बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)
Brihan Naradiya Purana with Sanskrit & Hindi Commentary
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)
पञ्चचत्वारिंशोऽध्यायः २६७
यदर्थं धर्मसंसर्गः कर्मणा च फलोदयः । तमनाश्वासिकं मोहं विनाशि चलमध्रुवम् ॥२३॥
दृश्यमाने विनाशे च प्रत्यक्षे लोकसाक्षिके । अगमात्परमस्तीति ब्रुवन्नपि पराजितः ॥२४॥
अनात्मा ह्यात्मनो मृत्युः क्लेशो मृत्युर्जरामयः । आत्मानं मन्यते मोहात्तदसम्पक् परं मतम् ॥२५॥
अथ चेदेवमप्यस्ति यल्लोके नोपपद्यते । अजरोऽयममृत्युश्च राजासौ मन्यते यथा ॥२६॥
अस्ति नास्तीतिवाप्येतत्तस्मिन्नसितलक्षणे । किमधिष्ठाय तद् ब्रूयाल्लोकयात्राविनिश्चयम् ॥२७॥
प्रत्यक्षं ह्य तयोर्मूलं कृतांतो ह्यतयोरपि । प्रत्यक्षो ह्यागमो भिन्नः कृतांतो वा न किचन ॥२८॥
यत्र तत्रानुमानेऽस्मिन्कृतं भावयतेऽपि च । अन्यो जीवः शरीरस्य नास्तिकानां मते स्थितः ॥२९॥
रेतोवटकणीकायां घृतपाकाधिवासनम् । जातिस्मृतिरयस्कांतः सूर्यकांतोऽबुभक्षणम् ॥३०॥
प्रेतभूतप्रियश्चैव देवता ह्युपयाचनम् । मृतकर्मनिवृत्तिं च प्रमाणमिति निश्चयः ॥३१॥
नन्वेते हेतवः संति ये केचिन्मूर्तिसंस्थिताः । अमूर्तस्य हि मूर्तेन सामान्यं नोपलभ्यते ॥३२॥
का रहस्योद्घाटन किया । उन्होंने कहा—'जिसके लिए धर्म का आचरण किया जाता है, जो कर्मों के
फल का उदय होने पर प्राप्त होता है, वह इहलोक या परलोक का भोग नश्वर है। उस पर आस्था करना
उचित नहीं। वह मोहरूप चंचल और अस्थिर है ॥१९-२३॥
कुछ नास्तिक ऐसा कहा करते हैं कि 'देहरूपी आत्मा का विनाश प्रत्यक्ष देखा जा रहा है, सम्पूर्ण लोक
इसका साक्षी है; फिर भी यदि कोई शास्त्र-प्रमाण की ओट लेकर देह से भिन्न आत्मा की सत्ता का प्रतिपादन
करता है तो वह परास्त ही है, क्योंकि उसका कथन लोकानुभव के विरुद्ध है । आत्मा के स्वरूप का अभाव हो
जाना ही उसकी मृत्यु है । जरारोगमय क्लेश मृत्यु है । जो लोग मोहवश आत्मा को देह से भिन्न मानते हैं,
उनको वह मान्यता ठीक नहीं है ॥२४-२५॥ यदि ऐसी वस्तु का भी अस्तित्व मान लिया जाय, जो लोक में
संभव नहीं है, अर्थात् यदि शास्त्र के आधार पर यह स्वीकार किया जाय कि शरीर से भिन्न कोई अजर-अमर
आत्मा है, जो स्वर्ग आदि लोकों में दिव्य सुख भोगता है, तब बंदी लोग, जो राजा को अजर-अमर कहते हैं,
उनको वह बात भी ठीक माननी पड़ेगी । सारांश यह है कि जैसे बंदी लोग आशीर्वाद में उपचारतः राजा को
अजर-अमर कहते हैं, उसी प्रकार शास्त्र का वह वचन भी औपचारिक ही है। नीरोग शरीर को ही अजर-अमर
और यहाँ के प्रत्यक्ष सुख-भोग को ही स्वर्गीय सुख कहा गया है । यदि आत्मा है या नहीं यह संशय उपस्थित
होने पर अनुमान से उसके अस्तित्व का साधन किया जाय तो इसके लिए कोई ऐसा ज्ञापक हेतु नहीं उपलब्ध
होता, जो कहीं व्यभिचरित न होता हो; फिर किस अनुमान का आश्रय लेकर लोक-व्यवहार का निश्चय किया जा
सकता है ? अनुमान और आगम—इन दोनों प्रमाणों का मुख्य प्रत्यक्ष प्रमाण है। आगम या अनुमान यदि प्रत्यक्ष
अनुभव के विरुद्ध है तो वह कुछ भी नहीं है, उसकी प्रामाणिकता स्वीकार नहीं की जा सकती । जिस किसी भी
अनुमान में ईश्वर, अदृष्ट अथवा नित्य आत्मा की सिद्धि के लिए की हुई भावना भी व्यर्थ है; अतः नास्तिकों के मत
में शरीर से भिन्न जीव का अस्तित्व नहीं है, यह बात स्थिर हुई ॥२६-२९॥ जैसे वटवृक्ष के बीज में पत्र, पुष्प,
फल, मूल तथा त्वचा आदि अन्तर्हित होते हैं, जैसे गाय के द्वारा खायी हुई घास में घी, दूध आदि प्रकट हो जाते हैं
तथा जिस प्रकार अनेक ओषध द्रव्यों का पाक एवं अधिवासन करने से उसमें नशा पैदा करने वाली शक्ति आ
जाती है उसी प्रकार वीर्य से ही शरीर आदि के साथ चेतनता भी प्रकट होती है।
[उक्त मत का खण्डन--] मरे हुए शरीर में जो चेतनता का अतिक्रमण देखा जाता है, वही देहातिरिक्त
आत्मा के अस्तित्व में प्रमाण है। यदि चेतनता देह का ही धर्म होता तो मृतक शरीर में भी उसकी उपलब्धि
३८—मार० पु०
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२६८ नारदीयपुराणम्
अविद्या कर्म तृष्णा च केचिदाहुः पुनर्भवम् । तस्मिन्नष्टे च दग्धे च चित्ते मरणधर्मिणि ॥३३॥
अन्योऽस्माज्जायते मोहस्तमाहुः सत्त्वसंक्षयम् । यदा सरूपतश्चान्यो जातितः श्रुततोऽर्थतः ॥३४॥
कथमस्मिन्स इत्येव संबंधः स्यादसंहितः । एवं सति च का प्रीतिर्ज्ञानविद्यातपोबलैः ॥३५॥
यदस्यान्येरितं कर्म सामान्यात्प्रतिपद्यते । अपि त्वयमिवैवान्यैः प्राकृतैर्दुःखितो भवेत् ॥३६॥
सुखितो दुःखितो वापि दृश्याद्दृश्यविनिर्णयः । यथा हि मुशलैर्हन्युः शरीरं तत्पुनर्भवेत् ॥३७॥
वृथा ज्ञानं यदन्यच्च येनैतन्नोपलभ्यते । ऋतुमंवत्सरौ तिष्यः शीतोष्णोऽथ प्रियाप्रिये ॥३८॥
यथा तातानि पश्यंति तादृशः सत्त्वसंक्षयः । जरयाभिपरीतस्य मृत्युना च विनाशितम् ॥३९॥
दुर्बलं दुर्बलं पूर्वं गृहस्येव विनश्यति । इन्द्रियाणि मनो वायुः शोणितं मांसमस्थि च ॥४०॥
आनुपूर्व्या विनश्यंति स्वं धातुमुपयाति च । लोकयात्राविघातश्च दानधर्मफलागमे ॥४१॥
तदर्थं वेदशब्दाश्च व्यवहाराश्च लौकिकाः । इति सम्यङ् मनस्येते बहवः संति हेतवः ॥४२॥
एतदस्तीति नास्तीति न कश्चित्प्रतिदृश्यते । तेषां विमृशतामेव तत्सम्यगभिधावताम् ॥४३॥
क्वचिन्निवसते बुद्धिस्तत्र जीर्यति वृक्षवत् । एवमर्थै रनर्थैश्च दुःखिताः सर्वजंतवः ॥४४॥
आगमैरपकृष्यंते हस्तिपैर्हस्तिनो यथा । ॥४५॥
होती । मृत्यु के पश्चात् कुछ काल तक शरीर तो रहता है, पर उसमें चेतना नहीं रहती। अतः चेतन आत्मा
शरीर से भिन्न है--यह सिद्ध होता है । नास्तिक भी रोग आदि की निवृत्ति के लिए मन्त्र-जप तथा तान्त्रिक
पद्धति से देवता आदि की आराधना करते हैं । वह देवता क्या है ? यदि पांचभौतिक है तो घर आदि की
भांति उसका दर्शन होना चाहिए और यदि वह भौतिक पदार्थों से भिन्न है तो चेतन की सत्ता स्वतः सिद्ध हो
गया । अतः देह से भिन्न आत्मा है--यह प्रत्यक्ष अनुभव से सिद्ध हो जाता है; और देह ही आत्मा है, यह प्रत्यक्ष
अनुभव के विरुद्ध जान पड़ता है । यदि शरीर की मृत्यु के साथ आत्मा का मृत्यु मान ली जाय तब तो उसके
किए हुए कर्मों का भी नाश मानना पड़ेगा; फिर तो उसके शुभाशुभ कर्मों का फल भोगने वाला कोई
नहीं रह जायगा और देह की उत्पत्ति में अकृताभ्यागम (बिना किये हुए कर्म का ही भोग प्राप्त हुआ ऐसा)
मानने का प्रसंग उपस्थित होगा । ये सब प्रमाण यह सिद्ध करते हैं कि देहातिरिक्त चेतन आत्मा की सत्ता अवश्य
है । नास्तिकों की ओर से जो हेतुभूत दृष्टान्त दिये गये हैं, वे मूर्त पदार्थ हैं । मूर्त जड़-पदार्थ से मूर्त जड़-पदार्थ
की ही उत्पत्ति होती है यही उनके द्वारा सिद्ध होता है। जैसे काष्ठ से अग्नि का उत्पत्ति आदि ।
पञ्चभूतों से आत्मा की उत्पत्ति की भांति यदि मूर्त से अमूर्त की उत्पत्ति मानी जाय तो पृथ्वी आदि
मूर्त भूतों से अमूर्त आकाश की भी उत्पत्ति स्वीकार करनी पड़ेगी, जो असम्भव है, अतः स्थूल भूतों के संयोग
से अमूर्त चेतन आत्मा की उत्पत्ति सर्वथा असम्भव है ।
आत्मा की सत्ता न मानने पर लोकयात्रा का निर्वाह नहीं होगा । दान, धर्म के फल की प्राप्ति के लिए
कोई आस्था नहीं रहेगी, क्योंकि वैदिक शब्द तथा लौकिक व्यवहार सब आत्मा को ही सुख देने के लिए हैं ।
इस प्रकार मन में अनेक तर्क उठते हैं और उन तर्कों तथा युक्तियों से आत्मा की सत्ता या असत्ता का निर्धारण
कुछ भी होता नहीं दिखायी देता । इस प्रकार विचार करते हुए भिन्न-भिन्न मतों की ओर दौड़ने वाले लोगों की
बुद्धि कहीं एक जगह प्रवेश करती है और वहीं वृक्ष की भांति जड़ जमाये जीर्ण ही जाती है । इस प्रकार अर्थ और
अनर्थ से सभी प्राणी दुःखी रहते हैं ॥३०-४४॥ केवल शास्त्र ही उन्हें खींचकर राह पर लाते हैं, ठीक उसी तरह
पञ्चचत्वारिंशोऽध्यायः २६६
अर्थांस्तथा हंति सुखावहांश्च लिहंत एते बहवोऽपशुष्काः ।
महत्तरं दुःखमभिप्रपन्ना हित्वामिषं मृत्युवशं प्रयांति ॥४६॥
विनाशिनी ह्यध्रुवजीवितः किं किं बंधुभिर्मित्रपरिग्रहैश्च ।
विहाय यो गच्छति सर्वमेव क्षणेन गत्वा न निवर्तते च ॥४७॥
भूव्योमतोयानलवायवोऽपि सदा शरीरं प्रतिपालयंति ।
इतीदमालक्ष्य रतिः कुतो भवेद्विनाशिनाप्यस्य न शर्म विद्यते ॥४८॥
इदमनुपधिवाक्यमच्छलं परमनिरामयमात्मसाक्षिकम् ।
नरपतिरभिवीक्ष्य विस्मितः पुनरनुयोक्तुमिदं प्रचक्रमे ॥४६॥
जनक उवाच
भगवन्यदि न प्रेत्य संज्ञा भवति कस्यचित् । एवं सति किम ज्ञानं ज्ञानं वा किं करिष्यति ॥५०॥
सर्वमुच्छेदनिष्ठं स्यात्पश्य चैतद्विजोत्तम । अप्रमत्तः प्रमत्तो वा किं विशेषं करिष्यति ॥५१॥
असंसर्गो हि भूतेषु संसर्गो वा विनाशिषु । कस्मै क्रियेत कल्पेत निश्चयः कोऽत्र तत्त्वतः ॥५२॥
सनंदन उवाच
तमसा हि मतिच्छन्नं विश्रांतमिव चातुरम् । पुनः प्रशमयन्वाक्यैः कविः पंचशिखोऽब्रवीत् ॥५३॥
पंचशिख उवाच
उच्छेदनिष्ठा नेहास्ति भावनिष्ठा न विद्यते । अयं ह्यपि समाहारः शरीरेन्द्रियचेतसाम् ॥५४॥
वर्तंते पृथगन्योन्यमप्युपाश्रित्य कर्मसु । धातवः पंचधा तोयं खे वायुर्ज्योतिर्बो धरा ॥५५॥
तेषु भावेन तिष्ठंति वियुज्यंते स्वभावतः । आकाशं वायुरुष्मा च स्नेहो यश्चापि पार्थिवः ॥५६॥
एष पञ्चसमाहारः शरीरमपि नैकधा । ज्ञानमूष्मा च वायुश्च त्रिविधः कायसंग्रहः ॥५७॥
इंद्रियाणींद्रियार्थाश्च स्वभावश्चेतनामनः । प्राणापानौ विकारश्च धातवश्चात्र निःसृताः ॥५८॥
श्रवणं स्पर्शनं जिह्वा दृष्टिर्नासा तथैव च । इंद्रियाणीति पंचैते चित्तपूर्वांगमा गुणाः ॥५६॥
जैसे महावत हाथो पर अंकुश रखकर उन्हें काबू में किये रहते हैं। बहुत से शुष्क हृदय वाले लोग ऐसे विषयों
की लिप्सा रखते हैं, जो अत्यन्त सुखदायक हों; किन्तु इस लिप्सा में भारी से भारी दुःखों का सामना करना पड़ता
है और वे अन्त में भोगों को छोड़कर मृत्यु के ग्रास बन जाते हैं। जो एक दिन नष्ट होने वाला है, जिसके जीवन
का कुछ ठिकाना नहीं, ऐसे अनित्य शरीर को पाकर इन बन्धु-बान्धवों तथा स्त्री-पुत्रादि से क्या लाभ है ? यह
सोचकर जो मनुष्य इन सबको क्षण भर में वैराग्यपूर्वक त्याग कर चल देता है, उसे मृत्यु के बाद फिर जन्म नहीं
लेना पड़ता । पृथ्वी, आकाश, जल, अग्नि और वायु ये सदा शरीर की रक्षा करते रहते हैं, इस बात को अच्छी
तरह समझ लेने पर इसके प्रति आसक्ति कैसे हो सकती है ? जो एक दिन मृत्यु के मुख में पड़ने वाला है, ऐसे
शरीर से सुख कहां ?
