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सर्वकोश
बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)

बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)

Brihan Naradiya Purana with Sanskrit & Hindi Commentary

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,008 पृष्ठ

पृष्ठ 319, कुल 1008 में से

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पृष्ठ 319

३०० नारदीयपुराणम्
तत्र विज्ञानसंयुक्ता त्रिविधा चेतना ध्रुवा। सुखदुःखेति यासाहुरनदुःखसुखेति च ॥६०॥
शब्दः स्पर्शश्च रूपं च भूत्यर्थमेव ते त्रयः। एते ह्यावरणार्थञ्च सद्गुणा ज्ञानसिद्धये ॥६१॥
तेषु कर्माणि सिद्धिश्च सर्वतत्त्वार्थनिश्चयः। तमाहुः परसं शुद्धं बुद्धिरित्यव्ययं महत् ॥६२॥
इमं गुणसमाहारमात्मभावेन पश्यतः। असम्यग्दर्शनेर्दुःखमन्तं नोपशाम्यति ॥६३॥
अनात्मेति च यद्दृष्टं तेनाहं न समेत्यपि। वर्तते किमधिष्ठानात्प्रसक्ता दुःखसंततिः ॥६४॥
तत्र सम्यग्जनो नाम त्यागशास्त्रमनुत्तमम्। शृणुयात्तत्र मोक्षाय भाष्यमाणं भविष्यति ॥६५॥
त्याग एव हि सर्वेषामुक्तानामपि कर्मणाम्। नित्यं मिथ्याविनीतानां क्लेशो दुःखावहो मतः ॥६६॥
द्रव्यत्यागे तु कर्माणि भोगत्यागे व्रतानि च। सुखत्यागे तपो योगं सर्वत्यागे समापना ॥६७॥
तस्य मार्गोऽयमध्यक्षः सर्वत्यागस्य दर्शितः। विप्रहाणाय दुःखस्य दुर्गतिर्हि तथा भवेत् ॥६८॥
पंच ज्ञानेंद्रियाण्युक्त्वा मनः षष्ठानि चेतसि। बलबष्ठानि वक्ष्यामि पंच कर्मेन्द्रियाणि तु ॥६९॥
हस्तौ कर्मेन्द्रियं ज्ञेयमथ पादो गतीन्द्रियम्। प्रजनानंदयोर्मेढ्रो विसर्गो पायुरिंद्रियम् ॥७०॥
वाक्च शब्दविशेषार्थमिति पंचान्वितं विदुः। एवमेकादशैतानि बुद्ध्या त्वसृजेन्मनः ॥७१॥
कर्णी शब्दश्च चित्तं च त्रयः श्रवणसंग्रहे। तथा स्पर्शे तथा रूपे तथैव रसगंधयोः ॥७२॥
एवं पंच त्रिका ह्येते गुणस्तदुपलब्धये। येनायं त्रिविधो भावः पर्यायात्समुपस्थितः ॥७३॥
सात्त्विको राजसश्चापि तामसश्चापि ते त्रयः। त्रिविधा वेदना येषु प्रसृता सर्वसाधिनी ॥७४॥
प्रहर्षः प्रीतिरानंदः सुखं संशान्तचित्तता। अकुतश्चित्कुतश्चिद्वा चित्ततः सात्त्विको गुणः ॥७५॥
अतुष्टिः परितापश्च शोको लोभस्तथाक्षमा। लिंगानि रजसस्तानि दृश्यंते हेत्वहेतुतः ॥७६॥
अविवेकस्तथा मोहः प्रमादः स्वप्नतंद्रिता। कथंचिदपि वर्तते विविधास्तामसा गुणाः ॥७७॥
उन्हें दुःख देने वाले अविद्या रूप क्लेश प्राप्त होते रहते हैं। शास्त्रों में द्रव्य का त्याग करने के लिए यज्ञ आदि
कर्म, भोग का त्याग करने के लिए व्रत, दैहिक सुखों के त्याग के लिए तप और सब कुछ त्यागने के लिए योग के
अनुष्ठान को आज्ञा दी गई है। यहो त्याग की सीमा है। सर्वस्व-त्याग का यह एकमात्र मार्ग हो दुःखों से
छुटकारा पाने के लिए उत्तम बताया गया है। इसका आश्रय न लेने वालों को दुर्गति भोगनी पड़ती है।
छठे मन सहित पाँच ज्ञानेन्द्रियाँ बतायी हैं, जिनकी स्थिति बुद्धि में है। [पाँच कर्मेन्द्रियाँ ये हैं-] दोनों
हाथ काम करने वाली इन्द्रिय हैं। पैर चलने-फिरने का कार्य करने वाली इन्द्रिय हैं। लिंग मैथुन-सुख और
सन्तानोत्पादन आदि के लिए है। गुदा का कार्य मलत्याग करना है। वाक् इन्द्रिय शब्द-विशेष का उच्चारण
करने के लिए है। मन को इन पाँचों से संयुक्त माना गया है। इस प्रकार पाँच ज्ञानेन्द्रिय, पाँच कर्मेन्द्रिय
और मन-ये सब मिलाकर ग्यारह इन्द्रियाँ हैं। इन सब को मन रूप जानकर बुद्धि के द्वारा शीघ्र इनका त्याग कर
देना चाहिए ॥४५-७१॥ श्रवणकाल में श्रोत्र रूपी इन्द्रिय, शब्द रूपी विषय और चित्त रूपी कर्ता—इन तीन का
संयोग होता है। इसी प्रकार स्पर्श, रूप, रस तथा गन्ध के अनुभव-काल में भी इन्द्रिय, विषय एवं मन का
संयोग अपेक्षित है। इस तरह तीन-तीन के पाँच समुदाय हैं। ये सब गुण कहे गये हैं। इनसे शब्दादि विषयों
का ग्रहण होता है और इसी के लिए ये कर्ता, कर्म और कारण रूपी त्रिविध भाव बारी-बारी से उपस्थित होते हैं।
इनमें से एक-एक के सात्त्विक, राजस और तामस तीन-तीन भेद हैं। हर्ष, प्रीति, आनन्द, सुख और चित्त की
शान्ति—ये सब भाव बिना किसी कारण के हों या किसी कारणवश हों, सात्त्विक गुण माने गये हैं ॥७२-७५॥
असंतोष, संताप, शोक, लोभ तथा क्षमा का अभाव--ये किसी कारण से हों या अकारण-रजोगुण के चिह्न हैं।
अविवेक, मोह, प्रमाद, स्वप्न और आलस्य--किसी तरह भी क्यों न हों, तमोगुण के ही नाना रूप हैं।