बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)
Brihan Naradiya Purana with Sanskrit & Hindi Commentary
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)
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अष्टाविंशोऽध्यायः
हसते वदते कोऽपि राक्षसे तद्भवेद्विः । यथाचारं प्रदेयं च मधुमांसादिकं तथा ॥६२॥
पाकादि च प्रशंसेरन् वाग्यता धृतभाजनाः । यदि पात्रं त्यजेत्कोऽपि ब्राह्मणः श्राद्धयोजितः ॥६३॥
श्राद्धहंता स विज्ञेयो नरकायोपपद्यते । भुंजानेषु च विप्रेषु ह्यान्योन्यं संस्पृशेयदि ॥६४॥
तदन्नमत्स्यजम्भुक्त्वा गायत्र्यष्टशतं जपेत् । भुज्यमानेषु विप्रेषु कर्त्ता श्रद्धापरायणः ॥६५॥
स्मरेन्नारायणं देवमनंतमपराजितम् । रक्षोघ्नान्वैष्णवांश्चैव पैतृकांश्च विशेषतः ॥६६॥
जपेच्च पौरुषं सूक्तं नाचिकेतत्रयं तथा । त्रिमधु त्रिसपर्णं च पावमानं यजूंषि च ॥६७॥
सामान्याप तथोक्तानि वदेत्पुण्यप्रदांस्तथा । इतिहासपुराणानि धर्मशास्त्राणि चैव हि ॥६८॥
भुंजीरन्ब्राह्मणा यावत्तावेताञ्जपेद्विज्ज । ब्राह्मणेपु च भुक्तेषु विकिरं विक्षिपेत्तथा ॥६६॥
शेषमन्नं वदेच्चैव मधुसूक्तं च वै जपेत् । स्वयं च पादौ प्रक्षाल्य सम्यगाचम्य नारद ॥७०॥
आचांतेषु च विप्रेषु पिंडं निर्वापयेत्ततः । स्वस्तिवाचनकं कुर्यादक्षय्योदकमेव व ॥७१॥
दत्त्वा समाहितः कुर्यात्तथा विप्राभिवादनम् । अचालयित्वा पात्रं तु स्वस्ति कुर्वंति ये द्विजाः ॥७२॥
वत्सरं पितरस्तेषां भवंत्युच्छिष्टभोजिनः । दातारो नोऽभिवर्द्धन्तामित्याद्यैः स्मृतिभाषितैः ॥७३॥
आशीर्वचो लभेत्तेभ्यो नमस्कारं चरेत्ततः । दद्याच्च दक्षिणां शक्त्या तांबूलं गंधसंयुतम् ॥७४॥
न्युब्जपात्रमथानीय स्वधाकारमुदीरयेत् । वाजेवाजे इति ऋचा पितॄन्देवान्विसर्जयेत् ॥७५॥
भोक्ता च श्राद्धकृत्तस्यां राजन्यां मैथुनं त्यजेत् । तथा स्वाध्यायमध्वानं प्रयत्नेन परित्यजेत् ॥७६॥
अध्वगश्चातुरश्चैव विहीनश्च धनैस्तथा । आमश्राद्धं प्रकुर्वीत हेम्ना वास्पृश्यभार्यकः ॥७७॥
द्रव्याभावे द्विजाभावे ह्यन्नमात्रं च पाचयेत् । पैतृकेन तु सूक्तेन होमं कुर्याद्विचक्षणः ॥७८॥
राक्षस हो जाता है। उस समय उन विप्रों को आचारानुसार मधु, मांस आदि भी दिया जा सकता है ॥६०-६२॥
वे विप्र उन भोजन-पात्रों को हाथ में लेकर पाक आदि की प्रशंसा करते हुये, मौन होकर भोजन करें। यदि
श्राद्ध-निमन्त्रित कोई ब्राह्मण उस पात्र को भोजन के समय छोड़ दे तो वह नरकगामी होता है। भोजन करते
समय यदि वे ब्राह्मण एक दूसरे को छू दें तो उस अन्न को खा लेने के बाद एक सौ आठ बार गायत्री का जप
करे ॥६३-६४३॥ उन विप्रों के भोजन करते समय श्राद्धकर्त्ता श्रद्धापूर्वक अपराजित अनन्त नारायणदेव का
स्मरण करे, विशेष रूप से राक्षसीय बाधाओं को दूर करने वाले वैष्णव और पितर सम्बन्धी मन्त्रों को जपे।
पुरुष सूक्त, नाचिकेतत्रय, त्रिमधु, त्रिसुपर्ण, पावमान और यजुर्मन्त्रों का अथवा साममन्त्रों और पुण्यप्रद मन्त्रों
का पाठ करे। द्विज ! जब तक ब्राह्मण भोजन करते रहें तब तक इतिहास, पुराण, धर्मशास्त्र और पूर्व कथित
मन्त्रों का जप करना चाहिए। ब्राह्मण जब भोजन कर चुकें तब शेष अन्न का विकिर दे (अर्थात् शेषात्न को
बिखेर दे) और मधुसूक्त का जप करे। नारद ! स्वयं पैर धोकर और आचमन कर जब वे ब्राह्मण भी आचमन कर
लें तब पिंड निर्वण करे ॥६५-७०३॥ स्वस्तिपाठ और अक्षय्योदक करने के अनन्तर सावधान हो विप्रों का
अभिवादन करे। जो द्विज पात्र को बिना हिलाये स्वस्ति, ऐसा कहते हैं उनके पितर एक वर्ष तक जूठा भोजन
करते हैं। श्राद्ध कर्त्ता उन ब्राह्मणों से 'दातारो नोऽभिवर्द्धन्ताम्' (हमारे दाता सदा विभवशाली रहें) आदि स्मृति
में कहे गए आशीर्वाद प्राप्त करे और उनको नमस्कार करे। आशीर्वाद प्राप्त करने के बाद यथाशक्ति उन
ब्राह्मणों की ताम्बूल और सुगन्धित पदार्थ के सहित दक्षिणा दे। न्युब्जपात्र को लाकर स्वधाकार कहे और 'वाजे
बाजे' इस ऋचा से पितरों और देवों का विसर्जन करे ॥७१-७५॥
श्राद्ध भोजन करने वाला और श्राद्धकर्त्ता उस रात्रि को मैथुन न करें, स्वाध्याय और मार्ग का चलना
विशेष रूप से छोड़ दें। रास्ता चलने वाला, रोगी और धनहीन श्राद्धकर्त्ता आम श्राद्ध (कच्चे अन्न से किया जाने
बाला श्राद्ध) करे अथवा भार्या सहित सोने का स्पर्श करे। द्रव्य के अभाव में अथवा किसी ब्राह्मण के न मिलने
१६४ नारदीयपुराणम्
अत्यंतहव्यशून्यश्चेत्स्वशक्त्या तु तृणं गवाम् । स्नात्वा च विधिवद्विप्र कुर्याद्वा तिलतर्पणम् ॥७६॥
अथवा रोदनं कुर्यादित्युच्चैर्विजने वने । दरिद्रोऽहं महापापी वदन्निति विचक्षणः ॥८०॥
परेद्युः श्राद्धकृन्मर्त्यो यो न तर्पयते पितॄन् । तत्कुलं नाशमायाति ब्रह्महत्यां च विंदति ॥८१॥
श्राद्धं कुर्वंति ये मर्त्याः श्रद्धावंतो मुनीश्वर । न तेषां संततिच्छेदः संपन्नास्ते भवंति च ॥८२॥
पितॄन्यजंति ये श्राद्धे तैस्तु विष्णुः प्रपूजितः । तस्मिंस्तुष्टे जगन्नाथे सर्वास्तुष्यंति देवताः ॥८३॥
पितरो देवताश्चैव गंधर्वाप्सरसस्तथा । यक्षाश्च सिद्धा मनुजा हरिरैव सनातनः ॥८४॥
येनेदमखिलं जातं जगत्स्थावरजंगमम् । तस्माद्दाता च भोक्ता च सर्वं विष्णुः सनातनः ॥८५॥
यदस्ति विप्र यन्नास्ति दृश्यं चादृश्यमेव च । सर्वं विष्णुमयं ज्ञेयं तस्मादन्यन्न विद्यते ॥८६॥
आधारभूतो विश्वस्य सर्वभूतात्मकोऽव्ययः । अनौपम्यस्वभावश्च भगवान्हव्यकव्यभुक् ॥८७॥
परब्रह्माभिधेयो य एक एव जनार्दनः । कर्त्ता कारयिता चैव सर्वं विष्णुः सनातनः ॥८८॥
इत्येवं ते मुनिश्रेष्ठ श्राद्धस्य विधिरुत्तमः । कथितः कुर्वतामेवं पापं सद्यो विलीयते ॥८६॥
य इदं पठते भक्त्या श्राद्धकाले द्विजोत्तमः । पितरस्तस्य तुष्यंति संततिश्चैव वर्द्धते ॥६०॥
इति श्रीबृहन्नारदीयपुराणे पूर्वभागे प्रथमपादे श्राद्धक्रियावर्णनं नामाष्टाविंशोऽध्यायः ॥२८॥
पर स्वयं केवल अन्न पकावे और वह विचक्षण व्यक्ति पैतृक सूक्त से हवन करे । यदि किसी भी प्रकार हवन करने
में असमर्थ हो तो अपनी शक्ति के अनुसार गायों को घास खिला दे अथवा विप्र स्नान करके विधिपूर्वक तिल से तर्पण
कर दे ॥७६-७९॥ अथवा किसी विजन वन में जाकर वह बुद्धिमान् व्यक्ति 'मैं महापापी हूँ दरिद्र हूँ' यह कहता हुआ
उच्च स्वर से रोये । जो श्राद्धकर्त्ता दूसरे दिन पुनः पितरों का तर्पण नहीं करता है उसका कुल नष्ट हो जाता
और वह ब्रह्महत्या का भागी होता है। मुनीश्वर ! जो श्रद्धालु व्यक्ति श्राद्ध करते हैं उनका वंशच्छेद कभी नहीं
होता और वे सदा धनवान् रहते हैं। जो श्राद्ध में पितरों की पूजा करते हैं वे स्वयं विष्णु की पूजा करते हैं
और विष्णु के प्रसन्न रहने पर सभी देवता स्वयं प्रसन्न हो जाते हैं ॥८०-८३॥ पितर, देवता, गन्धर्व, अप्सरायें,
यक्ष, सिद्ध और सभी मनुष्य, ये सनातन हरि के ही रूप हैं। जिससे यह सारा स्थावर जंगमात्मक जगत् उत्पन्न
हुआ है, अतएव दाता या भोक्ता सब कुछ वही सनातन विष्णु ही हैं। विप्र ! इस संसार में जो कुछ भाव या
अभाव दृश्य या अदृश्य पदार्थ है, सबको विष्णुमय ही समझना चाहिए । इसलिए विष्णु के अतिरिक्त और कुछ
