बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)
Brihan Naradiya Purana with Sanskrit & Hindi Commentary
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)
एकोनत्रिंशोऽध्यायः २०१
नारद उवाच
त्वं समर्थोऽसि तच्छेत्तुं यतो नो ह्यग्रजो भवान् । धर्माश्च विविधाः प्रोक्ताः पापान्यापि बहूनि च ॥५६॥
चिरभोज्यं फलं तेषामुक्तं बहुविदा त्वया । दिनांते ब्रह्मणः प्रोक्तो नाशो लोकत्रयस्य वै ॥५७॥
परार्द्धद्वितयांते तु ब्रह्माण्डस्यापि संक्षयः । ग्रामदानादिपुण्यानां त्वयैव विधिनंदन ॥५८॥
कल्पकोटिसहस्रेषु महांन्भोग उदाहृतः । सर्वेषामेव लोकानां विनाशः प्राकृते लये ॥५६॥
एकः शिष्यत एवेति त्वया प्रोक्तं जनार्दनः । एष मे संशयो जातस्तं भवाञ्छेत्तुमर्हति ॥६०॥
पुण्यपापोपभोगानां समाप्तिर्नास्य संप्लवे ।
सनक उवाच
॥६१॥
साधु साधु महाप्राज्ञ गुह्याद्गुह्यतमं त्विदम्
पृष्टं तत्तेऽभिधास्यामि शृणुष्व सुसमाहितः । नारायणोऽक्षरोऽनंतः परं ज्योतिः सनातनः ॥६२॥
विशुद्धो निर्गुणो नित्यो मायामोहविवर्जितः । निर्गुणोऽपि परानन्दो गुणवानिव भाति यः ॥६३॥
ब्रह्मविष्णुशिवाद्यैस्तु भेदवानिव लक्ष्यते । गुणोपाधिकभेदेषु त्रिष्वेतेषु सनातन ॥६४॥
संयोज्य मायामखिलं जगत्कार्यं करोति च । ब्रह्मारूपेण सृजति विष्णुरूपेण पाति च ॥६५॥
अंते च रुद्ररूपेण सर्वमत्तीति निश्चितम् । प्रलयांते समुत्थाय ब्रह्मारूपी जनार्दनः ॥६६॥
चराचरात्मकं विश्वं यथापूर्वमकल्पयत् । स्थावराद्याश्च विप्रेन्द्र यत्र यत्र व्यवस्थिता ॥६७॥
ब्रह्मा तत्तज्जगत्सर्वं यथापूर्वं करोति वै । तस्मात्कृतानां पापानां पुण्यानां चैव सत्तम् ॥६८॥
अवश्यमेव भोक्तव्यं कर्मणां ह्यक्षयं फलम् । नाभुक्तं क्षीयते कर्म कल्पकोटिशतैरपि ॥६६॥
नारद ने कहा—भगवन् ! दयानिधे ! मेरे मन में सन्देह हो रहा है । आप ही उसको दूर करने में समर्थ
हैं, क्योंकि आप हमारे अग्रज हैं । बहुज्ञ आपने बहुविध धर्म, बहुत से पाप और उनके चिर काल तक भोगने के
योग्य फलों को कहा और यह भी बताया कि ब्रह्मा के दिन के अन्त में तीनों लोकों का नाश हो जाता है ॥५५-५७॥
दो परार्द्ध के बीत जाने पर ब्रह्माण्ड का भी नाश हो जाता है । विधिनन्दन ! आपने अभी ग्राम दान आदि पुण्य
कर्मों का करोड़ों कल्पों तक महान् भोग कहा, फिर यह ब्रह्मा ही शेष रह जाता है। यही मुझे सन्देह हो गया है,
आप ही उसे दूर कर सकते हैं । क्या उस प्रलय में भी पाप और पुण्यों का नाश नहीं होता ? ॥५८-६०॥
सनक बोले—महाप्राज्ञ ! धन्य हो, धन्य हो । यह तो अत्यन्त गूढ़ प्रश्न पूछा, इसलिए तुमसे कह
रहा हूँ, सावधान होकर सुनो । नारायण अक्षर, अनन्त, परम ज्योति, सनातन, विशुद्ध, निर्गुण, नित्य माया-मोह से
रहित और परानन्द हैं जो निर्गुण होते हुए भी सगुण से जान पड़ते हैं ॥६१-६३॥ वही सनातन ब्रह्म ब्रह्मा, विष्णु
और शिव आदि रूपों में भिन्न-भिन्न जान पड़ता है । यद्यपि इन तीनों में केवल गुण और उपाधि का ही भेद
है ॥६४॥ वह माया से युक्त होकर अखिल जगत् का कार्य करता है वह ब्रह्मारूप से सृष्टि करता, विष्णुरूप से
पालन करता और अन्त में रुद्र रूप से सम्पूर्ण सृष्टि को उदरस्थ कर लेता है, यह निश्चित है ॥६५॥ प्रलय काल
बीत जाने पर वही ब्रह्मारूपी जनार्दन पूर्व की भाँति चराचरात्मक विश्व की रचना करता है । विप्रेन्द्र ! पूर्व
सृष्टि में स्थावर आदि पदार्थ जहाँ जिस रूप में व्यवस्थित थे, तदनुरूप ही ब्रह्मा ने उन सब के साथ सारे जगत्
को बनाया ॥६६-६७॥ सज्जन ! इस कारण कृत पापों और पुण्यों का फल अवश्यमेव भोगना पड़ता है । कर्मों के
फल अक्षय हैं । बिना उन कर्मों का भोग किए करोड़ों कल्पों में भी वे नष्ट नहीं होते । अपने किये शुभ-अशुभ कर्मों
२६ ना० पु०
२०२ नारदीयपुराणम्
अवश्यमेव भोक्तव्यं कृतं कर्म शुभाशुभम् । यो देवः सर्वलोकानामंतरात्मा जगन्मयः ।
सर्वकर्मफलं भुङ्क्ते परिपूर्णः सनातनः ॥७०॥
योऽसौ विश्वंभरो देवो गुणभेदव्यवस्थितः । सृजत्यवति चात्त्येतत्सर्वं सर्वभृगव्ययः ॥७१॥
इति श्रीबृहन्नारदीयपुराणे पूर्वभागे प्रथमपादे यमदूतकृत्यनिरूपणं नामैकविंशोऽध्यायः ॥३१॥
अथ द्वात्रिंशोऽध्यायः
सनक उवाच
एवं कर्मपाशनियंत्रित जतवः स्वर्गादिपुण्यस्थानेषु पुण्यभोगमनुभूय यातनासु चातीव दुःखतरं पापफल-
मनुभूय प्रक्षीणकर्मावशेषेणामुं लोकमागत्य सर्वभयविह्वलेषु मृत्युबाधासंयुतेषु स्थावरादिषु जायन्ते ।
वृक्षगुल्मलतावल्लीगिरयश्च तृणानि च । स्थावराश्चेति विख्याता महामोहमसावृताः ॥१॥
स्थावरत्वे पृथिव्यामुप्तबीजानि जलसेकानुपदं सुसंस्कारसामग्रीवशादन्तरूष्मप्रपाविताक्युच्छून्तरत्वमापद्ये
ततो मूलभावं तन्मूलादंकुरोत्पत्तिस्तस्मादपि पर्णकांडनालादिकं
कांडेपु च प्रसवमापद्यते तेषु च पुष्पसंभवः ॥२॥
तानि पुष्पाणि कानिचिदफलानि कानिचित्फलहेतुभूतानि तेषु पुष्पेषु वृद्धभावेषु सत्सु
तत्पुष्पमूलतस्तुषोत्पत्तिर्जायते तेषु तुषु भोक्तॄणां प्राणिनां संस्कारसामग्रीवशाद्धिमरश्मिकरणा-
का फल अवश्य ही भोगना पड़ता है । जो जगन्मय, सर्वलोकान्तरात्मा, परिपूर्ण सनातन देव है, वे सब कर्मों का फल
भोग करते हैं । जो ये विश्वम्भर देव हैं, जो गुण-भेद से स्थित हैं, वे सर्वभुक् अव्यय इस सारी सृष्टि को बनाते और
पालते हैं ॥६८-७१॥
श्रीनारदीयमहापुराण में यमदूतकृत्यनिरूपण नामक इकतीसवाँ अध्याय समाप्त ॥३१॥
अध्याय ३२
भवाटवी का वर्णन
सनक बोले—इस प्रकार कर्म पाश में बँधा हुआ जीव स्वर्गादि पुण्य स्थानों में पुण्य भोग का अनुभव
कर, यातना स्थानों में अति कष्टप्रद पाप-फलों का अनुभव करके कुछ कर्मों के शेष रह जाने पर इस लोक में
आते हैं और सब प्रकार के भय से युक्त, मृत्यु बाधा से विजड़ित स्थावरादि योनियों में उत्पन्न होते हैं । वृक्ष, झुर-
मुट, लता, वल्लरी, पहाड़ और तृण ये स्थावर नाम से प्रसिद्ध हैं जो महामोह से आवृत हैं ॥१॥ स्थावर की
दशा में पृथ्वी में बोये गए बीज सिञ्चन के बाद अपने संस्कारवश, अन्तः उष्णता के कारण कुछ आर्द्र होकर बढ़
जाते हैं । फिर उनमें से जड़े निकलतीं, जड़ों से अंकुर, अंकुर से पत्तियाँ, डंठल और नाल आदि निकलते हैं ।
कांडों से प्रसव (कलियाँ) और इससे फूल निकलते हैं ॥२॥ उन फूलों में से कुछ तो फल देने में असमर्थ, कुछ फल
देने के योग्य होते हैं । वे फूल जब पूर्ण रूप से विकसित हो जाते हैं तब पुष्प मूल से तुष (रस) निकलता है
उन तुषों में भोक्ता प्राणी के संस्कारवश चन्द्रमा की किरणों के संयोग से उसका ओषधि-रस तुष के भीतर मिल
द्वार्तिशोऽध्यायः २०३
सन्नतया तदोषधिरसस्तुषांतः प्रविश्य क्षीरभावं समेत्य स्वकाले तंडुलाकारतामुपगम्य प्राणिनां
भोगसंस्कारवशात्संवत्सरे फलिनः स्युः ॥३॥
स्थावरत्वेऽपि बहुकालं वानरादिभिर्भुज्यमाना हि च्छेदनदवाग्निदहनशीतातपादिदुःखमनुभूय
म्रियंते । ततश्च क्रिमयो भूत्वा सदादुःखबहुलाः क्षणार्द्धं जीवतं क्षणार्द्ध म्रियमाणा बलवत्प्रा-
णिपीडायां निवारयितुमक्षमाः शीतवातादिक्लेशभूयिष्ठा नित्यं क्षुधाक्षुधिता मलमूत्रादिषु
संचरंतो दुःखमनुभवंति ॥४॥
तत एव पशुयोनिमागत्य बलवद्वाधोद्वेजिता वृथोद्वेगभूयिष्ठाः क्षुत्क्षांता नित्यं वनचारिणो
मातृष्वपि विषयातुरा वातादिक्लेशबहुलाः कस्मिंश्चिज्जन्मनि तृणाशनाः कस्मिंश्चिज्जन्मनि
मांसामेध्याद्यदनाः कस्मिंश्चिज्जन्मनि कंदमूलफलाशना दुर्बलप्राणिपीडानिरता दुःखमनुभवंति ॥५॥
अंडजत्वेऽपि वाताशनामांसा मेध्याद्यशनाश्च परपीडापरायणा नित्यं दुःखबहुला ग्राम्यपशुयोनि-
मागता अपि स्वजातिवियोगभारोद्वहनपाशादिबंधनताडनहलादिधारणादिसर्वदुःखान्यनुभवंति ॥६॥
एवं बहुयोनिषु संभ्रांताः क्रमेण मानुषं जन्म प्राप्नुवंति केचिच्च
पुण्यविशेषायुक्तक्रमेणापि मनुष्यजन्ममाप्नुवते ॥७॥
मनुष्यजन्मतापि च चर्मकारचंडालव्याधनापितरजककुंभकारलोहकारतंतुवायसौचिकजटिल-
सिद्धधावकलेखकभृतकशासनहारिनीचमृत्यदरिद्रहीनांगाधिकांगत्वादिदुःखबहुलज्वरतापशीत-
श्लेष्मगुल्मपादाक्षिशिरोगर्भपार्श्ववेदनादिदुःखमनुभवंति ॥८॥
कर क्षीर के रूप में परिणत हो जाता है । समय पाकर वह क्षीर तण्डुल के रूप में हो जाता है । इस प्रकार प्राणियों
के भोग संस्कारवश वर्ष भर में फल देते हैं ॥३॥ स्थावर बन जाने पर भी बहुत समय तक वानर आदि जीव
उसको खाते हैं, काटने, जलाने और शीतातप के सहने के कारण उसको दुःख सहन करना पड़ता, इस प्रकार दुःखों
का अनुभव कर मर जाते हैं । तदनन्तर कृमि होकर सदा अधिक दुःखों को ही सहते, क्षणभर जीवित रहते तो क्षण
भर में ही मर जाते हैं । बली प्राणियों की पीड़ा से अपने को बचाने में सर्वथा असमर्थ होकर शीत, आतप, वायु
आदि से घोर कष्ट सहते हैं । नित्यप्रति भूख से व्याकुल होकर मल-मूत्र आदि में घूमते और दुःख का अनुभव करते
हैं ॥४॥ पशु-योनि में जन्म लेकर प्रबल बाधाओं से उद्विग्न होकर व्यर्थोद्वेग से कष्ट पाते रहते हैं । भूख-प्यास से
व्याकुल हों नित्य वन में घूमते रहते, माता के प्रति भी विषय-वासना की भावना रखते, वात आदि अनेकों क्लेश
को सहते, किसी जन्म में तृण खा कर रहते तो किसी जन्म में मांस आदि अमेध्य पदार्थ खाते तो किसी जन्म में
कन्द, मूल, फल खाकर ही जोते और दुर्बल प्राणियों को पीड़ा दे देकर स्वयं भी दुःख का अनुभव करते हैं ॥५॥
अंडज योनि में आने पर भी कभी वायु के सहारे जीते तो कभी मांस आदि अमेध्य भोज्य पदार्थ खाकर रहते और
सदा अनेकों कष्ट सहते रहते हैं । ग्राम्य पशु योनि में जन्म लेने पर अपनी जाति से वियोग, भार-वहन, पाश-
बन्धन और हल में जोतने आदि के दुःख से पीड़ित रहते हैं ॥६॥ इस प्रकार अनेक योनियों में भ्रमण करने के
बाद जीव मानव जन्म प्राप्त करता है । कुछ ऐसे भी भाग्यवान् होते हैं जो अपने पुण्य-विशेष के प्रभाव से बहुत
योनि में भ्रमण करने के बिना भी मानव जन्म का भोग प्राप्त करते हैं ॥७॥ मनुष्य जन्म में भी चमार, चाण्डाल,
व्याधा, नाई, धोबी, कुम्हार, लोहार, सोनार, जुलाहा, दर्जी, जटिल, सिद्ध, सन्देश-वाहक, लिपिक, सेवक टहलु-
आ, नीच-सेवक, हीनांग, अधिकांग, आदि होकर अत्यन्त क्लेश सहता और ज्वर, ताप, शीत, श्लेष्म, गुल्म, पाद-
रोग, नेत्र और शिरोरोग, उदर और पार्श्वशूल आदि रोगों से व्यथित रहते हैं ॥८॥
२०५ नारदीयपुराण