जो लोग मुक्ति के लिए प्रयत्नशील हों, उनको चाहिए कि सम्पूर्णा सकाम कर्मों तथा धन आदि का भी
त्याग करें। जो त्याग किये बिना व्यर्थ ही विनीत (शमदमादि साधनों में तत्पर) होने का मिथ्या दावा करते हैं,
३०० नारदीयपुराणम्
तत्र विज्ञानसंयुक्ता त्रिविधा चेतना ध्रुवा। सुखदुःखेति यासाहुरनदुःखसुखेति च ॥६०॥
शब्दः स्पर्शश्च रूपं च भूत्यर्थमेव ते त्रयः। एते ह्यावरणार्थञ्च सद्गुणा ज्ञानसिद्धये ॥६१॥
तेषु कर्माणि सिद्धिश्च सर्वतत्त्वार्थनिश्चयः। तमाहुः परसं शुद्धं बुद्धिरित्यव्ययं महत् ॥६२॥
इमं गुणसमाहारमात्मभावेन पश्यतः। असम्यग्दर्शनेर्दुःखमन्तं नोपशाम्यति ॥६३॥
अनात्मेति च यद्दृष्टं तेनाहं न समेत्यपि। वर्तते किमधिष्ठानात्प्रसक्ता दुःखसंततिः ॥६४॥
तत्र सम्यग्जनो नाम त्यागशास्त्रमनुत्तमम्। शृणुयात्तत्र मोक्षाय भाष्यमाणं भविष्यति ॥६५॥
त्याग एव हि सर्वेषामुक्तानामपि कर्मणाम्। नित्यं मिथ्याविनीतानां क्लेशो दुःखावहो मतः ॥६६॥
द्रव्यत्यागे तु कर्माणि भोगत्यागे व्रतानि च। सुखत्यागे तपो योगं सर्वत्यागे समापना ॥६७॥
तस्य मार्गोऽयमध्यक्षः सर्वत्यागस्य दर्शितः। विप्रहाणाय दुःखस्य दुर्गतिर्हि तथा भवेत् ॥६८॥
पंच ज्ञानेंद्रियाण्युक्त्वा मनः षष्ठानि चेतसि। बलबष्ठानि वक्ष्यामि पंच कर्मेन्द्रियाणि तु ॥६९॥
हस्तौ कर्मेन्द्रियं ज्ञेयमथ पादो गतीन्द्रियम्। प्रजनानंदयोर्मेढ्रो विसर्गो पायुरिंद्रियम् ॥७०॥
वाक्च शब्दविशेषार्थमिति पंचान्वितं विदुः। एवमेकादशैतानि बुद्ध्या त्वसृजेन्मनः ॥७१॥
कर्णी शब्दश्च चित्तं च त्रयः श्रवणसंग्रहे। तथा स्पर्शे तथा रूपे तथैव रसगंधयोः ॥७२॥
एवं पंच त्रिका ह्येते गुणस्तदुपलब्धये। येनायं त्रिविधो भावः पर्यायात्समुपस्थितः ॥७३॥
सात्त्विको राजसश्चापि तामसश्चापि ते त्रयः। त्रिविधा वेदना येषु प्रसृता सर्वसाधिनी ॥७४॥
प्रहर्षः प्रीतिरानंदः सुखं संशान्तचित्तता। अकुतश्चित्कुतश्चिद्वा चित्ततः सात्त्विको गुणः ॥७५॥
अतुष्टिः परितापश्च शोको लोभस्तथाक्षमा। लिंगानि रजसस्तानि दृश्यंते हेत्वहेतुतः ॥७६॥
अविवेकस्तथा मोहः प्रमादः स्वप्नतंद्रिता। कथंचिदपि वर्तते विविधास्तामसा गुणाः ॥७७॥
उन्हें दुःख देने वाले अविद्या रूप क्लेश प्राप्त होते रहते हैं। शास्त्रों में द्रव्य का त्याग करने के लिए यज्ञ आदि
कर्म, भोग का त्याग करने के लिए व्रत, दैहिक सुखों के त्याग के लिए तप और सब कुछ त्यागने के लिए योग के
अनुष्ठान को आज्ञा दी गई है। यहो त्याग की सीमा है। सर्वस्व-त्याग का यह एकमात्र मार्ग हो दुःखों से
छुटकारा पाने के लिए उत्तम बताया गया है। इसका आश्रय न लेने वालों को दुर्गति भोगनी पड़ती है।
छठे मन सहित पाँच ज्ञानेन्द्रियाँ बतायी हैं, जिनकी स्थिति बुद्धि में है। [पाँच कर्मेन्द्रियाँ ये हैं-] दोनों
हाथ काम करने वाली इन्द्रिय हैं। पैर चलने-फिरने का कार्य करने वाली इन्द्रिय हैं। लिंग मैथुन-सुख और
सन्तानोत्पादन आदि के लिए है। गुदा का कार्य मलत्याग करना है। वाक् इन्द्रिय शब्द-विशेष का उच्चारण
करने के लिए है। मन को इन पाँचों से संयुक्त माना गया है। इस प्रकार पाँच ज्ञानेन्द्रिय, पाँच कर्मेन्द्रिय
और मन-ये सब मिलाकर ग्यारह इन्द्रियाँ हैं। इन सब को मन रूप जानकर बुद्धि के द्वारा शीघ्र इनका त्याग कर
देना चाहिए ॥४५-७१॥ श्रवणकाल में श्रोत्र रूपी इन्द्रिय, शब्द रूपी विषय और चित्त रूपी कर्ता—इन तीन का
संयोग होता है। इसी प्रकार स्पर्श, रूप, रस तथा गन्ध के अनुभव-काल में भी इन्द्रिय, विषय एवं मन का
संयोग अपेक्षित है। इस तरह तीन-तीन के पाँच समुदाय हैं। ये सब गुण कहे गये हैं। इनसे शब्दादि विषयों
का ग्रहण होता है और इसी के लिए ये कर्ता, कर्म और कारण रूपी त्रिविध भाव बारी-बारी से उपस्थित होते हैं।
इनमें से एक-एक के सात्त्विक, राजस और तामस तीन-तीन भेद हैं। हर्ष, प्रीति, आनन्द, सुख और चित्त की
शान्ति—ये सब भाव बिना किसी कारण के हों या किसी कारणवश हों, सात्त्विक गुण माने गये हैं ॥७२-७५॥
असंतोष, संताप, शोक, लोभ तथा क्षमा का अभाव--ये किसी कारण से हों या अकारण-रजोगुण के चिह्न हैं।
अविवेक, मोह, प्रमाद, स्वप्न और आलस्य--किसी तरह भी क्यों न हों, तमोगुण के ही नाना रूप हैं।
पञ्चचत्वारिंशोऽध्यायः ३०१
इमां च यो वेद विमोक्षबुद्धिमात्मानमन्विच्छति चाप्रमत्तः ।
न लिप्यते कर्मफलैरनिष्टैः पत्रं विषस्येव जलेन सिक्तम् ॥७८॥
दृढैर्हि पाशैर्विविधैर्विमुक्तः प्रजानिमित्तैरपि देवतैश्च ।
यदा ह्यसौ दुःखसौख्ये जहाति मुक्तस्तदाऽग्र्यां गतिमेत्यलिंगः ॥७९॥
श्रुतिप्रमाणागममङ्गलैश्च शेते जरामृत्युभयादतीतः ।
क्षीणे च पुण्ये विगते च पापे तनोर्निमित्ते च फले विनष्टे ॥८०॥
अलेपमाकाशमलिंगमेवमास्थाय पश्यंति महत्यशक्ता ।
यथोर्णनाभिः परिवर्तमानस्तंतुक्षये तिष्ठति यात्यमानः ॥८१॥
तथा विमुक्तः प्रजहाति दुःखं विध्वंसते लोष्टमिवादिमुच्छन् ।
यथा रुरुः शृंगमथो पुराणं हित्वा त्वचं वाप्युरगो यथा च ॥८२॥
विहाय गच्छन्ननवेक्षमाणस्तथा विमुक्तो विजहाति दुःखम् ।
मत्स्यं यथा वाप्युदके पतंतमुत्सृज्य पक्षी निपतत्यशक्तः ॥८३॥
तथा ह्यसौ दुःखसौख्ये विहाय मुक्तः पराद्ध्र्यां गतिमेत्यलिंगः ॥८४॥
इदममृतपदं निशम्य राजा स्वयमिह पंचशिखेन भाष्यमाणम् ।
निखिलमभिसमीक्ष्य निश्चितार्थः परमसुखी विजहार वीतशोकः ॥८५॥
जो इस मोक्ष-विद्या को जानकर सावधानी के साथ तत्त्व का अनुसन्धान करता है, वह जल से कमल के
पत्ते की भाँति कर्म के अनिष्ट फलों से कभी लिप्त नहीं होता । सन्तानों के प्रति आसक्ति और भिन्न-भिन्न देव-
ताओं के लिए सकाम यज्ञों का अनुष्ठान--ये सब मनुष्य के लिए नाना प्रकार के दृढ़ बन्धन हैं । जब वह इन
बन्धनों से छूटकर दुःख-सुख की चिन्ता छोड़ देता है, उस समय सर्वश्रेष्ठ गति (मुक्ति) प्राप्त कर लेता है ।
श्रुति के महावाक्यों का विचार और शास्त्र में बताये हुए मंगलमय साधनों का अनुष्ठान करने से मनुष्य जरा
तथा मृत्यु के भय से रहित होकर सुख से रहता है। जब पुण्य और पाप का क्षय तथा उनसे मिलने वाले सुख-
दुःखादि फलों का नाश हो जाता है, उस समय सब वस्तुओं की आसक्ति से रहित पुरुष आकाश के समान निर्लेप
एवं निर्गुण आत्मा का साक्षात्कार कर लेता है। जो शरीर में आसक्ति न रखकर उसके प्रति अपनेपन का अभि-
मान त्याग देता है, वह दुःख से छूट जाता है। जैसे वृक्ष के प्रति आसक्ति न रखने वाला पक्षी जल में गिरते हुए
वृक्ष को छोड़कर उड़ जाता है, उसी प्रकार जो शरीर की आसक्ति को छोड़ चुका है, वह मुक्त पुरुष सुख और
दुःख दोनों का त्याग करके उत्तम गति को प्राप्त होता है ॥७६-८४॥
पञ्चशिख के बताये हुए इस अमृतमय ज्ञान को सुनकर राजा जनक उसे पूर्ण रूप से विचार करके एक
निश्चित सिद्धान्त पर पहुँच गए और शोक-रहित होकर बड़े सुख से रहने लगे ॥८५॥ फिर तो उनकी स्थिति ऐसी
३०२ नारदीयपुराणम्
अपि च भवति मैथिलेन गीतं नगरमुपाहितमग्निनाभिवीक्ष्य ।
न खलु मम हि दह्यतेऽत्र किंचित्स्वयमिदमाह किल स्म भूमिपालः ॥८६॥
इमं हि यः पठति विमोक्षनिश्चयं महामुने सततमवेक्षते तथा ।
उपद्रवाननुभवते ह्यदुःखितः प्रमुच्यते कपिलमिवेत्य मैथिलः ॥८७॥
इतिबृहन्नारदीयपुराणे पूर्वभागे बृहदुपाख्याने
द्वितीयपादे पञ्चचत्वारिंशोऽध्यायः ॥४५॥
अथ षट्चत्वारिंशोऽध्यायः
सूत उवाच
तच्छ्रुत्वा नारदो विप्रा मैथिलाध्यात्ममुत्तमम् । पुनः पप्रच्छ तं प्रीत्या सनंदनमुदारधीः ॥१॥
नारद उवाच
आध्यात्मिकादिविविधं तापं नानुभवेद्यथा । प्रब्रूहि तन्मुने मह्यं प्रपन्नाय दयानिधे ॥२॥
हो गई कि एक बार मिथिला नगरी को आग से जलती देखकर भूपाल ने स्वयं यह उद्गार प्रकट किया कि
'इस नगर के जलने से मेरा कुछ भी नहीं जलता ।' महामुनि नारदजी, इस अध्याय में मोक्षतत्त्व का निर्णय किया
गया है। जो सदा इसका स्वाध्याय और चिन्तन करता है, वह दुःख-शोक से रहित हो कभी किसी प्रकार के
उपद्रव का अनुभव नहीं करता तथा जिस प्रकार राजा जनक पञ्चशिख के समागम से इस ज्ञान को पाकर
मुक्त हो गए थे, उसी प्रकार वह भी मोक्ष प्राप्त करता है ॥८६-८७॥
श्रीनारदीयमहापुराण के पूर्वभाग में पैंतालीसवां अध्याय समाप्त ॥४५॥
