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बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)

बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)

Brihan Naradiya Purana with Sanskrit & Hindi Commentary

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)

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DevanagariSanskritpublished1,008 पृष्ठ

पृष्ठ 651, कुल 1008 में से

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पृष्ठ 651

१६२ नारदीयपुराणम्
कमलैर्जुहुयाद्वह्नौ ब्राह्मणाम्भोजयेत्ततः । पूजयेद्वैष्णवे पीठे विमलादिसमन्विते ॥१३॥
मूर्तिमूलेन संकल्प्य तस्यामावाह्य साधकः । सीतां वामे समासीनां तन्मन्त्रेण प्रपूजयेत् ॥१४॥
रमासीतापद्ं द्वैतं द्विठांतो जानकीमनुः । अग्नेः शार्ङ्ग च सम्पूज्य सरान्पार्श्वद्वयेऽर्चयेत् ॥१५॥
केशरेषु षडंगानि पत्रेष्वेतान्समार्चयेत् । हनुमंतं च सुग्रीवं भरतं सविभीषणम् ॥१६॥
लक्ष्मणांगदशत्रुघ्नान् जांबवंतं क्रमात्पुनः । वाचयंतं हनूमंतमग्रतो धृतपुस्तकम् ॥१७॥
यजेद्भरतशत्रुघ्नौ पार्श्वयोर्धृतचामरौ । धृतातपत्रं हस्ताभ्यां लक्ष्मणं पृष्ठतोऽर्चयेत् ॥१८॥
ततोऽष्टपत्रे सृष्टिं च जयंतं विजयं तथा । सुराष्ट्रं राष्ट्रपालं च अकोपं धर्मपालकम् ॥१९॥
सुमंतं चेति सम्पूज्य लोकेशानायुधैर्युतान् । एवं रामं समाराध्य जीवन्मुक्तः प्रजायते ॥२०॥
चंदनाक्तैः प्रजुहुयाज्जातीपुष्पैः समाहितः । राजवश्याय कमलैर्धनधान्यादिसिद्धये ॥२१॥
लक्ष्मीकामः प्रजुहुयात्प्रसूनैर्बिल्वसंभवैः । आज्याक्तैर्नीलकमलैर्वशयेदखिलं जगत् ॥२२॥
घृताक्तशतपर्वीभिर्दीर्घायुश्च निरामयः । रक्तोत्पलानां होमेन धनं प्राप्नोति वांछितम् ॥२३॥
पालाशकुसुमैर्हुत्वा मेधावी जायते नरः । तज्जप्तांभः पिबेत्प्रातर्वत्सरात्कविराड् भवेत् ॥२४॥
तन्मंत्रितान्नं भुंजीत महारोगप्रशांतये । रोगोक्तौषधहोमेन तद्रोगात्मुच्यते क्षणात् ॥२५॥
नदीतीरे च गोष्ठे वा जपेल्लक्षं पयोव्रतः । पायसेनाज्ययुक्तेन हुत्वा विद्यानिधिर्भवेत् ॥२६॥
परिक्षीणाधिपत्यो यः शाकाहारो जलांतरे । जपेल्लक्षं च जुहुयाद्विल्वपुष्पैर्दशांशतः ॥२७॥
तदुपराम्त छः लाख मंत्र का जप कर उसका दशांश कमलों से अग्नि में हवन करे। पश्चात् ब्राह्मण-भोजन
कराकर निर्मल वैष्णव पीठ पर मूर्ति की रचना करके उसमें मूल मंत्र से राम तथा उनके वाम पार्श्व में बैठी
सीता का आवाहन करे। सीता का पूजन उनके अपने मंत्र से करे। उनका मंत्र यह है—"रमा...।"
तदनन्तर अग्नि तथा शाङ्ग (धनुष) का पूजन कर दोनों पार्श्व में बाणों की पूजा करे। केसों पर छह अंग
देवताओं की पूजा कर पत्तों पर हनुमान्, सुग्रीव, भरत, विभीषण, लक्ष्मण, अंगद, शत्रुघ्न और जांबवान् का
क्रमशः पूजन करे, पुनः आगे हाथ में पुस्तक लेकर बांचते हुए हनुमान्, दोनों बगल में चामर लिये हुए भरत,
शत्रुघ्न और पृष्ठभाग में हाथों में छत्र को पकड़े हुए लक्ष्मण की अर्चना करे ॥१०-१८॥ तदनन्तर अष्टदल के
ऊपर सृष्टि, जयन्त, विजय, सुराष्ट्र, राष्ट्रपाल, अकोप, धर्मपाल तथा सुमंत की पूजा कर आयुधों समेत लोक-
पालों का पूजन करे। इस प्रकार राम की आराधना कर मनुष्य जीवन्मुक्त हो जाता है ॥१९-२०॥
जो व्यक्ति सावधान होकर (इस मंत्र को पढ़ते हुए) चन्दन मिश्रित जूही के पुष्पों से हवन करता है,
वह राजा को अपने वश में कर लेता है। कमलों से होम करने वालों को धन-धान्यादि की सिद्धि होती है। जो
लक्ष्मी की कामना करता है, वह बिल्व के पुष्पों से हवन करे। घृतयुक्त नीलकमलों से हवन करने से निखिल
जगत् वशीभूत होता है। घृताक्त दूर्वा से होम करने से दीर्घायु तथा आरोग्य की प्राप्ति होती है। रक्त कमलों
से होम करने से वांछित धन की प्राप्ति होती है। पलाशपुष्पों से हवन करने से मनुष्य मेधावी होता है। एक
वर्ष तक प्रातःकाल उक्तमन्त्र से अभिमन्त्रित जल को पीने से मनुष्य महाकवि होता है। उसके मन्त्रित अन्न
को खाने से भयंकर व्याधि भी नष्ट हो जाती है। जिस रोग की जो ओषधि है, उससे हवन करने से तुरन्त उसकी
शान्ति होती है ॥२०-२५॥ नदी के तट पर या गोष्ठ में दुग्धाहार करते हुए एक लाख मंत्र जप करे और फिर
घी एवम् खीर से हवन करे। ऐसा करने से मनुष्य विद्यानिधि होता है। जिसका आधिपत्य क्षीण हो गया हो,