से सर्वलक्षणसंपन्न अकंटक राज्य की प्राप्ति होती है। जिसका
नाम लेकर दश सहस्र बार मधुयुक्त लवंगों या अपामार्ग के पत्रों से हवन किया जायगा, वह अवश्य वशीभूत
होगा। सात दिन तक एक सौ आठ बार मंत्र-जप और उतनी ही संख्या में हवन करने से महारोग दूर होता
है। "उद्धिरत्यदम्... बोधयद्विन्वे" यह तारादि मंत्र कहा गया है ॥२५-३३॥ इसके ऋषि ब्रह्मा हैं,
छंद अनुष्टुप् है और देवता वाणी एवम् ऐश्वर्य को देने वाले विभु हयग्रीव हैं। तारकमंत्र से पंचांगन्यास करके
हिमपर्वत के समान आभा वाले, तुलसीमाला से विभूषित, अश्व के समान मुख वाले और उत्तुंग बिल्वदंड के
समान चरण वाले देव का ध्यान करे। अनन्तर दश हजार मंत्र का जप कर मधुयुक्त खीर से हवन करे। फिर
निर्मल वैष्णव पीठ पर मूलमंत्र से मूर्ति की कल्पना कर चारों दिशाओं में पूर्व आदि दिशा-क्रम से केसरों पर
सनंदन, सनक, श्री और पृथिवी की पूजा करे। अतिरिक्त दिशाओं में वेदों की अर्चना कर छह कोणों में निरुक्त,
ज्योतिष, व्याकरण, कला, शिक्षा और छन्द - इन वेदांगों की समर्चंना करे। तदनन्तर अष्टदल के मूल में आठ
माताओं की पूजा कर दलमध्य में आठ वक्रतुंड आदिकों का पूजन करे ॥३४-४०॥
पश्चात् साधक दल के अग्रभाग में आठ भैरवों, कृष्णांग मृग, लाल नेत्रों वाले, काल का दमन करने
वाले, लम्बे दांतों वाले और (देखने में) अतियंभकर वटुक देव की पूजा कर षोडशदल (कमल) पर हरि के दश
अवतारों एवम् शंख, चक्र, गदा, पद्म, नंदक (खङ्ग) और शाङ्ग (धनुष) की अर्चना करे। इनके अतिरिक्त
भूगृह में इन्द्र आदि दश दिक्पालों तथा उनके वज्र आदि आयुधों की पूजा कर द्वारों पर क्रमशः महागणपति,
दुर्गा, क्षेत्रेश, बटुक, प्रकाश आदि समस्त योगिनियों, सात नदियों, नौ ग्रहों, आठ पर्वतों और नक्षत्रों का परि-

तद्वहिः सप्त नद्यश्च तद्वाह्ये तु ग्रहान्नव । तद्वाह्ये पर्वतानष्टौ नक्षत्राणि च तद्वहिः ॥४६॥
एवं पंचदशावृत्त्या संपूज्य तुरगाननम् । वागीश्वरसमो वाचि धनैर्धनपतिर्भवेत् ॥४७॥
एवं सिद्धे मनौ मंत्रो प्रयोगांन्कर्तुमहं ति । अष्टोत्तरसहस्रं तु शुद्धं वार्यभिमंत्रितम् ॥४८॥
बीजेन मासमात्रं यः पिबेद्धीमान् जितेन्द्रियः । जन्ममूकोऽपि स नरो वाक्सिद्धिं लभते ध्रुवम् ॥४९॥
वियद्भगूस्थ्यमर्धीशबिंदुमद्बीजमीरितम् । चंद्रसूर्योपरागे तु पात्रे रुक्ममये क्षिपेत् ॥५०॥
दुग्धं गवां ततो मंत्री कंठमात्रोदके स्थितः । स्पर्शाद्विमोक्षपर्यंतं प्रजपेन्मंत्रमादरात् ॥५१॥
पिबेत्तत्सर्वमचिरात्तस्य सारस्वतं भवेत् । ज्योतिष्मतीलताबीजं दिनेष्वेकैकवर्द्धितम् ॥५२॥
अष्टोत्तरशतं यावद्भक्षयेदभिमंत्रितम् । सरस्वत्यवतारोऽसौ सत्यं स्याद्भूवि मानवः ॥५३॥
किं बहूक्तेन विप्रेंद्र मनोरस्य प्रसादतः । सर्ववेदागमादीनां व्याख्याता ज्ञानवान् भवेत् ॥५४॥
इति श्रीबृहन्नारदीयपुराणे पूर्वभागे बृहदुपाख्याने सनत्कुमारविभागे तृतीयपादे हयग्रीवोपासना-
निरूपणं नाम द्विसप्ततितमोऽध्यायः ॥७२॥

पूजन करे। इस प्रकार पन्द्रह बार हयग्रीव की अर्चना करने वाला व्यक्ति वाणी में बृहस्पति के समान और धन
में कुबेर के समान होता है। उक्त प्रकार से मंत्र को सिद्ध कर लेने पर ही मंत्री मंत्र का प्रयोग कर सकता है।
एक हजार आठ बार शुद्ध जल को बीज मंत्र से अभिमंत्रित कर एक मास तक इन्द्रियसंयमपूर्वक उसका पान
करने से वह मनुष्य भी निःसंदेह सिद्धवाक् हो जाता है, जो जन्मतः गूंगा है। "वियत्...." यह बीज मंत्र
है ॥ ४१-४९॥ चन्द्रग्रहण या सूर्यग्रहण के समय सुवर्ण के पात्र में गो का दूध डालकर स्वयं कंठ प्रमाण जल
में खड़ा होकर ग्रहण के स्पर्श से लेकर मोक्ष पर्यन्त आदरपूर्वक इस मंत्र का जप करते हुए उस दूध का पान
करने से मनुष्य शीघ्र वाक्सिद्धि को प्राप्त कर लेता है। एक सौ आठ ज्योतिष्मतीलता (मालकांगनी) के बीज
को उक्तमंत्र से अभिमंत्रित कर एक-एक वृद्धि क्रम से भक्षण करने से मानव पृथ्वी पर सरस्वती का अवतार
माना जाता है, यह सत्य बात है। विप्रवर्य ! बहुत क्या कहें, इस मंत्र के प्रभाव से मनुष्य समस्त वेदादि शास्त्रों
का व्याख्याता तथा ज्ञाता होता है ॥५०-५४॥
श्री नारदीयपुराण के पूर्वार्ध में बृहदुपाख्यानयुक्त तृतीय पाद में हयग्रीवोपासनानिरूपण नामक
बहत्तरवां अध्याय समाप्त ॥७२॥

अथ द्विसप्ततितमोऽध्यायः
सनत्कुमार उवाच
अथ रामस्य मनवो वक्ष्यंते सिद्धिदायकाः । येषामाराधनान्मर्त्यास्तरंति भवसागरम् ॥१॥
सर्वेषु मंत्रवर्येषु श्रेष्ठं वैष्णवमुच्यते । गाणपत्येषु सौरेषु शाक्तशैवेष्वभीष्टदम् ॥२॥
वैष्णवेष्वपि मंत्रेषु राममंत्राः फलाधिकाः । गाणपत्यादिमंत्रेभ्यः कोटिकोटिगुणाधिकाः ॥३॥
विष्णुशय्यास्थितो वह्निरिंदुभूषितमस्तकः । रामाय हृदयांतोऽयं महाघौघविनाशनः ॥४॥
सर्वेषु राममंत्रेषु ह्यतिश्रेष्ठः षडक्षरः । ब्रह्महत्यासहस्राणि ज्ञाताज्ञातकृतानि च ॥५॥
स्वर्णस्तेयसुरापानगुरुतल्पाद्युतानि च । कोटिकोटिसहस्राणि ह्युपपापानि यानि वै ॥६॥
मंत्रस्योच्चारणात्सद्यो लयं यांति न संशयः । ब्रह्मा मुनिः स्याद्गायत्री छंदो रामश्च देवता ॥७॥
आद्यं बीजं च हृच्छक्तिर्विनियोगोऽखिलाप्तये । षड्दीर्घभाजा बीजेन षडंगानि समाचरेत् ॥८॥
ब्रह्मरंध्रे भ्रुवोर्मध्येहृन्नाभ्योर्गुह्यपादयोः । मंत्रवर्णान्क्रमान्न्यस्य केशवादीन्प्रविन्यसेत् ॥६॥
पीठन्यासादिकं कृत्वा ध्यायेद्धृदि रघूत्तमम् । कालांभोधरकांतं च वीरासनसमास्थितम् ॥१०॥
ज्ञानमुद्रां दक्षहस्ते दधतं जानुनीतरम् । सरोरुहकरां सीतां विद्युदाभां च पार्श्वगाम् ॥११॥
पश्यंतीं रामवक्त्राब्जं विविधाकल्पभूषिताम् । ध्यात्वैवं प्रजपेद्वर्णलक्षं मंत्री दशांशतः ॥१२॥
अध्याय ७३
लक्ष्मण तथा राम के मंत्रों का जप-विधान
सनत्कुमार बोले—अब मैं राम के सिद्धिदायक मंत्रों को बतलाऊँगा, जिनकी आराधना करने से
मनुष्य भवसागर को पार करते हैं। समस्त उत्तम मंत्रों से अर्थात् गणपति, सूर्य, शक्ति तथा शिव के मंत्रों से
विष्णु का मंत्र श्रेष्ठ तथा कल्याणदायक माना गया है। परन्तु वैष्णव मंत्रों में भी राममंत्र अधिक फलदायक
है। गणपति आदि के मंत्रों से तो ये करोड़ों गुना अधिक फल देते हैं। "विष्णु..." यह षडक्षर राममंत्र समस्त
राममंत्रों से अत्युत्तम है। सहस्रों ब्रह्महत्यायें, जानकर या बिना जाने किये गये पाप, सोने की चोरी, मद्यपान,
गुरुपत्नीसंभोग तथा सहस्रों-करोड़ों जितने पातकोपपातक हैं, वे इस मंत्र के उच्चारण करते हैं। तुरन्त नष्ट
हो जाते हैं, इसमें संशय नहीं। इस मंत्र के ऋषि ब्रह्मा हैं, छन्द गायत्री है, देवता राम हैं और हृच्छक्ति आद्य
बीज हैं। सर्वप्राप्ति के लिये इसका विनियोग किया जाता है। छह दीर्घ मात्राओं से युक्त बीजमंत्र से
षडंगन्यास कर ब्रह्मरंध्र, भौंहों के मध्य, हृदय, नाभि, गुह्यदेश तथा दोनों चरणों में मंत्रवर्णों का
क्रमशः न्यास कर केशव आदि का न्यास करे ॥१-९॥ फिर पीठन्यास आदि करके हृदय में श्याम
मेघ के समान कांति वाले, वीरासन लगाकर बैठने वाले, घुटनों के बीच दाहिने हाथ में ज्ञानमुद्रा धारण
करने वाले रघुवर राम एवम् उनकी बगल में बैठकर उनके मुखारविंद का अवलोकन करने वाली, विद्युत् के
समान कान्ति वाली, कर में कमल धारण करने वाली, विविध आभूषणों से आभूषित सीता का ध्यान करे।