नहीं है। इस विश्व के आधारभूत वे ही सर्वभूतात्मक, अव्यय, अनुपम प्रकृति वाले, हव्यकव्यभोजी भगवान्
विष्णु हैं ॥८४-८७॥ परब्रह्म कहाने वाले जो जनार्दन हैं वे एक ही हैं। कर्त्ता और कारयिता सब कुछ वही
सनातन विष्णु हैं। मुनिश्रेष्ठ ! यही श्राद्ध की उत्तम विधि है जो तुम्हारे सामने मैंने व्यक्त कर दी। जो इस
विधि से श्राद्ध करते हैं उनके पाप तत्क्षण नष्ट हो जाते हैं। जो द्विजश्रेष्ठ श्राद्ध के समय भक्तिपूर्वक इस
(अध्याय) का पाठ करता है उसके पितर प्रसन्न होते हैं और उसकी सन्तान-वृद्धि होती है ॥८८-६०॥
श्रीनारदीयमहापुराण में श्राद्धवर्णन नामक अट्ठाईसवां अध्याय समाप्त ॥२८॥
एकोनत्रिंशोऽध्यायः
सनक उवाच
तिथीनां निर्णयं वक्ष्ये प्रायश्चित्तविधिं तथा । शृणुष्व तन्मुनिश्रेष्ठ कर्मसिद्धिर्यतो भवेत् ॥१॥
श्रौतं स्मार्तं व्रतं दानं यच्चान्यत्कर्म वैदिकम् । अनिर्णीतासु तिथिषु न किंचित्फलति द्विज ॥२॥
एकादश्यष्टमी षष्ठी पौर्णमासी चतुर्दशी । अमावस्या तृतीया च ह्युपवासव्रतादिषु ॥३॥
परविद्धाः प्रशस्ताः स्युर्न ग्राह्याः पूर्वसंयुताः । नागविद्धा तु या षष्ठी शिवविद्धा तु सप्तमी ॥४॥
दशम्येकादशीविद्धा नोपोष्याः स्युः कदाचन । दर्शं च पौर्णमासीं च सप्तमीं पितृवासरम् ॥५॥
पूर्वविद्धं प्रकुर्वाणो नरकायोपपद्यते । कृष्णपक्षे पूर्वविद्धां सप्तमीं च चतुर्दशीम् ॥६॥
प्रशस्तां केचिदाहुश्च तृतीयां नवमीं तथा । व्रतादीनां तु सर्वेषां शुक्लपक्षो विशिष्यते ॥७॥
अपराह्नाच्च पूर्वाह्नि ग्राह्यं श्रेष्ठतरं यतः । असंभवे व्रतादीनां यदि पौर्वाह्निकी तिथिः ॥८॥
मुहूर्तद्वितयं ग्राह्यं भगवत्युदिते रवौ । प्रदोषव्यापिनी ग्राह्या तिथिनक्तव्रते सदा ॥९॥
उपोषितव्यं नक्षत्रं येनास्तं याति भास्करः । तिथिनक्षत्रसंयोगविहितव्रतकर्मणि ॥१०॥
प्रदोषव्यापिनी ग्राह्या त्वन्यथा निष्फलं भवेत् । अर्धरात्रादधो या तु नक्षत्रव्यापिनी तिथिः ॥११॥
अध्याय २९
तिथियों का निर्णय
**सनक बोले—**तिथियों का निर्णय और प्रायश्चित्त विधि को अब कह रहा हूँ। मुनिश्रेष्ठ ! उसको सुनो,
जिससे कर्मसिद्धि प्राप्त होती है। द्विज ! श्रौत तथा स्मार्तव्रत, दान अथवा जो अन्य वैदिक कर्म हैं, उन्हें
अनिर्णीत तिथियों में करने से कुछ भी फल नहीं होता है। एकादशी, अष्टमी, षष्ठी, पूर्णिमा, चतुर्दशी, अमावस्या
और तृतीया यदि पर तिथि से (आगे की तिथि से) विद्ध हो तो उपवास, व्रत आदि में प्रशस्त मानी जाती हैं;
परन्तु पूर्वविद्ध ये तिथियां ग्राह्य नहीं हैं ॥१-३॥ नाग से विद्ध षष्ठी, शिव विद्ध सप्तमी, दशमी विद्ध एकादशी
को कभी भी उपवास नहीं करना चाहिए । दर्श (अमावस्या), पूर्णिमा, सप्तमी और पितृदिवस ये यदि पूर्वतिथियों
से विद्ध हों तो उस दिन उपवास या व्रत करने से मनुष्य नरकगामी होता है। कुछ लोग कृष्णपक्ष की पूर्वविद्ध
सप्तमी, चतुर्दशी, तृतीया और नवमी को प्रशस्त मानते हैं। सब व्रत आदि शुभ कर्मों के लिए शुक्लपक्ष प्रशस्त
माना जाता है ॥४-७॥ अपराह्न तिथि की अपेक्षा पूर्वाह्न की तिथि ग्राह्य है, क्योंकि वह श्रेष्ठ है। व्रतादि को
पौर्वाह्निकालिक तिथि यदि असम्भव हो तो सूर्योदयकाल की दो मुहूर्त की तिथि भी व्रत के लिए ग्राह्य है।
रात्रिकालीन व्रत में प्रदोषव्यापिनी तिथि ही ग्राह्य है। जिस व्रत में तिथि और नक्षत्र दोनों का संयोग विहित है
उसमें जिस नक्षत्र में सूर्यास्त हो उसी नक्षत्र को मानकर उपवास करना चाहिए। प्रदोषव्यापिनी तिथि ही
रात्रिकालीन व्रत के लिए ग्राह्य है, अन्यथा वह निष्फल है ॥८-१०॥ मुनिश्रेष्ठ ! जो नक्षत्रव्यापिनी तिथि आधी
रात के बाद तक रहती है वही नक्षत्रविहित व्रत के लिए ग्राह्य है। यदि दोनों दिन की आधी रात तक वह इष्ट
२४—ना० पु०
१८६ नारदीयपुराणम्
सैव ग्राह्या मुनिश्रेष्ठ नक्षत्रविहितव्रते । यद्यर्द्धरात्रयोर्व्याप्तं नक्षत्रं तु दिनद्वये ॥१२॥
तत्पुण्यं तिथिसंयुक्तं नक्षत्रं ग्राह्यमुच्यते । अर्द्धरात्रद्वये स्यातां नक्षत्रं च तिथिर्यदि ॥१३॥
क्षये पूर्वा प्रशस्ता स्याद्वृद्धौ कार्या तथोत्तरा । अर्द्धरात्रद्वये व्याप्ता तिथिनक्षत्रसंयुता ॥१४॥
ह्रासवृद्धिविशून्या चेद् ग्राह्या पूर्वा तथा परा । ज्येष्ठासंमिश्रितंमूलं रोहिणी वह्निसंयुता ॥१५॥
मित्रेण संयुता ज्येष्ठा संतानादिविनाशिनी । ततः स्युस्तिथयः पुण्याः कर्मानुष्ठानतो दिवा ॥१६॥
रात्रिव्रतेषु सर्वेषु रात्रियोगो विशिष्यते । तिथिनक्षत्रयोगेन या पुण्या परिकीर्तिता ॥१७॥
तस्यां तु तद्व्रतं कार्यं सैव कार्या विचक्षणैः । उदयव्यापिनी ग्राह्या श्रवणद्वादशी व्रते ॥१८॥
सूर्येन्दुग्रहणे यावत्तावद् ग्राह्या जपादिषु । संक्रांतिषु तु सर्वासु पुण्यकालो निगद्यते ॥१९॥
स्नानदानजपादीनां कुर्वतामक्षयंफलम् । तत्र कर्कटको ज्ञेयो दक्षिणायनसंक्रमः ॥२०॥
पर्वतो घटिकास्त्रिंशत्पुण्यकालं विदुबुर्धाः । वृषभे वृश्चिके चैव सिंहे कुम्भे तथैव च ॥२१॥
पूर्वमष्टमुहूर्तास्तु ग्राह्याः स्नानजपादिषु । तुलायां चैव मेषे च पूर्वतः परतस्तथा ॥२२॥
ज्ञेया दशैव घटिका दस्तास्याक्षयतावहाः । कन्यायां मिधुने चैव मीने धनुषि च द्विज ॥२३॥
घटिकाः षोडश ज्ञेया परतः पुण्यदायिकाः । माकरं संक्रमं प्राहुरुत्तरायणसंज्ञकम् ॥२४॥
परास्त्रिंशच्च घटिकाश्चत्वारिंशच्च पूर्ववत् । आदित्यशीतकिरणौ ग्राह्यावस्तंगतौ यदि ॥२५॥
स्नात्वा भुंजीत विप्रेन्द्र परेद्युः शुद्धमंडलम् । दृष्टचंद्रा सिनीवाली नष्टचंद्रा कुहूः स्मृता ॥२६॥
अमावश्या द्विधा प्रोक्ता विद्वद्भिर्धर्मलिप्सुभिः । सिनीवाली द्विजैर्ग्राह्या साग्निकैः श्राद्धकर्मणि ॥२७॥
नक्षत्र रहे तो वही तिथिसंयुक्त नक्षत्र पुण्यप्रद और ग्राह्य है। यदि दो आधी रात तक नक्षत्र और तिथि दोनों
रहें तो (तिथि के) क्षय में पूर्वा तिथि प्रशस्त है और वृद्धि में उत्तरा तिथि। यदि कोई तिथि (एक) नक्षत्र से युक्त
रहकर दो अर्धरात्रि तक चले और उसमें क्षय तथा वृद्धि न हो तो पूर्वा और परा दोनों तिथियाँ ग्राह्य हैं।
ज्येष्ठा से युक्तमूल, वह्नि से युक्त रोहिणी और मैत्र नक्षत्र से युक्त ज्येष्ठा नक्षत्र में होने वाले कर्म संतान आदि के
नाश हैं। इसके अतिरिक्त सारी तिथियाँ पुण्य तिथि हैं यदि कर्मानुष्ठान दिन को विहित हो ॥११-१६॥
सब रात्रिव्रतों में रात्रियोग ही विशिष्ट माना गया है। तिथि और नक्षत्र के योग से जो तिथि पुण्य तिथि मानी
गई है उसीमें बुद्धिमान् व्यक्ति को वह व्रत करना चाहिए। व्रत में उदय व्यापिनी श्रवण द्वादशी ग्राह्य है।
जप आदि कर्मों के लिए जब तक सूर्य ग्रहण और चन्द्र ग्रहण रहे तब तक का काल ग्राह्य है। सब संक्रान्तियों में
पुण्य काल माना जाता है ॥१७-१६॥ उस समय स्नान, दान और जप करने से अक्षय फल मिलता है। संक्रान्ति
को दक्षिणायन काल समझा जाता है। बुधजन उसके पूर्व की तीस घड़ी को पुण्यकाल मानते हैं। वृष, वृश्चिक, सिंह
और कुम्भ की संक्रान्ति के पूर्व के आठ मुहूर्त्त स्नान और जप के लिए ग्राह्य हैं। तुला और मेष संक्रान्ति के
पूर्व और पर काल दोनों ग्राह्य हैं। द्विज ! कन्या, मिथुन, मीन और धन संक्रान्ति के पूर्व की दश ही घड़ियां ग्राह्य