नोट--इस अध्याय का अनुवाद दूसरे संस्करण से किया गया है, जो गीता प्रेस के सौजन्य से हमें प्राप्त
हुआ। अतः गीता प्रेस के प्रति हम कृतज्ञता प्रकट करते हैं और पाठक के प्रति क्षमाप्रार्थना, क्योंकि मूलानुगामी
अनुवाद न होने पर भी विषयानु कूल होने से हमने इसे उद्धृत किया है। [अनुवादक]
अध्याय ४६
त्रिविध तापों से छूटने के उपाय आदि का प्रतिपादन
सूत बोले-विप्रगण ! उदार बुद्धि नारद ने जनक के उस उत्तम अध्यात्मज्ञान को सुनकर पुनः प्रसन्न
हो सनन्दन से पूछा- ॥१॥
नारद बोले-दयानिधि ! मुनिवर ! जिस उपाय से आध्यात्मिक आदि त्रिविध तापों से कष्ट न मिले
ऐसा उपाय आप मुझको बतलाइये, मैं आपकी शरण में आया हूँ ॥२॥
षट्चत्वारिंशोऽध्यायः ३०३
सनन्दन उवाच
तदस्य त्रिविधं दुःखमिह जातस्य पंडित । गर्भे जन्मजराद्येषु स्थानेषु प्रभविष्यतः ॥३॥
निरस्तातिशयाह्लादसुखाभावैकलक्षणा । भेषजं भगवत्प्राप्तिरेका चात्यंतिकी मता ॥४॥
तस्मात्तत्प्राप्तये यत्नः कर्तव्यः पंडितैर्नरैः । तत्प्राप्तिहेतुज्ञानं च कर्म चोक्तं महामुने ॥५॥
आगमोत्थं विवेकाच्च द्विधा ज्ञानं तथोच्यते । शब्दब्रह्मागममयं परं ब्रह्म विवेकजम् ॥६॥
मनुरप्याह वेदार्थं स्मृत्वार्यं मुनिसत्तमः । तदेतच्छ्रूयतामत्र सुबोधं गदतो मम ॥७॥
द्वे ब्रह्मणी वेदितव्ये शब्दब्रह्म परं च यत् । शब्दब्रह्मणि निष्णातः परं ब्रह्माधिगच्छति ॥८॥
द्वे विद्ये वेदितव्ये चेत्याह चाथर्वणी श्रुतिः । परमा त्वक्षरप्राप्तिऋग्वेदादिमया परा ॥९॥
यत्तदव्यक्तमजरमनीयमजमव्ययम् । अनिर्देश्यमरूपं च पाणिपादादिसंयुतम् ॥१०॥
विभुं सर्वगतं नित्यं भूतयोनिमकारणम् । व्याप्यं व्याप्तं यतः सर्वं तं वै पश्यंति सुरयः ॥११॥
तद्ब्रह्म तत्परं धाम तद्धयेयं मोक्षकांक्षिभिः । श्रुतिवाक्योदितं सूक्ष्मं तद्विष्णोः परमं पदम् ॥१२॥
तदेव भगवद्वाच्यं स्वरूपं परमात्मनः । वाचको भगवच्छब्दस्तस्योद्दिष्टोऽक्षयात्मनः ॥१३॥
एवं निगदितार्थस्य यत्तत्त्वं तस्य तत्त्वतः । ज्ञायते येन तज्ज्ञानं परमन्यत्त्रयोमयम् ॥१४॥
अशब्दगोचरस्यापि तस्य वै ब्रह्मणो द्विज । पूजायां भगवच्छब्दः क्रियते ह्यौपचारिकः ॥१५॥
शुद्धे महाविभूत्याख्ये परे ब्रह्मणि वर्तते । भगवन्भगवच्छब्दः सर्वकारणकारणे ।
ज्ञेयं ज्ञातेति तथा भकारोऽर्थद्वयात्मकः । तेनागमयिता स्रष्टा गकारोऽथ तथा मुने ॥१६॥
सनन्दन ने कहा-पंडित ! जन्मजरादि के स्थान इस संसार में उत्पन्न जीव के साथ इन त्रिविध तापों का
सम्बन्ध गर्भ में आने के साथ ही हो जाता है ॥३॥ इस त्रिविध ताप के शमन की एक मात्र ओषधि अत्यन्त सुख को
तिरस्कृत करने वाली भाव-लक्षणा भगवत्प्राप्ति हो है ॥४॥ इसलिए पंडित मनुष्य उस भगवान् को पाने का प्रयत्न
करें । महामुने ! उसको पाने का साधन भी ज्ञान और कर्म है ॥५॥ ज्ञान भी दो प्रकार का है, शास्त्राध्ययन द्वारा
प्राप्त और विवेक द्वारा प्राप्त । शब्दब्रह्म अर्थात् वेद का ज्ञान शास्त्रज्ञान है और परब्रह्म परमात्मा का बोध
विवेकजन्य ज्ञान है ॥६॥ मुनिश्रेष्ठ ! मनु ने भी वेदार्थ का स्मरण कर इसो बात का समर्थन किया है। यहाँ
उस ज्ञान को कह रहा हूँ सुनो ॥७॥ दो प्रकार के ब्रह्म-शब्द ब्रह्म और परब्रह्म को जानना आवश्यक है। शब्द ब्रह्म
का पूर्ण ज्ञान प्राप्त कर लेने वाला पर-ब्रह्म को प्राप्त कर लेता है ॥८॥ आथर्वणी श्रुति भी कहती है 'दो
विद्याओं को अवश्य जानना चाहिए-परा और अपरा । परा अक्षर प्राप्ति को कहते हैं और अपरा ऋग्वेदादिमयो
है ॥९॥ जो अव्यक्त, अजर, अनीह, अज, अव्यय, अनिर्देश्य, अरूप, पाणिपाद से युक्त, विभु, सर्वगत, नित्य, प्राणियों
का उत्पादक, अकारण, और जिससे सारा जगत् व्याप्त है उस ब्रह्म का सुधीजन सर्वदा दर्शन करते हैं ॥१०-११॥
मोक्ष के इच्छुक जनों को उस ब्रह्म, परमधाम का ध्यान करना चाहिए। श्रुतियों ने उस विष्णु के सूक्ष्म परम
पद का वर्णन किया है ॥१२॥ वही भगवान् नाम से प्रसिद्ध है, परमात्मा का वही स्वरूप है । उस अविनाशी का
वाचक भगवान् शब्द है ॥१३॥ इस प्रकार जिसकी व्याख्या की गई है उसका जो सार है उसको जिस साधन से
जानते हैं वही पर ज्ञान है और दूसरा त्रयो (वेदत्रयी) मय जो है वह अपर ज्ञान (आगममय) है ॥१४॥ द्विज !
यद्यपि वह ब्रह्म किसी शब्द या वाणी का गोचर नहीं है परन्तु उसकी पूजा के लिए भगवान् शब्द औपचारिक
(आरोपित) प्रयोग है अन्यथा उसका स्मरण या पूजा कैसे संभव होती ॥१५॥ भगवन् ! शुद्ध, सर्वकारणकारण,
महाविभूति परब्रह्म के लिए भगवान् शब्द का प्रयोग किया जाता है । मुने ! भकार के दो अर्थ हैं-ज्ञेय और ज्ञाता ।
३०४ नारदीयपुराणम्
ऐश्वर्यस्य समग्रस्य वीर्यस्य यशसः श्रियः । ज्ञानवैराग्ययोश्चैव षण्णां भग इतीरणा ॥१७॥
वसन्ति तत्र भूतानि भूतात्मन्यखिलात्मनि । सर्वभूतेष्वशेषेषु वकारार्थस्ततोऽव्ययः ॥१८॥
एवमेव महाशब्दो भगवानिति सत्तम । परमब्रह्मभूतस्य वासुदेवस्य नान्यगः ॥१९॥
तत्र पूज्यपदार्थोक्तिः परिभाषासमन्वितः । शब्दोऽयं नोपचारेण चान्यत्र ह्युपचारतः ॥२०॥
उत्पत्तिं प्रलयं चैव भूतानामगतिं गतिम् । वेत्ति विद्यामविद्यां च स वाच्यो भगवानिति ॥२१॥
ज्ञानशक्तिबलैश्वर्यवीर्यतेजांस्यशेषतः । भगवच्छब्दवाच्यानि विना हेयैर्गुणादिभिः ॥२२॥
सर्वाणि तत्र भूतानि वसन्ति परमात्मनि । भूतेषु वसनादेव वासुदेवस्ततः स्मृतः ॥२३॥
खांडिक्यं जनकं प्राह पृष्टः केशिध्वजः पुरा । नामव्याख्यामनंतस्य वासुदेवस्य तत्त्वतः ॥२४॥
भूतेषु वसते सोऽन्तर्वसंस्त्यत्र च तानि यत् । धाता विधाता जगतां वासुदेवस्ततः प्रभुः ॥२५॥
स सर्वभूतप्रकृतिं विकारं गुणादिदोषांश्च मुने ह्यतीतः ।
अतीतसर्वावरणोऽखिलात्मा तेनास्तृतं यद्भुवनांतरालम् ॥२६॥
समस्तकल्याणगुणं गुणात्मको हित्वातिदुःखावृतभूतसर्गः ।
इच्छागृहीताभिमतोरुदेहः संसाधितशेषजगद्धितोऽसौ ॥२७॥
तेजोबलैश्वर्यमहावबोधं स्ववीर्यशक्त्यादिगुणैकराशिः ।
परः पराणां सकला न यत्र क्लेशादयः संति परावरेशे ॥२८॥
गकार के तीन अर्थ हैं—गमयिता (प्रेरक), नेता (संचालक) तथा स्रष्टा । भ और ग के योग से भग शब्द बनता है,
जिसका अर्थ इस प्रकार है सम्पूर्ण ऐश्वर्य, वीर्य, यश, श्री, वैराग्य, ज्ञान इन छह अर्थों में भग शब्द का प्रयोग
कहा गया है ॥१६-१७॥ उस अखिलात्मा और भूतात्मा में सब भूत (पदार्थ) रहते हैं और वह अशेष
पदार्थों में रहता है। वकार का अर्थ अव्यय है ॥१८॥ महात्मन् ! भगवान् इस महाशब्द का ऐसा ही अर्थ है।
परम ब्रह्मभूत वासुदेव का द्योतक और शब्द नहीं है ॥१९॥ पूज्य पद का जो अर्थ है, उसको सूचित करने की
परिभाषा से युक्त यह भगवत् शब्द परमात्मा के लिए तो प्रधान रूप से प्रयुक्त होता है और दूसरों के लिए गौण
रूप से। जो उत्पत्ति, प्रलय, भूतों की गति-अगति और विद्या-अविद्या को जानता है उसको ही भगवान् कहा जाता
है ॥२१॥ ज्ञानशक्ति, बल, ऐश्वर्य, वीर्य और अशेष तेज ये भगवत् शब्द के अर्थ हैं। बिना इन गुणों के भगवत्
शब्द का प्रयोग कैसे किया जा सकता है ॥२२॥ उस परमात्मा में सब भूत निवास करते हैं और वह समस्त
भूतों में वास करता है, इसलिए उसको वासुदेव कहा जाता है ॥२३॥ पहले खाण्डिक्य जनक के पूछने पर केशि-
ध्वज ने उनसे इसी वासुदेव के नाम-माहात्म्य को तत्त्वतः कहा था ॥२४॥ वह सब भूतों में रहता है और
सारे पदार्थ उसमें रहते हैं। वह संसार का धाता और विधाता है, अतः उसको प्रभु वासुदेव कहते हैं
॥२५॥ मुने ! वह सब भूतों की प्रकृति, विकृति और गुण आदि के दोषों से परे है। वह अखिलांतरात्मा
सब आवरणों से मुक्त है। उससे सम्पूर्ण भुवन-मण्डल व्याप्त है ॥२६॥ सम्पूर्ण कल्याणमय गुण उसके
स्वरूप हैं। उन्होंने अपनी शक्ति के लेशमात्र से सम्पूर्ण भूतसमुदाय को व्याप्त कर रखा है। वे अपनी इच्छा
मात्र से मन के अनुकूल अनेक शरीर धारण करते रहते हैं और सारे जगत् का हित साधन करते रहते हैं ॥२७॥
तेज, बल, ऐश्वर्य, महाज्ञान, वीर्य, शक्ति और सब गुणों की वह एक राशि है। वे प्रकृति आदि से भी परे हैं और
उन समस्त कार्यकारणों के स्वामी परमेश्वर में किसी प्रकार का क्लेश नहीं है ॥२८॥
षट्चत्वारिंशोऽध्यायः ३०५
स ईश्वरो व्यष्टिसमष्टिरूपोऽव्यक्तस्वरूपः प्रकटस्वरूपः ।
सर्वेश्वरः सर्वंनिसर्गवेत्ता समस्तशक्तिः परमेश्वराख्यः ॥२९॥