मनुष्यत्वेऽपि यदा स्त्रीपुरुषयोर्व्यवायस्तत्समये रेतो यदा जरायुं प्रविशति तदैव कर्मवशाज्जन्तुः
शुक्रेण सह जरायुं प्रविश्य शुक्रशोणितकललं प्रपद्यते ॥६॥
तद्वीर्यं जीवप्रवेशात्पञ्चाहात्कललं भवति अर्द्धमासे पललमम्भवति। मासे प्रादेशमात्रत्वमापद्यते ॥१०॥
ततः प्रभृति वायुवशाच्चैतन्याभावेऽपि मातुरुदरे दुःसहतापवलेनावर्तकल स्थातुमशक्तत्वाद्विभ्रमति ॥११॥
मासे द्वितीये पूर्णे पुरुषाकारमात्रतामुपगम्य मासत्रितये पूर्णे करचरणाद्यवयवावभवमुपगम्य
चतुर्थे मासेषु गतेषु सर्वावयवानां संधिभेदपरिज्ञानं पञ्चमतीतेषु नखानामितिव्यंजकता
षट्स्वतीतेषु नखसंधिपरिस्फुटतामुपगम्य नाभिधुक्षणं पुष्यमाणममेध्यमूत्रसिक्ततांगं जरायुनांवंधि-
तरक्तास्थिकृमिवसामज्जास्नायुकेशादिदूषिते कुत्सिते शरीरे निवासिनं स्वयमप्येवं परिदूषितदेहं
मातुश्च कट्वम्ललवणात्युष्णभुक्तदह्यमानमात्मानं दृष्ट्वा देही पूर्वजन्मस्मरणात्सुखावानुभूतानुकूल-
नरकदुःखानि च स्मृत्वांतर्दुःखेन च परिदह्यमानो मातुरुदहातिमूत्रादिरूक्षेण दह्यमान एवं
मनसि प्रलपति ॥१२॥
अहोऽत्यंतपापोऽहंपूर्वजन्मनि भृत्यापत्यमित्रयोषिद्गृहक्षेत्रधनधान्यादिष्वत्यंतरागेण कलत्रपोषणार्थं
परधनक्षेत्रादिकं पश्यतो हरणायुपायैरपहृत्य कामांधतया परस्त्रीहरणादिकमनुभूय महा-
पापान्याचरंस्तैः पापै रहमेक एवंविधवरकाननुभूय पुनः स्थावरादिषु महादुःखमनुभूय संप्रति
जरायुणा परिवेष्टितोऽन्तःदुःखेन बहिस्तापेन च दह्यामि ॥१३॥
मया पोषिता दाराश्च स्वकर्मवशादन्यतो गताः ॥१४॥
अहो दुःखं हि देहिनाम् ॥१५॥
मनुष्य होने पर भी जब स्त्री पुरुष का संयोग होता है और उस समय जब वीर्य जरायु में प्रवेश करता है
उसी समय कर्मवश जन्तु शुक्र के साथ जरायु में जाकर शुक्र, शोणित और कलल के रूप में परिवर्तित हो जाता है।
उस वीर्य में जीव के प्रवेश से पाँच दिन बाद कलल होता, आधे महीने में पलल और एक महीने में प्रादेश मात्र का
पिण्ड हो जाता है ! तत्पश्चात् चेतनता के अभाव में भी वायु के कारण माता के उदर में दुःसह ताप के सहने में
असमर्थ हो इधर उधर चलता रहता है ॥९-११॥ दो मास बीत जाने पर पूर्णरूप से पुरुषाकार हो जाता है।
तीसरे महीने में पूर्ण रूप से हाथ, पैर आदि अंग स्पष्ट होने लगते हैं । चार मास बीत जाने पर सब अवयवों का
सन्धि भेद स्फुट हो जाता है । पांच मास बाद नख निकल आते, छह मास बीतने पर नख सन्धि परिस्फुट हो-
जाती और नाभि नाल से उसका पोषण होता है । अशुद्ध मूत्र आदि पदार्थों से उसका अंग ढका रहता है । जरायु
से बँधा, रक्त, अस्थि, कृमि, वसा, मज्जा, स्नायु, केश आदि से दूषित उस कुत्सित शरीर में अपने को अवस्थित
तथा माता के कटु, अम्ल, लवण और अत्युष्ण भोजन से जलाये जाते हुए स्वयं को देखकर वह देही पूर्व
जन्म की स्मृति तथा अनुभवों और पूर्वानुभूत नरक-दुखों का स्मरण कर अन्तर्वेदना से व्यथित हो माता के
मूत्र आदि रूक्ष पदार्थों से जलकर विलाप करने लगता है ॥१२॥ आह ! महापापी मैंने पूर्वजन्म में भृत्य, पुत्र,
मित्र, स्त्री, घर, धन, धान्य आदि के मोह में पड़कर स्त्री-पालन के लिए दूसरे के धन क्षेत्र आदि कूटोपायों से
अपहरण किया । कामान्ध हो पर-स्त्री हरण आदि महापापों को किया । दूसरों के लिए पापाचरण किया,
परन्तु अकेला ही अनेकों घोर नरकों का अनुभव कर पुनः स्थावर आदि योनियों में अनेक प्रकार के कष्ट सहा ।
इस समय जरायु में बँधकर अन्तस्ताप और बाह्य ताप दोनों से जल रहा हूँ ॥१३॥ मेरे द्वारा पाली गई स्त्री
भी अपने कर्मवश, अन्यत्र चली गई । अहो, देहधारियों के लिए केवल कष्ट ही कष्ट है ॥१४-१५॥ देह पाप
द्वांविंशोऽध्यायः २०५
देहस्तु पापात्संज्जातस्तस्मात्पापं न कारयेत् । भृत्यमित्रकलत्रार्थमप्यद्व्रव्यं हृतं मया ॥१६॥
तेन पापेन दह्यामि जरायुपरिवेष्टितः । दृष्ट्वास्यस्य वित्तं पूर्वं संतप्तोऽहमसूयया ॥१७॥
गर्भाग्निनानुदह्येयमिदानीमपि पापकृत् । कायेन मनसा वाचा परपीड़ामकारिषम्
तेन पापेन दह्यामि त्वहमेकोऽतिदुःखितः ॥१८॥
एवं बहुविधं गर्भस्थो जंतुर्विलप्य स्वयमेव वा ॥१९॥
आत्मानमाश्वास्य उत्पत्तेरनंतरं सत्संगेन विष्णोश्चरितश्रवणेन च विशुद्धमना भूत्वा सत्कर्माणि
निर्वर्त्य अखिलजगदंतरात्मनः सत्यज्ञानानंदमयस्य स्वशक्त्याद्यनुष्ठितविविधप्रपंचस्य लक्ष्मी-
पतेर्नारायणस्य सकलसुरासुरयक्षगंधर्वराक्षसपन्नगमुनिकिन्नरसमूहार्थितचरणकमलयुगं भक्तितः
समभ्यर्च्य दुःसह संसारच्छेदस्य कारणभूतं वेदरहस्योपनिषद्भिः परिस्कृतं सकललोकपरायणं
हृदि निधाय दुःखतरमिमं संसारागारमतिक्रमिष्यामीति मनसि भावयति ॥२०॥
यतस्तन्मातुः प्रसूतिसमये सति गर्भस्थो देही नारदमुने वायुनापीडितो मातुश्चापि दुःखं
कुर्वन्कर्मपाशेन बलाद्योनिमार्गान्निष्क्रामन्सकल्यातनाभोगमेककालभवमनुभवति ॥२१॥
तेनातिवलेशेन योनियंत्रपीडितो गर्भान्निष्क्रांतो निःसंज्ञतां याति ॥२२॥
तं तु बाह्यवायुः समुज्जीवयति । बाह्यवायुस्पर्शसमनंतरमेव नष्टस्मृतिपूर्वानु-
भूताखिलदुःखानि वर्त्तमानान्यपि ज्ञानाभावादविज्ञायात्यंतदुःखमनुभवति ॥२३॥
एवं बालत्वमापन्नो जंतुस्तत्रापि स्वमलमूत्रलिप्तदेह आध्यात्मिक दिपीड्यमानोऽपि
वक्तुमशक्तः क्षुत्तृषपीडितो रुदिते सति स्तनादिकं देयमिति मन्वानाः प्रयतन्ते ॥२४॥
के कारण ही प्राप्त होती है, इसलिए पाप नहीं करना चाहिए। सेवक, मित्र और स्त्री के लिए दूसरों का
धन लूटा। उसी पाप से आज जरायु में बँधकर भस्म हो रहा हूँ। दूसरे के धन को देखकर ईर्ष्यावश
जलता रहा उसी पाप के कारण पापी मैं इस समय भी गर्भाग्नि से जल रहा हूँ। शरीर, मन और वचन से दूसरे
को पीड़ित करता रहा । उस पाप से आज अकेला दुःखी होकर जल रहा हूँ ॥१६-१८॥
इस प्रकार गर्भस्थ जीव विलाप कर स्वयं अपने द्वारा अपने को आश्वासन देने लगता है कि मैं उत्पन्न
होने के बाद सत्संग के द्वारा शुद्धचित्त होकर सत्कर्म करूँगा। अखिल जगदन्तरात्मा, सत्यज्ञानानन्दमय
स्वशक्ति के प्रभाव से स्वर्ग लोक को प्रतिष्ठित करने वाले लक्ष्मीपति नारायण के उन युगल चरणारविन्दों की
जिनकी सब सुर, असुर, यक्ष, गन्धर्व, राक्षस, नाग, मुनि और किन्नरवर्ग पूजा करते हैं, भक्तिपूर्वक पूजा
करूँगा। और वेद, रहस्य साधना तथा उपनिषदों से परिस्कृत सकल लोकों के एक मात्र परम आधार भगवान्
का हृदय में ध्यान कर इस दुःखमय संसार के बन्धन से अपने को मुक्त करूँगा। इस प्रकार वह अपने मन में
भावना करता है ॥१९-२०॥ नारदमुनि ! यतः जन्म समय वह गर्भस्थ देही स्वयं वायु से पीड़ित होता
माता को भी पीड़ा पहुँचाता, कर्मपाश से बँधा वह बलात् योनिमार्ग से निकलते समय सब प्रकार की यात-
नाओं के भोग का अनुभव उसी समय करता है ॥२१॥ अतः योनि-यन्त्र से अत्यन्त पीड़ित होने के कारण
गर्भ से निकलते ही अचेत हो जाता है। इस दशा में उसको बाहर की वायु द्वारा चेतना प्राप्त होती है ।
बाह्य वायु के स्पर्श करते ही पूर्व जन्म की स्मृति नष्ट हो जाती है। उस समय पूर्व जन्म के अनुभूत दुःख
संस्कार रूप में वर्त्तमान रहते हैं। तो भी ज्ञानशून्य होने से उसको भूलकर वह जीव स्वयं दुःख का अनुभव
करता है ॥२२-२३॥ इस प्रकार जीव बालक बन कर अपने मलमूत्र में लिपटा रहता है। उसको मानसिक
पीड़ा होती रहती है, परन्तु कुछ कह नहीं सकता है। क्षुत्पिपासा से पीड़ित होकर जब रोने लगता है तब
माता 'स्तन पान कराना चाहिए', ऐसा सोचकर स्तनपान कराती है ॥२४॥
२०६ नारदीयपुराणम्
एवमनेकं देहभोगमन्वाधीनतयानुभूयमानो दंशादिष्वपि निवारयितुमशक्तः ॥२५॥
बाल्यभावमसाद्य मातापित्रोरुपाध्यायस्यां ताडनं सदा पर्यटनशीलत्वं पांशुभस्मपंमादिषु
क्रीडनं सदा कलहप्रियतदामशुचित्वं अशुच्याचाराभासकार्यनियतत्वं तदसंभव आधिप्रात्मिकदुः-
खमेवंविधमनुभवति ॥२६॥
ततस्तु तरुणभावेन धनार्जनमर्जितस्य रक्षणं तस्य नाशव्ययादिषु चात्यंतदुःखिता मायया मोहिताः
कामक्रोधादिदुष्टमनसः सदास्र्यापरायणाः परस्वपरस्त्रीहरणोपायपरायणाः पुत्रमित्रकलत्रादि-
भरणोपायचिंतापरायणा वृथाहंकारदूषिताः पुत्रादिषु व्याध्यादिपीडितेषु सत्सु सर्वव्याप्तिं
परित्यज्य रोगादिभिः क्लेशितांनां समीपे स्वयमाध्यात्मिकदुःखेन परिप्लुता वक्ष्यमाणप्रकारेण
चिंतामनुभवते ॥२७॥
गृहक्षेत्रादिकं कर्म किंचिन्नापि विचारितम् । समृद्धस्य कुटुम्बस्य कथं भवति वर्त्तनम् ॥२८॥
मम मूलधनं नास्ति वृष्टिश्चापि न वर्धति । अश्वः पलायितः कुत्र गावः किं नागता मम ॥२९॥
वालापत्या च मे भार्या व्याधितोऽहं च निर्धनः । अविचारात्कृषिर्नष्टा पुत्रा नित्यं रुदंति च ॥३०॥
भग्नं छिन्नं तु मे सद्म बांधवा अपि दूरगाः । न लभ्यते वर्त्तनं च राजबाधातिदुःसहा ॥३१॥
रिपवो मां प्रधावंते कथं जेष्याम्यहं रिपून् । व्यवसायाक्षमश्वाहं प्राप्ताः प्राघूर्णका अमी ॥३२॥
इस भाँति वह बालक परवश होने के कारण अनेक शारीरिक भोगों को भोगता है, मच्छर आदि उसको
काटते हैं, परन्तु वह हटा नहीं पाता है। धीरे-धीरे जब वह किशोरावस्था को प्राप्त होता है तब माता, पिता
और उपाध्याय की डाँट-फटकार और ताड़ना प्रारम्भ होती है, वह सदा इधर-उधर घूमता रहता, धूल राख और
कीचड़ से खेलने लगता, प्रति दिन लड़ता-झगड़ता और अनेकों अशिष्ट व्यवहारों तथा अशुचि कार्यों में ही
लगा रहता है। जब इन कार्यों में किसी प्रकार की बाधा पहुँचती तब उसको मानसिक कष्ट का अनुभव होने
लगता है। २५-२६॥
किशोरावस्था बीत जाने के बाद जब वह तरुण हो जाता है तब वह जीव धन कमाने लगता। अर्जित
धन को रक्षा, उसके नाश और व्यय को चिन्ता से अधिक दुःखी रहता है। मायामोहित, उस जीव का मन काम-
क्रोध आदि से दूषित हो जाता है। सर्वदा असूया-परायण होकर परद्रव्य परस्त्री के हरण की युक्ति ही सोचा करता
है। पुत्र, मित्र, कलत्र आदि के भरण-पोषण की चिन्ता में तल्लीन होकर व्यर्थ के अहंकार से उसका मन दूषित
हो जाता है। पुत्र आदि के रोग-ग्रस्त होने पर वह सारी क्रियाओं को छोड़कर रोगादि से पीड़ित स्वजनों के
समीप रहता और स्वयं मानसिक दुःख से दुःखी होकर अनेकों प्रकार को चिन्ताओं से चिन्तित हो जाता
है ॥२७॥ सोचता है कि घर, खेती बारी आदि की ओर मैंने कुछ भी ध्यान नहीं दिया, इतने बड़े कुटुंब का
भरण-पोषण कैसे होगा ? मेरे पास मूलधन भी नहीं है। वर्षा भी नहीं हो रही है। घोड़ा कहाँ भाग गया ?