हैं ॥२०-२३॥ मकर संक्रान्ति को उत्तरायण काल कहते हैं उसका सोलह घड़ी का पर काल ही पुण्य काल माना
जाता है। सूर्य और चन्द्रमा यदि ग्रहणावस्था में ही अस्त हो जाँय तो सूर्य के अस्त होने के बाद की तीस
घड़ियाँ और चन्द्रमा के अस्त होने के पूर्व की चालीस घड़ियां पुण्यकाल मानी गई हैं ॥२४-२५॥ विप्रेन्द्र ! दूसरे
दिन अपने अपने गृह-मण्डल को पवित्र कर स्नान के बाद भोजन करना चाहिए। जिस अमावस्या को चन्द्रमा
दीख पड़ता है, उसको सिनीवाली और जिस दिन नहीं दिखाई पड़ता उसको कुहू कहते हैं। इस प्रकार धर्मप्रेमी
विद्वानों ने दो प्रकार की अमावस्या बतलाई है। श्राद्ध कर्म में अग्निहोत्री द्विजों के लिए सिनीवाली ग्राह्य मानी
गई है ॥२६-२७॥ स्त्री, शूद्र और अग्नि स्थापन न करने वाले द्विजों के लिए कुहू ही ग्राह्य है। यदि दो अपराह्न
१८७
एकोनत्रिंशोऽध्यायः
कुहूः स्त्रीभिस्तथा शूद्रैरपि वानग्निकैस्तथा । अपराह्नद्वयव्यापिन्यमावास्या तिथैर्यदि ॥२८॥
क्षये पूर्वा तु कर्त्तव्या वृद्धौ कार्या तथोत्तरा । अमावास्या प्रतीता चेन्मध्याह्नात्परतो यदि ॥२६॥
भूतविद्धेति विख्याता सद्भिः शास्त्रविशारदैः । अत्यन्तक्षयपक्षे तु परेद्युरपराह्नगा ॥३०॥
तत्र ग्राह्या सिनीवाली सायाह्नव्यापिनी तिथिः । अर्वाचीनक्षये चैव सायाह्नव्यापिनी तथा ॥३१॥
सिनीवाली परा ग्राह्या सर्वथा श्राद्धकर्मणि । अत्यन्ततिथिवृद्धौ तु भूतविद्धां परित्यजेत् ॥३२॥
ग्राह्या स्यादपराह्नस्था कुहूः पैतृककर्मणि । यथार्वाचीनवृद्धौ तु संत्याज्या भूतसंयुता ॥३३॥
परेद्युर्विबुधश्रेष्ठैः कुहूर्ग्राह्या पराह्नगा । मध्याह्नद्वितये व्याप्ता ह्यमावस्या तिथैर्यदि ॥३४॥
तत्रेच्छया च संग्राद्या पूर्वा वाथ पराथवा । अन्वाधानं प्रवक्ष्यामि सन्तः संपूर्णपर्वणि ॥३५॥
प्रतिपद्दिवसे कुर्याद्यागं च मुनिसत्तम । पर्वणो यश्चतुर्थांश आद्यः प्रतिपदस्त्रयः ॥३६॥
यागकालः स विज्ञेयः प्रातरुक्तो मनीषिभिः । मध्याह्नद्वितये स्याताममावस्या च पूर्णिमा ॥३७॥
परेद्युरेव विप्रेन्द्र सद्यः कालो विधीयते ॥३८॥
पूर्वद्वये परेद्युः स्यात्संगवात्परतो यदि । सद्यः कालः परेद्युः स्याज्ज्ञेयमेवं तिथिक्षये ॥३६॥
सर्वैरेकादशी ग्राह्या दशमीपरिवर्जिता । दशमीसंयुता हंति पुण्यं जन्मत्रयार्जितम् ॥४०॥
एकादशी कलामात्रा द्वादश्यां तु प्रतीयते । द्वादशी च त्रयोदश्यामस्ति चेत्सा परा स्मृता ॥४१॥
संपूर्णैकादशी शुद्धा द्वादश्यां च प्रतीयते । त्रयोदशी च रात्र्यंते तत्र वक्ष्यामि निर्णयम् ॥४२॥
पूर्वा गृहस्थैः सा कार्या ह्युत्तरा यतिभिस्तथा । गृहस्थाः सिद्धिरिच्छंति यतो मोक्षं यतीश्वराः ॥४३॥
द्वादश्यां तु कलायां वा यदि लभ्येत पारणा । तदानीं दशमीविद्धाप्युपोष्यैकादशी तिथिः ॥४४॥
काल तक अमावस्या रहे तो क्षयाह श्राद्ध पूर्व अपराह्न में और वृद्धि श्राद्ध दूसरे अपराह्न में करना चाहिए ।
यदि मध्याह्न के बाद अमावस्या तिथि पड़ती हो तो शास्त्रविज्ञों ने उसको भूतविद्धा कहा है । अत्यन्त क्षय पक्ष में
दूसरे दिन की अमावस्या तिथि ही ग्राह्य है अपराह्न वालो नहीं। वहाँ सायंकाल तक रहने वालो सिनीवाली
तिथि लेनी चाहिए । उसी प्रकार नवीन क्षय पक्ष में भी सायंकाल तक रहने वाली सिनीवाली तिथि ग्राह्य
है ॥२८-३१॥ श्राद्धकर्म में परा सिनीवाली सर्वथा ग्राह्य है, अत्यन्त तिथि की वृद्धि होने पर भूतविद्धा तिथि
को छोड़ देना चाहिए । पितृकर्म में अपराह्नस्थ कुहू ग्राह्य है । नवीन वृद्धि में चतुर्दशी से विद्ध सिनीवाली सर्वथा
त्याज्य है । पर दिन में पराह्न में आने वाली कुहू श्रेष्ठ पंडितों द्वारा ग्राह्य है । यदि अमावस्या तिथि दो मध्याह्न
तक हो तो इच्छानुसार पूर्व या पर दोनों का ग्रहण किया जा सकता है । मुनिवर्य ! अन्वाधान कर्म को अब बता
रहा हूँ—संपूर्ण पर्व में प्रतिपदा के दिन यज्ञ करना चाहिए । पर्व के चौथे भाग को प्रतिपदा के आदि के तीन
चरण को विद्वानों ने यज्ञ काल कहा है ॥३२-३६॥ अमावस्या और पूर्णिमा यदि दो मध्याह्न तक रहे तो विप्रेन्द्र !
पर दिन हो पुण्य काल माना जाता है । किन्तु दो दिनों में पर दिन तब लिया जाय जब प्रातः स्नान के तीन
मुहूर्त्त बाद तक उक्त तिथि रहे । इस प्रकार सभी तिथि क्षयों में पर दिन ग्रहण के सम्बन्ध में समझना चाहिए ।
दशमी से अविद्ध एकादशी सबके लिए ग्राह्य है, दशमी से युक्त एकादशी तीन जन्म के अर्जित पुण्य को भी नष्ट
कर देती है । यदि द्वादशी में कलामात्र भी एकादशी की प्रतीति हो और द्वादशी त्रयोदशी में कलामात्र संयुक्त
हो तो वह परा कही गई है ॥३७-४१॥
सम्पूर्णा एकादशी यदि द्वादशी में मिली जान पड़ती हो और रात्रि के अन्त में त्रयोदशी हो तो उसका निर्णय
मैं कह रहा हूँ । गृहस्थ पूर्व एकादशी व्रत को करे और यति के लिए उत्तर एकादशी हो ग्राह्य है क्योंकि गृहस्थ
इष्ट सिद्धि चाहते और यति लोग मुक्ति । यदि द्वादशी में पारण हो जाय तो दशमीविद्धा एकादशी भी उपवास के
यहाँ प्रस्तुत पृष्ठ का संपूर्ण देवनागरी पाठ पंक्ति-दर-पंक्ति दिया गया है:
१८८ नारदीयपुराणम्
शुक्ले वा यदि वा कृष्णे भवेदेकादशीद्वयम् । गृहस्थानां तु पूर्वोक्ता यतीनामुत्तरा स्मृता ॥४२॥
द्वादश्यां विद्यते किंचिद्दशमीसंयुता यदि । दिनक्षये द्वितीयैव सर्वेषां परिकीर्तिता ॥४३॥
विद्धाप्येकादशी ग्राह्या परतो द्वादशी न चेत् । अविद्धापि निषिद्धैव परतो द्वादशी यदि ॥४४॥
एकादशी द्वादशी च रात्रिशेषे त्रयोदशी । द्वादशद्वादशीपुण्यं त्रयोदश्यां तु पारणे ॥४५॥
एकादशी कलामात्रा विद्यते द्वादशीदिने । द्वादशी च त्रयोदश्यां नास्ति वा विद्यतेऽथवा ॥४६॥
विद्धाप्येकादशी तत्र पूर्वा स्याद्गृहिणां तदा । यतिभिश्चोत्तरा ग्राह्या ह्यवीराभिस्तथैव च ॥४७॥
संपूर्णांकादशी शुद्धा द्वादश्यां नास्ति किंचन । द्वादशी च त्रयोदश्यामस्ति तत्र कथं भवेत् ॥५१॥
पूर्वा गृहस्थैः कार्यात्र यतिभिश्चोत्तरा तिथिः । उपोष्यैव द्वितीयेति केचिदाहुश्च भक्तितः ॥५२॥
एकादशी यदा विद्धा द्वादश्यां न प्रतीयते । द्वादशी च त्रयोदश्यामस्ति तत्रैव चापरे ॥५३॥
उपोष्या द्वादशी शुद्धा सर्वैरेव न संशयः । केचिदाहुश्च पूर्वा तु तन्मतं न समंजसम् ॥५४॥
संक्रांतौ रविवारे च पातग्रहणयोस्तथा । पारणं चोपवासं च न कुर्यात्पुत्रवान्गृही ॥५५॥
अर्कऽह्नि पर्वरात्रौ च चतुर्दश्यष्टमी दिवा । एकादश्यामहोरात्रं भुक्त्वा चांद्राsurface: चांद्रायणं चरेत् ॥५६॥
आदित्यग्रहणे प्राप्ते पूर्वयामत्रये तथा । नाद्याद्रवै यदि भुंजीत सुरापेन समो भवेत् ॥५७॥
अन्वाधानेष्टिमध्ये तु ग्रहणं चंद्रसूर्ययोः । प्रायश्चित्तं मुनिश्रेष्ठ कर्त्तव्यं तत्र याज्ञिकैः ॥५८॥
चंद्रोपरागे जुहुयाद्दशमे सोम इत्यृचा । आप्यायस्व ऋचा चैव सोमपास्त इति द्विज ॥५९॥
सूर्योपरागे जुहुयादुदुत्यं जातवेदसम् । आसत्येनोद्द्वयं चैव त्रयो मंत्रा उदाहृताः ॥६०॥
लिए ग्राह्य है । शुक्ल पक्ष में अथवा कृष्ण पक्ष में यदि दो दिन एकादशी हो तो पूर्व की एकादशी गृहस्थों के लिए
और पर यतियों के लिए ग्राह्य मानी गई है ॥४२-४५॥ यदि दशमी से युक्त एकादशी द्वादशी के दिन भी पड़े तो