स ज्ञायते येन तदस्तदोषं शुद्धं परं निर्मलमेव रूपम् ।
संदृश्यते चाप्यवगम्यते च तज्ज्ञानमज्ञानमतोऽन्यदुक्तम् ॥३०॥
स्वाध्यायसंयमाभ्यां स दृश्यते पुरुषोत्तमः । तत्प्राप्तिकारणं ब्रह्म तदेतत्प्रतिपद्यते ॥३१॥
स्वाध्यायाद्योगमासीत योगात्स्वाध्यायमामनेत् । स्वाध्याययोगसंपत्त्या परमात्मा प्रकाशते ॥३२॥
तदीक्षणाय स्वध्यायश्चक्षुर्योगस्तथापरम् । न मांसचक्षुषा द्रष्टुं ब्रह्मभूतः स शक्यते ॥३३॥
नारद उवाच
भगवंस्तमहं योगं ज्ञातुमिच्छामि तं वद । ज्ञाते यन्नाखिलाधारं पश्येयं परमेश्वरम् ॥३४॥
सनंदन उवाच
केशिध्वजो यथा प्राह खांडिक्याय महात्मने । जनकाय पुरा योगं तथाहं कथयामि ते ॥३५॥
नारद उवाच
खांडिक्यः कोऽभवद्ब्रह्मन्को वा केशिध्वजोऽभवत् । कथं तयोश्च संवादो योगसंबन्धवानभूत् ॥३६॥
सनंदन उवाच
धर्मध्वजो वै जनकस्तस्य पुत्रोऽमितध्वजः । कृतध्वजोऽस्य भ्राताभूत्सवाध्यात्मरतिर्नृपः ॥३७॥
कृतध्वजस्य पुत्रोऽभूद्धन्यः केशिध्वजो द्विजः । पुत्रोऽमितध्वजस्यापि खांडिक्यजनकाभिधः ॥३८॥
जो ईश्वर व्यष्टि और समष्टि स्वरूप, अव्यक्त और व्यक्त स्वरूप, सर्वेश्वर, सर्वप्रकृतिज्ञाता, समस्त
शक्ति से युक्त परमेश्वर है ॥२९॥ उसको जैसे जाना जाता है और उसके निर्दोष, शुद्ध, पर, निर्मल रूप को
जिसके द्वारा जाना जाता है या देखा जाता है उसको ज्ञान और उससे अतिरिक्त को अज्ञान कहते हैं ॥३०॥
वह पुरुषोत्तम स्वाध्याय और संयम के द्वारा प्राप्त होता है। उसकी प्राप्ति का कारण जो ब्रह्म (शब्द ब्रह्म)
है उसका प्रतिपादन किया जा रहा है ॥३१॥ स्वाध्याय से योग को संयुक्त करे और योग से स्वाध्याय को।
इस प्रकार स्वाध्याय और योग की सम्मिलित शक्ति से परमात्मा का प्रत्यक्ष दर्शन होता है ॥३२॥ उसके दर्शन के
लिए स्वाध्याय और योग ही नेत्र हैं। इन स्थूल नेत्रों से वह ब्रह्मभूत पुरुषोत्तम देखा नहीं जा सकता ॥३३॥
नारद बोले- भगवन् ! जिसके जान लेने पर मैं सर्वाधार परमेश्वर का दर्शन कर सकूँ, उस योग को
जानना चाहता हूँ। कृपा करके उसका वर्णन कीजिए ॥३४॥
सनन्दन ने कहा- प्राचीन काल में केशिध्वज ने महात्मा खांडिक्य जनक से इस योग के विषय में जो
कुछ कहा था उसी को यहाँ कह रहा हूँ ॥३५॥
नारद बोले- ब्रह्मन् ! खांडिक्य कौन थे, केशिध्वज का परिचय क्या है, किस प्रकार उन दोनों में
योग संबंधी वार्ता हुई- इसको कहिए ॥३६॥
सनन्दन ने कहा- जनक धर्मध्वज नामक एक राजा था। उसके पुत्र का नाम अमितध्वज था। उस अमित
ध्वज का भ्राता कृतध्वज था, जो सदा अध्यात्म-चिन्तन में ही लगा रहता था। कृतध्वज का यशस्वी पुत्र केशिध्वज
हुआ ! अमितध्वज का भी खांडिक्य जनक नामक पुत्र था। खांडिक्य को राजा केशिध्वज ने सिंहासन से उतार
३६ ना० पु०
३०६ नारदीयपुराणम्
कर्ममार्गे हि खांडिक्यः स्वराज्यादवरोपितः । पुरोधसा मंत्रिभिश्च समवेतोऽल्पसाधनः ॥३८॥
राज्यान्निराकृतः सोऽथ दुर्गारण्यचरोऽभवत् । इयाज सोऽपि सुबहून् यज्ञाञ्ज्ञानव्यपाश्रयः ॥४०॥
ब्रह्मविद्यामधिष्ठाय तत्तु मृत्युमपि स्वयम् । एकदा वर्तमानस्य यागे योगविदां वर ॥४१॥
तस्य धेनुं जघानोग्रः शार्दूलो विजने वने । ततो राजा हतां ज्ञात्वा धेनुं व्याघ्रेण ऋत्विजः ॥४२॥
प्रायश्चित्तं स पप्रच्छ किमत्रेति विधीयताम् । ते चोचुर्न वयंविद्मः कशेरुः पृच्छ्यतामिति ॥४३॥
कशेरुरपि तेनोक्तस्तथेति प्राह नारद । शुनकं पृच्छ राजेन्द्र नाहं वेद स वेत्स्यति ॥४४॥
स गत्वा तमपृच्छच्च सोऽप्याह नृपतिं मुने । न कशेरुर्नचैवाहं न चान्यः सांप्रतं भुवि ॥४५॥
वेत्त्येक एव त्वच्छत्रुः खांडिक्यो यो जितस्त्वया । स चाह तं व्रजाम्येष प्रष्टुमात्मरिपुं मुने ॥४६॥
प्राप्त एव मया यज्ञे यदि मां स हनिष्यति । प्रायश्चित्तं स चेत्पृष्टो वदिष्यति रिपुर्मम ॥४७॥
ततश्चाविकलो योगो मुनिश्रेष्ठ भविष्यति । इत्युक्त्वा रथमारुह्य कृष्णाजिनधरो नृपः ॥४८॥
वनं जगाम यत्रास्ते खांडिक्यः स महीपतिः । तमायांतं समालोक्य खांडिक्यो रिपुमात्मनः ॥४९॥
प्रोवाच क्रोधताम्राक्षः समारोपितकार्मुकः ॥
खांडिक्य उवाच ॥५०॥
कृष्णाजिनत्वक्कवचभावेनास्मान्हनिष्यसि
कृष्णाजिनधरे वेत्सि न मयि प्रहरिष्यति । मृगाणां वद पृष्ठेषु मूढ कृष्णाजिनं न किम् ॥५१॥
दिया । राज्य से निष्कासित होकर खांडिक्य थोड़े-से पुरोहित, मंत्री और थोड़ी-सी सामग्री के साथ राज्य से
बाहर घने जंगलों में रहने लगा । इधर केशिध्वज ने भी बहुत से ज्ञानपूर्वक यज्ञ किये ॥३७-३९॥ स्वयं ब्रह्म-
विद्या के अभ्यास से संसार-सागर को पार करने का उपाय सोच लिया । योगिवर ! एक दिन वह राजा योग-
साधन में तल्लीन था कि उसकी गाय को निर्जन वन में एक बाघ ने मार डाला ॥४०-४१॥ ऋत्विज् राजा ने जब
यह सुना कि बाघ ने गाय की हत्या कर दी है तो उसने ऋषियों से पूछा कि कौन-सा प्रायश्चित्त करना चाहिए ।
उन लोगों ने कहा कि हम लोग नहीं जानते । आप ऋषि कशेरु से पूछिए ॥४१-४२॥ नारद ! जब कशेरु से यह
बात पूछी गई तो उन्होंने कहा कि राजेन्द्र ! शौनक से पूछिए । मैं नहीं जानता, वही जानते हैं ॥४३॥
मुने ! राजा ने जाकर शौनक से पूछा तो उसने भी कहा 'न तो मैं जानता हूँ, न कशेरु और न तो इस
समय इस पृथ्वी पर दूसरा ही कोई है जो इस रहस्य को जानता हो । एक ही व्यक्ति ऐसा है जो इसको
जानता है, वह है तुम्हारा शत्रु खांडिक्य जिसे तुमने परास्त किया था ॥४४-४६॥ यह सुनकर उसने कहा—मुने ! मैं
अभी यह बात पूछने के लिए अपने उस शत्रु के पास जाऊँगा । यदि वह इस अवस्था में मुझे मार देगा तो भी
मुझे यज्ञफल ही प्राप्त होगा और यदि पूछने पर प्रायश्चित्त विधि को बता देगा तब तो हे मुनिश्रेष्ठ ! मेरी योग-
साधना पूरी हो ही जायगी ॥४५-४६॥ यह कहकर वह राजा कृष्ण मृगचर्म को धारण कर रथ पर बैठ कर उस
वन में गया जहाँ महामति खांडिक्य विराजमान था । खाण्डिक्य अपने शत्रु को अपनी ओर आते देखकर क्रोध से
आँखें लाल कर धनुष पर बाण चढ़ाता हुआ बोला ॥४७-४८½॥
'तुम आज कृष्णमृगचर्म का कवच पहन कर हमलोगों को मारोगे क्या ? क्या तुम यह सोचते हो कि
कृष्ण मृगचर्म पहन लेने के कारण तुमको कोई नहीं मारेगा ? कहो तो सही मृगों की पीठ पर कृष्णाजिन नहीं
षट्चत्वारिंशोऽध्यायः ३०७
येषां मत्वा वृथा चोग्राः प्रहिताः शितसायकाः । स त्वामहं हनिष्यामि न मे जीवन्विमोक्ष्यसे ॥५२॥
आतताय्यसि दुर्बुद्धे मम राज्यहरो रिपुः ।
केशिध्वज उवाच
खांडिक्य संशयं प्रष्टुं भवन्तमहमागतः ॥५३॥
न त्वां हंतुं विचार्यैतत्कोपं बाणं च मुञ्च वा । ततः स मंत्रिभिः सार्द्धमेकांते सपुरोहितः ॥५४॥
मंत्रयामास खांडिक्यः सर्वैरेव महामतिः । तमूचुर्मंत्रिणो वध्यो रिपुरेष वशंगतः ॥५५॥
हतेऽत्र पृथिवी सर्वा तव वश्या भविष्यति । खांडिक्यश्चाह तान्सर्वानेवमेव न संशयः ॥५६॥
हते तु पृथिवी सर्वा मम वश्या भविष्यति । परलोकजयस्तस्य पृथिवी सकला मम ॥५७॥
न हन्मि चेल्लोकजयो मम तस्य वसुंधरा । परलोकजयोऽनंतः स्वल्पकालो महीजयः ॥५८॥
तस्मान्नैनं हनिष्येऽहं यत्पृच्छति वदामि तत् । ततस्तमभ्युपेत्याह खांडिक्यो जनको रिपुम् ॥५९॥
प्रष्टव्यं यत्तवधा सर्वं तत्पृच्छ त्वं वदाम्यहम् । ततः प्राह यथावृत्तं होमधेनुवधं मुने ॥६०॥
ततश्च तं स पप्रच्छ प्रायश्चित्तं हि तद्व्रतम् । स चाचष्ट यथान्यायं मुने केशिध्वजाय तत् ॥६१॥
प्रायश्चित्तमशेषं हि यद्वै तत्र विधीयते । विदितार्थः स तेनैवमनुज्ञातो महात्मना ॥६२॥
यागभूमिमुपागत्य चक्रे सर्वां क्रियां क्रमात् । क्रमेण विधिवद्यागं नीत्वा सोऽवभृथाप्लुतः ॥६३॥
कृतकृत्यस्ततो भूत्वा चिंतयामास पार्थिवः । पूजिता ऋत्विजः सर्वे सदस्या मानिता मया ॥६४॥
होता है क्या ? जिनको जानकर भी तुम व्यर्थ में उनके ऊपर अपने तीखे बाणों को फेंकते हो । आज तुम्हारा
शत्रु मैं तुमको अवश्य मारूँगा, मेरे जीते जी तुम आज बच नहीं सकोगे । दुर्बुद्धे ! तुम मेरे राज्य के छीनने वाले
आततायी शत्रु हो ॥४९-५१½॥
केशिध्वज बोला-खाण्डिक्य ! तुमसे कुछ अपनी शंकाओं का समाधान पूछने के लिए आया हूँ, तुमको
मारने के लिए नहीं । अतएव यह जानकर तुम शान्त हो जाओ । अपने बाण को धनुष से उतार दो । यह सुनकर
महामति खाण्डिक्य ने एकान्त में अपने सब मंत्रियों और पुरोहितों से परामर्श किया ॥५२-५३॥ मन्त्रियों ने