१६२ नारदीयपुराणम्
कमलैर्जुहुयाद्वह्नौ ब्राह्मणाम्भोजयेत्ततः । पूजयेद्वैष्णवे पीठे विमलादिसमन्विते ॥१३॥
मूर्तिमूलेन संकल्प्य तस्यामावाह्य साधकः । सीतां वामे समासीनां तन्मन्त्रेण प्रपूजयेत् ॥१४॥
रमासीतापद्ं द्वैतं द्विठांतो जानकीमनुः । अग्नेः शार्ङ्ग च सम्पूज्य सरान्पार्श्वद्वयेऽर्चयेत् ॥१५॥
केशरेषु षडंगानि पत्रेष्वेतान्समार्चयेत् । हनुमंतं च सुग्रीवं भरतं सविभीषणम् ॥१६॥
लक्ष्मणांगदशत्रुघ्नान् जांबवंतं क्रमात्पुनः । वाचयंतं हनूमंतमग्रतो धृतपुस्तकम् ॥१७॥
यजेद्भरतशत्रुघ्नौ पार्श्वयोर्धृतचामरौ । धृतातपत्रं हस्ताभ्यां लक्ष्मणं पृष्ठतोऽर्चयेत् ॥१८॥
ततोऽष्टपत्रे सृष्टिं च जयंतं विजयं तथा । सुराष्ट्रं राष्ट्रपालं च अकोपं धर्मपालकम् ॥१९॥
सुमंतं चेति सम्पूज्य लोकेशानायुधैर्युतान् । एवं रामं समाराध्य जीवन्मुक्तः प्रजायते ॥२०॥
चंदनाक्तैः प्रजुहुयाज्जातीपुष्पैः समाहितः । राजवश्याय कमलैर्धनधान्यादिसिद्धये ॥२१॥
लक्ष्मीकामः प्रजुहुयात्प्रसूनैर्बिल्वसंभवैः । आज्याक्तैर्नीलकमलैर्वशयेदखिलं जगत् ॥२२॥
घृताक्तशतपर्वीभिर्दीर्घायुश्च निरामयः । रक्तोत्पलानां होमेन धनं प्राप्नोति वांछितम् ॥२३॥
पालाशकुसुमैर्हुत्वा मेधावी जायते नरः । तज्जप्तांभः पिबेत्प्रातर्वत्सरात्कविराड् भवेत् ॥२४॥
तन्मंत्रितान्नं भुंजीत महारोगप्रशांतये । रोगोक्तौषधहोमेन तद्रोगात्मुच्यते क्षणात् ॥२५॥
नदीतीरे च गोष्ठे वा जपेल्लक्षं पयोव्रतः । पायसेनाज्ययुक्तेन हुत्वा विद्यानिधिर्भवेत् ॥२६॥
परिक्षीणाधिपत्यो यः शाकाहारो जलांतरे । जपेल्लक्षं च जुहुयाद्विल्वपुष्पैर्दशांशतः ॥२७॥
तदुपराम्त छः लाख मंत्र का जप कर उसका दशांश कमलों से अग्नि में हवन करे। पश्चात् ब्राह्मण-भोजन
कराकर निर्मल वैष्णव पीठ पर मूर्ति की रचना करके उसमें मूल मंत्र से राम तथा उनके वाम पार्श्व में बैठी
सीता का आवाहन करे। सीता का पूजन उनके अपने मंत्र से करे। उनका मंत्र यह है—"रमा...।"
तदनन्तर अग्नि तथा शाङ्ग (धनुष) का पूजन कर दोनों पार्श्व में बाणों की पूजा करे। केसों पर छह अंग
देवताओं की पूजा कर पत्तों पर हनुमान्, सुग्रीव, भरत, विभीषण, लक्ष्मण, अंगद, शत्रुघ्न और जांबवान् का
क्रमशः पूजन करे, पुनः आगे हाथ में पुस्तक लेकर बांचते हुए हनुमान्, दोनों बगल में चामर लिये हुए भरत,
शत्रुघ्न और पृष्ठभाग में हाथों में छत्र को पकड़े हुए लक्ष्मण की अर्चना करे ॥१०-१८॥ तदनन्तर अष्टदल के
ऊपर सृष्टि, जयन्त, विजय, सुराष्ट्र, राष्ट्रपाल, अकोप, धर्मपाल तथा सुमंत की पूजा कर आयुधों समेत लोक-
पालों का पूजन करे। इस प्रकार राम की आराधना कर मनुष्य जीवन्मुक्त हो जाता है ॥१९-२०॥
जो व्यक्ति सावधान होकर (इस मंत्र को पढ़ते हुए) चन्दन मिश्रित जूही के पुष्पों से हवन करता है,
वह राजा को अपने वश में कर लेता है। कमलों से होम करने वालों को धन-धान्यादि की सिद्धि होती है। जो
लक्ष्मी की कामना करता है, वह बिल्व के पुष्पों से हवन करे। घृतयुक्त नीलकमलों से हवन करने से निखिल
जगत् वशीभूत होता है। घृताक्त दूर्वा से होम करने से दीर्घायु तथा आरोग्य की प्राप्ति होती है। रक्त कमलों
से होम करने से वांछित धन की प्राप्ति होती है। पलाशपुष्पों से हवन करने से मनुष्य मेधावी होता है। एक
वर्ष तक प्रातःकाल उक्तमन्त्र से अभिमन्त्रित जल को पीने से मनुष्य महाकवि होता है। उसके मन्त्रित अन्न
को खाने से भयंकर व्याधि भी नष्ट हो जाती है। जिस रोग की जो ओषधि है, उससे हवन करने से तुरन्त उसकी
शान्ति होती है ॥२०-२५॥ नदी के तट पर या गोष्ठ में दुग्धाहार करते हुए एक लाख मंत्र जप करे और फिर
घी एवम् खीर से हवन करे। ऐसा करने से मनुष्य विद्यानिधि होता है। जिसका आधिपत्य क्षीण हो गया हो,

६३३
त्रिसप्ततितमोऽध्यायः
तदैव पुनराप्नोति स्वाधिपत्यं न संशयः । उपोष्य गङ्गातीरांते स्थित्वा लक्षं जपेन्नरः ॥२८॥
दशांशं कमलैर्हुत्वा विल्वोत्थैर्वा प्रसूनकैः । मधुरत्रयसंयुक्तैराज्यश्रियमवाप्नुयात् ॥२६॥
मार्गमासे जले स्थित्वा कन्दमूलफलाशनः । लक्षं जप्त्वा दशांशेन पायसैर्जुहुयादसौ ॥३०॥
श्रीरामचन्द्रसदृशः पुत्रः पौत्रोऽपि जायते । अन्येऽपि बहवः संति प्रयोगा मन्त्रराजके ॥३१॥
किंतु प्रयोगकर्तृणां परलोको न विद्यते । षट्कोणं वसुपत्रं च तद्बाह्यार्कदलं लिखेत् ॥३२॥
षट्कोणेषु षडर्णानि यन्त्रस्य विलिखेद् बुधः । अष्टपत्रे तथाष्टाणाँल्लिखेत्प्रणवगर्भितान् ॥३३॥
कामबीजं रविदले मध्ये मन्त्रावृताभिधाम् । सुदर्शनावृतं बाह्ये दिक्षु युग्मावृतं तथा ॥३४॥
वज्रोल्लसद्भूमिगेहं कन्दर्पाङ्कुशपाशकैः । भूम्या च विलसत्कोणं यन्त्रराजमिदं स्मृतम् ॥३५॥
भूर्जेऽष्टगन्धैः संलिख्य पूजयेदुक्तवर्त्मना । षट्कोणेषु दलार्काब्जान्यवेष्टवृतयुग्मतः ॥३६॥
केशरेष्वष्टपत्रस्य स्वरद्वंद्वं लिखेद् बुधः । बहिस्तु मातृकां चैव मन्त्रं प्राणनिधायनम् ॥३७॥
यन्त्रमेतच्छुभ्रे घस्रे कण्ठे वा दक्षिणे भुजे । मूर्ध्नि वा धारयेन्मंत्री सर्वपापैः प्रमुच्यते ॥३८॥
सुदिने शुभनक्षत्रे सुदेशे शल्यवर्जिते । वश्याकर्षणविद्वेषद्रावणोच्चाटनादिकम् ॥३६॥
पुष्यद्वयं तथादित्यार्द्रामघासु यथाक्रमम् । दूर्वोत्या लेखनी वश्ये तथाकृष्टौ करंजजा ॥४०॥
नरास्थिजा मारणे तु स्तंभने राजवृक्षजा । शांतिपुष्टयायुषां सिद्धयै सर्वापच्छमनाय च ॥४१॥
वह शाकाहार करते हुए जल के मध्य में एक लाख जप कर उसका दशांश बिल्वपुष्पों से हवन करे । ऐसा करने
से तुरन्त आधिपत्य की पुनः प्राप्ति होती है, इसमें संशय नहीं । जो व्यक्ति गंगा के किनारे निवास करते हुए
उपवासपूर्वक एक लाख मंत्र का जप कर उसका दशांश 'त्रिमधुरमिश्रित कमलों या बिल्वपुष्पों से हवन करता
है, उसे राज्यश्री प्राप्त होती है। जो माघमास में कंद, मूल तथा फलाहार करते हुए जल में एक लाख मन्त्र-जप
करके उसका दशांश खीर से अग्नि में हवन करता है, उसके श्री रामचन्द्र के समान पुत्र-पौत्र उत्पन्न होते हैं ।
उक्त मन्त्रराज के अन्य भी बहुत से प्रयोग हैं । किंतु प्रयोगकर्ताओं को परलोक नहीं मिलता है। पहले
षट्कोण लिख कर अष्टदल कमल तथा उसके बाहर द्वादशदल कमल लिखे । मेधावी व्यक्ति षट्कोण में मंत्र के
छः वर्षों को लिखकर अष्टदल में प्रणव सहित आठ वर्षों को लिखे। रविदल में कामबीज (क्लीं) मध्य में मन्त्र
से आवृत, बाहर सुदर्शन मन्त्र से आवृत और दिशाओं में युग्मबीज (रां श्री) लिखकर भूमिगृह को लिखे, जो
वज्र, कंदर्प, अंकुश तथा पाश से युक्त हो । इस तरह भूमिगृह तथा कोण आदि से सुशोभित यंत्र सर्वश्रेष्ठ माना
गया है ॥२६-३५॥ भोजपत्र पर अष्टगन्धों से यन्त्र को लिखकर पूर्वकथित मार्ग से उसका पूजन करे । षट्कोण
में द्वादशदल कमल लिख कर बुधजन अष्टपत्र के केसरों पर द्वन्द्वस्वरों को लिखे । उसके बाहर मातृकाक्षर तथा
प्राणाधायक मन्त्र को लिखे । साधक इस यन्त्र को शुभ दिन में कण्ठ या दाहिनी भुजा या मस्तक पर धारण
करे । इसके धारण से समस्त पापों का नाश होता है। वशीकरण, आकर्षण, विद्वेष, मारण तथा उच्चाटन करने
के लिये सुदिन, शुभनक्षत्र तथा कंटकादिरहित सुदेश में यन्त्र को धारण करना चाहिये । आर्द्रा, पुनर्वसु, पुष्य,
अश्लेषा और मघा नक्षत्र में इसका धारण होना चाहिये । वशीकरण के लिये दूर्वा की लेखनी, आकर्षण के
लिये करंज की लेखनी, मारण के लिये अस्थि की लेखनी और स्तंभन के लिये राजवृक्ष की लेखनी बनानी
चाहिये । उस यन्त्र को धारण करने से पुष्टि तथा आयु की वृद्धि और समस्त विपत्तियों की शान्ति होती है। यदि
१. घी, मधु, चीनी -- इन तीनों का समुदाय त्रिमधु कहलाता है ।
८० ना० पु०