उस दिन सूर्यास्त द्वादशी में होने के कारण वह सम्पूर्ण तिथि द्वादशी ही मानी जाती है ऐसा सभी मानते हैं ।
विद्धा एकादशी भी ग्राह्य होती है यदि पर काल में द्वादशी न हो और अविद्धा एकादशी भी अग्राह्य है यदि पर
काल में द्वादशी हो । यदि एक ही दिन एकादशी द्वादशी दोनों हों और रात्रि के अन्त में त्रयोदशी हो तथा पारण
भी त्रयोदशी में ही जाय तो उस दिन व्रत रहने से बाहर द्वादशी का पुण्य मिलता है ॥४६-४८॥ द्वादशी के दिन
एकादशी कला मात्र भी हो और द्वादशी त्रयोदशी के दिन हो या न हो, तो विद्धा एकादशी भी गृहस्थों के लिए ग्राह्य
है । यतियों और पति-पुत्र-रहित स्त्रियों के लिए पर एकादशी ही ग्राह्य मानी गई है । पूरे दिन तक रहने वाली
शुद्ध एकादशी यदि द्वादशी से सर्वथा अविद्ध हो और द्वादशी त्रयोदशी में हो तो वहाँ क्या निर्णय होगा इसको
सुनो ॥४९-५१॥ उसमें पूर्व तिथि गृहस्थों के लिए और यतियों के लिए उत्तर तिथि ग्राह्य है । कुछ लोग कहते हैं
कि द्वितीय तिथि ही भक्ति पूर्वक उपवास के लिए ग्राह्य है । विद्धा एकादशी यदि द्वादशी में थोड़ी भी न हो और
उसी दिन द्वादशी त्रयोदशी में हो तो अपर व्यक्ति कहते हैं कि वह द्वादशी सब के लिए ग्राह्य है, इसमें कुछ भी
सन्देह नहीं । कुछ लोग पूर्व को ही ग्राह्य मानते हैं परन्तु उनका मत उचित नहीं जान पड़ता ॥५२-५४॥ संक्रान्ति
और रविवार के दिन यदि पात और ग्रहण हो तो पुत्रवान् गृहस्थ के लिए उस दिन पारण या उपवास करना
उचित नहीं है । रविवार, पर्व की रात्रि, चतुर्दशी और अष्टमी के दिन में, एकादशी को रात्रि और दिन दोनों
समय भोजन करने से चान्द्रायण व्रत करना चाहिए ॥५५-५६॥ सूर्य ग्रहण लगने पर ग्रहण के पूर्व तीन पहर के
भीतर भोजन नहीं करना चाहिए । यदि भोजन करे तो वह मदिरा पान के समान होता है । मुनिश्रेष्ठ ! अन्वाधान,
इष्टि, चन्द्र और सूर्य ग्रहण के समय याज्ञिक प्रायश्चित्त अवश्य करें । चन्द्र ग्रहण के समय 'दशमे सोम, इस मन्त्र
से या 'आप्यायस्व' अथवा 'सोमपास्त' इस मन्त्र से हवन करना चाहिए । सूर्य ग्रहण में 'उदुत्यं जातवेदसम्,
त्रिंशोऽध्यायः १८६
एवं तिथिं विनिश्चित्य स्मृतिमार्गेण पण्डितः । यः करोति व्रतादीनि तस्य स्यादक्षयं फलम् ॥६१॥
वेदप्रणिहितो धर्मो धर्मे स्तुष्यति केशवः । तस्माद्धर्मपरा यांति तद्विष्णोः परमं पदम् ॥६२॥
धर्मान्ये कर्त्तुमिच्छंति ते वै कृष्णस्वरूपिणः । तस्मातांस्तु भवव्याधिः कदाचिन्नैव बाधते ॥६३॥
इतिश्रीबृहन्नारदीयपुराणे पूर्वभागे प्रथमपादे तिथ्यादिनिर्णयो नाम एकोनत्रिंशोऽध्यायः ॥२६॥
त्रिंशोऽध्यायः
सनक उवाच
प्रायश्चित्तविधिं वक्ष्ये शृणु नारद सांप्रतम् । प्रायश्चित्तविशुद्धात्मा सर्वकर्मफलं लभेत् ॥१॥
प्रायश्चित्तविहीनैस्तु यत्कर्म क्रियते मुने । तत्सर्वं निष्फलं प्रोक्तं राक्षसैः परिसेवितम् ॥२॥
कामक्रोधविहीनैश्र्च धर्मशास्त्रविशारदैः । प्रष्टव्या ब्राह्मणा धर्मं सर्वधर्मफलेच्छुभिः ॥३॥
प्रायश्चित्तानि चीर्णानि नारायणपराङ्मुखैः । न निष्पुनंति विप्रेन्द्र सुराभांडमिवापगाः ॥४॥
ब्रह्महा च सुरापी च स्तेयी च गुरुतल्पगः । महापातकिनस्त्वेते तत्संसर्गी च पंचमः ॥५॥
यस्तु संवत्सरं ह्येतैः शयनासनभोजनैः । संवसेत्सह तं विद्यात्पतितं सर्वकर्मसु ॥६॥
अज्ञानाद्ब्राह्मणं हत्वा चीरवासाजटी भवेत् । स्वेनैव हतविप्रस्य कपालमपि धारयेत् ॥७॥
आसत्येनो द्वयम्' इस मन्त्र से हवन करना चाहिए। यही सूर्य के तीन मंत्र बतलाए गए हैं ॥५७-६०॥ इस प्रकार
स्मृति के अनुसार तिथियों का निर्णय कर जो पंडित व्रत आदि करता है, उसको अक्षय फल मिलता है। धर्म वेद-
विहित है। केशव धर्म से ही प्रसन्न होते हैं। इसलिए धर्मपरायणजन विष्णु के परम पद को प्राप्त करते हैं।
जो धर्माचरण करना चाहते हैं वे कृष्णस्वरूप हैं। इसलिए उनको सांसारिक व्याधियों से कुछ भी कभी भी पीड़ा
नहीं होती ॥६१-६३॥
श्रीनारदीयमहापुराण में तिथिनिर्णयवर्णन नामक उनतीसवाँ अध्याय समाप्त ॥२६॥
अध्याय ३०
प्रायश्चित्त विधि का निरूपण
सनक बोले— नारद ! अब प्रायश्चित्त विधि बता रहा हूँ। प्रायश्चित्त के द्वारा विशुद्ध आत्मा वाले सब कर्म
फलों को प्राप्त करते हैं। मुने ! प्रायश्चित्त के बिना मनुष्य जो कुछ कर्म करता है सब निष्फल जाता है और
उसके सब कर्म राक्षसों से घिरे रहते हैं। काम क्रोध से हीन, धर्मशास्त्रज्ञ और सब धर्मों के फल के इच्छुक
व्यक्ति को चाहिए कि वे ब्राह्मणों से ही धर्म की बातें पूछें ॥१-३॥ विप्रेन्द्र ! जिस प्रकार नदियाँ मदिरापात्र को
पवित्र करने में सर्वथा असमर्थ हैं, उसी प्रकार नारायण से विमुख रहने वाले व्यक्तियों को उनके किये हुए प्रायश्चित्त
भी। ब्रह्मघातक, मदिरा पान करने वाला, चोर, गुरुपत्नीगामी ये चार महापातकी हैं और इनके संसर्ग में रहने
वाला व्यक्ति भी पाँचवां महापापी है ॥४-५॥ जो इन महापातकियों के साथ एक वर्ष तक सोता, बैठता और भोजन
करता है उसको सब कर्मों से च्युत समझना चाहिए ॥६॥
अज्ञान से किसी ब्राह्मण की हत्या कर देने पर उस हत्यारे को जटा और वल्कलधारी होना चाहिए।
यदि जानबूझ कर उसने ब्राह्मणवध किया हो तब तो उसको कपाल भी धारण करना चाहिए। अन्यथा वह
१८० नारदीयपुराणम्
तदभावे मुनिश्रेष्ठ कपालं चान्यमेव वा । तद्द्रव्यं ध्वजदण्डे तु धृत्वा वनचरो भवेत् ॥८॥
वन्याहारो वसेत्तत्र वाग्यतो नियताशनः । सन्धवत्स्यामुपासीत त्रिकालं स्नानमाचरेत् ॥६॥
अध्ययनाध्यापनादीन्वजयेत्सस्मरेद्धरिम् । ब्रह्मचारी भवेन्नित्यं गंधमाल्यादि वर्जयेत् ॥१०॥
तीर्थान्यनुवसेच्चैव पुण्यांश्चत्वाश्रमांस्तथा । यदि वन्येनं जीवेन ग्रामे भिक्षां समाचरेत् ॥११॥
द्वादशाब्दं व्रतं कुर्यादेवं हरिपरायणः । ब्रह्महा शुद्धिमाप्नोति कर्मार्हश्चैव जायते ॥१२॥
व्रतमध्य मृगैर्र्वापि रोगैर्वापि विपद्यितः । गोनिमित्तं द्विजार्थं वा प्राणान्वापि परित्यजेत् ॥१३॥
यद्वा दद्याद्विजेन्द्राणां गवामयुतमुत्तमम् । एतेष्वन्यतमं कृत्वा ब्रह्महा शुद्धिमाप्नुयात् ॥१४॥
दीक्षितं क्षत्रियं हत्वा चरेद्धि ब्रह्महव्रतम् । अग्निप्रवेशने वापि मरुत्प्रपतनं तथा ॥१५॥
दीक्षितं ब्राह्मणं हत्वा द्विगुणं व्रतमाचरेत् । आचार्यादिवधे चैव व्रतमुक्तं चतुर्गुणम् ॥१६॥
हत्वा तु विप्रमात्रं च चरेत्संवत्सरं व्रतम् । एवं विप्रस्य गदितः प्रायश्चित्तविधिद्विज ॥१७॥
द्विगुणं क्षत्रियस्योक्तं त्रिगुणं तु विशः स्मृतम् । ब्राह्मणं हन्ति यः शूद्रस्तं मुशल्यं विदुर्बुधाः ॥१८॥
राज्ञैव शिक्षा कर्तव्या इति शास्त्रेषु निश्चयः । ब्राह्मणीनां वधे त्वद्धं पादः स्यात्कन्यकावधे ॥१९॥
हत्वा त्वनुपनीतांश्च तथा पादव्रतं चरेत् । हत्वा तु क्षत्रियं विप्रः षडब्दं कृच्छ्रमाचरेत् ॥२०॥
संवत्सरत्रयं वैश्यं शूद्रं हत्वा तु वत्सरम् । दीक्षितस्य स्त्रियं हत्वा ब्राह्मणीं चाष्टवत्सरान् ॥२१॥
ब्रह्महत्याव्रतं कृत्वा शुद्धो भवति निश्चितम् । प्रायश्चित्तविधानं तु सर्वत्र मुनिसत्तम ॥२२॥
कपाल अथवा अन्य वस्तु को ध्वज दण्ड में बांधकर रख ओर वनवासी हो जाय। और दिन में एक बार थोड़ा