मेरी गायें अबतक नहीं आईं। मेरी भार्या की गोद में छोटा-सा बच्चा है, व्याधि पीड़ित मैं निर्धन हो गया ।
मेरे अविचार के कारण कृषि भी नष्ट हो गई। पुत्र सर्वदा रोते रहते हैं ॥२८-३०॥ घर भी गिर गया, टूट
गया, बन्धु भी दूर हैं। कोई जीविका का साधन भी प्राप्त नहीं है। ऊपर से अति दुःसह राजा का शुल्क संबन्धी
भय है ॥३१॥ शत्रु चारों ओर से चढ़े भा रहे हैं। कैसे शत्रुओं को वश में कर सकूँगा ? कोई व्यवसाय करने
की भी क्षमता नहीं है । इतने अतिथि भी आ गए ॥३२॥ इस प्रकार अत्यन्त चिन्ताकुल हो अपने-अपने दुःखों
द्वात्रिंशोऽध्यायः २०७
एवमत्यंतचिन्ताकुलः स्वदुःखानि निवारयितुमक्षमो
धिग्विधिं भाग्यहीनं मां किमर्थं विदधे इति दैवमाक्षिपति ॥३३॥
तथा वृद्धत्वमापन्नो हीयमान सारो जरापलितादिव्याप्तदेहो व्याधिबाध्यत्वादिकमापन्नः ।
प्रकंपमानावयवश्वासकासादिपीडितो लोलाविललोचनः श्लेष्मव्याप्तकंठः पुत्रदारादिभिर्भत्स्यमानः
कदा मरणमुपयामीति चिंताकुलो मयि मृते सति मदजितं गृहक्षेत्रादिकं वस्तु पुत्रादयः कथं
रक्षंति कस्य वा भविष्यति ॥३४॥
नद्धने परैरपहृते पुत्रादीनां कथं वर्त्तनं भविष्यतीति ममतादुःखपरिलुतो गाढं निःश्वस्य स्वेन
वयसा कृतानि कर्माणि पुनः पुनः स्मरन् क्षणे विस्मरति च संततस्तत्त्वासन्नमरणो ॥३५॥
व्याधिपीडितोऽन्तस्तापार्तः क्षणं शय्यायां क्षणं मंचे च ततस्ततः पर्यटन् क्षुत्तृट्परीपीडितः
किंचित्मात्रमुदकं देहीत्यतिकार्पण्येन याचमानस्तत्रापि ज्वराविष्ठानामुदकं न श्रेयस्करमिति
ब्रुवतां मनसातिद्वेषं कुर्वन्मन्दचैतन्यो भवति ॥३६॥
ततश्च हस्तपादाकर्षणे न तु क्षमो रुदद्भिर्बाधवजनैर्वेष्टितो वक्तुमक्षमः स्वार्जितधनादिकं कस्य
भविष्यतीति चिंतापरो बाष्पाविलविलोचनः कंठे घुरघुरायमाणे सति शरीराान्निष्क्रांतप्राणो
यमदूतैर्भत्स्येमानः पाशंयंत्रितो नरकादीन्पूर्ववदश्नुते ॥३७॥
आमलप्रक्षयाद्यद्वदग्नौ धान्यंति धातवः । तथैव जीविनः सर्व आकर्मप्रक्षयाद् भृशम् ॥३८॥
को दूर करने में अपने को असमर्थ पाकर 'विधाता को धिक्कार है, क्यों मुझ भाग्यहीन का अन्त नहीं कर देता'
आदि कह कर भाग्य को ही दोष देता है ॥३३॥ फिर जब वह बूढ़ा हो जाता है, केश झड़ जाते, बुढ़ापा और
रोग से शरीर व्याप्त हो जाता तब व्याधियों और कष्टों से घिर जाता है। उसके शरीर में कंपकंपी होने
लगती है । श्वास-कास आदि रोगों से पीड़ित हो जाता । गले में कफ की अधिकता हो जाती और उसकी आँखें
मन्द तथा चंचल हो जाती हैं । पुत्र, स्त्री आदि जब उसको झिड़कने लगते तब यही सोचता है कि कब मेरी
मृत्यु होगी । परन्तु फिर यह सोचने लगता कि मेरी मृत्यु के बाद मेरे घर, खेत आदि की रक्षा मेरे पुत्र कैसे
करेंगे ? अथवा कौन इसको प्राप्त करेगा ? ॥३४॥ दूसरे जब मेरी सम्पत्ति को चुरा लेंगे तब पुत्रादि का निर्वाह
कैसे होगा ? इस प्रकार मोह और दुःख से व्याकुल होकर आहें भरने लगता और अपने जीवन में किये गए कर्मों
का बार-बार स्मरण कर क्षण भर में ही अपने को भूल जाता है । जब मृत्यु निकट आती तब व्याधि-पीड़ित
और अन्तस्ताप तथा वेदना से आर्त होकर क्षणभर शय्या पर तो क्षण भर मंच पर लुढ़कता है । इधर-उधर
घूमता हुआ जब भूख-प्यास से पीड़ित हो जाता तब 'अरे ! थोड़ा जल दो' यह कह कर बड़ी दीनता से जल
माँगने लगता है । उस समय जब उसके कुटुम्बी'ज्वराक्रान्त व्यक्ति के लिए जल लाभदायक नहीं होता' यह कहते
हैं तब तो वह मन ही मन उन पर ईर्ष्या करने लगता और अचेत हो जाता है ॥३५-३६॥ तदनन्तर उसमें हाथ
पैर हिलाने की शक्ति नहीं रह जाती, रोते हुए बन्धुओं से घिरा वह स्वयं कुछ कहने में असमर्थ हो जाता है ।
उसकी स्वार्जित सम्पत्ति किसके अधिकार में जायगी, इसकी चिन्ता से उसकी आँखें आँसू से भर जाती हैं । धीरे-
धीरे कण्ठ से घर्र-घर्र की ध्वनि होने लगती और उसके प्राण शरीर से निकल जाते हैं । मृत्यु के अनन्तर यमदूतों
की झिड़कियाँ सहता हुआ, यमपाश में बँधकर पूर्व की भाँति नरकों का भोग करता है ॥३७॥
जिस प्रकार धातुएँ तब तक जलती रहती हैं जब तक उनका दोष क्षय नहीं हो जाता उसी प्रकार
सभी जीव कर्मक्षय होने तक अत्यन्त दारुण भोग भोगते हैं। द्विजश्रेष्ठ ! इसलिए संसार रूपी दावानल से
२०८ नारदीयपुराणम्
तस्मात्संसारदावाग्नितापात द्विजसत्तम । अभ्यसेत्परमं ज्ञानं ज्ञानान्मोक्षमवाप्नुयात् ॥३६॥
ज्ञानशून्या नरा ये तु पशवः परिकीर्तिताः । तस्मात्संसारमोक्षाय परं ज्ञानं समभ्यसेत् ॥४०॥
मानुष्यं चैव संप्राप्य सर्वकर्मप्रसाधकम् । हरिं न सेवते यस्तु कोऽन्यस्तस्मादचेतनः ॥४१॥
अहो चित्रमहो चित्रमहो चित्रं मनीश्वराः । आस्थिते कामदे विष्णौ नरा यांति हि यातनाम् ॥४२॥
नारायणे जगन्नाथे सर्वकामफलप्रदे । स्थितेऽपि ज्ञानरहिताः पच्यंते नरकेष्वहो ॥४३॥
स्रवन्मूत्रपुरीषे तु शरीरेऽस्मिन्नशाश्वते । शाश्वतं भावयन्त्यज्ञा महामोहसमावृताः ॥४४॥
कुत्सितं मांसरक्ताद्यैर्देहं संप्राप्य यो नरः । संसारच्छेदकं विष्णुं न भजेत्सोऽतिपातकी ॥४५॥
अहो कष्टमहो कष्टमहो कष्टं हि मूर्खता । हरिध्यानपरो विप्र चाण्डालोऽपि महासुखी ॥४६॥
स्वदेहान्निस्सृतं दृष्ट्वा मलमूत्रादिकं त्विमम् । उद्वेगं मानवा मूर्खाः किं न यांति हि पापिनः ॥४७॥
दुर्लभं मानुषं जन्म प्रार्थ्यते त्रिदशैरपि । तल्लब्ध्वा परलोकाय यत्नं कुर्याद्विचक्षणः ॥४८॥
अध्यात्मज्ञानसम्पन्ना हरिपूजापरायणाः । लभन्ते परमं स्थानं पुनरावृत्तिदुर्लभम् ॥४९॥
यतो जातमिदं विश्वं यतश्चैतन्यमश्नुते । यस्मिंश्च विलयं याति स संसारस्य मोचकः ॥५०॥
निर्गुणोऽपि परोऽनंतो गुणवानिव भाति यः । तं समभ्यर्च्य देवेशं संसारात्परिमुच्यते ॥५१॥
इति श्रीबृहन्नारदीयपुराणे पूर्वभागे प्रथमपादे भवाटवीनिरूपणं नाम द्वात्रिंशोऽध्यायः ॥३२॥
सन्तप्त प्राणी परम ज्ञान का अभ्यास करे, ज्ञान से ही वह मोक्ष प्राप्त कर सकता है ॥३८-३९॥ जो ज्ञान-
शून्य मनुष्य हैं वे पशु कहे गए हैं, इसलिए संसार से मुक्ति पाने के लिए ज्ञान का अभ्यास करना चाहिए ॥४०॥
जो सब कर्मों का आधार भूत मानव-जीवन पाकर भा हरि की सेवा नहीं करता, उससे बढ़कर चेतनाहीन
कौन होगा ? मुनीश्वरवृन्द ! यह आश्चर्य है कि मनोरथदाता विष्णु के रहते हुए भी अज्ञानी नर यातना पाते
हैं ॥४१॥ अहो ! सब मनोरथों के देने वाले जगत्पति नारायण के रहने पर भी ज्ञानहीन मूढ़ नरक में पाप भोगते
हैं ॥४२॥ अज्ञ मनुष्य महामोह में फँसकर इस मलमूत्र से भरे अनित्य शरीर को ही नित्य समझते हैं ॥४३॥
जो मनुष्य मांस, रक्त आदि से युक्त इस कुत्सित शरीर को पाकर संसार से उद्धार करने वाले विष्णु का भजन
नहीं करता वह महापापी है ॥४४॥ विप्र ! सर्वदा हरि की उपासना करने वाला चाण्डाल भी महासुखी है ।
कष्ट है, कष्ट है, महाकष्ट है इस प्रकार चिल्लाना मूर्खता है ॥४५॥ आश्चर्य है कि मूर्ख पापी मानव शरीर से निकलते
हुए मल-मूत्रादि अशुद्ध पदार्थों को देखकर भी इसको अशुचि समझकर घृणा क्यों नहीं करता ? ॥४६॥ देवता
भी दुर्लभ मानव-जीवन प्राप्त करने की प्रार्थना किया करते हैं । इसलिए ऐसे दुर्लभ मानुष जन्म को पाकर
बुद्धिमान् व्यक्ति अवश्य परलोक सुधारने का प्रयत्न करे ॥४७॥ अध्यात्म-ज्ञान-सम्पन्न और हरिपूजापरायण
व्यक्ति उस परम स्थान को प्राप्त करते हैं जहाँ से पुनरागमन नहीं होता ॥४८॥ जिससे यह सारा विश्व उत्पन्न
हुआ, जिससे यह चैतन्य प्राप्त करता और जिसमें लय हो जाता है वही संसार का उद्धारकर्त्ता है ॥४६॥ जो
अनन्तनिर्गुण होता हुआ भी सगुण के समान जान पड़ता है उस देवेश की पूजा करने से ही संसार से मुक्ति
प्राप्त होती है ॥५०॥
श्री नारदीय महापुराण में भवाटवी निरूपण
नामक बत्तीसवाँ अध्याय समाप्त ॥३२॥
त्रयस्त्रिंशोऽध्यायः
नारद उवाच
भगवन्त्सर्वमाख्यातं यत्पृष्टं विदुषा त्वया । संसारपाशबद्धानां दुःखानि सुबहूनि च ॥१॥
अस्य संसारपाशस्य च्छेदकः कतमः स्मृतः । येनोपायेन मोक्षः स्यात्तन्मे ब्रूहि तपोधन ॥२॥
प्राणिभिः कर्मजालानि क्रियंते प्रत्यहं भृशम् । भुज्यंते च मुनिश्रेष्ठ तेषां नाशः कथं भवेत् ॥३॥