कहा कि यह शत्रु इस समय वश में आया हुआ है, अतः इसका वध अवश्य करना चाहिए। इसको मार देने पर
सारा राज्य तुम्हारे अधिकार में आ जायगा ॥५४½॥
खाण्डिक्य ने कहा-इसमें कोई सन्देह नहीं कि ऐसा करने से सारा राज्य मेरे अधिकार में आ जायगा ।
उसकी हत्या करने से पृथ्वी तो मेरे वश में हो जायगी, परन्तु वस्तुतः परलोक-विजयी वही होगा ॥५५-५६॥
यदि नहीं मारता तो परलोक विजय का श्रेय मुझको प्राप्त होगा और उसके अधिकार में केवल पृथ्वी रहेगी।
परलोक-जय अनन्त काल तक रहेगा, परन्तु लौकिक विजय क्षण भर ही ॥५७॥ इसलिए इसका वध नहीं करूँगा ।
यह जो कुछ पूछ रहा है, उसका उत्तर अवश्य दूंगा। इतना निश्चय करने के बाद जनक खाण्डिक्य अपने शत्रु के
पास आया और कहा-तुमको जो कुछ पूछना हो पूछो, मैं बताऊंगा ॥५८॥ मुने ! ऐसा आश्वासन पाकर उसने
होमधेनु के वध की कथा कह दी। इसके बाद उसने उसके लिए प्रायश्चित्त व्रत पूछा । मुने ! उसने न्यायानुुकूल
प्रायश्चित्त की विधि बता दी और उससे सम्बन्ध रखने वाली अन्य शेष क्रियाओं को भी बता दिया ॥५९-६०½॥
उस महात्मा से इस प्रकार सब तत्त्व को जानकर वह उसकी आज्ञा लेकर यज्ञ भूमि में आया और क्रमशः सारी
विधियां समाप्त कीं। क्रमशः सारी याज्ञिक क्रियाओं के करने के अनन्तर उसने अवभृथ-स्नान किया ॥६१-६२॥
सब कार्यों से निवृत्त होकर वह राजा सोचने लगा, मैंने सब ऋत्विजों की पूजा की सदस्यों का सम्मान भी किया,
३०८ नारदीयपुराणम्
तथैवाधिजनोऽप्यर्थैर्योजितोऽभिसतैर्मया । यथाहं मर्त्यलोकस्य मया सर्वं विचेष्टितम् ॥६५॥
अनिष्पन्नक्रियं चेतस्तथा न मम किं यथा । इत्थं तु चिंतयन्नेव सस्मार स महीपतिः ॥६६॥
खांडिक्याय न दत्तेति मया वै गुरुदक्षिणा । स जगाम ततो भूयो रथमारुह्य पार्थिवः ॥६७॥
स्वायंभुवः स्थितो यत्र खांडिक्योऽरण्यदुर्गमम् । खांडिक्योऽपि पुनर्द्दष्ट्वा तमायान्तं धृतायुधः ॥६८॥
तस्थौ हंतुं कृतमतिस्तमाह स पुनर्नृपः । अहं तु नापकाराय प्राप्तः खांडिक्य मा क्रुधः ॥६९॥
गुरोर्निष्कृतिदानाय मामवेहि समागतम् । निष्पादितो मया यागः सम्यक् त्वदुपदेशतः ॥७०॥
सोऽहं ते दातुमिच्छामि वृणीष्व गुरुदक्षिणाम् । इत्युक्तो मंत्रयामास स भूयो मंत्रिभिः सह ॥७१॥
गुरोर्निष्कृतिकामोऽयं किमयं प्रार्थ्यतां मया । तमूचुर्मंत्रिणो राज्यमशेषं याच्यतामयम् ॥७२॥
कृतिभिः प्रार्थ्यते राज्यमनायासितसैनिकैः । प्रहस्य तानाह नृपः स खांडिक्यो महीपतिः ॥७३॥
स्वल्पकालं महीराज्यं मादृशैः प्रार्थ्यते कथम् । एतमेतद्भवंतोऽत्र स्वार्थसाधनमंत्रिणः ॥७४॥
परमार्थः कथं कोऽत्र यूयं नात्र विचक्षणाः । इत्युक्त्वा समुपैत्यैनं स तु केशिध्वजं नृपम् ॥७५॥
उवाच किमवश्यं त्वं दास्यसि गुरुदक्षिणाम् । बाढमित्येव तेनोक्तः खांडिक्यस्तमथाब्रवीत् ॥७६॥
भवानध्यात्मविज्ञानपरमार्थविचक्षणः । यदि चेद्दीयते मह्यं भवता गुरुनिष्क्रयः ॥७७॥
तत्क्लेशप्रशमायालं यत्कर्म तदुदीरय
साथ ही याचकों को उनकी इच्छा के अनुसार दान भी दिया। मैंने जिस प्रकार मर्त्यलोक की विधियाँ होती हैं
उनको पूरा कर दिया, परन्तु फिर भी मेरे चित्त में कुछ कार्य सिद्ध न होने के समान असंतोष क्यों हो रहा
है ॥६३-६४½॥ इस प्रकार वह विचार कर ही रहा था कि उस भूपाल को यह स्मरण हो गया कि ओह! मैंने
खाण्डिक्य को अब तक गुरु दक्षिणा नहीं दी ॥६५½॥ फिर वह भूपाल रथ पर आरूढ़ होकर उस दुर्गम वन में
गया, जहाँ स्वायंभुव खाण्डक्य रहता था। पुनः उसको वन की ओर आते देखकर खाण्डक्य ने धनुष उठा लिया
और उसको मारने के अभिप्राय से तैयार हो गया ॥६६-६७½॥
यह देखकर राजा ने उससे कहा- खाण्डक्य, क्रोध मत करो, मैं तुम्हारे किसी अपकार की इच्छा से
नहीं आया हूँ। गुरुदक्षिणा देने के लिए मैं आया हूँ, ऐसा समझो। तुम्हारे उपदेश के अनुसार मैंने अपने यज्ञ को
विधिपूर्वक समाप्त किया है। अतः मैं गुरुदक्षिणा देना चाहता हूँ, माँगो ॥६८-६९½॥
यह सुनकर खाण्डक्य ने फिर मन्त्रियों से मन्त्रणा की कि यह गुरु का ऋण चुकाने के अभिप्राय से यहाँ
आया हुआ है। कहो, क्या माँगा जाय । मन्त्रियों ने राजा से कहा कि इससे सम्पूर्ण राज्य माँगा जाय। जो
नीतिपटु होते हैं वे बिना सैनिक सहायता के राज्य पाना चाहते हैं ॥७०-७१½॥
महामति वह नृपति खांडिक्य अदूरदर्शी मंत्रियों की मन्त्रणा सुनकर हँसता हुआ बोला-'क्षण स्थायी पृथ्वी
का राज्य मेरे समान विवेकी व्यक्ति कैसे माँग सकता है। आप लोग ऐसे ही केवल स्वार्थ-साधन करने का उपदेश देने
वाले मन्त्री हैं। यहाँ परमार्थ क्या है इस बात को जानने में आप कुशल नहीं हैं ॥७२-७३½॥ यह कह कर वह केशिध्वज
राजा के पास आया और कहा- 'तुम मुझे अवश्य गुरुदक्षिणा देना चाहते हो क्या?" 'अवश्य" केशिध्वज ने कहा-
यह निश्चय सुनकर खाण्डिक्य ने कहा ॥७४-७५॥ आप अध्यात्म विज्ञान के परमार्थ जानने वाले विद्वान् हैं।
यदि आप मुझको गुरुदक्षिणा देना चाहते हैं तो सांसारिक दुःखों से मुक्ति दिलाने वाले जो कर्म हैं उनको
कहिए ॥७६½॥
षट्चत्वारिंशोऽध्यायः ३०६
केशिध्वज उवाच
न प्रार्थितं त्वया कस्मान्मम राज्यमकंटकम् ।॥७८॥
राज्यलाभाद्धि नास्त्यन्यत्क्षत्रियाणामतिप्रियम् ।
खांडिक्य उवाच
केशिध्वज निबोध त्वं मया न प्रार्थितं यतः ।
राज्यमेतदशेषेण यन्न गृह्नन्ति पंडिताः । क्षत्रियाणामयं धर्मो यत्प्रजापरिपालनम् ॥७९॥
वधश्च धर्मयुद्धेन स्वराज्यपरिपन्थिनाम् । यत्राशक्तस्य मे दोषो नैवास्त्यपकृते त्वया ॥८०॥
बंधायैव भवत्येषा ह्यविद्या चाक्रमोज्झिता । जन्मोपभोगलिप्सार्थमियं राज्यस्पृहा मम ॥८१॥
अन्येषां दोषजानेव धर्ममेवानुरुध्यते । न याच्ञा क्षत्रबंधूनां धर्मावैतत्सतां मतम् ॥८२॥
अतो न याचितं राज्यमविद्यांतर्गतं तव । राज्यं गृह्णन्त्यविद्वांसो ममत्वाकृष्टचेतसः ॥८३॥
अहम्मानमहापालमदमत्ता न मादृशाः ॥
केशिध्वज उवाच
॥८४॥
अहं च विद्यया मृत्युं तर्तुकामः करोमि वै
राज्यं यज्ञांश्च विविधान्भोगे पुण्यक्षयं तथा । तदिदं ते मनो दिष्ट्या विवेकैश्वर्यतां गतम् ॥८५॥
श्रूयतां चाप्यविद्यायाः स्वरूपं कुलर्नंदन । अनात्मन्यात्मबुद्धिर्या ह्यस्वे स्वविषया मतिः ॥८६॥
अविद्यातरुसंभूतं बीजमेतद्विद्वधा स्थितम् । पंचभूतात्मके देहे देही मोहतमोवृतः ॥८७॥
केशिध्वज बोला--तुमने मुझसे अंकटक राज्य क्यों नहीं माँगा ? राज्य-प्राप्ति के अतिरिक्त क्षत्रियों
के लिए कोई अति प्रिय वस्तु नहीं है ॥७७॥
खांडिक्य ने कहा--केशिध्वज ! मैंने तुम्हारा सम्पूर्ण राज्य क्यों नहीं माँगा, इसका कारण सुनो ।
विद्वान् पुरुष राज्य की इच्छा नहीं करते । प्रजा का पालन करना और धर्मयुद्ध से अपने राज्य के शत्रुओं का
वध करना क्षत्रियों का धर्म है । मैं इस कर्तव्य के पालन में असमर्थ हो गया था, इसलिए यदि आपने मेरे राज्य
का अपहरण कर लिया है तो इसमें कोई दोष की बात नहीं है ॥७८-८०॥ यह राजकार्य अविद्या है, जो केवल
बन्धन में ही डालने वाली है । मेरी राज्याकांक्षा केवल जन्म के उपभोग की लिप्सा होगी, कल्याण का कारण
नहीं ॥८१॥ दूसरों का दोष-दर्शन धर्म में बाधा पहुँचाता है। माँगना क्षत्रियों का नहीं, प्रत्युत क्षत्रबन्धुओं
(धर्मभ्रष्ट क्षत्रियों) का कार्य है, ऐसा सज्जन लोग कहते हैं ॥८२॥ यही कारण है कि अविद्या की श्रेणी में आने
वाले तुम्हारे राज्य की याचना मैंने नहीं की। वे अज्ञानी व्यक्ति राज्य का लोभ करते हैं जिनका चित्त मोह के
वशीभूत हो जाता है और जो अहंकार और मान के नशे में मतवाले होते हैं; मेरे जैसे राज्य का लोभ नहीं
करते हैं ॥८३३॥
केशिध्वज ने कहा--मैं विद्या के द्वारा मृत्यु से पिण्ड छुड़ाने के लिए राज्य और विविध कर्म करता हूँ ।
यज्ञों को करता हूँ । भोग करने से सब पुण्यों का क्षय हो जाता है । तुम्हारा मन निष्कलुष होकर परमविवेकी
बन गया है । कुलन्दन ! अविद्या की परिभाषा सुनो ॥८४-८५३॥ अविद्या रूपी वृक्ष की उत्पत्ति का जो बीज है, यह
दो प्रकार का है--अनात्मा में आत्मबुद्धि और जो अपना नहीं है उसे अपना मानना (अर्थात् अहंता और ममता) ।
इस पाँच भौतिक शरीर में आत्मा मोह के अन्धकार से ढका रहता है। मूर्ख अज्ञानवश 'मैं यह हूँ' ऐसी उच्च
३१० नारदीयपुराणम्