सा वन्य-फल मूलों का ही आहार करता हुआ वनवासी जीवन वितावे ॥७-८॥ त्रिकाल स्नान और सन्ध्योपासना
करे, अध्ययन, अध्यापन आदि से मुख मोड़कर केवल हरि स्मरण में ही लगा रहे। नित्य ब्रह्मचर्य व्रत का पालन
करे और सुगन्धित पदार्थ या माला का सर्वथा त्याग कर दे। सर्वदा पवित्र तीर्थों और आश्रमों में रहे। यदि
वन्य फलों से जीना असम्भव हो तो गांव में भिक्षा मांगकर जीवन वितावे ॥६-११॥ इस प्रकार हरिपरणय
होकर बारह वर्ष तक व्रत पालन करने से ब्रह्मघाती शुद्ध ओर कर्मों का अधिकारी हो जाता है। व्रत पालन-काल
में यदि किसी वन्य पशु के द्वारा या रोग से मृत्यु हो जाय, गौ अथवा ब्राह्मण-रक्षार्थ प्राण त्याग कर दे अथवा
ब्राह्मणों को दश हजार उत्तम गायों का दान कर दे तो वह ब्रह्मघाती शुद्ध हो जाता है। यज्ञदीक्षित क्षत्रिय की
हत्या करने पर ब्रह्महत्या के समान ही प्रायश्चित करना चाहिए ॥१२-१४३॥ अग्नि में प्रवेश कर (जलकर) व
पहाड़ से गिरकर अथवा प्राणवायु को रोककर प्राणत्याग करना इसके लिए उत्तम प्रायश्चित्त है। दीक्षित ब्राह्म
की हत्या करने से दुगुना प्रायश्चित करना चाहिए और आचार्य आदि के वध करने पर चौगुना। द्विज ! विप्र की
हत्या करने पर उक्त संवत्सर व्रत करना चाहिए। विप्र के लिए इस प्रकार का प्रायश्चित विहित है। क्षत्रिय
लिए दूना, वैश्य के लिए तिगुने प्रायश्चित का विधान है। जो शूद्र ब्राह्मण का वध करता है उसको पंडितों
मुशल्य (मुशल से मारकर चूर्ण करने योग्य) माना है ॥१५-१८॥ राजा ही दण्ड (शिक्षा) का निर्णय करे ऐसा
शास्त्रों का निर्णय है। ब्राह्मणीवध में आधा प्रायश्चित (छह वर्ष तक) और कन्यावध में चौथाई (तीन वर्ष तक)
प्रायश्चित्त करना चाहिए। अविवाहित की हत्या कर देने पर चौथाई प्रायश्चित्त का ही विधान है ॥१९॥ ब्राह्मण
यदि क्षत्रिय की हत्या कर दे तो उसको छह वर्ष तक कृच्छ्र चान्द्रायण करना चाहिए। वैश्य का वध कर तीन वर्ष
और शूद्र की हत्या करने पर एक वर्ष का प्रायश्चित्त करना शास्त्रों में विहित है। यज्ञदीक्षित व्यक्ति की ब्राह्मणी
पत्नी की हत्या करने पर आठ वर्ष तक ब्रह्महत्या का प्रायश्चित्त करने से ही मनुष्य शुद्ध होता है। मुनिसत्तम
सर्वत्र मुनियों ने बूढ़ा रोगी और स्त्री के लिए आधा ही प्रायश्चित्त कहा है ॥२०-२२॥
त्रिशोऽध्यायः १६१
वृद्धातुरस्त्रीबालानामर्दमुक्तं मनीषिभिः । गौडी पैष्टी च माध्वी च विज्ञेया त्रिविधा सुरा ॥२३॥
चातुर्वर्ण्यैरपेया स्यात्तथा स्त्रीभिश्च नारद । क्षीरं घृतं वा गोमूत्रमेतेष्वन्यतमं मुने ॥२४॥
स्नात्वाऽऽर्द्रवासा नियतो नारायणमनुस्मरन् । पक्वायसनिभं कृत्वा पिवेच्चैवोदकं ततः ॥२५॥
तत्तु लोहेन पात्रेण ह्यायसेनायवा पिवेत् । ताम्रेण वाथ पात्रेण तत्पीत्वा मरणं व्रजेत् ॥२६॥
सुरापी शुद्धिमाप्नोति नान्या शुद्धिर्विधीयते । अज्ञानादात्मबुद्ध्या तु सुरां पीत्वा द्विजश्चरेत् ॥२७॥
ब्रह्महत्याव्रतं सम्यक्तच्चिह्नपरिवर्जितः । यदि रोगा निवृत्त्यर्थमौषधार्थं सुरा पिवेत् ॥२८॥
तस्योपनयनं भूयस्तथा चान्द्रायणद्वयम् । सुरासंसृष्टपात्रं तु सुराभांडोदकं तथा ॥२९॥
सुरापानसमं प्राहुस्तथा चन्द्रस्य भक्षणम् । तालं च पानसं चैव द्राक्षं खार्जूरसंभवम् ॥३०॥
माधुकं शैलमारिष्टं मैरेयं नालिकेरजम् । गौडो माध्वी सुरा मद्यमेवमेकादश स्मृताः ॥३१॥
एतेष्वन्यतमं विप्रो न पिवेदं कदाचन । एतेष्वन्यतमं यस्तु पिवेदज्ञानतो द्विजः ॥३२॥
तस्योपनयनं भूयस्तप्तकृच्छ्रं चरेत्तथा । समक्षं वा परोक्षं वा बलाच्चौर्येण वा तथा ॥३३॥
परस्वानामापुादानं स्तेयमित्युच्यते बुधैः । सुवर्णस्य प्रमाणं तु मन्वाद्यैः परिभाषितम् ॥३४॥
वक्ष्ये शृणुष्व विप्रेंद्र प्रायश्चित्तौकसाधनम् । गवाक्षान्तमार्तण्डरश्मिमण्डो प्रदृश्यते ॥३५॥
त्रसरेणुप्रमाणं तु रज इत्युच्यते बुधैः । त्रसरेण्वष्टकं निष्कस्तत्त्रयं राजसर्षपः ॥३६॥
गौरसर्षपस्तत्त्रयं स्यात्तत्षट्कं यव उच्यते । यवत्रयं कृष्णलः स्यान्माषस्तत्पंचकं स्मृतः ॥३७॥
माषषोडशमानं स्यात्सुवर्णमिति नारद । हृत्वा ब्रह्मस्वमज्ञानाद्द्वादशाब्दं तु पूर्ववत् ॥३८॥
गौडी, पैष्टी माध्वी ये तीन प्रकार की मदिरायें मानी गई हैं। नारद ! ये सब प्रकार की मदिरायें
चारो वर्गों और स्त्रियों के लिए अपेय हैं । मुने ! मदिरा पान करने पर दूध, घी या गोमूत्र इनमें से किसी को
जलते हुए लोहे के समान गरम कर, स्नान करने के बाद भीगी धोती पहने हो एकाग्र भाव से हरि का स्मरण
करता हुआ पी जावे ऊपर से पानी भी पी ले । उस जलते हुए पदार्थ को लोहे के पात्र या ताँवे के पात्र से
पीकर प्राण छोड़ दे ॥२३-२६॥ सुरा पान करने वाला इसी प्रकार शुद्ध होता है और दूसरा शुद्धि का उपाय
इसके लिए उपयुक्त नहीं । कोई द्विज यदि अज्ञान वश मदिरा पी ले तो पैरों में बेड़ियाँ लगाकर ब्रह्महत्या के
समान प्रायश्चित करे, केवल उसके चिह्न (कपाल आदि) न धारण करे । यदि रोग से छूटने के लिए या ओषधि
के रूप में मदिरा पान करना पड़े तो पुनः उसका यज्ञोपवीत हो और दो चान्द्रायण व्रत करे । सुरा से छुये गए
पात्र, मदिरा पात्र का जल या आर्द्र भक्षण ये भी सुरा पान के समान ही माने जाते हैं ॥२७-२९३॥ ताल,
पानस (कटहल की बनी मदिरा) द्राक्षा, खजूर, मधु और पत्थर से बनी मदिरा, आरिष्ट, मैरेय, नारिकेल से बनी
गुड़, मधु से बना हुआ मद्य, ये ग्यारह प्रकार की मदिरायें होती हैं । ब्राह्मण इनमें से किसी प्रकार की मदिरा न
पीये ॥३०-३१३॥ कोई द्विज यदि इनमें से किसी को अज्ञान वश पी ले तो पुनः उसका यज्ञोपवीत हो और वह
तप्त कृच्छ्र व्रत करे ॥३२३॥
पंडितों ने दूसरे के धन को प्रत्यक्ष या गुप्त रूप से, बलात् या चोरी से ले लेने को ही 'स्तेय' कहा है। मनु
आदि स्मृतिकारों ने सुवर्ण के प्रमाण की परिभाषा बताई है । विप्रेन्द्र ! उसी के अनुसार मैं प्रायश्चित्त कह
रहा हूँ, सुनो । खिड़की से होकर आने वाली सूर्य की किरणों के बीच जो त्रसरेणु प्रमाण का धूलि कण दिखाई
देता है उसको पंडितों ने रज कहा है। आठ त्रसरेणु के बराबर निष्क और तीन निष्क का राजसर्षप होता है
॥३३-३६॥ तीन राजसर्षप का एक गौर सर्षप और छः गौर सर्षप का एक यव होता है । तीन यव का एक
कृष्णल और पाँच कृष्णल का एक माष होता है । नारद ! सोलह माष के बराबर सुवर्ण होता है । अज्ञानवश
१६२ नारदीयपुराणम्
कपालध्वजहीनं तु ब्रह्महत्याव्रतं चरेत् । गुरूणां यज्ञकतूंणां धम्मिष्ठानां तथैव च ॥३८॥
श्रोत्रियाणां द्विजानां तु हृत्वा हेमैवमाचरेत् । कृतानुतापो देहे च संपूर्ण लेपयेद् घृतम् ॥४०॥
करीषच्छादितो दग्धःस्तेयपापाद्विमुच्यते । ब्रह्मस्वं क्षत्रियो हृत्वा पश्चात्तापमवाप्य च ॥४१॥
पुनर्ददाति तत्रैव तद्विधानं शृणुष्व मे । तत्र सांतपनं कृत्वा द्वादशाहोपवासतः ॥४२॥
शुद्धिमाप्नोति देवर्षे ह्यन्यथा पतितो भवेत् । रत्नासनमनुष्यस्त्रीधेनुभूम्यादिकेषु च ॥४३॥
सुवर्णसदृशेष्वे षु प्रायश्चित्तार्द्धमुच्यते । त्रसरेणुसमं हेम हृत्वा कुर्यात्समाहितः ॥४४॥
प्राणायामद्वयं सम्यक् तेन शुद्ध्यति मानवः । प्राणायामत्रयं कुर्याद्धृत्वा निष्कप्रमाणकम् ॥४५॥
प्राणायामांश्च चत्वारो राजसर्षपमात्रके । गौरसर्षपमानं तु हृत्वा हेम विचक्षणः ॥४६॥