कर्मणा देहमाप्नोति देही कामेन बध्यते । कामाल्लोभाभिभूतः स्याल्लोभात्क्रोधपरायणः ॥४॥
क्रोधाच्च धर्मनाशः स्याद्धर्मनाशान्मतिभ्रमः । प्रनष्टबुद्धिर्मनुजः पुनः पापं करोति च ॥५॥
तस्माद्देहं पापमूलं पापकर्मरतं तथा । यथा देहभ्रमं त्यक्त्वा मोक्षभाक्स्यात्तथा वद ॥६॥
सनक उवाच
साधु साधु महाप्राज्ञ मतिस्ते विमलोर्जिता । यस्मात्संसारदुःखान्नो मोक्षोपायमभीप्ससि ॥७॥
यस्याज्ञया जगत्सर्वं ब्रह्मा सृजति सुव्रत । हरिश्च पालको रुद्रो नाशकः स हि मोक्षदः ॥८॥
अहमादिविशेषांता जाता यस्य प्रभावतः । तं विद्यान्मोक्षदं विष्णुं नारायणमनामयम् ॥९॥
यस्याभिन्नमिदं सर्वं यच्चेंगति च नेंगति । तमुग्रमजरं देवं ध्यात्वा दुःखात्प्रमुच्यते ॥१०॥
अध्याय ३३
योग-निरूपण
नारद बोले—भगवन् ! महाज्ञानो आप से जो कुछ पूछा गया उसको आपने कह दिया । इस संसार-
पाश में बंधे प्राणियों को अनेक दुःख हैं ॥१॥ तपोधन ! इस संसार-पाश को छिन्न करने वाला कौन है ? और
जिस उपाय से मनुष्य को मोक्ष प्राप्त होता है उसको मुझसे कहिए ॥२॥ समस्त प्राणी सदा कर्म करते रहते
हैं और उसका भोग भी करते हैं, परन्तु मुनिश्रेष्ठ ! उन कर्मों का नाश कैसे होता है, इसको कृपा कर
बतलाइए ॥३॥ कर्म से ही देह प्राप्त होती है और देही इच्छाओं से बंध जाता है, काम से वह लोभाभिभूत
हो जाता है, लोभ से क्रोधी स्वभाव का होना स्वाभाविक है । क्रोध से धर्मनाश होता और धर्मनाश से
बुद्धि-भ्रम हो जाता है । नष्ट-बुद्धि मनुष्य बार-बार पाप करता है । सारांश यह है कि यह देह पाप मूल है और
देही सदा पापकर्मों में लीन रहता है । इसलिए जिस प्रकार मनुष्य शरीर-भ्रम को छोड़कर मोक्ष प्राप्त कर
सकता है उस उपाय को बतलाइए ॥४-६॥
सनक बोले—महाप्राज्ञ ! धन्य हो, धन्य हो, तुमने अत्यंत विमल बुद्धि पाई है, क्योंकि इसीलिए
तुम सांसारिक दुःख से मुक्ति पाने के उपाय की ही इच्छा करते हो ॥७॥ व्रती ! जिसकी आज्ञा से ब्रह्मा
समस्त विश्व की सृष्टि करते, विष्णु पालन करते और रुद्र संहार करते हैं, वही मोक्षदाता हैं ॥८॥ अहम् आदि
तत्त्व से लेकर विशेष पर्यन्त सारे पदार्थ जिससे उत्पन्न हुए हैं उसी अनामय, विष्णु नारायण को मोक्षदाता सम-
झना चाहिए ॥९॥ जिससे यह संसार भिन्न नहीं अर्थात् जो विश्व रूप है, जो स्वयं सचेष्ट और निश्चेष्ट
(अकाम-सकाम) दोनों हैं उसी उग्र अजर देव का ध्यानकर मानव दुःखों से मुक्ति पाता है ॥१०॥ उस अविकार
२७—ना० पु०
यहाँ प्रस्तुत पृष्ठ का संपूर्ण पाठ पंक्ति-दर-पंक्ति देवनागरी लिपि में दिया गया है:
२१० नारदीयपुराणम्
अविकारमजं शुद्धं स्वप्रकाशं निरंजनम् । ज्ञानरूपं सदानन्दं प्राहुर्वै मोक्षसाधनम् ॥११॥
यस्यावताररूपाणि ब्रह्माद्या देवतागणाः । समर्चयंति तं विद्याच्छाश्वतस्थानदं हरिम् ॥१२॥
जितप्राणा जिताहाराः सदा ध्यानपरायणाः । हृदि पश्यंति यं सत्यं तं जानीहि सुखावहम् ॥१३॥
निर्गुणोऽपि गुणाधारो लोकानुग्रहरूपधृक् । आकाशमध्यगः पूर्णस्तं प्राहुर्मोक्षदं नृणाम् ॥१४॥
अध्यक्षः सर्वकार्याणां देहिनो हृदये स्थितः । अनूपमोऽखिलाधारस्तं देवं शरणं व्रजेत् ॥१५॥
सर्वं संगृह्य कल्पांते शेते यस्तु जले स्वयम् । तं प्राहुर्मोक्षदं विष्णुं मुनयस्तत्त्वदर्शिनः ॥१६॥
वेदार्थविद्भिः कर्मज्ञैरिज्यते विविधैर्मखैः । स एव कर्मफलदो मोक्षदोऽकामकर्मणाम् ॥१७॥
हव्यकव्यादिदानेषु देवतापितृरूपधृक् । भुंक्ते य ईश्वरोऽव्यक्तस्तं प्राहुर्मोक्षदं प्रभुम् ॥१८॥
ध्यातःप्रणमितो वापि पूजितो वापि भक्तितः । ददाति शाश्वतं स्थानं तं दयालुं समर्चयेत् ॥१९॥
आधारः सर्वभूतानामेको यः पुरुषः परः । जरामरणनिर्मुक्तो मोक्षदः सोऽव्ययो हरिः ॥२०॥
संपूज्य यस्य पादाब्जं देहिनोऽपि मुनीश्वर । अमृतत्वं भजंत्याशु तं विदुः पुरुषोत्तमम् ॥२१॥
आनन्दमजरं ब्रह्म परं ज्योतिः सनातनम् । परात्परतरं यच्च तद्विष्णोः परमं पदम् ॥२२॥
अद्वयं निर्गुणं नित्यमद्वितीयमनौपमम् । परिपूर्णं ज्ञानमयं विदुर्मोक्षप्रसाधकम् ॥२३॥
एवंभूतं परं वस्तु योगमार्गविधानतः । य उपास्ते सदा योगी स याति परमं पदम् ॥२४॥
सर्वसंगपरित्यागी शमादिगुणसंयुतः । कामाद्यैर्वर्जितो योगी लभते परमं पदम् ॥२५॥
अज, शुद्ध, स्वप्रकाश निरंजन, ज्ञानरूप और सदानन्द को ही मोक्ष-साधन कहा जाता है ॥११॥ जिसके अवतार
रूपों की ब्रह्मा आदि देवतागण अर्चा करते हैं उसी हरि को शाश्वत मोक्षदाता जानना चाहिए ॥१२॥ जितप्राण,
जिताहार और सदा ध्यानपरायण साधुजन ही जिस ब्रह्म को हृदय में दर्शन कर लेते हैं उसी सुखदायक सत्य को
मुक्तिप्रद जानो ॥१३॥ जो निर्गुण होता हुआ भी गुणाधार है जो लोकानुग्रह के लिए अवतार रूप धारण करने
वाला, पूर्ण और आकाशमध्यचारी है वही मनुष्यों का मोक्षदाता कहा जाता है ॥१४॥ वह सब कार्यों का अध्यक्ष,
प्राणियों के हृदय में स्थित रहने वाला, अनुपम और निखिल विश्व का आधार है, उस देव के ही शरण में
जाना चाहिए ॥१५॥ जो कल्पान्त में सारी सृष्टि को अपने में लीन कर जल में शयन करता है, तत्त्वदर्शी
मुनि उसी विष्णु को मोक्षप्रद कहते हैं ॥१६॥ कर्म और वेद के तत्त्वज्ञाता लोग विविध यज्ञों से जिसकी
उपासना करते हैं, वही निष्काम कर्म करने वाले मनुष्यों को कर्मफल प्रदान करता है ॥१७॥ जो अव्यक्त ईश्वर
हव्य कव्य आदि दान में देवता और पितरों का रूप धारण कर दिये हुये पदार्थों को भोग करता है, उसी
प्रभु को मोक्षद कहते हैं ॥१८॥ जो भक्ति पूर्वक ध्यान, प्रणाम, पूजा करने से शाश्वत स्थान प्रदान करता है, उस
दयालु की भक्ति पूर्वक पूजा करनी चाहिए ॥१९॥ जो सब भूतों का एक मात्र आधार है, जो श्रेष्ठ पुरुष, जरा-
मरण से रहित अव्यय हरि है वह मोक्ष देने वाला है ॥२०॥ मुनीश्वर, जिसके चरण कमल की पूजा कर मरण-
शील मानव भी अमर बन जाता है उसको पुरुषोत्तम समझते हैं ॥२१॥ जो आनन्द, अजर, परब्रह्म सनातन ज्योति
और पर से भी पर है वह विष्णु का परम पद है ॥२२॥ अद्वैत, निर्गुण, नित्य, अद्वितीय, अनुपम, परिपूर्ण, ज्ञानमय
ब्रह्म ही मोक्ष के देने वाले हैं ॥२३॥ जो योगी सदा ऐसे पर वस्तु की योग विधि से उपासना करता है वह
परमपद को प्राप्त करता है ॥२४॥ सब प्रकार की आसक्ति से रहित, शम आदि गुणों से युक्त और काम
आदि गुणों से मुक्त रहने वाला योगी परम पद को प्राप्त करता है ॥२५॥
त्रयस्त्रिंशोऽध्यायः २११
नारद उवाच
कर्मणा केन योगस्य सिद्धिर्भवति योगिनाम् । तदुपायं यथातत्त्वं ब्रूहि मे वदतां वर ॥२६॥
सनक उवाच
ज्ञानलभ्यं परं मोक्षं प्राहुस्तत्त्वार्थचिंतकाः । यज्ज्ञानं भक्तिमूलं च भवितः कर्मवतां तथा ॥२७॥
दानानि यज्ञा विविधास्तीर्थयात्रादयः कृताः । येन जन्मसहस्रेषु तस्य भक्तिर्भवेद्धरौ ॥२८॥
अक्षयः परमो धर्मो भक्तिलेशेन जायते । श्रद्धया परया चैव सर्वं पापं प्रणश्यति ॥२९॥
सर्वपापेषु नष्टेषु बुद्धिर्भवति निर्मला । सैव बुद्धिः समाख्याता ज्ञानशब्देन सूरिभिः ॥३०॥
ज्ञानं च मोक्षदं प्राहुस्तज्ज्ञानं योगिनां भवेत् । योगस्तु द्विविधः प्रोक्तः कर्मज्ञानप्रभेदतः ॥३१॥
क्रियायोगं विना नृणां ज्ञानयोगो न सिध्यति । क्रियायोगरतस्तस्माच्छ्रद्धया हरिमर्चयेत् ॥३२॥
द्विजभूम्यग्निसूर्याम्बुधातुहृच्चित्रसंज्ञिताः । प्रतिमाः केशवस्यैता पूज्य एतासु भक्तितः ॥३३॥
कर्मणा मनसा वाचा परपीडापराङ्मुखः । तस्मात्सर्वगतं विष्णुं पूजयेद्भक्तिसंयुतः ॥३४॥
अहिंसा सत्यमक्रोधो ब्रह्मचर्यापरिग्रहौ । अनीर्ष्या च दया चैव योगयोर्ह्वयोः समाः ॥३५॥
चराचरात्मकं विश्वं विष्णुरेव सनातनः । इति निश्चित्य मनसा योगद्वितयमभ्यसेत् ॥३६॥
आत्मवत्सर्वभूतानि ये मन्यंते मनीषिणः । ते जानंति परं भावं देवदेवस्य चक्रिणः ॥३७॥
यदि क्रोधादिदुष्टात्मा पूजाध्यानपरो भवेत् । न तस्य तुष्यते विष्णूर्यतो धर्मपतिः स्मृतः ॥३८॥
यदि कामादिदुष्टात्मा देवपूजापरो भवेत् । दंभाचारः स विज्ञेयः सर्वपातकैभिः समः ॥३६॥
नारद बोले--हे वक्ताओं में श्रेष्ठ ! योगियों को किस कर्म से योग-सिद्धि प्राप्त होती है ?