६३४ नारदीयपुराणम्
विभ्रमोत्पादने चैव शिलायां विलिखेद् बुधः । खरचर्मणि विद्वेषे ध्वजे तूच्चाटनाय च ॥४२॥
शत्रूणां ज्वरसन्तापशोकमारणकर्मणि । पीतवस्त्रं लिखित्वा तु साधयेत्साधकोत्तमः ॥४३॥
वश्याकृष्टौ चाष्टगन्धैः सम्पूज्य च यथाविधि । चिताङ्गारादिना चैव ताडनोच्चाटनादिकम् ॥४४॥
विषार्कक्षीरयोगेन मारणं भवति ध्रुवम् । लिखित्त्वैवं यन्त्रराजं गन्धपुष्पादिभिर्यजेत् ॥४५॥
त्रिलोहवेष्टितं कृत्वा धारयेत्साधकोत्तमः । बीजं रामाय ठद्वन्द्वं मन्त्रोऽयं रसवर्णकः ॥४६॥
महासुदर्शनमनुः कथ्यते सिद्धिदायकः । सुदर्शनमहाशब्दाच्चक्रराजेश्वरेति च ॥४७॥
दुष्टांतकदुष्टभयानकदृष्टभयंकरम् । छिन्धि द्वयं भिन्धि युग्मं विदारय युगं ततः ॥४८॥
परमन्त्रान् ग्रस द्वंद्वं भक्षयद्वितयं ततः । त्रासय द्वितयं वर्मास्त्राग्निजायांतितो मनुः ॥४६॥
अष्टषष्ट्यक्षरः प्रोक्तो यंत्रसंवेष्टने स्वयम् । तारो हृद्भगवान् ङेन्तो ङेन्तो हि रघुनन्दनः ॥५०॥
रक्षोघ्नविशदायांते मधुरादिप्रसन्न च । वरदानायान्त्रितांते नुतेजसे पदमीरयेत् ॥५१॥
बालायांते तु रामाय विष्णवे हृदयांतिमः । सप्तचत्वारिंशद्वर्णो मालामन्त्रोऽयमीरितः ॥५२॥
विश्वामित्रो मुनिश्चास्य गायत्री छंद ईरितम् । श्रीरामो देवता बीजं ध्रुवः शक्तिश्च ठद्वयम् ॥५३॥
षड्दीर्घस्वरयुग्मायाबीजेनांगानि कल्पयेत् । ध्यानपूजादिकं सर्वमस्यपूर्ववदाचरेत् ॥५४॥
अयमाराधितो मन्त्रः सर्वान्कामान्प्रयच्छति । स्वकामसत्यवागलक्ष्मीताराद्यः पञ्चवर्णकः ॥५५॥
षडक्षरः षड्विधः स्याच्चतुर्वर्गफलप्रदः । ब्रह्मा संमोहनः शक्तिर्दक्षिणा मूर्तिसंज्ञकः ॥५६॥
अगस्त्यः श्रीशिवः प्रोक्तास्ते तेषां मुनयः क्रमात् । अथवा कामबीजादेर्विश्वामित्रो मुनिः स्मृतः ॥५७॥
छन्दः प्रोक्तं च गायत्री श्रीरामो देवता पुनः । बीजशक्तिरराधमांत्यं मन्त्राणैः स्यात्षडंगकम् ॥५८॥
बीजैः षड्दीर्घयुक्तैर्वा मन्त्राणान्पूर्ववन्न्यसेत् । ध्यायेत्कल्पतरोर्मूले सुवर्णमयमण्डपे ॥५६॥


शत्रुओं को मतिभ्रान्त करना हो तो बुद्धिमान् साधक शिला पर (यन्त्र) लिखे, फूट डालना हो तो गधे के चाम
पर लिखे, उच्चाटन करना हो तो पताका पर लिखे और ज्वर, संताप, शोक तथा मारण कर्म के लिये पीतवस्त्र
पर लिख कर श्रेष्ठ साधक मंत्र सिद्ध करे ॥३६-४३॥ वशीकरण तथा आकर्षण के लिये अष्टगन्धों से विधिपूर्वक पूजा
करनी चाहिये । ताडन तथा उच्चाटन करने के लिये चिता अंगार (कोयले) से यन्त्र को लिखे । विष तथा आक
के दूध को घोल कर (उससे उक्त यन्त्र) लिखने से निश्चय ही मारण होता है । उत्तम साधक इस प्रकार यन्त्रराज
को लिखकर गन्ध-पुष्प आदि से अर्चना करे ॥४४-४५॥ फिर त्रिलोह (सोना, चांदी, तांबा) से उसे वेष्टित कर
उत्तम साधक धारण करे । "बीज ....." यह छः अक्षरों का मन्त्र महासुदर्शन मन्त्र कहलाता है, जो सिद्धिदायक
है । "सुदर्शन स्वाहा" इस अड़सठ अक्षरों के मन्त्र से यन्त्र का संवेष्टन किया जाता है । "तार....हृदयम्"
यह सैंतालीस अक्षरों का मालामन्त्र कहा गया है । इसके ऋषि विश्वामित्र हैं, छन्द गायत्री है, श्रीराम देवता
हैं, ध्रुव बीज है और ठद्वय शक्ति है । छः दीर्घस्वरों से युक्त बीज मन्त्र से अङ्गन्यास कर ध्यान, पूजन आदि सब
कुछ पूर्ववत् ही करना चाहिये । इस मन्त्र की आराधना करने से सकल कामनायें सफल होती हैं । "स्वकाम..."
यह षडक्षर मन्त्र चतुर्वर्ग के फल को देने वाला है । ब्रह्मा, संमोहन, शक्ति, दक्षिणामूर्ति, अगस्त्य तथा श्रीशिव-ये
क्रमशः इसके ऋषि हैं ॥४६-५६॥ अथवा कामबीज आदि के विश्वामित्र मुनि हैं, गायत्री छन्द है, श्रीराम देवता हैं
और स्वाहा बीजशक्ति है । मन्त्राक्षरों से षडंगन्यास कर छः दीर्घ मात्राओं से युक्त बीज मन्त्र से मन्त्राक्षरों का यथा-
पूर्व न्यास करे । तदनन्तर कल्पतरु के मूल में स्थित सुवर्णमय मण्डप में पुष्पक विमान के भीतर अष्टदलकमल से

त्रिसप्ततितमोऽध्यायः ६३५
पुष्पकस्थविमानांतः सिंहासनपरिच्छदे । पद्मे वसुदले देशेमिन्द्रनीलसमप्रभम् ॥६०॥
वीरासनसमासीनं ज्ञानमुद्रोपशोभितम् । वामोरुन्यस्तहस्तस्तीतालक्ष्मणसेवितम् ॥६१॥
रत्नाकल्पं विभुं ध्यात्वा वर्णलक्षं जपेन्मनुम् । यद्वा स्मारादिमन्त्राणां जयांश्च हरिं स्मरेत् ॥६२॥
यजनं काम्यकर्माणि सर्वं कुर्यात्षडर्णवत् । रामश्च चन्द्रभद्रान्तो ङेनमोंतो ध्रुवादिकः ॥६३॥
मन्त्रावष्टाक्षरौ ह्येतौ ताराद्यौ चेन्नवाक्षरौ । एतेषां यजनं सर्वं कुर्यान्मंत्री षडर्णवत् ॥६४॥
जानकीवल्लभो डेंतो द्विष्टांतः कवचादिकः । दशार्णोऽयं महामन्त्रो विशिष्टोऽस्य मुनिः स्वराट् ॥६५॥
छन्दश्च देवता सीता पतिर्बीजं तथादिमम् । स्वाहा शक्तिश्च कामेन कुर्यादंगानि षट् क्रमात् ॥६६॥
शिरोललाटभ्रू मध्यतालुकण्ठेषु हृद्यपि । नाभ्यांघ्रिजानुपादेषु दशार्णान्विन्यसेन्मनोः ॥६७॥
अयोध्यान्नगरे रत्नचित्रसौवर्णमण्डपे । मंदारपुष्पैर्रावद्धविताने तोरणान्विते ॥६८॥
सिंहासनसमासीन पुष्पकोपरि राघवम् । रक्षोभिर्हरिभिर्देवैः सुविमानगतैः शुभैः ॥६६॥
संस्तूयमानं मुनिभिः प्रह्वैश्च परिसेवितम् । सीतांलंकृतवामांगं लक्ष्मणेनोपशोभितम् ॥७०॥
श्यामं प्रसन्नवदनं सर्वाभरणभूषितम् । एवं ध्यात्वा जपेन्मंत्री वर्णलक्षं समाहितः ॥७१॥
दशांशः कमलैर्होमो यजनं च षडर्णवत् । रामो ङेन्तो धनुष्पाणिर्डेतोंऽते वह्निसुन्दरी ॥७२॥
दशाक्षरोऽयं मंत्रोऽस्य मुनिर्नृ ह्या विराट् पुनः । छन्दस्तु देवता प्रोक्तो रामो राक्षसमर्दनः ॥७३॥
आद्यं बीजं द्विठः शक्तिर्बी जेनांगानि कल्पयेत् । वर्णन्यास तथा ध्यानं पुरश्चर्याचनादिकम् ॥७४॥
युक्त सिंहासन पर वीरासन लगाकर बैठे हुए इन्द्रनीलमणि के समान कान्ति वाले विभु रामचन्द्र का ध्यान करे,
जो ज्ञान मुद्रा से सुशोभित, लक्ष्मण से सुसेवित, बायीं जांघ पर बैठी सीता के कन्धे पर हाथ रखे हुए तथा रत्न के
समान कान्ति से युक्त हैं। ध्यान के उपरान्त छः लाख मन्त्र का जप करे या स्मार आदि मन्त्रों के अधिदेवता
विजयिष्णु हरि का स्मरण करे। इस षडक्षर मन्त्र से यजन तथा काम्यकर्म सब कुछ कर सकते हैं। "ओं राम-
चन्द्राय नमः ओं रामभद्राय नमः" अष्टाक्षर मन्त्र हैं। जब इनके अन्त में 'ओं' जोड़ दिया जाता है तब ये
नवाक्षर हो जाते हैं। साधक षडक्षर मन्त्र की तरह इनकी भी आराधना करे। "हुं जानकीवल्लभाय स्वाहा"
यह दशाक्षर महामन्त्र है। इसके ऋषि वशिष्ठ हैं, छन्द स्वराट् है, देवता रामचन्द्र हैं, हुं बीज है और स्वाहा
शक्ति है। इस मन्त्र से क्रमशः षडंगन्यास करना चाहिये, शिर, ललाट, भौंह के बीच, तालु, कण्ठ, हृदय, नाभि
चरण तथा जानु में मन्त्र के दश अक्षरों का न्यास करे । ॥५७-६७॥
तदनन्तर ध्यान करे कि अयोध्या नगर में रत्नजटित सुवर्ण के मण्डप में, जो मन्दार पुष्पों से आबद्ध
वितान एवम् तोरण से सुशोभित है, पुष्पक विमान पर अवस्थित सिंहासन पर राघव विराजमान हैं। सुन्दर
विमानों पर चढ़कर आये हुए देवगण तथा रक्षोगण उनकी स्तुति कर रहे हैं। मुनिगण विनीत भाव से सेवा में जुटे
हुए हैं। भगवान् का वाम अङ्ग सीता से अलंकृत तथा लक्ष्मण से उपशोभित है। उनका वर्ण श्याम है, मुख
प्रसन्न है और शरीर समस्त आभूषणों से विभूषित है। साधक समाहित चित्त से इस प्रकार ध्यान कर दस लाख
मन्त्र जप करे और उसका दशांश कमलों से हवन करे। यजन-पूजन तो षडक्षर मन्त्र की तरह करना चाहिये।
'रामाय धनुष्पाणये स्वाहा' - यह दशाक्षर मन्त्र है। इसके मुनि ब्रह्मा, छन्द विराट् और देवता राक्षसमर्दक
राम हैं। आद्य अक्षर (रां) बीज है और स्वाहा शक्ति है। बीज से अङ्गन्यास करना चाहिये। वर्णन्यास, ध्यान,
पुरश्चरण तथा अर्चना आदि दशाक्षर मन्त्र की ही तरह करे। इसके जप में धनुष और बाण लिये श्रीरामचन्द्र