स्नात्वा च विधिवज्जप्याद्गायत्र्यष्टसहस्रकम् । यवमात्रसुवर्णस्य स्तेयाच्छुद्धो भवेद्द्विजः ॥४७॥
आसायं प्रातरारभ्य जप्त्वा वै वेदमातरम् । हेमकृष्णलमात्रं तु हृत्वा सांतपनं चरेत् ॥४८॥
माषप्रमाणे हेम्नस्तु प्रायश्चित्तं निगद्यते । गोमूत्रपक्वयवभुग्वर्षेणैकेन शुद्ध्यति ॥४६॥
संपूर्णस्य सुवर्णस्य स्तेयं कृत्वा मुनीश्वर । ब्रह्महत्याव्रतं कुर्याद्द्वादशाब्दं समाहितः ॥५०॥
सुवर्णमानान्न्यूने तु रजतस्तेयकर्मणि । कुर्यात्सांतपनं सम्यगन्यथा पतितो भवेत् ॥५१॥
दशनिष्कांतपर्यन्तमूर्ध्वं निष्कचतुष्टयात् । हृत्वा च रजतं विद्वान्कुर्याच्चांद्रायणं मुने ॥५२॥
दशादिशतनिष्कांतं यः स्तेयी रजतस्य तु । चांद्रायणद्वयं तस्य प्रोक्तं पापविशोधकम् ॥५३॥
शतादूर्ध्वं सहस्रांतं प्रोक्तं चांद्रायणत्रयम् । सहस्रादधिकस्तेये ब्रह्महत्याव्रतं चरेत् ॥५४॥
ब्राह्मण का धन चुरा लेने पर बारह वर्ष तक पूर्व की भांति ब्रह्महत्या का प्रायश्चित्त करना चाहिए, केवल कपाल
ध्वज नहीं धारण करना चाहिए ॥३७-३८॥ गुरु, यज्ञकर्त्ता, धर्मिष्ठ, श्रोत्रिय और द्विजों का सुवर्ण चुराने से इस
प्रकार प्रायश्चित्त किया जाता है कि पहले अपने पाप पर पश्चात्ताप करे और अपने शरीर पर घी का लेप कर
करसी की आग में जल कर मर जाय। इस प्रकार वह चोरी के पाप से छूट जाता है। क्षत्रिय यदि ब्राह्मण के
धन को चुरा कर पुनः पश्चात्ताप करे और उसी ब्राह्मण को लौटा दे तब उसको जो प्रायश्चित्त करना पड़ता है
उसको मुझसे सुनो ॥३९-४१॥ इस दशा में बारह दिन तक उपवासकर सान्तपन करे तभी वह शुद्ध हो सकता है
देवर्षि ! अन्यथा वह पतित कहा जाता है । रत्नासन, मनुष्य, स्त्री, धेनु, और भूमि आदि का चुराना सुवर्णस्तेय
के समान ही माना जाता है, परन्तु इसके लिए सुवर्णस्तेय का आधा प्रायश्चित्त कहा गया है। त्रसरेणु के बराबर
सोना चुरा लेने पर एकाग्र हो दो प्राणायाम करे तभी वह मनुष्य भली भाँति शुद्ध होता है । निष्क परिमित सोना
चुराने पर तीन प्राणायाम करे । राजसर्षप मात्र सोना चुराने पर चार प्राणायाम करे । विज्ञ व्यक्ति गौर सर्षप
परिमित सोना चुरा लेने पर विधिवूर्वक स्नान कर आठ हजार गायत्री का जप करे ॥४२-४६॥ यव मात्र सोना
चुराने पर द्विज प्रातः काल से लेकर सायङ्काल वेदमाता गायत्री का जप करने पर शुद्ध होता है । कृष्णल (गुंजा)
मात्र सोना चुराने पर सान्तपन व्रत करे । माष प्रमाण सुवर्ण की चोरी करने पर प्रायश्चित्त कहा गया है कि
वह व्यक्ति एक वर्ष तक गोमूत्र में यव पकाकर खाय तभी वह शुद्ध होता है ॥४७-४६॥ मुनीश्वर ! सम्पूर्ण सुवर्ण के
चुराने पर सावधान हो बारह वर्ष तक ब्रह्महत्या व्रत करे । सुवर्णमान से कम चाँदी के चुराने पर विधिवत् सान्तपन
व्रत करे अन्यथा वह पतित हो जाता है। मुने ! चार निष्क (१६ माशे का परिमाण) से दश निष्क तक चाँदी की
चोरी करने पर चान्द्रायण व्रत करे । दश निष्क से लेकर सौ निष्क तक की चाँदी जो चुराता है उसके पापों का
संशोधन दो चान्द्रायण व्रत करने से ही होता है ॥५०-५२॥ सौ निष्क से अधिक हजार निष्क तक चुराने पर तीन
बार चान्द्रायण व्रत करना चाहिए। हजार निष्क से अधिक चुराने पर ब्रह्महत्या व्रत करना पड़ता है । कोईम्,
त्रिंशोऽध्यायः १८३
कांस्यपित्तलमुख्येषु ह्ययस्कांते तथैव च । सहस्रनिष्कमाने तु पराकं परिकीर्तितम् ॥५५॥
प्रायश्चित्तं तु रत्नानां स्तेये रजतवत्स्मृतम् । गुरुतल्पगतानां च प्रायश्चित्तमुदीर्यते ॥५६॥
अज्ञानान्मातरं गत्वा तत्सपत्नीमथापि वा । स्वयमेव स्वमुष्कं तु च्छित्त्वापापमुदीरयन् ॥५७॥
हस्ते गृहीत्वा मुष्कं तु गच्छेद्वै नैर्ऋतीं दिशम् । गच्छन्मार्गे सुखं दुःखं न कदाचिद्विचारयेत् ॥५८॥
अपश्यन्गच्छतो गच्छेत्प्राणान्तं यः स शुद्ध्यति । महत्प्रपतनं वापि कुर्यात्पापमुदाहरन् ॥५९॥
स्ववर्णोत्तमवर्णस्त्रीगमने त्वविचारतः । ब्रह्महत्याव्रतं कुर्याद्द्वादशाब्दं समाहितः ॥६०॥
अमत्याभ्यासतो गच्छेत्सवणीं चोत्तमां तथा । कारीषाग्निना दग्धः शुद्धिं याति द्विजोत्तम ॥६१॥
रेतःसेकात्पूर्वमेव निवृत्तो यदि मातरि । ब्रह्महत्याव्रतं कुर्याद्रेतःसेकेऽग्निदाहनम् ॥६२॥
सवर्णोत्तमवर्णासु निवृत्तो वीर्यसेचनात् । ब्रह्महत्याव्रतं कुर्यान्नवब्दान्विष्णुतत्परः ॥६३॥
वैश्यायां पितृपत्न्यां तु षडब्दं व्रतमाचरेत् । गत्वा शूद्रां गुरोर्भार्यां त्रिवर्षं व्रतमाचरेत् ॥६४॥
मातृष्वसारं च पितृष्वसारमाचार्यभार्यां श्वशुरस्य पत्नीम् । ॥६५॥
पितृव्यभार्यामथ मातुलीनीं पुत्रीं च गच्छेदयदि काममुग्धः
दिनद्वये ब्रह्महत्याव्रतं कुर्याद्यथाविधि । एकस्मिन्नेव दिवसे बहुवारं त्रैवार्षिकम् ॥६६॥
एकं वारं गते ह्यब्दं व्रतं कृत्वा विशुद्ध्यति । दिनत्रये गते वह्निदग्धः शुध्येत नान्यथा ॥६७॥
चांडालीं पुक्कसीं चैव स्नुषां च भगिनीं तथा । मित्रस्त्रियं शिष्यपत्नीं यस्तु वै कामतो व्रजेत् ॥६८॥
ब्रह्महत्याव्रतं कुर्यात्स षडब्दं मुनीश्वर । अकामतो व्रजेद्यस्तु सोऽब्दकृच्छ्रं समाचरेत् ॥६९॥
महापातकिसंसर्गे प्रायश्चित्तं निगद्यते । प्रायश्चित्तविशुद्धात्मा सर्वकर्मफलं लभेत् ॥७०॥
पित्तल और अयस्कान्त आदि की यदि हजार निष्क मात्रा में चोरी की जाय तो उस चोर को पराक व्रत करना
चाहिए । रत्नों की चोरी में भी चाँदी की चोरी के समान ही प्रायश्चित्त कहा गया है ॥५३-५६॥
गुरुतल्प गमन का प्रायश्चित्त कह रहा हूँ सुनो । अनजाने माता या माता की सौत से मैथुन करने वाला
व्यक्ति स्वयं अपने पापों की घोषणा करते हुए अपने अण्डकोश को काट दे । अविचार अज्ञानवश अपने वर्ण से उत्तम
वर्ण वाली स्त्री से संभोग करने पर बारह वर्ष तक सावधानी से ब्रह्म हत्या व्रत करना चाहिए ॥५७-६०॥ द्विजोत्तम ।
अविवेक और अभ्यास के कारण यदि सवर्णा या उत्तम वर्ण की कन्या से सम्भोग करे तो वह करसी की आग में जल
कर ही शुद्ध हो सकता है । मातृयोनि में वीर्य पात करने के पूर्व ही यदि मैथुन त्याग कर दे तब तो वह ब्रह्म हत्या
व्रत करे और वीर्य पात करने पर तो अग्नि में भस्म हो जाना ही प्रायश्चित्त है । सवर्ण अथवा उत्तम वर्ण में वीर्य
पात करने के पूर्व ही मैथुन से हट जाने पर नव वर्ष तक भगवान् की पूजा में एकनिष्ठ हो ब्रह्महत्या व्रत करे
॥६१-६३॥ पिता की वैश्या पत्नी से व्यभिचार करने पर छह वर्ष तक व्रत पालन करे और गुरु की शूद्र भार्या से
भोग करने पर तीन वर्ष तक, मौसी, फुआ, आचार्य-भार्या, श्वशुर की स्त्री, चाचा की स्त्री, मामी और पुत्री से यदि
कामविह्वल होकर दो दिन मैथुन कर दे तो यथा विधि ब्रह्महत्या व्रत करे । एक ही दिन कई बार संभोग करने
पर तीन वर्ष तक और एक बार करने पर एक वर्ष तक व्रत करे तभी वह शुद्ध हो सकता है । तीन दिन मैथुन
करने पर केवल अग्नि में भस्म होने पर ही शुद्धि हो सकती है, अन्यथा नहीं ॥६४-६७॥ मुनीश्वर ! चाण्डाली,
पुक्कसी पुत्रवधू, बहिन, मित्रस्त्री, शिष्यपत्नी से जो काम-भावना से भोग करता है वह छह वर्ष तक ब्रह्म-हत्या व्रत
करे, जो अकामभाव से ऐसा करे, वह एक वर्ष तक कृच्छ्रव्रत करे ॥६८-६९॥