उसका उपाय तत्त्वतः बताइए ॥२६॥
सनक बोले--तत्त्वार्थ चिन्तकों ने पर मोक्ष को ज्ञानलभ्य कहा है । उस ज्ञान का मूल भक्ति है,
जो कर्मशील व्यक्ति को ही प्राप्त होती है । ॥२७॥ जिसने सहस्रों जन्म में दान यज्ञ और विविध तीर्थ-
यात्रायें की हैं, उसकी हरि चरणों में भक्ति होती है ।।२८।। भक्ति के लेश मात्र से भी अक्षय परम धर्म प्राप्त होता
है और अति उत्तम श्रद्धा से सब पाप नष्ट हो जाते हैं ॥२९॥ सब पापों के नष्ट हो जाने पर बुद्धि निर्मल हो जाती
है । विद्वानों ने उसी निर्मल बुद्धि को ज्ञान नाम से कहा है ।।३०।। ज्ञान को मोक्ष देने वाला कहा गया है । वह
ज्ञान योगियों को प्राप्त होता है । कर्म और ज्ञान भेद से योग दो प्रकार का कहा गया है ।।३१।। मनुष्यों को कर्म
योग के बिना ज्ञान योग सिद्ध नहीं होता । इसलिए कर्म योग में लीन रह कर श्रद्धापूर्वक हरि की उपासना करनी
चाहिए ।।३२।। ब्राह्मण, भूमि, अग्नि, सूर्य, जल, धातु की बनी मूर्ति, हृदय और केशव का चित्र इतनी केशव की
प्रतिमायें हैं । इन प्रतिमाओं में केशव की भक्ति पूर्वक पूजा करनी चाहिए ।।३३।। इसलिए मन, कर्म और वचन से
किसी को पीड़ा न देते हुए भक्तिपूर्वक, सर्वव्यापक विष्णु की पूजा करे ॥३४॥ अहिंसा, सत्य, अक्रोध,
ब्रह्मचर्य, अपरिग्रह, अनीर्ष्या (सहानुभूति) और दया दोनों योगों में समानरूप से आवश्यक है ।।३५।। यह सारा
चराचरात्मक विश्व विष्णु का ही रूप है, ऐसा मन में निश्चय कर दोनों योगों का अभ्यास करना चाहिए
।।३६।। जो मनीषी सब प्राणियों को आत्मवत् समझते हैं वे देवाधिदेव चक्रधर विष्णु के परम रहस्य को
जानते हैं ।।३७।। यदि क्रोध आदि से मलिन आत्मा वाला व्यक्ति पूजा और ध्यान करता है उस पर विष्णु कभी
प्रसन्न नहीं होते, क्योंकि वे धर्मपति कहे जाते हैं ।।३८।।
यदि कोई कामादि दोषों से दूषित अन्तः करण वाला व्यक्ति देवपूजा करता है, उसको दम्भी समझना चाहिए
२१२ नारदीयपुराणम्
तपः पूजाध्यानपरो यस्त्वसूयारतो भवेत् । तत्तपः सा च पूजा च तद्ध्यानं हि निरर्थकम् ॥४०॥
तस्मात्सर्वात्मकं विष्णुं शमादिगुणतत्परः । मुक्त्यर्थमर्चयेत्सम्यक् क्रियायोगपरो नरः ॥४१॥
कर्मणा मनसा वाचा सर्वलोकहिते रतः । समर्चयति देवेशं क्रियायोगः स उच्यते ॥४२॥
नारायणं जगद्योनिं सर्वान्तर्यामिणं हरिम् । स्तोत्राद्यैः स्तौति यो विष्णुं कर्मयोगी स उच्यते ॥४३॥
उपवासादिभिश्चैव पुराणश्रवणादिभिः । पुष्पाद्यैश्चार्चनं विष्णोः क्रियायोग उदाहृतः ॥४४॥
एवं भक्तिमतां विष्णौ क्रियायोगरतात्मनाम् । सर्वपापानि नश्यंति पूर्वजन्मार्जितानि वै ॥४५॥
पापक्षयाच्छुद्धमतिर्वाञ्छति ज्ञानमुत्तमम् । ज्ञानं हि मोक्षदं ज्ञेयं तदुपायं वदामि ते ॥४६॥
चराचरात्मके लोके नित्यं चानित्यमेव च । सम्यग् विचारयेद्धीमात्सद्भिः शास्त्रार्थकोविदैः ॥४७॥
अनित्यास्तु पदार्था वै नित्यमेको हरिः स्मृतः । अनित्यानि परित्यज्य नित्यमेव समाश्रयेत् ॥४८॥
इहामुत्र च भोगेषु विरक्तश्च तथा भवेत् । अविरक्तो भवेद्यस्तु स संसारे प्रवर्तते ॥४९॥
अनित्येषु पदार्थेषु यस्तु रागी भवेन्नरः । तस्य संसारविच्छित्तिः कदाचिन्नैव जायते ॥५०॥
शमादिगुणसम्पन्नो मुमुक्षुर्ज्ञानमभ्यसेत् । शमादिगुणहीनस्य ज्ञानं नैव च सिध्यति ॥५१॥
रागद्वेषविहीनो यः शमादिगुणसंयुतः । हरिध्यानपरो नित्यं मुमुक्षुरभिधीयते ॥५२॥
चतुर्भिः साधनैरेभिर्विशुद्धमतिरुच्यते । सर्वगं भावयेद्विष्णुं सर्वभूतदयापरः ॥५३॥
क्षराक्षरात्मकं विश्वं व्याप्य नारायणः स्थितः । इति जानाति यो विप्र तज्ज्ञानं योगजं विदुः ॥५४॥
योगोपायमतो वक्ष्ये संसारविनिवर्त्तकम् । योगं ज्ञानं विशुद्धं स्यात्तज्ज्ञानं मोक्षदं विदुः ॥५५॥
[ और वह सब प्रकार के पापियों के बराबर है ॥३६॥ जो तप, ध्यान और पूजा करता हुआ भी असूया का त्याग
नहीं करता है, उसकी वह तपस्या, पूजा और ध्यान निरर्थक है ॥४०॥ इसलिए कर्मयोगी विधिपूर्वक शम, दम
आदि गुणों से युक्त होकर सर्वात्मक विष्णु की मुक्ति के लिए पूजा करे ॥४१॥ मन, वचन और कर्म से जो लोक-
कल्याण में लीन रहता है; वह मानो देवेश की भली भाँति अर्चा करता है और उसी को क्रिया-योग कहते हैं ॥४२॥
जो जगत् के आदि कारण, सर्वान्तर्यामी, हरि, विष्णु की स्तोत्र आदि से स्तुति करता है, वह कर्मयोगी कहा
जाता है ॥४३॥ उपवास आदि व्रत, पुराण-श्रवण और पुष्प, धूप आदि से विष्णु का अर्चन हो क्रियायोग कहा
गया है ॥४४॥ इस प्रकार भक्ति पूर्वक क्रिया योग में रत रहने वाले भक्तों के पूर्व जन्माजित सब पाप नष्ट हो
जाते हैं ॥४५॥ पाप-क्षय से शुद्ध बुद्धि वाले व्यक्ति उत्तम ज्ञान की ही कामना करते हैं । ज्ञान मोक्ष देने वाला है ।
इसलिए ज्ञान प्राप्ति का उपाय तुमको बतला रहा हूँ ॥४६॥
धीमान् व्यक्ति शास्त्र-तत्त्व जानने वाले सज्जनों से उपदेश प्राप्त कर इस चराचरात्मक लोक में नित्य, अनित्य
को पहचाने ॥४७॥ संसार के सब पदार्थ अनित्य हैं, केवल एक हरि ही नित्य हैं। अनित्य को छोड़कर नित्य को
ही अपनाना चाहिए ॥४८॥ लौकिक और स्वर्गीय भोगों से सदा विरक्त रहना चाहिए । जो भोगों से विरक्त नहीं
रहता, वह संसार में जन्म लेता है ॥४९॥ जो मनुष्य अनित्य पदार्थों से अनुराग करता है, उसका संसार के माया-
बन्धन से वियोग नहीं होता । वह उसी से बँधा रहता है ॥५०॥ मुक्ति के इच्छुक शम, दम आदि गुणों से युक्त
होकर ज्ञान का अवश्य अभ्यास करें । शम, दम आदि गुणों से हीन व्यक्ति को ज्ञान-प्राप्ति कभी नहीं होती ॥५१॥
राग-द्वेष से हीन, शम आदि गुणों से युक्त और नित्य प्रति भगवान् का चिन्तन करने वाला व्यक्ति ही मुमुक्षु
कहा जाता है ॥५२॥ इन चार साधनों से ही विमल बुद्धि होती है, ऐसा शास्त्रीय कथन है । सब प्राणियों के प्रति
दया भाव रखकर सर्वत्र व्यापक विष्णु का ध्यान करना चाहिए ॥५३॥ विप्र ! भगवान् नारायण क्षराक्षरात्मक
(जड चेतनमय) संसार में व्याप्त होकर रहते हैं ऐसा जिसको ज्ञान हो जाता है, उसको योगज ज्ञान
कहते हैं ॥५४॥ इसके आगे अब संसार से मुक्ति दिलाने वाले योगोपाय को बतला रहा हूँ । विशुद्ध ज्ञान ही योग
२१३
त्रयस्त्रिंशोऽध्यायः
आत्मानं द्विविधं प्राहुः परापरविभेदतः । द्वे ब्रह्मणी वेदितव्ये इति चाथर्वणी श्रुतिः ॥५६॥
परस्तु निर्गुणः प्रोक्तो ह्यहंकारयुतोऽपरः । तयोरभेदविज्ञानं योग इत्यभिधीयते ॥५७॥
पंचभूतात्मके देहे यः साक्षी हृदये स्थितः । अपरः प्रोच्यते सद्भिः परमात्मा परः स्मृतः ॥५८॥
शरीरं क्षेत्रमित्याहुस्तत्स्थः क्षेत्रज्ञ उच्यते । अव्यक्तः परमः शुद्धः परिपूर्ण उदाहृतः ॥५९॥
यदा त्वभेदविज्ञानं जीवात्मपरमात्मनोः । भवेत्तदा मुनिश्रेष्ठ पाशच्छेदोऽपरात्मनः ॥६०॥
एकः शुद्धोऽक्षरो नित्यः परमात्मा जगन्मयः । नृणां विज्ञानभेदेन भेदवानिव लक्ष्यते ॥६१॥
एकमेवाद्वितीयं यत्परं ब्रह्म सनातनम् । गीयमानं च वेदांन्तैस्तस्मान्नास्ति परं द्विज ॥६२॥
न तस्य कर्म कार्यं वा रूपं वर्णमथापि वा । कर्तृत्वं वापि भोक्तृत्वं निर्गुणस्य परात्मनः ॥६३॥
निदानं सर्वहेतूनां तेजो यत्तेजसां परम् । किमप्यन्यद्यतो नास्ति तज्ज्ञेयं मुक्तिहेतवे ॥६४॥
शब्दब्रह्ममयं यत्तन्महावाक्यादिकं द्विज । तद्विचारोद्भवं ज्ञानं परं मोक्षस्य साधनम् ॥६५॥
सम्यग्ज्ञानविहीनानां दृश्यते विविधं जगत् । परमज्ञानिनामेतत्परब्रह्मात्मकं द्विज ॥६६॥
एक एव परानन्दो निर्गुणः परतः परः । भाति विज्ञानभेदेन बहुरूपधरोऽव्ययः ॥६७॥
मायिनो मायया भेदं पश्यन्ति परमात्मनि । तस्मान्मायां त्यजेद्योगान्मुमुक्षुर्द्विजसत्तम ॥६८॥
नासद्रूपा न सदरूपा माया नैवोभयात्मिका । अनिर्वाच्या ततो ज्ञेया भेदबुद्धिप्रदायिनी ॥६९॥
मायैव ज्ञानशब्देन बुद्ध्यते मुनिसत्तम । तस्मादज्ञानविच्छेदो भवेदै जितमायिनाम् ॥७०॥
सनातनं परं ब्रह्म ज्ञानशब्देन कथ्यते । ज्ञानिनां परमात्मा वै हृदि भाति निरन्तरम् ॥७१॥
है, वही ज्ञान मोक्ष दाता कहा गया है ॥५५॥ पर और अपर भेद से आत्मा के दो प्रकार कहे गये हैं। 'दो ब्रह्म
जानने योग्य हैं' ऐसा अथर्ववेद का वचन है ॥५६॥ निर्गुण को पर और अहंकार से युक्त आत्मा को अपर कहा
गया है । उन दोनों में अभेद बुद्धि रखना ही योग है ॥५७॥ इस पंचभूतात्मक देह में जो साक्षी रूप से हृदय में
निवास करता है उसको सज्जन अपर कहते हैं और परमात्मा को पर कहते हैं ॥५८॥ शरीर को क्षेत्र और शरीरस्थ
आत्मा को क्षेत्रज्ञ कहते हैं। वह अव्यक्त, पूर्ण परम और शुद्ध है ॥५६॥ मुनिश्रेष्ठ ! जिस समय मनुष्य को
जीवात्मा और परमात्मा का अभेद ज्ञान हो जाता है उस समय अपरात्मा (जीव) को मुक्ति प्राप्त हो जाती
है ॥६०॥ एक शुद्ध, अक्षर, नित्य, जगन्मय परमात्मा ही ज्ञान भेद से मनुष्य को भिन्न सा प्रतीत होता है ॥६१॥
द्विज ! जिस एक, अद्वितीय, पर सनातन ब्रह्म का वेदान्तों ने वर्णन किया है उससे पर दूसरा कोई पदार्थ नहीं
है ॥६२॥ उस निर्गुण परमात्मा का कर्म, कार्य, रूप अथवा वर्ण कुछ भी नहीं है, और न तो वह कर्त्ता या भोक्ता
हो है। वह सब कारणों का कारण और सब उत्कृष्ट तेज से भी उत्कृष्ट तेज है । जिसके अतिरिक्त अन्य कोई
पदार्थ नहीं है वही पर ब्रह्म मुक्ति-प्राप्ति के लिये ज्ञेय (कारण) है ॥६३-६४॥ द्विज ! शब्द ब्रह्म के समर्थक जितने
महावाक्य हैं उनके विवेचन से प्राप्त पर ज्ञान ही मोक्ष का साधन है । द्विज ! परब्रह्मस्वरूप यह जगत् सम्यग्ज्ञान
से शून्य अथवा अज्ञानियों को ही विविधरूपों में दिखाई पड़ता है ॥६५-६६॥ एक ही परानन्द, निर्गुण, परतः पर
अव्यय विज्ञान भेद से बहुरूपधारो जान पड़ता है ॥६७॥ मायाबद्ध मनुष्य माया के प्रभाव से परमात्म में भिन्नता
देखते हैं। इसलिए, द्विजवर्य ! मुमुक्षु योग द्वारा माया को छोड़े ॥६८॥ माया न तो सद्प है, न असद्रूप और
न सदसद्रूपा ही है, उस भेद बुद्धि प्रदान करने वाली माया को अनिर्वचनीय समझना चाहिए। मुनिश्रेष्ठ ! ज्ञान
के द्वारा माया को हो पहचाना जाता है। तभी जितमायी (विज्ञानी) का अज्ञान दूर होता है ॥६६-७०॥ ज्ञान
शब्द से सनातन पर ब्रह्म का हो निर्देश है। ज्ञानियों के हृदय में परमात्मा सर्वदा विराजमान रहता है। मुनिवर्य !