६३६ नारदीयपुराणम्
दशाक्षरोक्तवत्कुर्याच्चापबाणधरं स्मरेत् । तारो नमो भगवते रामान्ते चंद्रभद्रकौ ॥७५॥
द्वैतावर्काक्षरौ मंत्रौ ऋषिध्यानादि पूर्ववत् । श्रीपूर्वं जयपूर्वं च तद्विधा रामनाम च ॥७६॥
त्रयोदशाक्षरो मंत्रो मुनिर्ब्रह्मा विराट् स्मृतम् । छन्दस्तु देवता प्रोक्तो रामः पापौघनाशनः ॥७७॥
षडंगानि प्रकुर्वीत द्विरावृत्त्या पदत्रयैः । ध्यानाचंनादिकं सर्वं ह्यस्य कुर्याद्दशार्णवत् ॥७८॥
तारो नमो भगवते रामायांते महापदम् । पुरुषाय हृदंतोऽयं मनुरष्टादशाक्षरः ॥७६॥
विश्वामित्रो मुनिश्चंदो धृती रामोऽस्य देवता । तारो बीजं नमः शक्तिश्चंद्राद्यश्चव्यग्निवड्भुजैः ॥८०॥
वर्णैर्मत्रोत्थितैः कुर्यात्षडंगानि समाहितः । निश्शाणभेरीपटहशंखतुर्यादिनिःस्वनैः ॥८१॥
प्रवृत्तनृत्ये परितो जयमंगलभाषिते । चंदनागरुकस्तूरीकर्पूरादिसुवासिते ॥८२॥
नानाकुसुमसौरभ्यवाहिगंधवहान्विते । देवगंधर्वनारीभिर्गायन्तीभिरलंकृते ॥८३॥
सिंहासने समासीनं पुष्पकोपरि राघवम् । सौमित्रिसीतासहितं जटामुकुटशोभितम् ॥८४॥
चापबाणधरं श्यामं ससुग्रीवविभीषणम् । हत्वा रावणमायांतं कृतत्रैलोक्यरक्षणम् ॥८५॥
एवं ध्यात्वा जपेद्वर्णं लक्षं मंत्री दशांशतः । घृताक्तैः पायसैर्हुत्वा यजनं पूर्ववच्चरेत् ॥८६॥
प्रणवो हृदयं सीतापतये तदनंतरम् । रामाय हनयुग्मांते वर्मास्ताग्निप्रियांतमः ॥८७॥
एकोनविशद्वर्णोऽयं मंत्रः सर्वार्थसाधकः । विश्वामित्रो मुनिश्चास्या नुष्टुप्छन्द उदाहृतम् ॥८८॥
देवता रामभद्रो जं बीजं शक्तिर्नम इति । मंत्रोत्थितैः क्रमाद्वर्णैस्ततो ध्यायेच्च पूर्ववत् ॥८६॥
पूजनं काम्यकर्मादिसर्वमस्य षडर्णवत् । तारः स्वबीजं कमला रामभद्रेति संपठेत् ॥६०॥
का ध्यान करना चाहिए ॥६८-७४॥ तार (ओं) के पश्चात् 'नमो भगवते रामचन्द्राय' अथवा 'रामभद्राय'
ये दो प्रकार के द्वादशाक्षर मन्त्र हैं । इनके मुनि तथा ध्यान आदि पूर्ववत् ही है। श्रीपूर्वक, जयपूर्वक तथा
जय-जयपूर्वक 'राम' नाम (अर्थात् श्रीराम जयराम जयजयराम) यह तेरह अक्षरों का मन्त्र है। इसके मुनि ब्रह्मा,
छन्द विराट् और देवता सकल पापनाशक राम हैं। इस मन्त्र के तीन पदों को दोहरा कर षडंगन्यास करना
चाहिये । ध्यान, पूजन आदि तो दशाक्षर मन्त्र की तरह करने होंगे । 'ओं नमो भगवते रामाय महापुरुषाय नमः'
-यह अट्ठारह अक्षरों का मन्त्र है। इसके मुनि विश्वामित्र, छन्द धृति और देवता राम हैं। 'ओं' इसका बीज
है और 'नमः' शक्ति है । साधक सावधान होकर मन्त्र के अट्ठारहों अक्षरों से षडंगन्यास करे। तदनन्तर ढोल,
नगाड़ा, शङ्ख, तुरही आदि के शब्द तथा 'जय' आदि मांगलिक शब्दों के साथ नृत्य-गीत करे । चन्दन, अगर,
कस्तूरी, कर्पूर आदि से सुवासित, विविध सुगंधित कुसुमों से समन्वित और गाती हुई देवों एवम् गन्धर्वो की ललनाओं
से विभूषित पुष्पक विमान पर सिंहासनासीन राघव का ध्यान करे। जिनके समीप सीता, लक्ष्मण, सुग्रीव तथा
विभीषण उपस्थित हैं। जो जटा रूपी मुकुट से सुशोभित होते हुए हाथों में धनुष-बाण धारण किये हुए हैं। और
जिन्होंने आते हुए रावण को मार कर त्रैलोक्य की रक्षा की है ॥७५-८५॥
इस प्रकार ध्यान कर साधक एक लाख मन्त्र-जप करे और उसका दशांश घृतमिश्रित पायस से होम करे ।
पूजन तो पूर्ववत् ही समझना चाहिये । "प्रणव........."यह उन्नीस अक्षरों वाला मन्त्र सकल कामनाओं को
सफल करता है। विश्वामित्र इसके मुनि हैं, छंद अनुष्टुप् है, देवता रामभद्र हैं, 'जं' बीज है और 'नमः' शक्ति
है । मन्त्र के वर्णों से क्रमशः न्यास कर बाद में पहिले की तरह ध्यान करे। यजन-पूजन आदि तो षडक्षर मन्त्र
की ही तरह करना चाहिये । 'ओं रां श्रीं रामभद्र महेष्वास रघुवीर नृपोत्तम । दशास्यान्तक मां रक्ष देहि मे
परमां श्रियम्' - यह पैंतीस अक्षरों का मन्त्र है। बीज से वियुक्त होने पर बत्तीस अक्षरों का होता है; परन्तु सकल

६३७
त्रिसप्ततितमोऽध्यायः
महेष्वासपदान्ते तु रघुवीर नृपोत्तम । दशास्यांतकशब्दांते मां रक्षदेहि संपठेत् ॥८१॥
परमांते मे श्रियं स्यान्मंत्रो बाणगुणाक्षरः । बीजैस्त्रियुक्तो द्वात्रिंशद्वर्णोऽयं फलदायकः ॥८२॥
विश्वामित्रो मुनिश्चास्थानुष्टुप्छंदउदाहृतम् । देवता रामभद्रोऽत्र बीजं स्वं शक्तिरिंदिरा ॥८३॥
बीजत्रयाद्यैः कुर्वीत पदैः सर्वेण मंत्रवित् । पंचांगानि च विन्यस्य मंत्रवर्णान्क्रमान्न्यसेत् ॥८४॥
मूर्धिन भाले दृशोः श्रोत्रे गंडयुग्मे सनासिके । आस्ये दोःसंधियुगले स्तनहृन्नाभिषु क्रमात् ॥८५॥
कटौ मेढ्रे पायुपादसंधिष्ववर्णान्न्यसेन्मनोः । ध्यानाचंनादिकं चास्य पूर्ववत्समुपाचरेत् ॥८६॥
लक्षत्रयं पुरश्चर्या पायसैर्हवनं मतम् । ध्यात्वा रामं पीतवर्ण जपेल्लक्षं समाहितः ॥८७॥
दशांशं कमलैर्हुत्वा धनैर्धनपतिर्भवेत् । तारो माया रमाद्वंद्वं दाशरथाय हृच्च वै ॥८८॥
एकादशाक्षरो मंत्रो मुन्याद्यर्चास्य पूर्ववत् । त्रैलोक्यांते तु नाथाय हृदंतो वसुवर्णवान् ॥८९॥
अस्यापि पूर्ववत्सर्वं न्यासध्यानाचंनादिकम् । आंजनेयपदान्ते तु गुरवे हृदयांतिमः॥ ॥१००॥
मंत्रो नवाक्षरोऽस्यापि यजनं पूर्ववन्मतम् । ङेतं रामपद पश्चाद्धृदयं पंचवर्णवत् ॥१०१॥
मुनिध्यानाचंनं चास्य प्रोक्तं सर्वं षडर्णवत् । रामांते चंद्रभद्रौ च डेंतौ पावकवल्लभा ॥१०२॥
मंत्रौ द्वौ च समाख्यातौ मुन्याद्यर्चादि पूर्ववत् । वह्निः शेषावन्वितश्चैव चंद्रभूषितमस्तकः ॥१०३॥
एकाक्षरो रघुपतेर्मंत्रः कल्पद्रुमोऽपरः । ब्रह्मा मुनिः स्याद्गायत्री छंदो रामोऽस्य
देवता ॥१०४॥
षड्दीर्घाढचेन मंत्रेण षडंगानि समाचरेत् । सरयूतीरमंदारवेविकापंकजासने ॥१०५॥
श्यामं वीरासनासीनं ज्ञानमुद्रोपशोभितम् । वामोरुन्यस्ततद्धस्तं सीतालक्ष्मणसंयुक्तम् ॥१०६॥
कामनाओं को पूर्ण करता है । इसके मुनि विश्वामित्र, छंद अनुष्टुप्, देवता रामभद्र, बीज ‘स्वं’ तथा शक्ति
इंदिरा है। मन्त्रवेत्ता साधक बीजत्रय सहित पदों से पंचांग न्यास कर क्रमशः मन्त्रवणों का न्यास करे । मस्तक,
भाल, नेत्र, कर्ण, कपोल, नासिका, भुजा, बाहुमूल, स्तन, हृदय, कटि, लिंग, पायु, चरण तथा संधियों में मन्त्र के
वणों का न्यास कर ध्यान, पूजन आदि पूर्ववत् ही करे । मन्त्र का जप तीन लाख और हवन पायस से करने को
कहा गया है । पीतवर्ण राम का ध्यान कर समाहित चित्त से एक लाख जप करे ।॥८६-९७॥ फिर उसका दशांश
कमलों से हवन करे । ऐसा करने से मानव कुबेर होता है । ‘ओं ह्रीं श्रीं दाशरथाय नमः’ यह ग्यारह अक्षरों का
मन्त्र है । इसके मुनि आदि तथा पूजन आदि पूर्ववत् ही समझना चाहिये । “त्रैलोक्य नाथाय नमः.....”यह
आठ अक्षरों का मन्त्र है । इसका भी न्यास, ध्यान, पूजन आदि पूर्ववत् करना चाहिये । ‘आंजनेयगुरवे
नमः...........’यह नौ अक्षरों का मन्त्र है । इसका भी यजन आदि पूर्ववत् करे । ‘रामाय नमः’ यह पाँच अक्षरों
का मन्त्र है। इसके मुनि, ध्यान, पूजन आदि षडक्षर मन्त्र की तरह अवगत करना चाहिये । ‘रामचन्द्राय स्वाहा,
‘रामभद्राय स्वाहा’ इन दोनों मन्त्रों के मुनि एवम् अर्चना आदि पूर्ववत् समझनी चाहिये । अग्नि (र्), शेष (आ) से
युक्त हो और उसका मस्तक चन्द्रमा (ं) से विभूषित हो तो यह ग्यारह अक्षरों वाला रघुपति का मन्त्र है, जो
कल्पवृक्ष के समान है। इसके मुनि ब्रह्मा, छन्द गायत्री और देवता राम हैं। छः दीर्घमात्राओं से युक्त मन्त्र से
षडंग न्यास कर परमात्मा राम का ध्यान करे-‘सरयू के तटवर्ती मंदारवृक्ष के नीचे मंडप में कमलों के आसन
पर श्यामवर्ण राम वीरासन लगाये विराजमान हैं। ज्ञानमुद्रा उनकी शोभा बढ़ा रही है। बाँयीं जांघ पर सीता
जी बैठी हुई हैं। समीप में लक्ष्मण विद्यमान हैं। कन्दर्पतुल्य कान्तिमान् शरीर को अपने आप निहार रहे हैं।”