अब महापापी की संगति से जो-जो पाप लगते हैं उनके लिए प्रायश्चित्त कह रहा हूँ । प्रायश्चित्त करने से
मनुष्य का आत्मा शुद्ध होता है और वह सब कर्म फलों का अधिकारी होता है । जिसका उपर्युक्त चार प्रकार के
२५ नारदीयपुराण
१६४ नारदीयपुराणम्
यस्य येन भवेत्संगो ब्रह्महादिचतुर्ष्वपि । तत्तद्व्रतं स निर्वर्त्य शुद्धिमाप्नोत्यसंशयम् ॥७१॥
अज्ञानात्पंचरात्रं तु संगमेभिः करोति यः । कायकृच्छ्रं चरेत्सम्यगन्यथा पतितो भवेत् ॥७२॥
द्वादशाहे तु संसर्गे महासांतपनं स्मृतम् । संगंकृत्वाऽर्द्धमासं तु द्वादशाहमुपावसेत् ॥७३॥
पराको माससंसर्गे चांद्रमासत्रये स्मृतम् । कृत्वा संगं तु षण्मासं चरेच्चान्द्रायणद्वयम् ॥७४॥
किंचिन्न्यूनाब्दसंगे तु षण्मासव्रतमाचरेत् । एतच्च त्रिगुणं प्रोक्तं ज्ञातात्संगे यथाक्रमम् ॥७५॥
मंडूकं नकुलं काकं वराहं मूषकं तथा । मार्जाराजाविकं श्वानं हत्वा कुक्कुटकं तथा ॥७६॥
कृच्छ्राद्धं माचरेद्विप्रोऽतिकृच्छ्रं चाश्वहा चरेत् । तप्तकृच्छ्रं करिवधे पराकं गोवधे स्मृतम् ॥७७॥
कामतो गोवधे नैव शुद्धिर्दृष्टा मनीषिभिः । पानं शय्यासनाद्येषु पुष्पमूलफलेषु च ॥७८॥
भक्ष्यभोज्यापहारेषु पंचगव्यविशोधनम् । शुष्ककाष्ठतृणानां च द्रुमाणां च गुडस्य च ॥७९॥
चर्मवस्त्राभिषाणां च त्रिरात्रं स्वादभोजनम् । टिट्टिभं चक्रवाकं च हंसं कारंडवं तथा ॥८०॥
उलूकं सारसं चैव कपोतं जलपादकम् । शुकं चाषं बलाकं च शिशुमारं च कच्छपम् ॥८१॥
एतेष्वन्यतमं हत्वा द्वादशाहमभोजनम् । प्राजापत्यव्रतं कुर्याद्रैतोविण्मूत्रभोजने ॥८२॥
चांद्रायणत्रयं प्रोक्तं शूद्रोच्छिष्टस्य भोजने । रजस्वलां च चांडालं महापातकिनं तथा ॥८३॥
सूतिकां पतितं चैव उच्छिष्टं रजकादिकम् । स्पृष्ट्वा सचैलं स्नायीत घृतं संप्राश्येत्तथा ॥८४॥
गायत्रीं च विशुद्धात्मा जपेदष्टशतं द्विज । एतेष्वन्यतमं स्पृष्ट्वा अज्ञानाद्यदि भोजने ॥८५॥
महापापियों में किसी से संसर्ग हो जाता है उसकी उसी महापाप के अनुकूल व्रत करने से शुद्धि होती है,
इसमें कोई सन्देह नहीं। जो अज्ञान वश पाँच रात्रि तक इनमें से किसी के साथ रहता है वह कायकृच्छ्रव्रत करे
अन्यथा वह पतित हो जाता है। बारह दिन की संगति में तो महासान्तपन व्रत करना ही उचित माना गया है।
आधे महीने तक संगति करने से बारह दिन तक उपवास करना चाहिए। एक महीने तक साथ रहने पर पराक व्रत
और तीन महीने के संसर्ग में चान्द्रायण व्रत करना श्रेयस्कर कहा जाता है। छह महीने के साहचर्य में दो चान्द्रायण
व्रत करना चाहिए ॥६९-७४॥ एक वर्ष से कुछ कम समय तक साथ रहने से षण्मास व्रत करना चाहिए।
जान बूझकर संगति करने पर क्रमशः इनका तिगुना प्रायश्चित्त करना चाहिए ऐसा शास्त्रकारों का कहना है ॥७५॥
मेढक, नेवला, कौआ, सूअर, चूहा, बिल्ली, बकरी, भेड़, कुत्ता और मुर्गा इतने जीवों की हत्या करने पर
ब्राह्मण को अर्द्ध कृच्छ्र करना चाहिए। अश्व वध करने वाले को अति कृच्छ्र व्रत करना चाहिए। हाथी के वध में
तप्तकृच्छ्र और गोवध में पराक व्रत कहा गया है। मनीषियों ने जान बूझकर गोहत्या करने वालों पर किसी
प्रकार का प्रायश्चित नहीं बतलाया है ॥७६-७७॥ पीने योग्य वस्तु रस, शरबत आदि, खटिया, आसन और फल फूल
मूल अथवा भक्ष्य भोज्य आदि के चुरा लेने पर पंचगव्य से शुद्धि कही गई है। सूखी लकड़ी, तृण, वृक्ष, गुड़, चमड़ा
वस्त्र और मांस को चुरा लेने पर तीन रात तक उपवास करना चाहिए। टिटिहिरी, चक्रवाक, हंस, कारंडव,
उल्लू, सारस, कपोत, जलपादक (एक प्रकार का हंस), सुग्गा, चाष, बगुला, शिशुमार, कछुआ इनमें से किसी
की हत्या करने पर बारह दिन तक भोजन नहीं करना चाहिए। वीर्य, विष्ठा और मूत्र भोजन करने पर
प्राजापत्य व्रत करना चाहिए ॥७८-८२॥ शूद्र का जूठा भोजन करने पर तीन बार चान्द्रायण व्रत का विधान है।
रजस्वला स्त्री, चाण्डाल, महापापी सूतिका (जच्चा) पतित, जूठा भोजन, धोबी आदि छू जाने पर सचैल (वस्त्र-
सहित) स्नान करने और घृत प्राशन भी करे। द्विज ! इस प्रकार विशुद्ध हो आठ सौ गायत्री का जप करे।
यदि इनमें से किसी को छू कर अनजाने अज्ञान वश भोजन कर ले तो द्विज ! वह व्यक्ति तीन रात
त्रिंशोऽध्यायः १८५
त्रिरात्रोपोषणाच्छुद्धयेत्पञ्चगव्याशनाद्विज । स्नानदानजपादौ च भोजनादौ च नारद ॥८६॥
एषामन्यतमस्यापि शब्दं यः शृणुयाद्वदेत् । उद्गमेद्भुक्तमन्नंतत्स्नात्वा चोपवसेत्तथा ॥८७॥
द्वितीयेऽह्नि घृतं प्राश्य शुद्धिमाप्नोति नारद । व्रतादिमध्ये यद्येषा शृणुयाद्ध्वनिमप्युत ॥८८॥
अष्टोत्तरसहस्रं तु जपेद्वै वेदमातरम् । पापानामधिकं पापं द्विजदैवतनिन्दनम् ॥८६॥
न दृष्ट्वा निष्कृतिस्तस्य सर्वशास्त्रेषु नारद । महापातकतुल्यानि यानि प्रोक्तानि सूरिभिः ॥६०॥
प्रायश्चित्तं तु तेषां च कुर्यादेवं यथाविधि । प्रायश्चित्तानि यः कुर्यान्नारायणपरायणः ॥६१॥
तस्य पापानि नश्यंति ह्यन्यथा पतितो भवेत् । यस्तु रागादिनिर्मुक्तो ह्यनुतापसमन्वितः ॥६२॥
सर्वभूतदयायुक्तो विष्णुस्मरणतत्परः । महापातकयुक्तो वा युक्तो वा सर्वपातकैः ॥६३॥
विमुक्त एव पापेभ्यो ज्ञेयो विष्णुपरो यतः । नारायणमनाद्यंतं विश्ववाकारमनामयम् ॥६४॥
यस्तु संस्मरते मर्त्यः स मुक्तः पापकोटिभिः । स्मृतो वा पूजितो वापि ध्यातः प्रणमितोऽपि वा ॥६५॥
नाशयत्येव पापानि विष्णुर्हृद्गमनः सताम् । संपर्कद्विदि वा मोहाद्यस्तु पुजयते हरिम् ॥६६॥
सर्वपापविनिर्मुक्तः स प्रयाति हरेः पदम् । सकृत्संस्मरणाद्विष्णोर्नश्यंति क्लेशसंचयाः ॥६७॥
स्वर्गादिभोगप्राप्तिस्तु तस्य विप्रानुमीयते । मानुषं दुर्लभं जन्म प्राप्यते यैर्मुनीश्वर ॥६८॥
तत्रापि हरिभक्तिस्तु दुर्लंभा परिकीर्त्तिता । तस्मात्तडिल्लतालोलं मानुष्यं प्राप्य दुर्लभम् ॥६९॥
हरिं संपूजयेद्भक्त्या पशुपाशविमोचनम् । सर्वेऽन्तराया नश्यंति मनःशुद्धिश्च जायते ॥१००॥
तक उपवास करने से शुद्ध होता है अथवा पंचगव्यका पान करे ॥८३-८५३॥ नारद ! स्नान, दान, जप अथवा
भोजन आदि के समय यदि इनमें से किसी का शब्द सुन ले या स्वयं इनसे बातचीत करे तो वही व्यक्ति खाया
हुआ अन्न उगल दे और स्नान कर उस दिन उपवास करे । नारद ! दूसरे दिन संविधि घृतप्राशन करने पर वह
शुद्ध होता है । व्रत आदि के मध्यकाल में यदि इनकी बोली भी सुन ले तो एक हजार आठ बार वेद माता
गायत्री का जप करे ॥८६-८८३॥ द्विज और देवताओं की निन्दा सब पापों से बढ़ कर पाप है । नारद ! सब
शास्त्रों में इसका कोई प्रायश्चित्त नहीं लिखा है । महापापों के बराबर जो पाप कहे गये हैं उनके लिए इस
प्रकार का प्रायश्चित्त विधिपूर्वक करना चाहिए जो व्यक्ति नारायण का स्मरण करता हुआ प्रायश्चित्त करता है
उसके पाप नष्ट हो जाते हैं, अन्यथा वह पतित हो रहता है । जो राग आदि से मुक्त हो पश्चात्ताप करता और
सब प्राणियों पर दया भाव रखकर विष्णु के स्मरण में लगा रहता है, वह महापातकी हो चाहे सब पापों से
युक्त क्यों न हो, उसको सब पापों से मुक्त समझना चाहिए । क्योंकि वह विष्णु का सेवक है ॥८९-६३३॥ जो
मनुष्य, अनन्त, विश्वरूप निर्विकार नारायण का स्मरण करता है वह अपने करोड़ों पापों से मुक्त हो जाता है ।