योगी अपने योगबल से अज्ञान का नाश करे ॥७१॥
२१४ नारदीयपुराणम्
अज्ञानं नाशयेद्योगी योगेन मुनिसत्तम । अष्टांगैः सिद्ध्यते योगस्तानि वक्ष्यामि तत्त्वतः ॥७२॥
यमाश्च नियमाश्चैव आसनानि च सत्तम । प्राणायामः प्रत्याहारो धारणा ध्यानमेव च ॥७३॥
समाधिश्च मुनिश्रेष्ठ योगाङ्गानि यथाक्रमम् । एषां संक्षेपतो वक्ष्ये लक्षणानि मुनीश्वर ॥७४॥
अहिंसा सत्यमस्तेयं ब्रह्मचर्यापरिग्रहौ । अक्रोधश्चानसूया च प्रोक्ताः संक्षेपतो यमाः ॥७५॥
सर्वेषामेव भूतानामक्लेशजननं हि यत् । अहिंसा कथिता सद्भिर्योगसिद्धिप्रदायिनी ॥७६॥
यथार्थकथनं यच्च धर्माधर्मविवेकतः । सत्यं प्राहुर्मनिश्रेष्ठ अस्तेयं शृणु साम्प्रतम् ॥७७॥
चौर्येण वा बलेनापि परस्वहरणं हि यत् । स्तेयमित्युच्यते सद्भीरस्तेयं तद्विपर्ययम् ॥७८॥
सर्वत्र मैथुनत्यागो ब्रह्मचर्यं प्रकीर्तितम् । ब्रह्मचर्यपरित्यागाज्ज्ञानवानपि पातकी ॥७६॥
सर्वसंगपरित्यागी मैथुने यस्तु वर्तते । स चंडालसमो ज्ञेयः सर्ववर्णबहिष्कृतः ॥८०॥
यस्तु योगरतो विप्र विषयेषु स्पृहान्वितः । तत्संभाषणमात्रेण ब्रह्महत्या भवेन्नृणाम् ॥८१॥
सर्वसंगपरित्यागी पुनः संगो भवेद्यदि । तत्संगसंगिनां संगान्महापातकदोषभाक् ॥८२॥
अनादानं हि द्रव्याणामापद्यपि मुनीश्वर । अपरिग्रह इत्युक्तो योगसिद्धिकारकः ॥८३॥
आत्मनस्तु समुत्कर्षादितिनिष्ठुरभाषणम् । क्रोधमाहुर्धर्मविदो ह्यक्रोधस्तद्विपर्ययः ॥८४॥
धनाद्यैरधिकं दृष्ट्वा भृशं मनसि तापनम् । असूया कीर्तिता सद्भिस्तत्त्यागो ह्यनसूयता ॥८५॥
एवं संक्षेपतः प्रोक्ता यमा विबुधसत्तम । नियमानपि वक्ष्यामि तुभ्यं ताञ्छृणु नारद ॥८६॥
तपःस्वाध्यायसंतोषाः शौचं च हरिपूजनम् । संध्योपासनमुख्याश्च नियमाः परिकीर्त्तिताः ॥८७॥
योग अष्टांगों द्वारा ही सिद्ध होता है उनको अब यथार्थ रूप से बतला रहा हूँ। मुनिश्रेष्ठ !
यम, नियम, आसन, प्राणायाम, प्रत्याहार, धारणा, ध्यान और समाधि ये ही क्रमशः योग के अंग हैं। मुनीश्वर !
संक्षेप में इनका लक्षण कह रहा हूँ ॥७२-७४॥ अहिंसा, सत्य, अस्तेय, ब्रह्मचर्य, अपरिग्रह, अक्रोध और अनसूया
ये ही संक्षेप में यम कहे गए हैं ॥७५॥ मनीषियों ने कहा है कि सभी प्राणियों को किसी प्रकार का कष्ट देना
ही अहिंसा है जो कि मनुष्य को योगसिद्धि प्रदान करने वाली है ॥७६॥ मुनिश्रेष्ठ ! धर्म अधर्म का विचार कर
जिसको जैसे देखा जाय उसको उसी रूप में कह देना ही सत्य है। अब अस्तेय की परिभाषा सुनिए। शिष्ट
पुरुषों ने कहा है कि चोरी से या बलपूर्वक किसी का धन छीन लेना ही स्तेय है, इसके विपरीत अस्तेय है
॥७७-७८॥ कहीं किसी भी अवस्था में मैथुन न करना ही ब्रह्मचर्य है। ब्रह्मचर्य के त्याग से ज्ञानी भी पापी
है ॥७६॥ सब संग (आसक्ति) का परित्याग करने वाला व्यक्ति भी यदि मैथुन करता है तो वह सब वर्णों
से बहिष्कृत है, उसको चाण्डाल के समान जानना चाहिए ॥८०॥ विप्र! जो योगरत रहने पर भी विषय वासना
की इच्छा करता है उससे बातचीत करने से भी मनुष्य को ब्रह्महत्या का पाप लगता है। सब प्रकार की आसक्तियों
का त्याग करने वाला व्यक्ति यदि फिर रागी बन जाय उसके सहकर्मी या संगियों की संगति से भी महापाप का
दोषभागी बनना पड़ता है ॥८१-८२॥ मुनीश्वर ! आपत्ति में भी किसी दूसरे से कुछ न लेना अपरिग्रह कहा गया है
जिसके पालन से योगसिद्धि मिल जाती है ॥८३॥ अपने उत्कर्ष के अभिमान से जो निष्ठुर भाषण किया जाता
है उसको क्रोध कहते हैं इसके विपरीत अक्रोध कहा जाता ॥८४॥ धनादि से किसी को अपने से अधिक देखकर
जो मन में अधिक सन्ताप होता है उसको असूया कहते हैं, उसका परित्याग करना अनसूया कहा जाता है।
॥८५॥ बुधश्रेष्ठ ! इस प्रकार संक्षेप में यमों का वर्णन कर दिया गया, नारद! अब नियमों को बता रहा हूँ
उसको सुनो ॥८६॥
तप, स्वाध्याय, सन्तोष, शौच, हरिपूजन और मुख्यरूप से सन्ध्योपासन ये नियम कहे गए हैं ॥८७॥
त्रयस्त्रिंशोऽध्यायः २१५
चांद्रायणादिभिर्यत्र शरीरस्य विशोषणम् । तपो निगदितं सद्भिर्योगसाधनमुत्तमम् ॥८८॥
प्रणवस्योपनिषदां द्वादशार्णस्य च द्विज । अष्टाक्षरस्य मंत्रस्य महावाक्यचयस्य च ॥८९॥
जपः स्वाध्याय उदितो योगसाधनमुत्तमम् । स्वाध्यायं यस्त्यजेन्मूढस्तस्य योगो न सिध्यति ॥९०॥
योगं विनापि स्वाध्यायात्पापनाशो भवेन्नृणाम् । स्वाध्यायैस्तोष्यमाणाश्च प्रसीदंति हि देवताः ॥९१॥
जपस्तु त्रिविधः प्रोक्तो वाचिकोपांशुमानसः । त्रिविधेऽपि च विप्रेन्द्र पूर्वात्पुवत्परो वरः ॥९२॥
मंत्रस्योच्चारणं सम्यक्स्फुटाक्षरपदं यथा । जपस्तु वाचिकः प्रोक्तः सर्वयज्ञफलप्रदः ॥९३॥
मंत्रस्योच्चारणे किंचित्पदात्पदविवेचनम् । स तूपांशर्जपः प्रोक्तः पूर्वस्माद्द्विगुणोऽधिकः ॥९४॥
विधाय हृद्यक्षरश्रेण्यां तत्तदर्थविचारणम् । स जपो मानसः प्रोक्तो योगसिद्धिप्रदायकः ॥९५॥
जपेन देवता नित्यं स्तुवतः संप्रसीदति । तस्मात्स्वाध्यायसंपन्नो लभेत्सर्वान्मनेारथान् ॥९६॥
यदृच्छालाभसंतुष्टिः संतोष इति गीयते । संतोषहीनः पुरुषो न लभेच्छर्म कुत्रचित् ॥९७॥
न जातु कामः कामानामुपभोगेन शाम्यति । इतोऽधिकं कदा लप्स्य इति कामस्तु वर्द्धते ॥९८॥
तस्मात्कामं परित्यज्य देहसंशोषकारणम् । यदृच्छालाभसंतुष्टो भवेद्धर्मपरायणः ॥९९॥
बाह्याभ्यन्तरभेदेन शौचं तु द्विविधं स्मृतम् । मृज्जलाभ्यां बहिः शुद्धिर्भावशुद्धिस्तथान्तरम् ॥१००॥
अन्तःशुद्धिविहीनस्तु येऽध्वरा विविधाः कृताः । न फलंति मुनिश्रेष्ठ भस्मनि न्यस्तहव्यवत् ॥१०१॥
भावशुद्धिविहीनानां समस्तं कर्म निष्फलम् । तस्माद्रागादिकं सर्वं परित्यज्य सुखी भवेत् ॥१०२॥
मृदा भारसहस्रैस्तु कुम्भकोटिजलैस्तथा । कृतशौचोऽपि दुष्टात्मा चंडालसदृशः स्मृतः ॥१०३॥
चान्द्रायण आदि व्रत द्वारा शरीर के शोषण को महात्माओं ने उत्तम योग साधन और तप कहा है ॥८८॥ ओंकार
उपनिषद्, द्वादशाक्षर मन्त्र, अष्टाक्षर मन्त्र और जिस (सम्प्रदाय) के जो महावाक्य हैं, उनका जप ही स्वाध्याय
है जो कि उत्तम योग साधन है । जो मूढ़ स्वाध्याय का त्याग कर देता है उसका योग कभी भी सिद्ध नहीं होता
॥८९-९०॥ बिना योग के भी केवल स्वाध्याय से मनुष्यों के पाप नष्ट हो जाते हैं । स्वाध्याय के द्वारा जिन
देवताओं की स्तुति की जाती है, वे अवश्य प्रसन्न होते हैं ॥९१॥ जप, वाचिक उपांशु, और मानस भेद से तीन प्रकार
का होता है। इस त्रिविध जप में पूर्वपेक्षा पर श्रेष्ठ माना गया है ॥९२॥ जिस जप में मन्त्र के अक्षरों, पदों का स्फुट
रूप से भलीभाँति उच्चारण किया जाता है उसको वाचिक जप कहा जाता है, ऐसा जप सब यज्ञों के फल को देने
वाला है । जिस जप में मन्त्रोच्चारण करते समय मंत्रपदों का कुछ विवेचन किया जाता है उसको उपांशु जप कहते
हैं । यह पूर्व वाचिक जप से दुगुना अधिक फल देने वाला है । अक्षरों की पृथक्-पृथक् श्रेणी बनाकर उसके अर्थों पर
ध्यान देकर मन में ही जप करना मानस जप कहा है। यह जप योगसिद्धि को देने वाला है । जप द्वारा देवताओं की
स्तुति करने पर देवता शीघ्र प्रसन्न होते हैं । इसलिए स्वाध्याय करने वाला व्यक्ति अपने सब मनोरथों को प्राप्त करता
है ॥८३-९६॥ जो कुछ मिल जाय उसी पर प्रसन्न रहना सन्तोष कहा जाता है । संतोष हीन व्यक्ति कभी और कहीं
सुख नहीं पा सकता ॥९७॥ विषयोपभोग से कभी भी इच्छा-तृप्ति नहीं होती । इसमें तो 'इससे अधिक कब प्राप्त
करूंगा' ऐसी इच्छा बनी ही रहती है, जिससे दिनों दिन काम (इच्छा) बढ़ता ही रहता है । इसलिए देह को
सुखा देने वाले को छोड़कर सर्वदा श्रम से जो कुछ मिल जाय उसी पर सन्तोष करना चाहिए ॥९८-९९॥
बाह्य और आभ्यन्तर भेद से शौच दो प्रकार का होता है । मिट्टी और जल से की हुई शुद्धि बाह्य-
शुद्धि और भावशुद्धि आभ्यन्तर शुद्धि है ॥१००॥ मुनिश्रेष्ठ ! अन्तःशुद्धि विहीन मनुष्यों के किए हुए विविध-यज्ञ
राख में दी हुई आहुति की भाँति कभी भी फलदायक नहीं होते ॥१०१॥ बिना भावशुद्धि के सभी कर्म
निष्फल हो जाते हैं । इस लिए रागादि का परित्याग करके ही मनुष्य सुखी होता है ॥१०२॥ हजारों मन
मिट्टी और करोड़ों घड़ों के जल से शुद्धि करने पर भी दुष्टात्मा व्यक्ति चाण्डाल के समान ही माना जाता
२१६ नारदीयपुराणम्
अंतःशुद्धिविहीनस्तु देवपूजापरो यदि । तमेव दैवतं हंति नरकं च प्रपद्यते ॥१०४॥
अंतःशुद्धिविहीनश्च बहिः शुद्धिं करोति यः । अलंकृतः सुराभाण्ड इव शांतिं न गच्छति ॥१०५॥
मनःशुद्धिविहीना ये तीर्थयात्रां प्रकुर्वते । न तान्पुनंति तीर्थानि सुराभांडमिवापगा ॥१०६॥
वाचा धर्मान्प्रवदति मनसा पापमिच्छति । जानीयातं मुनिश्रेष्ठ महापातकिनां वरम् ॥१०७॥
विशुद्धमानसा ये तु धर्ममात्रमनुत्तमम् । कुर्वंति तत्फलं विद्यादक्षयं सुखदायकम् ॥१०८॥
कर्मणा मनसा वाचा स्तुतिश्रवणपूजनैः । हरिभक्तिर्दृढा यस्य हरिपूजेति गीयते ॥१०८॥
यमाश्च नियमाश्चैव संक्षेपेण प्रबोधिताः । एभिर्विशुद्धमनसां मोक्षं हस्तगतं विदुः ॥११०॥
यमैश्च नियमैश्चैव स्थिरबुद्धिर्जितेन्द्रियः । अभ्यसेदासनं सम्यग्योगसाधनमुत्तमम् ॥१११॥
पद्मकं स्वस्तिकं पीठं सैंहं कौक्कुटकौजरे । कौमं वज्रासनं चैव वाराहं मृगचैलिकम् ॥११२॥
क्रौञ्चं च नालिकं चैव सर्वतोभद्रमेव च । वार्षभं नागमात्स्ये च वैयाघ्रं चार्द्धचन्द्रकम् ॥११३॥