६३८ नारदीयपुराणम्
अवेक्षमाणमात्मानं मन्मथामिततेजसम् । शुद्धस्फटिकसंकाशं केवलं मोक्षकांक्षया ॥१०७॥
चिंतयेत्परमात्मानममृतुलक्षं जपेन्मनुम् । सर्वं षडर्णवच्चास्य होम नित्यर्च नादिकम् ॥१०८॥
वह्निः शेषासनो भ्रांतः केवलो द्व्यक्षरो मनुः । एकाक्षरोक्त्तवत्सर्वं मुनिध्यानाचनादिकम् ॥१०६॥
तारमानारमानंगचास्त्रबीजौद्विवर्णकः । द्वयक्षरो मंत्रराजः स्यात्षड्विधः सकलेष्टदः ॥११०॥
द्वयक्षरश्चंद्रभद्रांतो द्विविधश्चतुरक्षरः । एकाणोक्तवदेतेषां मुनिध्यानाचनादिकम् ॥१११॥
तारो रामश्चतुर्थ्यंतो वर्मास्त्रं वह्निवल्लभा । अष्टाणोऽयं महामंत्रो मुन्याद्यर्चा षडर्णवत् ॥११२॥
तारो मया हृदंते स्याद्रामाय प्रणवांतितमः । शिवोमाराममंत्रोऽयमष्टाणंः सर्वसिद्धिदः ॥११३॥
ऋषिः सदाशिवः प्रोक्तो गायत्री छंद ईरितम् । शिवोमारामचंद्रोऽत्र देवता परिकीर्तितः ॥११४॥
षड्दीर्घयामाय यातु ध्रुवपंचार्णयुक्तया । षडंगानि विधायाथ ध्यायेद्धृदि सुरार्चितम् ॥११५॥
रामं त्रिनेत्रं सोमाद्धंधारिणं शूलिनं वरम् । भस्मोद्धूलितसर्वांगं कपर्द्दिनमुपास्महे ॥११६॥
रामाभिरामां सौंदर्यसीमा सोमावतंसिनीम् । पाशांकुशधनुर्वाणधरां ध्यायेत्त्रिलोचनाम् ॥११७॥
एवं ध्यात्वा जपेद्वांलक्षं त्रिमधुरान्वितैः । विल्वपत्रैः फलैः पुष्पैस्तैलैर्वा पंकजैर्जुनेत् ॥११८॥
स्वयमायांति निधयः सिद्धयश्च सुरेप्सिताः । तारो माया च भरताग्रजरामनमोभवः ॥११६॥
वह्निजायाद्वादशार्णो मंत्रः कल्पद्रुमोऽपरः । अंगिराश्च मुनिश्चंदो गायत्री देवता पुनः ॥१२०॥
श्रीरामो भुवनाबीजं स्वाहाशक्तिः समीरितः । चंद्रैकमूनिभूनेत्रैर्मंतारै रंगकल्पनम ॥१२१॥

यदि केवल मोक्ष की आकांक्षा हो तो शुद्ध स्फटिक के समान रूप वाले राम का ध्यान करना चाहिये ॥१०८-१०७॥
ध्यानोपरान्त छः लाख मन्त्र-जप करना चाहिए । हवन, पूजन आदि तो षडक्षर मन्त्र की तरह करना चाहिये ।
वह्नि (र), शेष (आ) के आसन पर विराजमान हो और उसके बाद भान्त (म) हों तो केवल दो अक्षरों का मन्त्र
(राम) होता है । इसके मुनि, ध्यान, पूजन आदि एकाक्षर मन्त्र की तरह किये जाते हैं । तार (ओं), माया
(ह्रीं), रमा (श्रीं), अनङ्ग (क्लीं), अस्त्र (फट्) तथा स्व बीज (रां) इनके साथ पृथक् पृथक् जुड़ा हुआ द्वयक्षर
मन्त्र (राम) छह भेदों से युक्त व्यक्षर मन्त्रराज है जो समस्त कामनाओं को पूर्ण करता है। द्वयक्षर मन्त्र के अन्त
में चन्द्र और भद्र शब्द जोड़ा जाय तो दो प्रकार का चतुरक्षर मन्त्र होता है। इन सबके ऋषि, ध्यान और पूजन
आदि एकाक्षर मन्त्र में बताये के अनुसार हैं। तार (ओं), चतुर्थ्यन्त राम शब्द (रामाय), वर्म (हुं), अस्त्र (फट्),
वह्निवल्लभा (स्वाहा) —यह (ओं रामाय हुं फट् स्वाहा) आठ अक्षरों का महामन्त्र है । इसके ऋषि और पूजन
आदि षडक्षर मन्त्र के समान हैं। 'ओं' ह्रीं रामाय नमः ओं, यह शिव, पार्वती तथा राम मन्त्र सकल सिद्धियों को
देने वाला है । इसके ऋषि सदाशिव, छंद गायत्रो और देवता शिव, उमा तथा रामचंद्र हैं। छः दीर्घ मात्राओं
से युक्त सप्ताक्षर मन्त्र से षडंगन्यास कर हृदय में देववंद्य, राम, अर्धचन्द्र, त्रिशूल तथा कपर्द धारण करने वाले एवम्
सर्वांग में भस्म रमाने वाले त्रिनेत्र शंकर और अति सुन्दरी, मनोरमा, चन्द्रभूषणा, पाश, अंकुश, धनुष तथा बाण
धारण करने वाली त्रिलोचना उमा का ध्यान करे। ध्यानोपरान्त तीन लाख मन्त्र जप करके त्रिमधुयुक्त बिल्वपत्र,
फल, पुष्प, तिल या पद्मों से हवन करे ॥१०८-११८॥ ऐसा करने से निधियां तथा सिद्धियां, जिनकी देवता भी
इच्छा करते हैं, स्वयम् उसके पास आती हैं। 'ओं ह्रीं भरताग्रजराम बलीं स्वाहा' यह द्वादशाक्षर मन्त्र कल्पवृक्ष के
समान है । इसके मुनि अंगिरा, छन्द गायत्री, देवता श्रीराम, बीज भुवना और शक्ति स्वाहा है। मन्त्र के बारहौं
अक्षरों से अङ्गन्यास कर षडक्षर मन्त्र की तरह ध्यान, पूजन आदि करे ॥११९-१२१३॥ ओं सीतापतिरामाय नमः

६३६
त्रिसप्ततितमोऽध्यायः
ध्यानपूजादिकं चास्य सर्वं कुर्यात्षडर्णवत् । प्रणवो हृदयं सीतापते रामश्च ङेंतिमः ॥१२२॥
हनद्वयान्ते वर्म्मास्त्रं मंत्रः षोडशवर्णवान् । अगस्त्योऽस्य मुनिश्चंदो बृहती देवता पुनः ॥१२३॥
श्रीरामोऽहं तथा बीजं रां शक्तिः समुदीरिता । रामाब्धिवह्नि नवेदाक्षिवर्णैः पंचांगकल्पना ॥१२४॥
ध्यानपूजादिकं सर्वमस्य कुर्यात्षडर्णवत् । तारो हृच्चैव ब्रह्मण्य सेव्याय पदमीरयेत् ॥१२५॥
रामायाकुण्ठशब्दहांतं तेजसे च समीरयेत् । उत्तमश्लोकधुर्याय स्वं भृगुः कामिकान्वितः ॥१२६॥
दंडापितां प्रिये मंत्रो रामरामाक्षरो मतः । ऋषिः शुक्रस्तथानुष्टुप्छंदो रामोऽस्य देवता ॥१२७॥
पादैः सर्वेण पंचांगं कुर्याच्छेषं षडर्णवत् । लक्षं जपो दशांशेन जुहुयात्पायसैः सुधीः ॥१२८॥
सिद्धमन्त्रस्य भुक्तिः स्यान्मुक्तिः पातकनाशनम् । आदौ दाशरथायांते विद्महे पदमुच्चरेत् ॥१२९॥
ततः सीतामल्लभाय धीमहीति समुच्चरेत् । तन्नो रामः प्रचेो वर्णा दद्यादिति च संवदेत् ॥१३०॥
एवोक्ता रामगायत्री सर्वभीष्टफलप्रदा । पद्मासीतापदां ङेंतं वह्न्यंतः षडक्षरः ॥१३१॥
वाल्मीकिश्च मुनिश्चंदो गायत्री देवता पुनः । सीता भगवती प्रोक्ता श्रीं बीजं वह्निमुन्दरी ॥१३२॥
शक्तिः षड्दीर्घयुक्तेन बीजेनांगानि कल्पयेत् । ततो ध्यायन्महादेवीं सीतां त्रैलोक्यपूजिताम् ॥१३३॥
तप्तहाटकवर्णाभां पद्मयुग्मं करद्वये । सर्वरत्नभूषणस्फूर्जद्दिव्यदेहां शुभ्रात्मिकाम् ॥१३४॥
नानावस्त्रां शशिमुखीं पद्माक्षीं मुदितांतराम् । पश्यंतीं राघवं पुण्यं शय्याध्यां षड्गुणेश्वरीम् ॥१३५॥
एवं ध्यात्वा जपेद्वर्णलक्षं मंत्री दशांशतः । जुहुयात्कमलैः फुल्लैः पीठे पूर्वोदिते यजेत् ॥१३६॥
मूर्ति संकल्प्य मूलेन तस्यामावाह्य जानकीम् । संपूज्य दक्षिणे राममभ्यर्च्यप्रिऽनिलात्मजम् ॥१३७॥

हन द्वय हुं फट्' यह सोलह अक्षरों का मन्त्र है। इसके मुनि अगस्त्य, छन्द बृहती, देवता श्रीराम, बीज 'हं' और
शक्ति 'रां' है । मन्त्र के सोलहों अक्षरों से पंचांगन्यास कर षडक्षर मन्त्र की तरह ध्यान, पूजन आदि सब कुछ करे ।
'ओं नमः ब्रह्मण्यसेव्याय रामायाकुण्ठतेजसे। उत्तमश्लोकधुर्याय न्यस्तदण्डापिताङ्ग्नये' यह तैंतीस अक्षरों का मन्त्र
है। इसके ऋषि शुक्र, छन्द अनुष्टुप् और देवता राम हैं। समस्त पादों से पंचाङ्कन्यास कर शेष कार्य षडक्षर मन्त्र
की तरह करे। विद्वान् साधक एक लाख मन्त्र जप करने के पश्चात् उसका दशांश पायस से हवन करे । इस मन्त्र
की सिद्धि हो जाने पर भुक्ति-मुक्ति मिलती है तथा पातकों का नाश होता है। "दाशरथाय विद्महे । सीता-
वल्लभाय धीमहि । तन्नो रामः प्रचोदयात्" यह रामगायत्री कही गई है, जो सकल कामनाओं को देने वाली
है और जिसे राम ने प्रकाशित किया है। 'श्रीं सीतायै स्वाहा' यह षडक्षर सीता मन्त्र है ॥१२२-१३१॥ इसके
मुनि वाल्मीकि, छन्द गायत्री, देवता भगवती सीता, बीज 'श्रीं' और शक्ति 'स्वाहा' है। छः दीर्घमात्राओं से
युक्त बीज मन्त्र से अङ्गन्यास कर त्रैलोक्यपूजित महादेवी सीता का इस प्रकार ध्यान करे - "उनकी कान्ति तपे
सोने के समान है; दोनों हाथों में कमलपुष्प विद्यमान हैं, दिव्य शरीर में उत्तम रत्नों के बने आभूषण चमक
रहे हैं; स्वरूप सौम्य है; मुख चन्द्रमा के समान है; नेत्र पद्मों के तुल्य हैं; वे विविध वस्त्र धारण किये हुई हैं,
उनका अन्तःकरण प्रहृष्ट मालूम पड़ता है; वे पुण्यात्मा राघव की ओर निहार रही हैं; बहुमूल्यक आसन पर
समासीन हैं; और छहों गुणों की स्वामिनी हैं ॥१३२-१३५॥”
उपर्युक्त प्रकार से ध्यान कर छः लाख मन्त्र-जप करे और उसका दशांश विकसित कमल पुष्पों से होम
करे। अनन्तर पूर्वकथित पीठ पर मूलमन्त्र से मूर्ति का संकल्प करके उसमें जानकी का आवाहन करे। प्रतिमा