अहमेतदितीत्युच्चैः कुरुते कुमतिर्मतिम् । आकाशवाय्वग्निजल्पृथिवीभिः पृथक् स्थिते ॥८६॥
आत्मन्यात्ममयं भावं कः करोति कलेवरे । कलेवरोपभोग्यं हि गृहक्षेत्रादिकं च यत् ॥८७॥
अदेहे ह्यात्मनि प्राज्ञो ममेदमिति मन्यते । इत्थं च पुत्रपौत्रेषु तद्देहोत्पादितेषु च ॥८८॥
करोति पंडितः स्वाम्यमनात्मनि कलेवरे । सर्वदेहोपभोगाय कुरुते कर्म मानवः ॥८९॥
देहं चान्यत्तदा पुंसस्सदा बंधाय तत्परम् । मृण्मयं हि यथा गेहं लिप्यते वै मृदंभसा ॥९०॥
पार्थिवोऽयं तथा देहो मृदंभोलेपनस्थितिः । पंचभोगात्मकैर्भोगैः पंचभोगात्मकं वपुः ॥९१॥
आप्यायते यदि ततः पुंसो गर्वोऽत्र किंकृतः । अनेकजन्मसाहस्रं संसारपदवीं व्रजन् ॥९२॥
मोहश्रमं प्रयातोऽसौ वासनारेणुगुंठितः । प्रक्षाल्यते यदा सौम्य रेणुर्ज्ञानोष्णवारिणा ॥९३॥
तदा संसारपांथस्य याति मोहश्रमः शमम् । मोहश्रमे शमं याते स्वच्छान्तःकरणः पुमान् ॥९४॥
अनन्यातिशयाधारः परं निर्वाणमृच्छति । निर्वाणमय एवायमात्मा ज्ञानमयोऽमलः ॥९५॥
दुःखाज्ञानमया धर्माः प्रकृतेस्ते तु नात्मनः । जलस्य नाग्निना संगः स्थालीसंगात्तथापि हि ॥९६॥
शब्दोद्रेकादिकान्धर्म्मान्करोति हि यथा बुधः । तथात्मा प्रकृतेः संगादहंमानादिदूषितः ॥९७॥
भजते प्राकृतान्धर्मान्न्यस्तस्तंभो हि सोऽव्ययः । तदेतत्कथितं बीजमविद्याया मया तव ॥१००॥
क्लेशानां च क्षयकरं योगादन्यन्न विद्यते ॥१०१॥
इति श्रीबृहन्नारदीयपुराणे पूर्वभागे बृहदुपाख्याने द्वितीयपादे षट्चत्वारिंशत्तशोऽध्यायः ॥४६॥
स्वर से घोषणा करते हैं ॥८६-८७॥ परन्तु आकाश, वायु, अग्नि, जल, पृथ्वी तत्त्व के पृथक् हो जाने पर 'अहम्'
कहाँ रह जाता है ? कौन विवेकी अपने शरीर को आत्मा समझने की मूर्खता करेगा ? ॥८८॥ सारा गृह, क्षेत्र
आदि केवल शरीर के उपभोग के लिए हैं । प्रज्ञावान् शरीर से पृथक् आत्मा को ही अपना समझता है ॥८९१/२॥
इस प्रकार अपने शरीर से उत्पन्न किए हुए पुत्र, पौत्र आदि में अधिक ममता नहीं रखनी चाहिए । पण्डित
आत्मा से अतिरिक्त शरीर पर अपना अधिकार रखते हैं ॥९०१/२॥ मानव देह के उपभोग के लिए ही सब कर्म
करते हैं । आत्मा से अतिरिक्त जो देह है उसमें ही लिप्त रहकर मानव सदा अपने को मोह बन्धन में ही बाँधने
का प्रयत्न करता है ॥६१॥ जिस प्रकार मिट्टी से बने घर को मिट्टी और जल से लीपते हैं उसी प्रकार मनुष्य
का मोह में पड़ा रहना इस पार्थिव शरीर को मिट्टी और जल से लीपने के समान है ॥९२१/२॥ इस पाँच भौतिक
शरीर को पंच भोगात्मक भोग में ही लिप्त रखा जाय तो उस समय कौन सा अभिमान करने के योग्य कार्य
हुआ ॥९३१/२॥ सौम्य ! अनेक सहस्र जन्म के पश्चात् संसार में आकर मनुष्य मोह में फँसकर वासना की धूलि
में लिपट जाता है ॥६४१/२॥ इसलिए जब ज्ञान के उष्ण जल से उसको धोया जायगा तभी संसार-पथ पर चलने
वाले पथिकों का मोह दूर हो सकेगा ॥६५१/२॥ मोह के दूर हो जाने पर मनुष्य का अन्तःकरण स्वच्छ हो जाता
है, तभी वह एकमात्र ईश्वर का सहारा प्राप्त कर निर्वाण को प्राप्त करता है ॥९६१/२॥ आत्मा निर्वाणमय, ज्ञानमय
और निर्मल है । दुःख और अज्ञान प्रकृति के धर्म हैं, आत्मा के नहीं ॥६७१/२॥ जल का अग्नि के साथ कोई साहचर्य
नहीं परन्तु स्थाली के साथ है ॥६८॥ जिस प्रकार बुध जन शब्द आदि गुणों को ग्रहण करता है उसी प्रकार आत्मा
भी प्रकृति के संसर्ग से अहंकार आदि से दूषित हो जाता है ॥६६॥ और वह अव्यय प्राकृत धर्मों का अपना
स्वभाव छोड़कर उपभोग करता है । इस प्रकार आज मैंने अविद्या का रहस्य तुमको बता दिया । योग को छोड़कर
कोई अन्य उपाय क्लेशों को दूर करने वाला नहीं है ॥१००-१०१॥
श्रीनारदीयमहापुराण छियालीसवां अध्याय समाप्त ॥४६॥
अथ सप्तचत्वारिंशोऽध्यायः
सनन्दन उवाच
एतदध्यात्ममालाढ्यं वचः केशिध्वजस्य सः । खांडिक्योऽमृतवच्छ्रुत्वा पुनराह तमीरयन् ॥१॥
खांडिक्य उवाच
तद् ब्रूहि त्वं महाभाग योगं योगविदुत्तम । विज्ञातयोगशास्त्रार्थस्त्वमस्यां निमिसंततौ ॥२॥
केशिध्वज उवाच
योगस्वरूपं खांडिक्य श्रूयतां गदतो मम । यत्र स्थितो न च्यवते प्राप्य ब्रह्मलयं मुनिः ॥३॥
मन एव मनुष्याणां कारणं बंधमोक्षयोः । बंधस्य विषयासंगि मुक्तैर्निर्विषयं तथा ॥४॥
विषयेभ्यः समाहृत्य विज्ञानात्मा बुधो मनः । चिंतयेन्मुक्तये तेन ब्रह्मभूतं परेश्वरम् ॥५॥
आत्मभावं नयेत्तेन तद्ब्रह्माप्यापनं मनः । विकार्यमात्मनः शक्त्या लोहमाकर्षको यथा ॥६॥
आत्मप्रयत्नसापेक्षा विशिष्टा या मनोगतिः । तस्या ब्रह्मणि संयोगो योग इत्यभिधीयते ॥७॥
एवमत्यंतवैशिष्ट्ययुक्तधर्मोपलक्षणम् । यस्य योगः स वै योगी मुमुक्षुरभिधीयते ॥८॥
योगयुक् प्रथमं योगी युंजमानोऽभिधीयते । विनिष्पन्नसमाधिस्तु परब्रह्मोपलब्धिमान् ॥६॥
अध्याय ४७
मुक्तिप्रद योग का वर्णन
सनन्दन बोले—केशिध्वज की उपर्युक्त अध्यात्म ज्ञान से पूर्ण सुधामयी वाणी को सुनकर पुनः उत्सुक
हो खाण्डिक्य ने उससे पूछा ॥१॥
खाण्डिक्य ने कहा—महाभाग ! तुम इस योग को कहो । तुम योगियों में श्रेष्ठ हो । तुम्हीं निमिवंश
में एकमात्र योगशास्त्र के रहस्य को जानने वाले हो ॥२॥
केशिध्वज ने कहा—खाण्डिक्य ! मैं योग-स्वरूप का वर्णन कर रहा हूँ, सुनो । योगस्थ होने पर मुनि
ब्रह्म का सान्निध्य प्राप्त कर लेता और पुनः कभी च्युत नहीं होता ॥३॥ मनुष्यों का मन ही बन्धन और मोक्ष का
कारण है । विषयों में आसक्त मन बन्धन का और निर्विषय मन मुक्ति का कारण है ॥४॥ विज्ञानी व्यक्ति मन को
विषयों की ओर से हटाकर उससे ब्रह्मस्वरूप परमात्मा का मुक्ति प्राप्ति के लिए चिन्तन करे ॥५॥ जिस प्रकार
चुम्बक लोहे को अपनी ओर खींच लेता है उसी प्रकार आत्मशक्ति के द्वारा विकारशील मन को विषयों की ओर
से हटावे और ब्रह्मचिन्तन के सहारे उसको आत्म-भाव की ओर ले जाय ॥६॥ आत्म-प्रयत्न से मन की जो विशेष
गति (स्पन्दन) होती है उस गति का ब्रह्म में युक्त होना ही योग कहा जाता है ॥७॥ इस प्रकार जिसका योग
अत्यन्त वैशिष्ट्य युक्त धर्म से उपलक्षित होता है वही योगी मुमुक्षु कहा जाता है ॥८॥ पहले पहल योग की
साधना करने वाला योगी युञ्जान कहा जाता है । समाधि को प्राप्त करने वाला परब्रह्म को पाने वाला समझा
३१२ नारदीयपुराणम्
यद्यन्तरायदोषेण दूष्यते नास्य मानसम् । जन्मान्तरैरभ्यसनान्मुक्तिः पूर्वस्य जायते ॥१०॥
विनिष्पन्नसमाधिस्तु मुक्तिस्तत्रैव जन्मनि । प्राप्नोति योगी योगाग्निदग्धकर्मचयोऽचिरात् ॥११॥
ब्रह्मचर्यमहिंसां च सत्यास्तेयापरिग्रहान् । सेवेत योगी निष्कामो योगितां स्वमनो नयन् ॥१२॥
स्वाध्यायशौचसंतोषतपांसि नियमान्यमान् । कुर्वीत ब्रह्मणि तथा परस्मिन्प्रवणं मनः ॥१३॥
एते यमाश्च नियमाः पंच पञ्चप्रकीर्तिताः । विशिष्टफलदाः काम्या निष्कामानां विमुक्तिदाः ॥१४॥
एवं भद्रासनादीनां समास्थाय गुणैर्युतः । यमाख्यैर्नियमाख्यैश्च युंजीत नियतो यतिः ॥१५॥
प्राणाख्यमवलं वस्थमभ्यासात्कुरुते तु यत् । प्राणायामः स विज्ञेयः सबीजोऽबीज एव च ॥१६॥
परस्परेणाभिभवं प्राणापानौ यदा निलौ । कुरुतः सद्भिधानेन तृतीयः संधमात्तयोः ॥१७॥
तस्य चालंबनवत्स्थूलं रूपं द्विषत्पते । आलंबनमनंतस्य योगिनोऽभ्यसतः स्मृतम् ॥१८॥
शब्दादिष्वनुरक्तानि निगृह्याक्षाणि योगवित् । कुर्याच्चित्तानुकारीणि प्रत्याहारपरायणः ॥१९॥
वश्यता परमा तेन जायते निश्चलात्मनाम् । इंद्रियाणामवश्यैस्तैर्न योगी योगसाधकः ॥२०॥
प्राणायामेन पवनैः प्रत्याहरेण चेंद्रियैः । वशीकृतैस्ततः कुर्यात्स्थिरं चेतः शुभाश्रये ॥२१॥
खांडिक्य उवाच
कथ्यतां मे महाभाग चेतसो यः शुभाश्रयः । यदाधारमशेषं तु हंति दोषसमुद्भवम् ॥२२॥
जाता है ॥६॥ यदि विघ्नबाधाओं या दोषों से योगी का मन दूषित नहीं होता है तो उसको दूसरे जन्म के पुण्य
प्रभाव से प्रथम अवस्था में ही मुक्ति मिल जाती है ॥१०॥ जिसको समाधि-अवस्था प्राप्त हो जाती है वह योगी
योगाग्नि से सब कर्मों के भस्म हो जाने से शीघ्र उसी जन्म में मुक्ति पा जाता है ॥११॥ योगी निष्काम होकर ब्रह्मचर्य,
अहिंसा, सत्य, अस्तेय और अपरिग्रह का सेवन करता हुआ योगिधर्म की ओर अपने मन को लगावे ॥१२॥
स्वाध्याय, शौच, संतोष, तप, सुनियम और यम का अभ्यास करे और परब्रह्म में अपने मन को लगावे ॥१३॥