दंडवातासनं शैलं स्वभ्रं मौद्गरमेव च । माकरं त्रैपथं काष्ठं स्थाणुं वैकर्णिकं तथा ॥११४॥
भौमं वीरासनं चैव योगसाधनकारणम् । त्रिंशत्संख्यान्यासनानि मुनीन्द्रैः कथितानि वै ॥११५॥
एषामेकतमं बद्ध्वा गुरुभक्तिपरायणः । उपासको जयेत्प्राणान्द्वन्द्वातीतो विमत्सरः ॥११६॥
प्राङ्मुखोदङ्मुखो वापि तथा प्रत्यङ्मुखोऽपि वा । अभ्यासेन जयेत्प्राणान्निःशब्दे जनवर्जिते ॥११७॥
प्राणो वायुः शरीरस्थ आयामस्तस्य निग्रहः । प्राणायाम इति प्रोक्तो द्विविधः स प्रकीर्त्तितः ॥११८॥
है ॥१०३॥ अन्तः शुद्धि के बिना जो व्यक्ति देवपूजा करता है, देवता उसी का सर्वनाश करते हैं और वह नरक-
गामी भी होता है ॥१०४॥ जो अन्तःशुद्धि के बिना बाह्यशुद्धि पर ही ध्यान देता है वह ऊपर से
सजाये हुए मदिरा पात्र के समान है और ऐसे दम्भी को शान्ति कभी भी नहीं मिलती ॥१०५॥
जो व्यक्ति बिना मन को शुद्ध किए तीर्थ यात्रा करता है, उसको तीर्थ उसी प्रकार पवित्र करने में असमर्थ होता
है, जिस प्रकार देव-सरिता मदिरा से भरे पात्र को ॥१०६॥ जो वाणी द्वारा धर्म का उपदेश देता है और हृदय
से पाप करना चाहता है, मुनिश्रेष्ठ ! उसको महापापियों में शिरोमणि समझना चाहिए ॥१०७॥ जो विशुद्ध
अन्तःकरण वाला व्यक्ति केवल उत्तम धर्म का पालन करता है, उसको अक्षय सुखदायक फल प्राप्त होता है ॥१०८॥
मन, वाणी, क्रिया, स्तुति, नामश्रवण और पूजा के द्वारा भगवान् में अचल भक्ति रखने को ही हरिपूजा
कहते हैं । यम और नियमों को इस प्रकार संक्षेप में कह दिया। इन यम-नियमों के पालन से मनुष्यों का अन्तः
करण विशुद्ध होता है और विशुद्ध अन्तःकरण वालों को मोक्ष अनायास प्राप्त हो जाता है ॥१०६-११०॥ जिते-
न्द्रिय व्यक्ति यम-नियमों के अभ्यास से स्थिर बुद्धि होकर आसनों का अभ्यास भली भांति करे, जो कि उत्तम योग-
साधन हैं । मुनिवरों ने पद्मक, स्वस्तिक, पीठ, सिंह, कुक्कुट, कुंजर, कूर्म्म, वज्र, वाराह, मृग, चैलिक, क्रौञ्च, नालिक,
सर्वतोभद्र, वार्षभ (वृषभासन), नाग, मत्स्य, व्याघ्र, अर्द्धचन्द्र, दण्डवातासन, शैल, स्वभ्र, मौद्गर, मकर, त्रिपथ,
काष्ठ, स्थाणु, वैकर्णिक, भौम और वीरासन नामक तीस आसनों का वर्णन किया है ॥१११-११५॥ इसमें
से किसी एक आसन का अभ्यास करके भी गुरुभक्तिनिष्ठ उपासक प्राण पर अधिकार कर सकता और मात्सर्य
तथा द्वन्द्व को जीत सकता है। नीरव और निर्जन स्थान में पूर्व उत्तर या पश्चिमाभिमुख हो आसन लगाकर
अभ्यास के द्वारा प्राण वायु पर अधिकार करना चाहिए ॥११६-११७॥
शरीर-सञ्चारी वायु को प्राण कहा जाता है। आयाम का अर्थ उसका निग्रह करना है। इस प्रकार
प्राण को वश में करना ही प्राणायाम कहा जाता है । यह दो प्रकार का होता है ; अगर्भ और सगर्भ । इनमें
त्रयस्त्रिंंशोऽध्यायः २१७
अगर्भश्च सगर्भश्च द्वितीयस्तु तयोर्वरः। जपध्यानं विनागर्भः सगर्भस्तत्समन्वितः ॥११६॥
रेचकः पूरकश्चैव कुंभकः शून्यकस्तथा। एवं चतुर्विधः प्रोक्तः प्राणायामो मनीषिभिः ॥१२०॥
जंतूनां दक्षिणा नाडी पिंगला परिकीर्तिता। सूर्यदेवतका चैव पितृयोनिरिति श्रुता ॥१२१॥
देवयोनिरिति ख्याता इडा नाडी त्वदक्षिणा। तत्राधिदैवतं चंद्रं जानीहि मुनिसत्तम ॥१२२॥
एतयोरुभयोर्मध्ये सुषुम्णा नाडिका स्मृता। अतिसूक्ष्मा गुह्यतमा ज्ञेया सा ब्रह्मदैवता ॥१२३॥
वामेन रेचयेद्वायुं रेचनाद्रेचकः स्मृतः। पूरयेद्दक्षिणेनैव पूरणात्पूरकः स्मृता ॥१२४॥
स्वदेहपूरितं वायुं निगृह्य न विमुंचति। संपूर्णकुं भवत्तिष्ठेत्कुम्भकः स हि विश्रुतः ॥१२५॥
न गृह्णाति न त्यजति वायुमंतर्बहिःस्थितम्। विद्धि तच्छून्यकं नाम प्राणायामं यथास्थितम् ॥१२६॥
शनैःशनैर्विजेतव्यः प्राणो मत्तगजेन्द्रवत्। अन्यथा खलु जायन्ते महारोगा भयंकराः ॥१२७॥
क्रमेण योजयेद्वायुं योगी विगतकल्मषः। स सर्वपापनिर्मुक्तो ब्रह्मणः पदमाप्नुयात् ॥१२८॥
विषयेषु प्रसक्तानि चेन्द्रियाणि मुनीश्वरः। समाहृत्य निगृह्णाति प्रत्याहारस्तु स स्मृतः ॥१२६॥
जितेन्द्रिया महात्मानो ध्यानशून्या अपि द्विज। प्रयान्ति परमं ब्रह्म पुनरावृत्तिदुर्लभम् ॥१३०॥
अनिजितेन्द्रियग्रामं यस्तु ध्यानपरो भवेत्। मूढात्मानं च तं विद्याद्ध्यानं चास्य न सिध्यति ॥१३१॥
यद्यत्पश्यति तत्सर्वं पश्येदात्मवदात्मनि। प्रत्याहृतानीन्द्रियाणि धारयेत्सा तु धारणा ॥१३२॥
योगाज्जितेन्द्रियग्रामस्तानि हृत्वा दृढं हृदि। आत्मानं परमं ध्यायेत्सर्वधातारमच्युतम् ॥१३३॥
दूसरा श्रेष्ठ है। जप-ध्यान के बिना किया हुआ प्राणायाम अगर्भ और जप के सहित सगर्भ है ॥११८-११६॥
मनीषियों ने प्राणायाम के रेचक, पूरक, कुंभक और शून्यक ये चार भेद बताये हैं ॥१२०॥ जीवों की दक्षिणनाड़ी
पिंगला कही गई है। सूर्य इसका देवता और पितर योनि है। मुनिसत्तम ! वामनाड़ी इड़ा नाम से प्रसिद्ध है।
चन्द्रमा इसका देवता और देव योनि है ॥१२१-१२२॥ इन दोनों के मध्य सुषुम्ना नाड़ी है। यह अति सूक्ष्म, गुह्यतम
ओर ब्रह्मदैवत है। वाम नाड़ी से वायु को छोड़े। रेचन के कारण ही प्राणायाम की तीसरी क्रिया को रेचक
कहा गया है, दक्षिणा से वायु को खींचे। उसी क्रिया में वायु द्वारा शरीर को पूरण किया जाता है इसलिए
उसको पूरक कहा जाता है ॥१२३-१२४॥ अपनी देह में वायु को भरकर उसको छोड़ा न जाय और भरे हुए कुंभ
(घड़े) के समान स्थिर रखा जाय तो इस क्रिया को कुंभक कहते हैं ॥१२५॥ शरीर के भीतर की वायु को न
निकाला जाय और बाहर की वायु को न भीतर खींचा जाय ऐसी स्थिति वाली क्रिया को शून्यक नामक
प्राणायाम कहते हैं ॥१२६॥ धीरे-धीरे मतवाले हाथी की भाँति प्राण को वश में करना चाहिए, अन्यथा महान्
भयंकर रोग हो जाते हैं ॥१२७॥ शुद्धहृदय योगी क्रमशः वायु को वश में करे। ऐसा करने से वह सब पापों
से मुक्त होकर ब्रह्मपद को प्राप्त करता है ॥१२८॥
विषयों की ओर झुकी हुई इन्द्रियों को उधर से हटाकर अपने वश में करना प्रत्याहार कहा जाता है
॥१२९॥ द्विज ! जितेन्द्रिय महात्मा ध्यानशून्य रहने पर भी परम ब्रह्म पद को प्राप्त करते हैं जहाँ से पुनरा-
गमन नहीं होता ॥१३०॥ जो इन्द्रियों पर बिना अधिकार किये ध्यान परायण होता है उसको मूढात्मा
(पाखण्डी) समझना चाहिए और उसका ध्यान कभी भी सफल नहीं होता ॥१३१॥
जो जो वस्तुयें दिखाई देती हैं उनको आत्मवत् देखे। सम्पूर्ण इन्द्रियों को विषयों से हटाकर अन्तःकरण
में ही धारण करने को धारणा कहते हैं ॥१३२॥ योग के द्वारा इन्द्रियों को जीतकर हृदय में अच्युत, विश्वरूप,
सब लोकों के एक कारण, सबके प्रतिपालक, परम आत्मा विष्णु का ध्यान करे। विकसित कमल के समान नेत्र
२८ ना० पु०
२१८ नारदीयपुराणम्
सर्वविश्वात्मकं विष्णुं सर्वलोकैककारणम् । विकसत्पद्मपत्राक्षं चारुकुण्डलभूषितम् ॥१३४॥
दीर्घबाहुमुदाराङ्गं सर्वालङ्कारभूषितम् । पीताम्बरधरं देवं हेमयज्ञोपवीतिनम् ॥१३५॥
बिभ्रतं तुलसीमालां कौस्तुभेन विराजितम् । श्रीवत्सवक्षसं देवं सुरासुरनमस्कृतम् ॥१३६॥
अष्टारे हृत्सरोजे तु द्वादशांगुलविस्तृते । ध्यायेदात्मानमव्यक्तं परात्परतरं विभुम् ॥१३७॥
ध्यानं सद्भिर्निगदितं प्रत्ययस्यैकतानता । ध्यानं कृत्वा मुहूर्त्तं वा परं मोक्षं लभेन्नरः ॥१३८॥
ध्यानात्पापानि नश्यन्ति ध्यानान्मोक्षं च विंदति । ध्यानात्प्रसीदति हरिर्द्ध्यानात्सर्वार्थसाधनम् ॥१३६॥
यद्यद्रूपं महाविष्णोस्तत्तद्ध्यायेत्समाहितम् । तेन ध्यानेन तुष्टात्मा हरिर्मोक्षं ददाति वै ॥१४०॥
अचञ्चलं मनः कुर्याद्ध्येयवस्तुनि सत्तम । ध्यानं ध्येयं ध्यातृभावं यथा नश्यति निर्भरम् ॥१४१॥
ततोऽमृतत्वं भवति ज्ञानामृतनिषेवणात् । भवेन्निरन्तरं ध्यानादभेदप्रतिपादनम् ॥१४२॥
सुषुप्तिवत्परानन्दयुक्तश्चोपरतेन्द्रियः । निर्वातदीपवत्संस्थः समाधिरभिधीयते ॥१४३॥
योगी समाध्यवस्थायां न शृणोति न पश्यति । न जिघ्रति न स्पृशति न किंचद्वक्ति सत्तम ॥१४४॥
आत्मा तु निर्मलः शुद्धः सच्चिदानन्दविग्रहः । सर्वोपाधिविनिर्मुक्तो योगिनां भात्यचञ्चलः ॥१४५॥
निर्गुणोऽपि परो देवो ह्यज्ञानाद्गुणवानिव । विभात्यज्ञाननाशे तु यथापूर्वं व्यवस्थितम् ॥१४६॥
परं ज्योतिरमेयात्मा मायावानिव मायिनाम् । तन्नाशे निर्मलं ब्रह्म प्रकाशयति पंडित ॥१४७॥
एकमेवाद्वितीयं च परं ज्योतिर्निरंजनम् । सर्वेषामेव भूतानामन्तर्यामितया स्थितम् ॥१४८॥
वाले, मनोहर कुण्डलों से विभूषित, दीर्घ भुजा वाले, उदार अंगों वाले, सब अलंकारों से अलंकृत, पीताम्बर-
धारी सुवर्ण का यज्ञोपवीत धारण करने वाले, तुलसी माला को धारण किए हुए कौस्तुभमणि और श्रीवत्स
से सुशोभित वक्षःस्थल वाले, सुर और असुरों से पूजित, अव्यक्त, परात्पर विभु विष्णु का बारह अंगुल विस्तृत
और आठ पंखुड़ियों वाले हृदय-कमल में ध्यान करना चाहिए ॥१३३-१३७॥ सज्जनों ने प्रत्यय की एकतानता
(ईश्वर में एकनिष्ठ हो जाने के भाव) को ही ध्यान कहा है। मनुष्य क्षण भर के ध्यान से भी पर मोक्ष को पा
जाता है ॥१३८॥ ध्यान से पाप नष्ट होते और ध्यान से ही मोक्ष मिलता है । ध्यान से भगवान् प्रसन्न होते
और ध्यान से सभी मनोरथ सिद्ध हो जाते हैं । महाविष्णु के जो जो रूप हैं उन उन रूपों को एकाग्र होकर
ध्यान करना चाहिए । हरि इस प्रकार के ध्यान से प्रसन्न होकर मोक्ष प्रदान करते हैं ॥१३६-१४०॥ मुनिवर्य !