६४० नारदीयपुराणम्
पृष्ठे लक्ष्मणमभ्यर्च्य षट्‌कोणेऽवंगपूजनम् । पत्रेषु मंत्रिमुख्यांश्च बाह्ये लोकेश्वरान्पुनः ॥१३८॥
वज्राद्यानपि संपूज्य सर्वसिद्धीश्वरो भवेत् । जातिपुष्पैश्चन्दनाक्तै राजवश्याय होमयेत् ॥१३६॥
कमलैर्धनधान्याप्तिनीलोत्पलैर्वशयेन् जगत् । बिल्वपत्रैः श्रियःप्राप्त्यै दूर्वाश्री रोगशांतये ॥१४०॥
किं बहुत्वेन सौभाग्यं पुत्रान्पौत्रान्परं सुखम् । धनं धान्यं च मोक्षं च सीताराधनतो लभेत् ॥१४१॥
शक्रः सेंदुर्लक्ष्मणाय हृदयं सप्तवर्णवान् । अगस्त्योऽस्य मुनिश्चंदो गायत्री देवता पुनः ॥१४२॥
लक्ष्मणाख्यो महावीरश्चाढचं हृद्बीजशक्तिकै । षड्दीर्घाढचेन बीजेन षडंगानि समाचरेत् ॥१४३॥
द्विभुजं स्वर्णरुचिरतनुं पद्मनिभेक्षणम् । धनुर्बाणकरं रामसेवासंसक्तमानसम् ॥१४४॥
ध्यात्वैवं प्रजपेद्ब्रर्णलक्षं मंत्री दशांशतः । मध्वाक्तैः पायसैर्हुत्वा रामपीठे प्रपूजयेत् ॥१४५॥
रामवद्यजनं चास्य सर्वसिद्धिप्रदो ह्ययम् । साकल्यं रामपूजाया यदीच्छेन्नियतं नरः ॥१४६॥
तेन यत्नेन कर्त्तव्यं लक्ष्मणार्चनमादरात् । श्रीरामचन्द्रभेदास्तु बहवः संति सिद्धिदाः ॥१४७॥
तत्साधकः सदा कार्यं लक्ष्मणाराधनं शुभम् । अष्टोत्तरसहस्रं वा शतं वा सुसमाहितैः ॥१४८॥
लक्ष्मणस्य मनुर्जप्यो मुमुक्षुभिरतंद्रितैः । अजप्त्वा लक्ष्मणमनुं राममंत्रान् जपंति ये ॥१४६॥
न तेषां जायते सिद्धिर्हानिरेव पदे पदे । यो जपेल्लक्ष्मणमनुं नित्यमेकांतमास्थितः ॥१५०॥
मुच्यते सर्वपापेभ्यः सर्वान्कामानवाप्नुयात् । जयप्रधानो मंत्रोऽयं राज्यप्राप्त्यैकसाधनम् ॥१५१॥

के दक्षिण भाग में राम, अग्रभाग में हनुमान् और पृष्ठ भाग में लक्ष्मण को पूजा कर षट्कोण में अङ्गदेवताओं
की पूजा करे । पत्रों में प्रमुख मंत्रियों की तथा बाहर लोकपालों एवम् वज्र आदि आयुधों की अर्चना करे । ऐसा
करने से सकल सिद्धियां प्राप्त होती हैं। राजा को वश में करने के लिये चन्दन लगाये जूही के पुष्पों से हवन
करे । कमलों से होम करने से धन-धान्य की प्राप्ति होतो है । नील कमलों से हवन करने वाला व्यक्ति विश्व
को वशीभूत कर लेता है। बिल्वपत्रों से लक्ष्मी की प्राप्ति तथा दूर्वा से रोग की शान्ति होती है। बहुत क्या
कहें, सीता को आराधना करने से मनुष्य को सौभाग्य, पुत्र, पौत्र, सुख, धन, धान्य तथा मोक्ष की प्राप्ति होतो
है ॥१३६-१४१॥ 'लं लक्ष्मणाय नमः' यह सात अक्षरों का मन्त्र है । इसके मुनि अगस्त्य, छन्द गायत्री, देवता
लक्ष्मण तथा हनुमान्, बीज 'लं' और शक्ति 'नमः' है। छः दीर्घमात्राओं से युक्त बीज मन्त्र से षडंगन्यास कर
दो भुजा वाले, स्वर्ण के समान मनोहर शरीर वाले, कमल तुल्य नेत्र वाले, हाथों में धनुष-बाण धारण करने वाले
और राम की सेवा में दत्तचित्त वाले लक्ष्मण का ध्यान करने के पश्चात् सात लाख मन्त्र जपे और उसका दशांश
मधु युक्त पायस से हवन करे । तदुपरान्त रामपीठ में राम हो की तरह उनकी भी पूजा करे । ऐसा करने से यह
मन्त्र सकल सिद्धियों को प्रदान करता है। जो व्यक्ति रामपूजा को सर्वांग पूर्ण करना चाहता हो, वह यत्न
करके आदरपूर्वक लक्ष्मण की अर्चना करे । श्रीरामचन्द्र के ऐसे अनेक प्रभेद हैं, जो सिद्धि को देने वाले
हैं । ॥१४२-१४७॥
इसलिये साधक को सदा लक्ष्मण की शुभदायिनी आराधना करनी चाहिये । मोक्षाभिलाषी जन सावधान
होकर लक्ष्मण का मन्त्र एक हजार आठ या एक सो आठ बार निरालस्यपूर्वक जप करे । जो व्यक्ति बिना लक्ष्मण
के मन्त्र को जपे राम मन्त्रों का जप करता है, उसे सिद्धि नहीं मिलती; प्रत्युत पद-पद में हानि होती है ॥१४८-
१४९॥। जो निश्चय एकान्त में लक्ष्मण-मन्त्र का जप करता है, वह सकल पापों से मुक्त होकर वाँछित फलों को
प्राप्त करता है। यह मन्त्र विजय को देने वाला है। राज्यप्राप्ति का तो एकमात्र साधन है। नष्ट राज्य की...

त्रिसप्ततितमोऽध्यायः ६४१
नष्टराज्याप्तये मंत्रं जपेल्लक्षं समाहितः । सोऽचिरान्नष्टराज्यं स्वं प्राप्नोत्येव न संशयः ॥१५२॥
ध्यायन्नराममयोध्यायामभिषिक्तमनन्यधीः । पञ्चायुतं मनुं जप्त्वा नष्टराज्यमवाप्नुयात् ॥१५३॥
नागपाशविनिर्मुक्तं ध्यात्वा लक्ष्मणमादरात् । अयुतं प्रजपेन्मंत्रं निगडान्मुच्यते ध्रुवम् ॥१५४॥
वातात्मजेनानीताभिरोषधीभिर्गतव्यथम् । ध्यात्वा लक्षं जपन्मंतमल्पमृत्युं जयेद्ध्रुवम् ॥१५५॥
घातयंतं मेघनादं ध्यात्वा लक्षं जपेन्मनुम् । दुर्जयं वापि वेगेन जयद्रिपुकुलं महत् ॥१५६॥
ध्यात्वा शूर्पणखानासाछेदनोद्युक्तमानसम् । सहस्रं प्रजपेन्मंत्रं पुरूहूतादिकान् जयेत् ॥१५७॥
रामपादाब्जसेवार्थं कृतोद्योगमथो स्मरन् । प्रजपेल्लक्षमंकांते महारोगात्प्रमुच्यते ॥१५८॥
त्रिमासं विजिताहारो नित्यं सप्तसहस्रकम् । अष्टोत्तरशतैः पुष्पैर्निश्छिद्रैः शतपत्रकैः ॥१५९॥
पूजयित्वा विधानेन पायसं च सशर्करम् । निवेद्य प्रजपेन्मंत्रं कुष्ठरोगात्प्रमुच्यते ॥१६०॥
विजने विजिताहारः षण्मासं विधिनामुना । क्षयरोगात्प्रमुच्येत सत्यं सत्यं न संशयः ॥१६१॥
अभिमंत्र्य जलं प्रातर्मंत्रेण त्रिः समाहितः । त्रिसंध्यं वा पिबेन्नित्यं मुच्यते सर्वरोगतः ॥१६२॥
दारिद्र्यं च पराभूतं जायते धनदोपमः । विषादिदोषसंस्पर्शो न भवेतु कदाचन ॥१६३॥
मनुना मंत्रितैस्तोयैः प्रत्यहं क्षालयेन्मुखम् । मुखनेत्रादिसंभूताञ्जयेद्रोगांश्च दारुणान् ॥१६४॥
पीत्वाभिमंत्रितं त्वंभः कुक्षिरोगान् जयेद्ध्रुवम् । लक्ष्मणप्रतिमां कृत्वा दद्याद्भक्त्या विधानतः ॥१६५॥
प्राप्ति के लिये जो व्यक्ति समाहित होकर एक लाख मन्त्र-जप करता है, उसे शीघ्र अपना विनष्ट राज्य प्राप्त
हो जाता है, इसमें संशय नहीं ॥१५०-१५२॥ जो व्यक्ति अनन्यचित्त होकर अयोध्या में अभिषिक्त होने वाले
राम का ध्यान करते हुए पचास हजार मन्त्र-जप करता है, उसे नष्ट राज्य की प्राप्ति होती है ॥१५३॥ जो
मनुष्य नागपाश से मुक्त होने वाले लक्ष्मण का आदरपूर्वक ध्यान कर दश सहस्र मन्त्र जपता है, वह कारागार,
(जेल) से मुक्त हो जाता है, इसमें सन्देह नहीं ॥१५४॥ जो हनुमान् द्वारा लाई गई ओषधि से स्वस्थ होने वाले
लक्ष्मण का ध्यान कर एक लाख मन्त्र का जप करता है, वह निःसन्देह अकाल मृत्यु को जीतता है ॥१५५॥ जो
मेघनाद को मारते हुए लक्ष्मण का ध्यान कर एक लक्ष मन्त्र का जप करता है, वह दुर्जय एवम् महान् शत्रुकुल
को भी जीत लेता है ॥१५६॥ जो शूर्पणखा की नाक काटने के लिये उद्यत लक्ष्मण का ध्यान कर एक हजार
बार मन्त्र को जपता है, वह इन्द्र आदि को भी जीत लेता है ॥१५७॥ जो राम के चरणारविन्दों की सेवा के
लिये उद्योग करने वाले लक्ष्मण का स्मरण कर एकान्त में एक लाख मन्त्र का जप करता है, वह महारोग से
मुक्त हो जाता है ॥१५८॥ जो तीन मास तक जिताहार¹ होकर नित्य सात हजार मन्त्र का जप करके एक
सौ आठ निश्छिद्र कमलपुष्पों से विधिपूर्वक पूजन करता है तथा खीर एवम् शक्कर (चीनी) नैवेद्य चढ़ाता है वह
कुष्ठरोग से छुटकारा पा जाता है ॥१५९-१६०॥
इसी तरह जिताहार होकर निर्जन स्थान में जप आदि करने से क्षयरोग (तपेदिक) दूर हो जाता है,
इसमें तनिक भी संदेह नहीं है। जो प्रातःकाल सावधान होकर इस मन्त्र से तीन बार जल को अभिमंत्रित करके
नित्य तीनों संध्या पान करता है, उसके सकल रोग निवृत्त हो जाते हैं, दरिद्रता विलीन हो जाती है। और तो क्या
वह साक्षात् कुबेर तुल्य हो जाता है। विष आदि का दोष तो उसे कभी लगता ही नहीं। इस मन्त्र से अभिमंत्रित जल
से प्रत्यह मुख धोना चाहिये ॥१६१-१६३½॥ ऐसा करने से मुख, नेत्र आदि स्थानों में हुए भयंकर रोग भी छूट जाते
१. परिमित एवम् विहित भोजन करने वाला।
८१ ना० पृ०