ये यम और नियम पाँच-पाँच हैं, जो निष्काम योगियों को काम्य फल एवं मुक्ति देने वाला है ॥१४॥ इसी प्रकार
भद्रासन आदि आसनों को लगाकर शुभ गुणों से युक्त होकर योगी यम, नियम आदि से नियमपूर्वक योग साधना
करे ॥१५॥ अभ्यास द्वारा प्राण वायु को स्थिर करने को ही प्राणायाम कहा जाता है। प्राणायाम दो प्रकार का
होता है--सबौज (आलम्बनयुक्त) और निर्बीज (आलम्बन रहित)। जब योगी के प्राण और अपान वायु एक-दूसरे का
पराभव करते (दबाते हैं,) तब क्रमशः रेचक और पूरक नामक दो प्राणायाम होते हैं। और इन दोनों का एक ही
समय संयम (निरोध) करने से कुम्भक नामक तीसरा प्राणायाम होता है ॥१७॥ राजन् ! जब योगी सबीज
प्राणायाम का अभ्यास करता है तब उसका आलम्बन सर्वव्यापी अनन्त स्वरूप भगवान् विष्णु का साकार रूप
होता है ॥१८॥ प्रत्याहार की साधना करने वाला योगी शब्दादि विषयों में आसक्त इन्द्रियों को खींचकर मन के
वश में करे ॥१९॥ इस प्रकार निश्चल चित्तवाले योगियों की बुद्धि स्थिर हो जाती है। योग-साधक योगी इन्द्रियों
को बिना वश में किये योग-साधन नहीं कर सकता ॥२०॥ प्राणायाम के द्वारा प्राणवायु को और प्रत्याहार के
द्वारा इन्द्रियों को वश में करने के वाद योगी चित्त की शुभ आश्रय में स्थिर करे ॥२१॥
खाण्डिक्य ने कहा--महाभाग ! चित्त का जो शुभाश्रय है उसको कहिए, जिसका अवलम्बन सम्पूर्ण दोष
जन्य विकारों को नष्ट कर देता है ॥२२॥
Here is the complete Devanagari text transcribed line by line from the image:
सप्तचत्वारिंशोऽध्यायः ३१३
केशिध्वज उवाच
आश्रयश्चेतसो ज्ञानिन् द्विधा तच्च स्वरूपतः । रूपं मूर्तममूर्तं च परं चापरमेव च ॥२३॥
त्रिविधा भावना रूपं विश्वमेतत्रिधोच्यते । ब्रह्माख्या कर्मसंज्ञा च तथा चैवोभयात्मिका ॥२४॥
कर्मभावात्मिका ह्येका ब्रह्मभावात्मिकापरा । उभयात्मिका तथैवान्या त्रिविधा भावभावना ॥२५॥
सनकाद्या सदा ज्ञानिन् ब्रह्मभावनया युताः । कर्मभावनया चान्ये देवादद्याः स्थावराश्चराः ॥२६॥
हिरण्यगर्भादिषु च ब्रह्मकर्मात्मिका द्विधा । अधिकारबोधयुक्तेषु विद्यते भावभावना ॥२७॥
अक्षीणेपु समस्तेषु विशेषज्ञानकर्मसु । विश्वमेतत्परं चान्यद्भेदभिन्नदृशां नृपः ॥२८॥
प्रत्यस्तमितभेदं यत्सत्तामात्रमगोचरम् । वचसामात्मसंवेद्यं तज्ज्ञानं ब्रह्मसंज्ञितम् ॥२९॥
तच्च विष्णोः परं रूपमरूपस्याजनस्थ च। विश्वस्वरूपवैरूप्यलक्षणं परमात्मनः ॥३०॥
न तद्योगयुजा शक्यं नृप चिन्तयितुं यतः । ततः स्थूलं हरे रूपं चिंत्यं यच्चक्षुगोचरम् ॥३१॥
हिरण्यगर्भो भगवान्वासवोऽथ प्रजापतिः । मरुतो वसवो रुद्रा भास्करास्तारका ग्रहाः ॥३२॥
गन्धर्वा यक्षदैत्याश्च सकला देवयोनयः । मनुष्याः पशवः शैला समुद्राः सरितो द्रुमाः ॥३३॥
भूप भूतान्यशेषाणि भूतानां ये च हेतवः । प्रधानादिविशेषान्ताश्चेतनाचेतनात्मकम् ॥३४॥
एकपादं द्विपादं च बहुपादमपादकम् । मूर्तमेतद्धरे रूपं भावनात्रितयात्मकम् ॥३५॥
एतत्सर्वमिदं विश्वं जगदेतच्चराचरम् । परब्रह्मस्वरूपस्य विष्णोः शक्तिसमन्वितम् ॥३६॥
विष्णुशक्तिः परा प्रोक्ता क्षेत्रज्ञाख्या तथापरा । अविद्याकर्मसंज्ञान्या तृतीया शक्तिरिष्यते ॥३७॥
येयं क्षेत्रज्ञशक्तिः सा चेष्टिता नृप कर्मजा । असारभूते संसारे प्रोक्ता तत्र महामते ॥३८॥
केशिध्वज बोला--ज्ञानिन् ! चित्त के आश्रय (ब्रह्म) के दो स्वरूप हैं--मूर्त और अमूर्त अथवा पर और
अपर ॥२३॥ सम्पूर्ण रूप की त्रिविध भावना होती है--ब्रह्म, कर्म और उभयात्मक । एक भावना कर्म-भावात्मिका,
दूसरी ब्रह्म-भावात्मिका और तीसरी कर्म-ब्रह्मोभयात्मिका है । यही त्रिविध भाव भावना है ॥२४-२५॥ ज्ञानी !
सनक आदि सर्वदा ब्रह्म-भावना में ही तल्लीन रहते हैं । अन्य देव आदि और स्थावर, चर कर्म-भावना के ही
पुजारी हैं ॥२६॥ अधिकार और ज्ञान-सम्पन्न हिरण्यगर्भ आदि में ब्रह्मकर्माभयात्मिका भावना रहती है। अधिकार
और ज्ञान से युक्त प्राणियों में केवल भावात्मक-भावना रहती है। नृप ! समस्त विशेष ज्ञान और कर्म के
विद्यमान रहने पर भेद-भाव और भिन्न रूपों में ही यह विश्व दृष्टिगोचर होता है ॥२७-२८॥ जहाँ समस्त भेद-
भाव नष्ट हो जाते हैं, जो केवल सत् है और वाणी का अविषय है तथा जो स्वयं ही अनुभव-स्वरूप है, उसी को
ब्रह्मज्ञान कहते हैं ॥२९॥ वही अज, अरूप, परमात्मा विष्णु का परम स्वरूप है जो उनके विश्वरूप से विलक्षण
होता है ॥३०॥ नृप ! चूंकि उस रूप का योगी चिन्तन नहीं कर सकते इसलिए उसका जो नेत्रगोचर रूप है,
उसी का चिन्तन करना चाहिए ॥३१॥ हिरण्यगर्भ भगवान्, इन्द्र, प्रजापति, मरुत्, वसु, रुद्र, भास्कर, तारक,
ग्रह, गन्धर्व, यक्ष, दैत्य, सब देव योनि, मनुष्य, पशु, पर्वत, समुद्र, नदियां, वृक्ष और सब प्राणी, (प्रकृति) प्रधान
से लेकर विशेष तक सम्पूर्ण भूतों के कारण, चेतन-अचेतन, एक पैर दो पैर वाले, बहुत पैर वाले अथवा बिना पैर
के जितने जीव हैं ये तीनों भावनाओं से मिले हुए भगवान् के मूर्त रूप हैं ॥३२-३५॥ यह जो चराचरात्मक सम्पूर्ण
जगत् है सो परब्रह्म विष्णु की शक्ति से युक्त है ॥३६॥ विष्णु की शक्ति परा कहलाती है, क्षेत्रज्ञा अपरा नाम
की दूसरी शक्ति है और तीसरी अविद्या कर्म शक्ति है ॥३७॥ नृप ! जो यह क्षेत्रज्ञा शक्ति है, महामते, वह इस
असार संसार में कर्मशक्ति से आवृत रहती है। मनुष्य शक्ति के द्वारा संसार के सब तापों का अनुभव करता
४० ना० पु०
३१४ नारदीयपुराणम्
संसारतापानखिलानवाप्नोत्यनुसंजितान् । तया तिरोहितत्वात्तु शक्तिः क्षेत्रज्ञसंज्ञिता ॥३९॥
सर्वभूतेषु भूपाल तारतम्येन लक्ष्यते । अप्राणवत्सु खल्वल्पा स्थावरेषु ततोऽधिका ॥४०॥
सरीसृपेषु तेभ्योऽप्याप्यतिशक्त्या पतत्त्रिषु । पतत्त्रिभ्यो मृगास्तेभ्यः स्वशक्त्या पशवोऽधिकाः ॥४१॥
पशुभ्यो मनुजाश्चातिशक्त्या पुंसः प्रभाविताः । तेभ्योऽपि नागगन्धर्वयक्षाद्या देवता नृप ॥४२॥
शक्रः समस्तदेवेभ्यस्ततश्चातिप्रजापतिः । हिरण्यगर्भोऽपि ततः पुंसः शक्त्युपलक्षितः ॥४३॥
एतान्यशेषरूपाणि तस्य रूपाणि पार्थिव । यतस्तच्छक्तियोगेन युक्तानि नभसा यथा ॥४४॥
द्वितीयं विष्णुसंज्ञस्य योगिध्येयं महामते । अमूर्तं ब्रह्मणो रूपं यत्सन्नित्युच्यते बुधैः ॥४५॥
समस्ताः शक्तयश्चैता नृप यत्र प्रतिष्ठिताः । नहि स्वरूपरूपं वै रूपमन्यद्धरेर्महत् ॥४६॥
समस्तशक्तिरूपाणि तत्करोति जनेश्वर । देवतिर्यङ्मनुष्यादिचेष्टावंति स्वलीलया ॥४७॥
जगतामुपकाराय तस्य कर्मनिमित्तजा । चेष्टा तस्याप्रमेयस्य व्यापिन्यविहतात्मिका ॥४८॥
तद्रूपं विश्वरूपस्य चिंत्यं योगयुजा नृप । तस्य ह्यात्मविशुद्धयर्थं सर्वकिल्बिषनाशनम् ॥४९॥
यथाग्निरुद्धतशिखः कक्षं दहति सानिलः । तथा चित्तस्थितो विष्णुर्योगिनां सर्वकिल्बिषम् ॥५०॥
तस्मात्समस्तशक्तीनामाद्यांते तत्र चेतः । कुर्वीत संस्थितं साधु विज्ञेया शुद्धलक्षणा ॥५१॥
शुभाश्रयः सचित्तस्य सर्वगस्य तथात्मनः । त्रिभावभावनातीतो मुक्तये योगिनां नृप ॥५२॥
अन्ये तु पुरुषव्याघ्र चेतसो ये व्यपाश्रयाः । अशुद्धास्ते समस्तास्तु देवाद्याः कर्मयोनयः ॥५३॥
है। भूपाल ! उस अविद्या शक्ति से तिरोहित होने के कारण यह शक्ति सब प्राणियों में तारतम्य से देखी जाती
है ॥३८-३९३॥ प्राणशून्य पदार्थों में यह अत्यन्त स्वल्प रहती, परन्तु स्थावरों में उससे कुछ अधिक रहती है ॥४०॥
रेंगकर चलने वाले जीवों में कुछ और अधिक और उनसे अधिक पक्षियों में रहती है । पक्षियों की अपेक्षा मृगों
में वह शक्ति अधिक मात्रा में पाई जाती है । मृगों की अपेक्षा पशुओं में अधिक और पशुओं से अधिक मनुष्यों में
वह शक्ति देखी जाती है । नृप ! मनुष्यों से भी अधिक नाग, गन्धर्व, यक्ष, देवता आदि में उस शक्ति की अधिकता
है ॥४१-४२॥ सब देवों से अधिक इन्द्र में उस शक्ति को देखते हैं । शक्र से अधिक प्रजापति शक्तिशाली और
प्रजापति की अपेक्षा हिरण्यगर्भ पुरुष में वह शक्ति अधिक पाई जाती है ॥४३॥
पार्थिव ! उस पुरुष शक्ति के ये ही सम्पूर्ण रूप हैं । जिस प्रकार आकाश से सारे पदार्थ ढके हुए हैं, उसी
प्रकार सारे पदार्थ उससे युक्त हैं ॥४४॥ महामति ! दूसरा योगिध्येय परब्रह्म विष्णु का अमूर्त रूप है, जिसको
बुधजन सत् कहते हैं ॥४५॥ जिसमें ये समस्त शक्तियां एकत्र हैं वह भगवान् हरि का दूसरा स्वरूप रूप या महत्
