बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)
Brihan Naradiya Purana with Sanskrit & Hindi Commentary
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)
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त्रयस्त्रिंशोऽध्यायः
आत्मानं द्विविधं प्राहुः परापरविभेदतः । द्वे ब्रह्मणी वेदितव्ये इति चाथर्वणी श्रुतिः ॥५६॥
परस्तु निर्गुणः प्रोक्तो ह्यहंकारयुतोऽपरः । तयोरभेदविज्ञानं योग इत्यभिधीयते ॥५७॥
पंचभूतात्मके देहे यः साक्षी हृदये स्थितः । अपरः प्रोच्यते सद्भिः परमात्मा परः स्मृतः ॥५८॥
शरीरं क्षेत्रमित्याहुस्तत्स्थः क्षेत्रज्ञ उच्यते । अव्यक्तः परमः शुद्धः परिपूर्ण उदाहृतः ॥५९॥
यदा त्वभेदविज्ञानं जीवात्मपरमात्मनोः । भवेत्तदा मुनिश्रेष्ठ पाशच्छेदोऽपरात्मनः ॥६०॥
एकः शुद्धोऽक्षरो नित्यः परमात्मा जगन्मयः । नृणां विज्ञानभेदेन भेदवानिव लक्ष्यते ॥६१॥
एकमेवाद्वितीयं यत्परं ब्रह्म सनातनम् । गीयमानं च वेदांन्तैस्तस्मान्नास्ति परं द्विज ॥६२॥
न तस्य कर्म कार्यं वा रूपं वर्णमथापि वा । कर्तृत्वं वापि भोक्तृत्वं निर्गुणस्य परात्मनः ॥६३॥
निदानं सर्वहेतूनां तेजो यत्तेजसां परम् । किमप्यन्यद्यतो नास्ति तज्ज्ञेयं मुक्तिहेतवे ॥६४॥
शब्दब्रह्ममयं यत्तन्महावाक्यादिकं द्विज । तद्विचारोद्भवं ज्ञानं परं मोक्षस्य साधनम् ॥६५॥
सम्यग्ज्ञानविहीनानां दृश्यते विविधं जगत् । परमज्ञानिनामेतत्परब्रह्मात्मकं द्विज ॥६६॥
एक एव परानन्दो निर्गुणः परतः परः । भाति विज्ञानभेदेन बहुरूपधरोऽव्ययः ॥६७॥
मायिनो मायया भेदं पश्यन्ति परमात्मनि । तस्मान्मायां त्यजेद्योगान्मुमुक्षुर्द्विजसत्तम ॥६८॥
नासद्रूपा न सदरूपा माया नैवोभयात्मिका । अनिर्वाच्या ततो ज्ञेया भेदबुद्धिप्रदायिनी ॥६९॥
मायैव ज्ञानशब्देन बुद्ध्यते मुनिसत्तम । तस्मादज्ञानविच्छेदो भवेदै जितमायिनाम् ॥७०॥
सनातनं परं ब्रह्म ज्ञानशब्देन कथ्यते । ज्ञानिनां परमात्मा वै हृदि भाति निरन्तरम् ॥७१॥
है, वही ज्ञान मोक्ष दाता कहा गया है ॥५५॥ पर और अपर भेद से आत्मा के दो प्रकार कहे गये हैं। 'दो ब्रह्म
जानने योग्य हैं' ऐसा अथर्ववेद का वचन है ॥५६॥ निर्गुण को पर और अहंकार से युक्त आत्मा को अपर कहा
गया है । उन दोनों में अभेद बुद्धि रखना ही योग है ॥५७॥ इस पंचभूतात्मक देह में जो साक्षी रूप से हृदय में
निवास करता है उसको सज्जन अपर कहते हैं और परमात्मा को पर कहते हैं ॥५८॥ शरीर को क्षेत्र और शरीरस्थ
आत्मा को क्षेत्रज्ञ कहते हैं। वह अव्यक्त, पूर्ण परम और शुद्ध है ॥५६॥ मुनिश्रेष्ठ ! जिस समय मनुष्य को
जीवात्मा और परमात्मा का अभेद ज्ञान हो जाता है उस समय अपरात्मा (जीव) को मुक्ति प्राप्त हो जाती
है ॥६०॥ एक शुद्ध, अक्षर, नित्य, जगन्मय परमात्मा ही ज्ञान भेद से मनुष्य को भिन्न सा प्रतीत होता है ॥६१॥
द्विज ! जिस एक, अद्वितीय, पर सनातन ब्रह्म का वेदान्तों ने वर्णन किया है उससे पर दूसरा कोई पदार्थ नहीं
है ॥६२॥ उस निर्गुण परमात्मा का कर्म, कार्य, रूप अथवा वर्ण कुछ भी नहीं है, और न तो वह कर्त्ता या भोक्ता
हो है। वह सब कारणों का कारण और सब उत्कृष्ट तेज से भी उत्कृष्ट तेज है । जिसके अतिरिक्त अन्य कोई
पदार्थ नहीं है वही पर ब्रह्म मुक्ति-प्राप्ति के लिये ज्ञेय (कारण) है ॥६३-६४॥ द्विज ! शब्द ब्रह्म के समर्थक जितने
महावाक्य हैं उनके विवेचन से प्राप्त पर ज्ञान ही मोक्ष का साधन है । द्विज ! परब्रह्मस्वरूप यह जगत् सम्यग्ज्ञान
से शून्य अथवा अज्ञानियों को ही विविधरूपों में दिखाई पड़ता है ॥६५-६६॥ एक ही परानन्द, निर्गुण, परतः पर
अव्यय विज्ञान भेद से बहुरूपधारो जान पड़ता है ॥६७॥ मायाबद्ध मनुष्य माया के प्रभाव से परमात्म में भिन्नता
देखते हैं। इसलिए, द्विजवर्य ! मुमुक्षु योग द्वारा माया को छोड़े ॥६८॥ माया न तो सद्प है, न असद्रूप और
न सदसद्रूपा ही है, उस भेद बुद्धि प्रदान करने वाली माया को अनिर्वचनीय समझना चाहिए। मुनिश्रेष्ठ ! ज्ञान
के द्वारा माया को हो पहचाना जाता है। तभी जितमायी (विज्ञानी) का अज्ञान दूर होता है ॥६६-७०॥ ज्ञान
शब्द से सनातन पर ब्रह्म का हो निर्देश है। ज्ञानियों के हृदय में परमात्मा सर्वदा विराजमान रहता है। मुनिवर्य !
योगी अपने योगबल से अज्ञान का नाश करे ॥७१॥