६४२ नारदीयपुराणम्
स सर्वेभ्योऽथ रोगेभ्यो मुच्यते नात्र संशयः । कन्यार्थी विमलापाणिग्रहणासक्तमानसः ॥१६६॥
ध्यायन् लक्षं जपेन्मंत्री अब्जैर्हुत्वा दशांशतः । ईप्सितां लभते कन्यां शीघ्रमेव न संशयः ॥१६७॥
दीक्षितं जृम्भणास्त्राणां मंत्रेषु नियतव्रतम् । ध्यात्वा च विधिवन्नित्यं जपेन्मासत्रयं मनुम् ॥१६८॥
पूजापुरःसरं सप्तसहस्रं विजितेंद्रियः । सर्वांसामपि विद्यानां तत्त्वज्ञो जायते नरः ॥१६६॥
विश्वामित्रक्रतुवरे कृताद्भुतपराक्रमम् । ध्यायँल्लक्षं जपेन्मंत्रं मुच्यते महतो भयात् ॥१७०॥
कृतनित्यक्रियः शुद्धस्त्रिकालं प्रजपेन्मनुम् । सर्वपापविनिर्मुक्तो याति विष्णोः परं पदम् ॥१७१॥
दीक्षितो विधिवन्मंत्री गुणैर्विगतकल्मषः । स्वाचारनियतो दांतो गृहस्थो विजितेंद्रियः ॥१७२॥
ऐहिकाननपेक्ष्यैव निष्कामो योऽर्चयेद्विभुम् । स सर्वान्पुण्यपापौघान्दग्ध्वा निर्मलमानसः ॥१७३॥
पुनरावृत्तिरहितः शाश्वतं पदमश्नुते । सकामो वाञ्छितान् लब्ध्वा भुक्त्वा भोगान् मनोगतान् ॥१७४॥
जातिस्मरश्चिरं भूत्वा याति विष्णोः परं पदम् । निद्राचन्द्रान्विता पश्चाद्भरताय हृदंतिमः ॥१७५॥
सप्ताक्षरो मनुश्चास्य मुन्याद्यश्चादि पूर्ववत् । बकः सेंदुश्च शत्रुघ्नपरं डेंतं हृदंतिमः ॥१७६॥
सप्ताक्षरोऽयं शत्रुघ्नमंत्रः सर्वैष्टसिद्धिदः ॥१७७॥
इति श्रीबृहन्नारदीयपुराणे पूर्वभागे बृहदुपाख्याने सनत्कुमारविभागे तृतीयपादे रामाद्युपासना-
वर्णनं नाम त्रिसप्ततितमोऽध्यायः ॥७३॥


हैं। इससे अभिमंत्रित जल को पीने से पेट की व्याधियाँ दूर हो जाती हैं, यह ध्रुव है। जो व्यक्ति लक्ष्मण की
प्रतिमा बना कर भक्ति से विधिपूर्वक दान करता है, वह निःसंदेह समस्त रोगों से मुक्त हो जाता है। जो सुन्दरी
कन्या से विवाह करना चाहता हो, वह लक्ष्मण का ध्यान कर इस मन्त्र को एक लाख जपे और उसका दशांश
कमलों से हवन करे। ऐसा करने से शीघ्र अभिलषित कन्या को प्राप्त होता है, इसमें संशय नहीं। जो जितेन्द्रिय
होकर जृंभणास्त्रों १ का दीक्षा पाने वाले महाव्रती लक्ष्मण का ध्यान कर तीन मास तक नित्य इस मन्त्र का सात
हजार जप करता है, वह निखिल विद्याओं का तत्त्वज्ञ होता है। जो विश्वामित्र के यज्ञ में अद्भुत पराक्रम दिखलाने
वाले लक्ष्मण का ध्यान कर इस मन्त्र को जपता है, वह महाभय से मुक्त हो जाता है। १६४-१७०॥ जो नित्य कर्म
से शुद्ध होकर तीनों काल इस मन्त्र का जप करता है, वह अखिल पापों से मुक्त होकर वैकुण्ठ को जाता है।
जो गृहस्थ साधक विधिपूर्वक दीक्षा लेकर निष्पाप, जितेन्द्रिय एवम् सदाचारकुशल हो बिना ऐहलौकिक स्वार्थ के
निष्काम भाव से विभु रामचन्द्र की आराधना करता है, वह सकल पाप-पुण्यों को दग्ध कर निर्मलचित्त हो जाता
है तथा उस शाश्वत पद को प्राप्त करता है, जहाँ से पुनरावृत्ति नहीं होती। वह समस्त कामनाओं को प्राप्त कर
अभिलषित भोगों को भोगते हुए चिरकाल तक जातिस्मर (पूर्वजन्मों के वृत्तान्तों को जानने वाला) होता है और
अन्त में विष्णु के परम पद को प्राप्त करता है। (भं भरताय नमः) यह सात अक्षरों का मन्त्र है। इसके मुनि
आदि पूर्ववत् ही समझना चाहिए। (शं शत्रुघ्नाय नमः) यह सप्ताक्षर मन्त्र शत्रु का नाशक तथा सकलसिद्धि-
दायक है ॥१७१-१७७॥
श्री नारदीयपुराण के बृहदुपाख्यानयुक्त पूर्वार्ध में सनत्कुमारविभाग के तृतीयपाद में रामादि उपासना
वर्णन नामक तिहत्तरवाँ अध्याय समाप्त ॥७३॥


१. वह अस्त्र, जिसके छोड़ने से लोगों को जंभाई आने लगती है ।

चतुःसप्ततितमोऽध्यायः
सनत्कुमार उवाच
अथोच्यंते हनुमतो मंत्राः सर्वैष्टदायकाः । यान्समाराध्य विप्रेंद्र तत्तुल्याचरणा नराः ॥१॥
मनुः स्वरेंदुसंयुक्तं गगनं च भगान्विताः । हसफाग्निनिशाधीशाः द्वितीयं बीजमीरितम् ॥२॥
स्वफाग्नयो भगेढाढ्यास्तृतीयं बीजमीरितम् । वियद्भग्वग्निमन्विन्दुयुक्तं स्याच्च चतुर्थकम् ॥३॥
पंचमं भगचंद्राढ्यावियद्भग्वस्कवाययः । मन्विद्वाढ्यौ हसौ षष्ठं देंतः स्याद्धनुमांस्ततः ॥४॥
हृदयांतो महामंत्रराजोऽयं द्वादशाक्षरः । रामचन्द्रो मुनिश्चास्य जगतीछंद ईरितम् ॥५॥
देवता हनुमाग्बीजं षष्ठं शक्तिद्वितीयकम् । षड्बीजेश्च षडंगानि शिरोभाले दृशोर्मुखे ॥६॥
गलबाहुद्वये चैव हृदि कुक्षी च नाभितः । ध्वजे जानुद्वये पादद्वये वर्णान्क्रमन्न्यसेत् ॥७॥
षड्बीजानि पदद्वंद्वं मूर्ध्नि भाले मखे हृदि । नाभावूर्वोरुजंघयोश्च पादयोर्विन्यसेत्क्रमात् ॥८॥
अंजनीगर्भसंभूतं ततो ध्यायेत्कपीश्वरम् । उद्यत्कोटचर्कसंकाशं जगत्प्रक्षोभकारकम् ॥९॥
श्रीरामंत्रिध्यानानिष्टं सुग्रीवप्रमुखाचितम् । विवासयंतं नादेन राक्षसान्मारुतिं भजेत् ॥१०॥

अध्याय ७४
हनुमान् के मन्त्रों का निरूपण
सनत्कुमार बोले-विप्रवर्य ! अब मैं सकलकामनादायक हनुमान् के मन्त्रों को बतलाता हूँ, जिनकी
आराधना करने से मानव उनके समान हो जाता है। मनुस्वर (ओ) तथा इन्दु (अनुस्वार) से युक्त गगन (ह)
अर्थात् 'हौं' यह प्रथम बीज है। ह् स् फ् र् और अनुस्वार ये भग (ए) से युक्त हों अर्थात् 'हस्फें' यह दूसरा बीज
है। ख् फ् र् ये भग (ए) और इन्दु (अनुस्वार) से युक्त हों अर्थात् 'ख्फें' यह तीसरा बीज कहा गया है। वियत्
(ह) भृगु (स्) अग्नि (र्) मनु (ओ) और इन्दु (अनुस्वार) इन सब का संयुक्त रूप 'हस्रौं' यह चौथा बीज है।
भग (ए) और चन्द्र (अनुस्वार) से युक्त वियत् (ह) भृगु (स्) ख् फ् तथा अग्नि (र्) हों अर्थात् 'हस्ख्फें' यह पांचवां
बीज है। मनु (ओ) और इन्दु (अनुस्वार) से युक्त ह् स् अर्थात् 'ह् सौं' यह छठा बीज है। तदनन्तर ङे विभक्त्यन्त
हनुमत् शब्द (हनुमते) और अन्त में हृदय (नमः) यह (हौं हस्फें ख्फें हस्रौं ह्स्ख्फें ह् सौं हनुमते नमः) बारह अक्षरों
वाला महामन्त्रराज कहा गया है। इस मन्त्र के श्रीरामचन्द्र ऋषि हैं और जगती छन्द कहा गया है। इसके
देवता हनुमान् हैं। 'ह्सौं' बीज है, 'हस्फें' शक्ति है। छह बीजों से षडंग-न्यास कर शिर, ललाट नेत्र, मुख,
ग्रीवा, भुजा, हृदय, पेट, नाभि, लिंग, जानु और चरणों में क्रमशः वर्णों का न्यास करे। पुनः छह बीजों तथा
दो पदों को मस्तक, भाल, मुख, हृदय, नाभि, ऊरु, जंघा तथा चरणों में क्रमशः न्यस्त करे। अनन्तर अंजनी के
गर्भ से उत्पन्न कपीश्वर का इस प्रकार ध्यान करे (हनुमान्) उनकी कान्ति उदित होते हुए कोटि सूर्य के समान है।
वे संसार को प्रक्षुब्ध करने वाले तथा श्रीराम के चरणों के ध्यान में निरत रहने वाले हैं। सुग्रीव आदि कपिगण
उनका सम्मान करते हैं। वे अपने नाद (किलकिलाहट) से राक्षसों को त्रास पहुँचाते हैं ॥१-१०॥