ध्येय वस्तु में अपने मन को स्थिर करना चाहिए । जब ध्यान, ध्येय और ध्यातृ-भाव का सर्वथा नाश हो जाता
है तब उसके बाद ज्ञान रूपी अमृत के निरन्तर पान करने से अमृतत्व की प्राप्ति होती है । निरन्तर ध्यान से
अभेद ज्ञान होता है ॥१४१-१४२॥ जब मनुष्य सुषुप्ति अवस्था के समान परानन्द युक्त हो इन्द्रिय व्यापारों से
स्वतः विमुख हो जाता है और उसका मन निर्वात दीप के समान स्थिर हो जाता है तो उसकी उस अवस्था
को समाधि कहते है ॥१४३॥ योगी समाधि अवस्था में कुछ भी सुनता नहीं है, देखता और सूंघता भी नहीं है,
उसे स्पर्श ज्ञान भी नहीं रह जाता और न तो कुछ बोलता ही है । योगियों का अन्तः करण निर्मल और शुद्ध
रहता है वे स्वयं सच्चिदानन्द स्वरूप और सर्वोपाधि से मुक्त हो पर्वत की भाँति अचल रहते हैं ॥१४४-१४५॥
अज्ञानावस्था में पर देव निर्गुण होता हुआ भी गुणवान् के समान जान पड़ता है । वही अज्ञान नष्ट हो जाने पर
अपने पूर्व रूप में ही दिखाई पड़ने लगता है ॥१४६॥ पंडित ! मायाबद्ध जीवों को अमेयात्मा परज्योति माया-
बद्ध सा जान पड़ता है और वही मायामुक्त हो जाने पर निर्गुण पर ब्रह्म के रूप में दिखलाई पड़ने लगता है
॥१४७॥ परब्रह्म एक, अद्वितीय, परज्योति और निरंजन स्वरूप है जो कि सब प्राणियों का अन्तर्यामी
त्रयस्त्रिंशोऽध्यायः २१६
अणोरणीयान्महतो महीयान्सनातनारमाखिलविश्वहेतुः ।
पश्यन्ति यज्ज्ञानविदां वरिष्ठाः परात्परस्मात्परमं पवित्रम् ॥१४८॥
अकारादिक्षकारांतवर्णभेदव्यवस्थितः । पुराणपुरुषोऽनादिः शब्दब्रह्मेति गीयते ॥१५०॥
विशुद्धमक्षरं नित्यं पूर्णमाकाशमध्यगम् । आनन्दं निर्मलं शांतं परं ब्रह्मेति गीयते ॥१५१॥
योगिनो हृदि पश्यन्ति परात्मानं सनातनम् । अविकारमजं शुद्धं परं ब्रह्मेति गीयते ॥१५२॥
ध्यानमन्यत्प्रवक्ष्यामि शृणुष्व मुनि सत्तम । संसारतापतप्तानां सुधावृष्टिसमं नृणाम् ॥१५३॥
नारायणं परानन्दं स्मरेत्प्रणवसंस्थितम् । नादरूपमनौपम्यमर्द्ध मात्रोपरिस्थितम् ॥१५४॥
अकारं ब्रह्मणो रूपमुकारं विष्णुरूपवत् । मकारं रुद्ररूपं स्यादर्द्धमात्रं परात्मकम् ॥१५५॥
मात्रास्तिस्रः समाख्याता ब्रह्मविष्णुशिवाधिपाः । तेषां समुच्चयं विप्र परब्रह्मप्रबोधकम् ॥१५६॥
वाच्यं तु परमं ब्रह्म वाचकः प्रणवः स्मृतः । वाच्यवाचकसंबन्धो ह्युपचारात्तयोर्द्विज ॥१५७॥
जपन्तः प्रणवं नित्यं मुच्यन्ते सर्वपातकैः । तदभ्यासेन संयुक्ताः परं मोक्षं लभन्ति च ॥१५८॥
जपंश्च प्रणवं मन्त्रं ब्रह्मविष्णुशिवात्मकम् । कोटिसूर्यसमं तेजो ध्यायेदात्मनि निर्मलम् ॥१५९॥
शालग्रामशिलारूपं प्रतिमारूपमेव वा । यद्यत्पापहरं वस्तुतत्तद्वा चिन्तयेद्धृदि ॥१६०॥
यदेतद्वैष्णवं ज्ञानं कथितं ते मुनीश्वर । एतद्विदित्वा योगीन्द्रो लभते मोक्षमुत्तमम् ॥१६१॥
यस्त्वेतच्छृणुयाद्वापि पठेद्वापि समाहितः । स सर्वपापनिर्मुक्तो हरिसालोक्यमाप्नुयात् ॥१६२॥
इति श्रीबृहन्नारदीयपुराणे पूर्वभागे प्रथमपादे योगनिरूपणं नाम त्रयस्त्रिंशोऽध्यायः ॥३३॥
है ॥१४८॥ वह सूक्ष्म से भी सूक्ष्मतम और महान् से भी महत्तर है। सनातनात्मा और अखिलविश्व का एक
मात्र कारण है, जिसको तत्त्वज्ञानियों में श्रेष्ठ महात्मा परात्पर से भी परम पवित्र समझते हैं ॥१४९॥ वह
पुराण पुरुष अनादि है और अकार के लेकर क्षकार तक वर्ण भेद के रूप में व्यवस्थित रह कर शब्द ब्रह्म के
नाम से वर्णित होता है ॥१५०॥ उसको विशुद्ध, अक्षर, नित्य, पूर्ण, आकाशमध्यगामी, आनन्दमय, निर्मल,
शान्त और परब्रह्म कहते हैं ॥१५१॥ उस परात्मा सनातन को योगी जन अपने हृदय में देखते हैं और उस पर
ब्रह्म को अविकार, अज और शुद्ध कहते हैं ॥१५२॥
मुनिवर्य ! अब मैं दूसरे प्रकार के ध्यान को कह रहा हूँ सुनो, जो इस संसार की ज्वाला में दग्ध
मानवों के लिए अमृत वर्षा के समान है ॥१५३॥ परानन्द नारायण की अनुपम नाद रूप में, अर्द्ध मात्रा के
ऊपर स्थित तथा प्रणव में स्थित रूप में स्मरण करना चाहिए ॥१५४॥ अकार ब्रह्मा का रूप है, उकार विष्णु
का, मकार रुद्र का और अर्द्धमात्रा परब्रह्म का रूप है। ये तीनों मात्रायें ब्रह्मा, विष्णु और शिव देवता
वाली कही जाती हैं। विप्र ! इन तीनों का समुच्चय पर ब्रह्म का वाचक है ॥१५५-१५६॥ परब्रह्म वाच्य
(अर्थ) और प्रणव वाचक (शब्द) है। द्विज ! उनका यह वाच्य-वाचक संबन्ध केवल उपचार (आरोपित) मात्र
है। वस्तुतः इन दोनों में अभेद संबन्ध है। नित्य प्रति प्रणव का जप करने से मनुष्य सब पापों से छूट जाता
है और प्रणव साधना में लीन रहने वाले तो पर मोक्ष को प्राप्त करते हैं ॥१५७-१५८॥ ब्रह्मा, विष्णु और
शिवात्मक प्रणव मंत्र का जप करते समय कोटि सूर्य के समान प्रभावशाली तेज पुंज का ध्यान करना चाहिए।
शालिग्राम शिला रूप, अथवा प्रतिमारूप अथवा जो जो पापों को दूर करने वाली वस्तुएँ हैं उनका हृदय में
ध्यान करना चाहिए ॥१५९-१६०॥ मुनीश्वर ! यह जो वैष्णव ज्ञान तुमसे मैंने कहा है, इसको जानकर योगीन्द्र
उत्तम मोक्ष प्राप्त करते हैं। जो व्यक्ति एकाग्र होकर इस ज्ञान को सुनता है या स्वयं पढ़ता है, वह अपने सब
पापों से मुक्त होकर हरि-सालोक्य मोक्ष को प्राप्त करता है ॥१६१-१६२॥
श्रीनारदीयमहापुराण में योग निरूपण नामक तैंतीसवां अध्याय समाप्त ॥३३॥
अथ चतुस्त्रिंशोऽध्यायः
नारद उवाच
समाख्यातानि सर्वाणि योगाङ्गानि महामुने । इदानीमपि सर्वज्ञ यत्पृच्छामि तदुच्यताम् ॥१॥
योगो भक्तिमतामेष सिध्यतीति त्वयोदितम् । यस्य तुष्यति सर्वेशस्तस्य भक्तिश्च शाश्वतम् ॥२॥
यथा तुष्यति सर्वेशो देवदेवो जनार्दनः । तन्ममाख्याहि सर्वज्ञ मुने कारुण्यवारिधे ॥३॥
सनक उवाच
नारायणं परं देवं सच्चिदानन्दविग्रहम् । भज सर्वात्मना विप्र यदि मुक्तिमभीप्ससि ॥४॥
रिपवस्तं न हिंसन्ति न बाधंते ग्रहाश्च तम् । राक्षसाश्च न चेक्षन्ते नरं विष्णुपरायणम् ॥५॥
भक्तिर्दृढा भवेद्यस्य देवदेवे जनार्दने । श्रेयांसितस्य सिध्यन्ति भक्तिमन्तोऽधिकास्ततः ॥६॥
पादौ तौ सफलौ पुंसां यौ विष्णोगृहगामिनौ । तौ करौ सफलौ ज्ञेयौ विष्णुपूजापरौ तु यौ ॥७॥
ते नेत्रे सुफले पुंसां पश्यतो ये जनार्दनम् । सा जिह्वा प्रोच्यते सद्भिर्हरिनामपरा तु या ॥८॥
सत्यं सत्यं पुनः सत्यमुद्धृत्य भुजमुच्यते । तत्त्वं गुरुसमं नास्ति न देवः केशवात्परः ॥९॥
सत्यं वच्मि हितं वच्मि सारं वच्मि पुनः पुनः । असारेऽस्मिंस्तु संसारे सत्यं हरिसमर्चनम् ॥१०॥
अध्याय ३४
हरिभक्त के लक्षणों का निरूपण
नारद बोले—महामुनि ! आपने समस्त योगांगों का वर्णन कर दिया, सर्वज्ञ ! अब जो कुछ मैं पूछ रहा
हूँ उसको कहिए ॥१॥ आपने अभी कहा है कि, योग भक्तों को ही सिद्ध होता है और शाश्वत भक्ति उसी को
प्राप्त होती है जिस पर सर्वेश प्रसन्न रहते हैं । सर्वज्ञ ! करुणा-सागर ! मुने ! अब देवाधिदेव जनार्दन कैसे प्रसन्न
होते हैं, इसको आप कहिए ॥२-३॥
सनक बोले—विप्र ! यदि तुम मुक्ति चाहते हो तो सच्चिदानन्द स्वरूप, पर देव ब्रह्म का सब प्रकार से
भजन करो ॥४॥ जो नर विष्णु में सर्वदा अपनी निष्ठा रखता है उसको शत्रु नहीं मार सकते, ग्रह-पीड़ा भी पास
नहीं फटकती और राक्षस उसकी ओर आँख नहीं उठा सकते हैं ॥५॥ जिसकी देवाधिदेव जनार्दन में दृढ़ भक्ति
हो जाती है उसको सब कल्याण प्राप्त होते हैं और वह अधिकाधिक भक्तिमान् हो जाता है ॥६॥ उस व्यक्ति के
ही पैर सफल हैं जिनसे विष्णु मन्दिर में जाया जाता है, जो हाथ विष्णु की पूजा में लगे रहते हैं वे ही धन्य
हैं । नेत्र वे ही कृतकृत्य हैं जो जनार्दन का दर्शन करते हैं । उसी जिह्वा की मनीषी लोग प्रशंसा करते हैं जो
सर्वदा हरिनामोच्चारण में लगी रहती है ॥७-८॥ मैं दोनों हाथ उठाकर कह रहा हूँ कि यह सत्य है,
सत्य है, सत्य है कि, गुरु के समान दूसरा कोई तत्त्व नहीं और न तो केशव से बढ़कर कोई
देवता ही है ॥९॥ मैं सत्य कह रहा हूँ, श्रेय कह रहा हूँ और बार बार सार कह रहा हूँ कि, इस असार संसार