रूप नहीं है ॥४६॥ जनेश्वर ! सब शक्तियों को वही सत् रूप संचालित या प्रकट करता है । वही देव, तिर्यक् और
मनुष्यों को अपनी लीला से क्रियाशील बनाता है ॥४७॥ संसार के कल्याण के लिए उस अप्रमेय सत् की कर्म-
निमित्तजा शक्ति सर्वत्र व्यापक और गतिशील रहती है ॥४८॥ नृप ! योगी जन आत्म-शुद्धि और सब पापों
को नष्ट करने के लिए उस विश्व के इस रूप का ही चिन्तन करें ॥४९॥ जिस प्रकार अग्नि की चंचल लपटें
वायु के सहयोग से अत्यन्त तीव्र होकर समीप के कक्ष को जला देती हैं उसी प्रकार योगी के हृदय में स्थित विष्णु
उसके सब कलुष को भस्म कर देते हैं ॥५०॥ अतएव साधु अपने चित्त को समस्त शक्तियों के आधारभूत उस
भगवान् में लगा दे, यही शुद्ध लक्षणा (भावना) है ॥५१॥ नृप ! आत्मा, चंचल चित्त का त्रिभाव भावना से रहित
जो शुभाश्रय है वही योगी की मुक्ति का कारण बनता है ॥५२॥ पुरुषव्याघ्र ! चित्त के अन्य जो आश्रय (आधार)
हैं वे अशुद्ध हैं और वे हैं देवता आदि जो कर्मयोनि हैं ॥५३॥ भगवान् के मूर्त रूप का सब आश्रयों की ओर से
मूर्त्तं भगवतो रूपं सर्वापाश्रयनिस्पृहः । एषा वै धारणा ज्ञेया यच्चित्तं तत्र धार्यते ॥५४॥
तत्र मूर्त्तं हरे रूपं यादृक् चिंत्यं नराधिप । तच्छ्रूय तामनाधारे धारणा नोपपद्यते ॥५५॥
प्रसन्नचारुवदनं पद्मपत्रायतेक्षणम् । सुकपोलं सुविस्तीर्णं ललाटफलकोज्ज्वलम् ॥५६॥
समकर्णां सविन्यस्तचारुकर्णोपभूषणम् । कम्बुग्रीवं सुविस्तीर्णश्रीवत्सांकितवक्षसम् ॥५७॥
वलित्रिभङ्गिना भुग्ननाभिना चोदरेण वै । प्रलंबाष्टभुजं विष्णुमथवापि चतुर्भुजम् ॥५८॥
समस्थितोरुजघनं सुस्थिरांत्रिकरंबुजम् । चिंतयेद्ब्रह्मभूतं तं पीतनिर्मलवाससम् ॥५९॥
किरीटचारुकेयूरकटकादिविभूषितम् । शार्ङ्गशंखगदाखड्गप्रकाशवलयांचितम् ॥६०॥
चिंतयेत्तन्मयो योगी समाधायात्ममानसम् । तावद्यावद् दृढीभूता तत्रैव नृपधारणा ॥६१॥
वदतस्तिष्ठतो यद्वा स्वेच्छया कर्म कुर्वतः । नापयाति यदा चित्तात्सिद्धां मन्येत तां तदा ॥६२॥
ततः शंखगदाचक्रशार्ङ्गादि रहितं बुधः । चिंतयेद्भगवद्रूपं प्रशांतं साक्षसूत्रकम् ॥६३॥
सा यदा धारणा तद्वदवस्थानवती ततः । किरीटकेयूरमुखैर्भूषणैरहितं स्मरेत् ॥६४॥
तदेकावयवं चैवं चेतसा हि पुनर्बुधः । कुर्यात्ततोऽवयविनि प्रणिधानपरो भवेत् ॥६५॥
तद्रूपप्रत्यये चैकसंमतिश्चान्यनिःस्पृहा । तद्ध्यानं प्रथमैरंगैः षड्भिर्निष्पाद्यते नृप ॥६६॥
तस्यैव कल्पनाहीनं स्वरूपग्रहणं हि यत् । मनसा ध्याननिष्पाद्यं समाधिः सोऽभिधीयते ॥६७॥
विज्ञानं प्रापकं प्राप्ये परे ब्रह्मणि पार्थिव । प्रोपणीयस्तथैवात्मा प्रक्षीणाशेषभावनः ॥६८॥
निस्पृह होकर ध्यान करना चाहिए । यही धारणा कही जाती है, जहां चित्त को एकाग्र किया जाता है अथवा
जहाँ चित्त को एक आधार प्राप्त होता है ॥५४॥ नराधिप ! भगवान् के मूर्त्त रूपों में भी जिस रूप का चिन्तन
करना चाहिए उसको भी सुनो; क्योंकि अनाधार में ध्यान-धारणा नहीं हो सकती ॥५५॥ प्रसन्न, शुभ मुख और
कमल पत्र के समान बड़ी आँखों वाले, सुन्दर कपोल, देदीप्यमान विशाल ललाट से सुशोभित, मनोहर कर्णाभरण
से आभूषित कर्ण वाले, कम्बुग्रीव, चौड़े, श्रीवत्स से चिह्नित वक्षःस्थल और त्रिवली से मुक्त, वृत्ताकार गहरी
नाभि और चढ़ाव-उतार वाले उदर से युक्त और प्रलम्बबाहु-चतुर्भुज विष्णु का अथवा ऊरु और जंघे को स्थिरता
के साथ आसनबद्ध करके घुटने पर अपने कर कमल को रखे हुए, पीले, निर्मल वस्त्र से सुशोभित योगि-रूप में
स्थित, किरीट, केयूर और वलय से सुशोभित, शार्ङ्ग, शंख, गदा और प्रभा-वलय से मंडित ब्रह्म का तन्मय होकर
योगी अपने मन को वश में करके चिन्तन करे ॥५६-६०$\frac{१}{२}$॥ इस क्रम को तब तक जारी रखे जब तक कि उसमें
दृढ़ धारणा न हो जाय ॥६१॥ ठहरने, बोलने अथवा स्वेच्छापूर्वक काम करने के समय भी यदि मन से वह रूप
लुप्त न हो तो धारणा को सिद्ध समझना चाहिए ॥६२॥ इस अवस्था को प्राप्त कर लेने के उपरान्त धीमान्
योगी शंख, चक्र, गदा और शार्ङ्ग से रहित केवल अक्ष सूत्र से युक्त भगवान् के रूप का ध्यान करे ॥६३॥ ऐसी
धारणा भी जब पूर्ववत् स्थिर हो जाय तब किरीट, केयूर आदि आभरणों से शून्य रूप का ध्यान करे ॥६४॥
जब इस प्रकार की धारणा स्थिर हो जाय तब वह ज्ञानी योगी उनके किसी एक अवयव का ही ध्यान करे । फिर
वह उपासनापरायण होकर अवयवी का ध्यान करे ॥६५॥ उनके रूप का एकान्त ध्यान करने पर और उस पर
दृढ़ विश्वास हो जाने पर अन्य विषयों की ओर स्पृहा नहीं रह जाती । नृप ! सज्जन इस प्रकार ध्यान यम-
नियमादि छह अंगों से निष्पन्न होता है । उसी प्रभु के जब अवयव की कल्पना से रहित रूप का मन के द्वारा ध्यान
किया जाता है तब उस ध्यान को समाधि कहा जाता है ॥६६-६७॥ विज्ञान उस प्राप्त करने योग्य पर ब्रह्म को
प्राप्त कराने वाला है, तथा अशेष भावनाओं से रहित आत्मा प्राप्त करने वाला है । क्षेत्रज्ञ कर्ता है और ज्ञान
३१६ नारदीयपुराणम्
अत्रज्ञकरणीज्ञानं करणं तेन तस्य तत् । निष्पाद्य मुक्तिकार्यं वै कृतकृत्यो निवर्तते ॥६६॥
तद्भावभावनापन्नस्ततोऽसौ परमात्मनः । भवत्यभेदी भेदश्च तस्याज्ञानकृतो भवेत् ॥७०॥
विभेदजनके ज्ञाने नाशमात्यन्तिकं गते । आत्मनो ब्रह्मणोभेदं संमलं कः करिष्यति ॥७१॥
इत्युक्तस्ते मया योगः खांडिक्यं परिपृच्छतः । संक्षेपविस्तराभ्यां तु किमद्यक्रियतां तव ॥७२॥
खांडिक्य उवाच
कथितो योगसद्भावः सर्वमेव कृतं मम । तवोपदेशात्सकलो नष्टश्चित्तमलो मम ॥७३॥
ममेति यन्मया प्रोक्तमसदेतन्न चान्यथा । नरेंद्र गदितुं शक्यमपि विज्ञेयवेदिभिः ॥७४॥
अहं ममेत्यविद्येयं व्यवहारस्थानयोः । परमार्थस्त्वसंलाध्यो वचसां गोचरो न यः ॥७५॥
तद्गच्छ श्रेयसे सर्वं ममैतद्भवता कृतम् । यद्विमुक्तिपरो योगः प्रोक्तः केशिध्वजान्ययः ॥७६॥
सनन्दन उवाच
यथार्हपूजया तेन खांडिक्येन स पूजितः । आजगाम पुरं ब्रह्मंस्ततः केशिध्वजो नृप ॥७७॥
खांडिक्योऽपि सुतं कृत्वा राजानं योगसिद्धये । विशालागमत्कृष्णे समावेशितमानसः ॥७८॥
स तत्रैकांतिको भूत्वा यमादिगुणसंयुतः । विष्ण्वाख्ये निर्मले ब्रह्मण्यवाप नृपतिर्लयम् ॥७९॥
केशिध्वजोऽपि मुक्त्यर्थं स्वकर्मक्षपणोन्मुखः । बुभुजे विषयान्कर्म चक्र चानभिसंधितम् ॥८०॥
स कल्याणोपभोगैश्च क्षीणपापोऽमलस्ततः । अवाप सिद्धिमत्यंतंत्रितापक्षवणीं मुने ॥८१॥
करण है; अतः उस ज्ञान रूपी करण के द्वारा वह योगी मुक्ति रूप कार्य सिद्ध करके कृतकृत्य होकर सर्वश्रेष्ठ
हो जाता है ॥६८-६९॥ भगवान् के रूप ध्यान में तन्मय होकर वह उससे अभिन्न (तद्रूप) हो जाता है ! उससे
अपने को भिन्न समझना तो अज्ञान है ॥७०॥ विभेदमूलक ज्ञान के आत्यन्तिक नाश हो जाने पर आत्मा और
ब्रह्म का भेद रह ही नहीं जाता है, इसका समर्थन कौन कर सकता है ॥७१॥ खाण्डिक्य ! तुम्हारे प्रश्न के
अनुसार मैंने इस प्रकार कहीं पर तो संक्षेप में और कहीं विस्तार के साथ योग का वर्णन कर दिया । अब तुम्हारा
कौन सा प्रिय कार्य है, जिसको करूँ ॥७२॥
खाण्डिक्य ने कहा-तुमने मेरे ऊपर अनुग्रह करके सम्पूर्ण योग का वर्णन कर दिया और तुम्हारे उप-
देश से मेरे मन का सब मल नष्ट हो गया ॥७३॥ मैंने जो 'यह मेरा है' ऐसा समझ रखा था, वह असद्ज्ञान था,
इसमें सन्देह का कुछ भी अवसर नहीं । ज्ञेय तत्त्व को जानने वाले व्यक्ति ही इस विषय को कह सकते हैं ॥७४॥
मैं और मेरा का व्यवहार अविद्या (अज्ञान) है । इसका परमार्थ तत्त्व अनिर्वचनीय और वाणी से परे है।
केशिध्वज जी, अब तुम जा सकते हो, जो कुछ तुमने उपदेश दिया और जो कुछ मुक्ति-विषयक योग को बतलाया
वह मेरे कल्याण के लिए पर्याप्त है ॥७५-७६॥
सनन्दन बोले-ब्रह्मन् ! खांडिक्य से केशिध्वज यथायोग्य पूजा पाकर अपनी राजधानी में चला आया
॥७७॥ खांडिक्य भी अपने पुत्र को राज्य देकर अपने मन में कृष्ण का ध्यान करता हुआ विशाला नगरी में आया
॥७८॥ वहां वह यम-नियमादि का पालन करता हुआ एकान्त भाव से निर्मल परब्रह्म विष्णु में लीन हो गया
॥७९॥ केशिध्वज भी अपने कर्मों को नष्ट कर मुक्ति पाने के अभिप्राय से राजकीय विषयों का उपभोग करता
हुआ अनासक्त भाव से कर्म करता रहा ॥८०॥ मुने ! उसने शुभ भोगों के द्वारा अपने पापों को नष्ट कर त्रिताप