६४४ नारदीयपुराणम्
ध्यात्वैवं प्रजपेद्भानुसहस्रं विजितेन्द्रियः । दशांशं जुहुयाद्ब्रीहीन्पयोदध्याज्यमिश्रितान् ॥११॥
पूर्वोक्ते वैष्णवे पीठे मूर्तिं संकल्प्य मूलतः । आवाह्य तत्र संपूज्य पाद्यादिभिरुपायनैः ॥१२॥
केशरेष्वंगपूजा स्यात्पत्रेषु च ततोऽर्चयेत् । रामभक्तो महातेजाः कपिराजो महाबलः ॥१३॥
द्रोणाद्रिहारको मेरुपीठकार्चनकारकः । दक्षिणाशाभास्करश्च सर्वविघ्नविनाशकः ॥१४॥
इत्थं सम्पूज्य नामानि दलाग्रेषु ततोऽर्चयेत् । सुग्रीवमंगदं नीलं जांबवंतं नलं तथा ॥१५॥
सुषेणं द्विविदं मैंदं लोकपालस्ततोऽर्चयेत् । वज्राद्यानपि संपूज्य सिद्धश्चैवं मनुर्भवेत् ॥१६॥
मंत्रं नवशतं रात्रौ जपेद्दशदिनावधि । यो नरस्तस्य नश्यंति राजशत्रूत्थभीतयः ॥१७॥
मातुलिंगाम्रकदलीफलैर्हुत्वा सहस्रकम् । द्वाविंशतिब्रह्मचारि विप्रान्संभोजयेच्छुचीन् ॥१८॥
एवंकृते भूतविषग्रहरोगोपद्रवाः । नश्यंति तत्क्षणादेव विद्द्वेषिग्रहदानवाः ॥१९॥
अष्टोत्तरशतेनांबु मंत्रितंविषनाशनम् । भूतापस्मारकृत्योत्थं ज्वरे तन्मंत्रमंत्रितैः ॥२०॥
भस्मभिः सलिलैर्वापि ताडयेज्ज्वरिणं क्रुधा । त्रिदिनाज्ज्वरमुक्तोऽसौ सुखं च लभते नरः ॥२१॥
औषधं वा जलं वापि भुक्त्वा तन्मंत्रमंत्रितम् । सर्वरोगान्पराभूय सुखी भवति तत्क्षणात् ॥२२॥
तज्जप्तभस्मलिप्तांगो भुक्त्वा तन्मंत्रितं पयः । योद्धुं गच्छेदथ यो मंत्री शस्त्रसंघैर्न बाध्यते ॥२३॥
शस्त्रक्षतं व्रणस्फोटो लूतास्फोटोऽपि भस्मना । त्रिजप्तेन च संस्पृष्टाःशुष्यंत्येव न संशयः ॥२४॥
जपेदर्कास्तमारभ्य यावदर्कोदयो भवेत् । मन्त्रं सप्तदिनं यावच्चादाय भस्मकीलको ॥२५॥
निखनेदभिमन्त्र्याशु शत्रूणां द्वार्थलक्षितः । विद्वेषं मिथ आपन्नाः पलायंतेऽरयोऽचिरात् ॥२६॥

इस प्रकार वायुपुत्र का ध्यान कर बारह हजार मन्त्र का जप करे और उसका दशांश दूध, दही एवम्
घी मिश्रित व्रीहि (धान्य) से होम करे। पश्चात् पूर्वोक्त वैष्णव पीठ पर मूल मन्त्र से मूर्ति की प्रतिष्ठा कर पाद्य
आदि उपहारों से आवाहन पूर्वक आराधना करे। केसरो पर अंगदेवताओं को पूजा कर पत्रों पर रामभक्त,
महातेजस्वी, कपिराज, महाबली, द्रोणपर्वतहारी, मेरुपीठपूजक, दक्षिणदिशाभास्कर और सर्वविघ्नविनाशक-इन
नामों का पूजन करे। तदुपराम्त पत्रों के छोरों पर सुग्रीव, अंगद, जांबवंत, नल, सुषेण, द्विविद, मैंद तथा
लोकपालों को पूजा कर वज्र आदि आयुधों को भी अर्चना करे। ऐसा करने से मन्त्र सिद्ध हो जाता है। जो
व्यक्ति दश दिनों तक रात में नौ सौ बार इस मन्त्र का जप किया करता है, उसे राजशत्रुजन्य भय नहीं होता।
बिजौरा नींबू, आम, तथा केले से हजार बार हवन कर वाईस ब्रह्मचारो विप्रों को भोजन कराने से भूत, विष, ग्रह,
रोग, शत्रु तथा दानव-कृत उपद्रव तत्काल नष्ट हो जाते हैं। इस मन्त्र को एक सौ आठ वार पढ़ कर जल को
अभिमंत्रित करने से जल विषनाशक होता है। जिसको भूतमिरगी आती हो या ज्वर लगता हो, उसे इस मन्त्र से
अभिमंत्रित जल या भस्म से तीन दिन ताडन करे। ऐसा करने से रोगी रोगमुक्त होकर आनन्दित हो जाता
है। औषध या जल को इस मन्त्र से अभिमंत्रित करके पान करने से मनुष्य तुरन्त सकल व्याधियों पर विजय प्राप्त
कर सुखी होता है। जो व्यक्ति इस मन्त्र से अभिमंत्रित भस्म को अंगों में लगाकर तथा मंत्रित जल पीकर युद्ध
करने जाता है, उसके ऊपर शस्त्रों का प्रहार निष्फल हो जाता है। भस्म को इस मन्त्र से तीन बार अभिमंत्रित
कर शस्त्र-कृत घाव या व्रणस्फोट या लूतास्फोट पर लगा देने से घाव निःसंदेह सूख जाता है ॥११-२४॥ सात दिनों
तक सूर्यास्त से लेकर सूर्योदय पर्यन्त इस मन्त्र का जप करे। फिर भस्म और कील को अभिमंत्रित करके छिप
कर शत्रु के दरवाजे पर गाड़ आये। ऐसा कर देने से शत्रु अपने स्वजनों से ही द्वेष करते हुए शीघ्र उस स्थान

चतुःसप्ततितमोऽध्यायः ६४५
भस्माम्बु चन्दनं मंत्री मंत्रेणानेन मन्वितम् । भक्ष्यादियोजितं यस्मै ददाति स तु दासवतृ ॥२७॥
क्रूराश्च जंतवोऽप्येवं भवंति वशवर्तिनः । गृहीत्वेशानदिक्संस्थं करंजतरुमूलकम् ॥२८॥
कृत्वा तेनांगुष्ठमात्रां प्रतिमां च हनूमतः । कृत्वा प्राणप्रतिष्ठां च सिंदूराद्यैः प्रपूज्य च ॥२९॥
गृहस्याभिमुखों द्वारे निखनेन्मन्त्रमुच्चरन् । ग्रहाभिचाररोगानिंविषचोरनृपोद्भवाः ॥३०॥
न जायंत गृहे तस्मिन् कदाचिदप्युपद्रवाः । तद्गृहं धनपुत्राद्यैरेधते प्रत्यहं चिरम् ॥३१॥
निशि यत्र वने भस्म मृत्स्नया वापि यत्नतः । शत्रोः प्रतिकृतिं कृत्वा हृदि नाम समालिखेत् ॥३२॥
कृत्वा प्राणप्रतिष्ठांतं भित्त्वाच्छस्त्रैर्मनुं जपन् । मन्त्रान्ते प्रोच्चरेच्छत्रोर्नाम छिंधि च भिंधि च ॥३३॥
मारयेति च तस्यान्ते दंतैरोष्ठं निपीड्य च । पाण्योस्तले प्रपीड्याथ त्यक्त्वा तं स्वगृहं ।
व्रजेत् ॥३४॥
कुर्वन्सप्तदिनं चेवं हन्याच्छत्रुं न संशयः । राजिकालवणैर्मु क्तविकुरः पितृकानने ॥३५॥
धत्तूरफलपुष्पैश्च नखरोमविषैरपि । द्विक (काक) कौशिकगृध्राणां पक्षैः श्लेष्मांतकाक्षजैः ॥३६॥
समिद्भिस्त्रिस्रतं याम्यदिशूमुखो जुहुयान्निशि । एवं सप्तदिनं कुर्वन्मारयेदुद्धतं रिपुम् ॥३७॥
दिवास्त्रिस्रदिनं रात्रौ श्मशाने षट्शतं जपेत् । ततो वेताल उत्थाय वदेद्भावि शुभाशुभम् ॥३८॥
किंकरोऽस्य वर्तेत कुरुते साधकोदितम् । भस्मांबुमंत्रितं रात्रौ सहस्रावृत्तिकं पुनः ॥३६॥
दिनत्रयं च तत्पश्चात्प्रक्षिपेत्प्रतिमासु च । यासु कासु च स्थूलासु लघुष्वपि विशेषतः ॥४०॥
मंत्रप्रभावाच्चलनं सद्यत्येव न संशयः । अष्टम्य्यां वा चतुर्दश्यां कुजे वा रविवासरे ॥४१॥
से भाग जाता है । साधक इस मन्त्र से अभिमंत्रित भस्म, जल तथा चन्दन भोजन आदि में मिला कर जिसे देता
है, वह उसका दासत्तुल्य हो जाता है । ऐसा करने से हिंसक जन्तु भो वशीभूत हो जाते हैं । ईशान कोण में स्थित
करंज वृक्ष के मूल को लाकर इसकी अंगुष्ठप्रमाण हनुमान् की प्रतिमा बनाये । उस मूर्ति की प्राणप्रतिष्ठा तथा
सिंदूर आदि से पूजन कर घर के सम्मुख द्वार पर मन्त्रोच्चारण करते हुए गाड़ दे । ऐसा करने से उस घर में ग्रह,
अभिचार (टोना), रोग, अग्नि, विष, चोर, राजा आदि के उपद्रव कभी भी नहीं होते । रात्रि में वन जाकर
भस्म या अच्छी मिट्टो को शत्रु को प्रतिमा बना कर उसके हृदय पर शत्रु का नाम लिख दे । फिर उसकी प्राण-
प्रतिष्ठा कर (हनुमान् के) मन्त्र को जपते हुए शस्त्रों से काटे । मन्त्र के अन्त में 'अमुकनामानं शत्रुं छिन्धि, भिन्धि,
मारय' यह पढ़े । तदनन्तर (प्रतिमा के) होंठ में दांत काट कर हथेली पर मारे पश्चात् अपने घर को लौट जाये
॥२५-३४॥ सात दिनों तक ऐसा करने से निःसन्देह शत्रु मर जाता है । रात्रि में श्मशान जाकर बालों को बिखेर
कर पीले सरसों, नमक, धतूरे के फल-फूलों, नख, रोम, विष, कौए, कौशिक (उल्लू) तथा गोध के पंखों और लसोड़े
एवम् बहेड़े को लकड़ी से दक्षिण मुंह होकर होम करे । इस तरह सात दिनों तक करने से उद्धत शत्रु की मृत्यु
होती है । तीन दिनों तक ऐसा करने से शत्रु को महाभय होता है । रात्रि के समय श्मशान में जो साधक छह
सौ बार मन्त्र का जप करता है, उसके वेताल दास होकर शुभाशुभ फल को बतलाने लगता है ॥३५-३८॥ तीन
दिनों तक रात्रि में भस्म और जल को इस मन्त्र से सहस्र बार अभिमंत्रित कर जिस-किसी प्रतिमा पर—चाहे
भारी हो या हलकी -छिड़कने से वह प्रतिमा मन्त्र के प्रभाव से चलने लगती है, इसमें संशय नहीं। अष्टमी या
चतुर्दशी तिथि और मङ्गल या रवि दिन शुद्धचित्त साधक किसो तख्ते पर अतिस्निग्ध माष (उड़द) से हनुमान् की
कमनीय एवम् सर्व लक्षण सम्पन्न प्रतिमा बनाये । उस प्रतिमा के वाम भाग में तेलदीप और दक्षिण भाग में