भगवान् विष्णु के स्मरण, पूजा, ध्यान प्रणाम से सज्जनों के हृदय में निवास करने वाले भगवान् उसके पापों को
नष्ट कर देते हैं । जो साहचर्य या मोह वश भी भगवान् की पूजा करता है वह भी सब पापों से मुक्त हो विष्णु-
लोक को चला जाता है । भगवान् का एक बार भी स्मरण करने से सभी क्लेश नष्ट हो जाते हैं ॥६४-६७॥
विप्र ! स्वर्ग आदि भोग-प्राप्ति का तो अनुमान ही किया जा सकता है । मुनीश्वर ! पहले तो
मानुष जन्म पाना ही दुर्लभ है, मानव जीवन में हरि भक्ति का पाना और दुर्लभ है । इसलिए विद्युत् के समान
चंचल मानुष शरीर पाकर पशु-पाश से विमुक्त करने वाले भगवान् का भक्ति पूर्वक स्मरण करना चाहिए । ऐसा
करने से सब प्रकार की बाधायें दूर हो जातीं हैं और हृदय शुद्ध हो जाता है । जनार्दन की पूजा करने पर परम
१६६ नारदीयपुराणम्
परं मोक्षं लभेच्चैव पूजिते तु जनार्दने। धर्मार्थकाममोक्षाख्याः पुरुषाथर्ाः सनातनाः ॥१०१॥
हरिपूजापराणां तु सिध्यन्ति नात्र संशयः। पुत्रदारगृहक्षेत्रधनधान्याभिधावतीम् ॥१०२॥
लब्ध्वेमां मानुषीं वृत्तिं रे रे दर्पं तु मा वृथाः। सन्त्यज्य कामं क्रोधं च लोभं मोहं मदं तथा ॥१०३॥
परापवादं निन्दां च भजध्वं भक्तितो हरिम्। व्यापारान्सकलांस्त्यक्त्वा पूजयध्वं जनार्दनम् ॥१०४॥
निकटा एव दृश्यंते कृतांतनगरद्रुमाः। यावन्नायाति मरणं यावन्नायाति वै जरा ॥१०५॥
यावन्नेन्द्रियवैकल्यं तावदेवार्चयेद्धरिम्। धीमान्न कुर्याद्विश्वासं शरीरेऽस्मिन्विनश्वरे ॥१०६॥
नित्यं सन्निहितो मृत्युः संपदत्यंतचंचला। आसन्नमरणो देहस्तस्माद्दपं विमुंचत ॥१०७॥
संयोगा विप्रयोगांताः सर्वं च क्षणभंगुरम्। एतज्ज्ञात्वा महाभाग पूजयस्व जनार्दनम् ॥१०८॥
आशया व्यथते चैव मोक्षस्त्वत्यंतदुर्लभः। भक्त्या यजति यो विष्णुं महापातकवानपि ॥१०६॥
सोऽपि याति परं स्थानं यत्र गत्वा न शोचति। सर्वतीर्थानि यज्ञाश्च सांगा वेदाश्च सत्तम ॥११०॥
नारायणर्चनस्यैते कलां नार्हन्ति षोडशीम्। किं वै वेदैर्मखैः शास्त्रैः किं वा तीर्थनिषेवणैः ॥१११॥
विष्णुभक्तिविहीनानां किं तपोभिर्व्रतैरपि ॥११२॥
यजंति ये विष्णुमनंतमूर्त्ति निरीक्ष्य चाकारगतं वरेण्यम्। ॥११३॥
वेदांतवेद्यं भवरोगवैद्यं ते यांति मर्त्याः पदमच्युतस्य
अनादिमात्मानमनंतशक्तिमाधारभूतं जगतः सुरेड्यम्। ॥११४॥
ज्योतिःस्वरूपं परमच्युताख्यं स्मृत्वा समभ्येति नरः सखायम्
इति श्रीबृहन्नारदीयपुराणे पूर्वभागे प्रथमपादे प्रायश्चित्तविधिर्नाम त्रिंशोऽध्यायः ॥३०॥
मोक्ष भी प्राप्त हो जाता है। धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष ये सनातन पुरुषार्थ हैं जो हरि भक्तों को निःसन्देह प्राप्त
हो जाते हैं ॥६८-१०११/२॥ अरे मनुष्यो ! पुत्र, स्त्री, घर, क्षेत्र, धनधान्य आदि की ओर दौड़ने वालो मानवीय
वृत्ति को पाकर तुम व्यर्थ में दर्प मत करो। काम, क्रोध, लोभ, मोह, मद, पर-निन्दा, अपवाद को छोड़कर भक्ति
पूर्वक हरि का स्मरण करो। सब व्यापारों को छोड़कर जनार्दन की पूजा करो, देखो, यमपुरी के वृक्ष समीप
दिखाई दे रहे हैं अर्थात् मृत्यु अत्यन्त सन्निकट है। जब तक मृत्यु निकट नहीं आयी, बुढ़ापा गला नहीं पकड़तो,
जब तक इन्द्रियाँ शिथिल नहीं होतीं तब तक ही भगवान् की पूजा कर लो। इस संसार में बुद्धिमान् कभी
भी इस भंगुर शरीर पर विश्वास नहीं करते ॥१०२-१०६॥ मृत्यु सर्वदा निकट रहती है, यह लौकिक संपत्ति
अत्यन्त चंचल है, यह शरीर मृत्यु के अति निकट है, इसलिए दर्प को छोड़ो। महाभाग ! संयोग का अवसान वियोग
में होता है, सारे पदार्थ क्षणभंगुर हैं, यह जानकर जनार्दन की पूजा करो। यह संसार आशा से ही व्यथा पा
रहा है, मोक्ष तो अत्यन्त दुर्लभ है परन्तु जो व्यक्ति भक्ति पूर्वक विष्णु की पूजा करता है, वह महा पापी हो क्यों
न हो—वह परम स्थान को प्राप्त कर लेता है जहाँ जाकर उसको कोई शोक नहीं रह जाता। महाभाग ! सारे तीर्थ,
यज्ञ, अंग सहित वेद-ये सभी विष्णु पूजन की सोलहवीं कला के बराबर नहीं है ॥१०७-११०१/२॥ उनके वेदाध्ययन,
शास्त्र, तीर्थ-सेवन, तप और व्रत से क्या लाभ जो विष्णु भक्ति से विमुख हैं। जो अनन्त मूर्ति, वरेण्य, वेदान्त-
वेद्य, सांसारिक रोगों के एक मात्र वैद्य विष्णु की मूर्ति को देखकर उनको पूजा करते हैं, वे मनुष्य उस अच्युत हरि
के लोक को चले जाते हैं। मनुष्य अनादि, परमात्मा, अनंत शक्तिशाली संसार के आधारभूत, देवपूज्य, ज्योतिः
स्वरूप, परम और अच्युत नामक भगवान् का स्मरण करता है वह उनका मित्र बन जाता है ॥१११-११४॥
श्रीमन्नारदीयमहापुराण में प्रायश्चित्त विधि नामक
तीसवाँ अध्याय समाप्त ॥३०॥
एकत्रिंशोऽध्यायः
नारद उवाच
कथितो भवता सम्यग्वर्णाश्रमविधिर्मुने । इदानीं श्रोतुमिच्छामि यममार्गं सुदुर्गमम् ॥१॥
सनक उवाच
शृणु विप्र प्रवक्ष्यामि यममार्गं सुदुर्गमम् । सुखदं पुण्यशीलानां पापिनां भयदायकम् ॥२॥
षडशीतिसहस्राणि योजनानि मुनीश्वर । यममार्गस्य विस्तारः कथितः पूर्वसूरिभिः ॥३॥
ये नरा दानशीलास्तु ते यांति सुखिनो द्विज । धर्मशून्या नरा यांति दुःखेन भृशमर्दिताः ॥४॥
अतिभीता विवस्त्राश्च शुष्ककंठौष्ठतालुकाः । क्रंदंतो विस्वरं दीनाः पापिनो यांति तत्पथि ॥५॥
हन्यमाना यमभटैः प्रतोदायैस्तथायुधैः । इतस्ततः प्रधावंतो यांति दुःखेन तत्पथि ॥६॥
क्वचित्पंकः क्वचिद्वह्निः क्वचित्संतप्तसैकतम् । क्वचिद्वै दावरूपेण तीक्ष्णधाराः शिलाः क्वचित् ॥७॥
क्वचित्कंटकवृक्षाश्च दुःखारोहशिला नगाः । गाढांधकाराश्च गुहाः कंटकावरणं महत् ॥८॥
वप्राग्रारोहणं चैव कन्दरस्य प्रवेशनम् । शर्कराश्च तथा लोष्टाःसूचीतुल्याश्च कंटकाः ॥६॥
शैवालं च क्वचिन्मार्गे क्वचित्कीचकपंक्तयः । क्वचिद्व्याघ्राश्च गर्जते वर्धते च क्वचिज्ज्वराः ॥१०॥
अध्याय ३१
यमदूतों के कृत्य का वर्णन
नारद बोले--मुने ! आपने वर्णाश्रम विधि का वर्णन भली भाँति कर दिया । अब मैं अत्यंत दुर्गम यम,
मार्ग का वर्णन सुनना चाहता हूँ ।।१।।
सनक बोले - विप्र ! सुनो, मैं उस दुर्गम यम मार्ग का वर्णन कर रहा हूँ जो पुण्य शील जनों के लिए
सुखद और पापियों के लिए भयदायक है । मुनीश्वर ! पूर्व आचार्यों ने यम मार्ग का विस्तार छियासी हजार
योजन बतलाया है ॥२-३॥ द्विज ! जो दानशील हैं वे व्यक्ति सुखपूर्वक उस मार्ग से चले जाते हैं । परन्तु जो
धार्मिक नहीं हैं वे उस मार्ग पर बड़ी पीड़ा और कष्ट से जाते हैं । पापी लोग उस पथ पर चलते समय भय-
त्रस्त हो जाते, उनके वस्त्र गिर जाते, कण्ठ, ओठ और तालू सूख जाते हैं । वे दीन करुण स्वर से रोते चिल्लाते हैं ।
उस पथ पर चलते समय यमदूत कोड़े और शस्त्रों से मारते हैं । वे इधर उधर भागते और बड़े कष्ट से चलते हैं ॥४-६॥
उस मार्ग में कहीं तो कीचड़ है, कहीं अग्नि, कहीं जलती हुई बालुका और कहीं तीखी धार वालो शिलायें शस्त्र के
रूप में सीधी खड़ी हैं । कहीं कांटेदार वृक्ष, कहीं ऐसे पहाड़ हैं जिनकी चट्टानों पर पैर रखकर चलना अत्यन्त
कष्टकर है । कहीं बड़ी बड़ी गुफायें हैं जिनमें सदा अन्धकार रहता और जो कांटों से ढंकी रहती है ॥७-८॥ वहाँ
ऊँची ऊँची चोटियों पर चढ़ना पड़ता तो कभी कन्दराओं में घुसना पड़ता है । कहीं छोटी-छोटी कंकड़ियाँ, ढेले,
कहीं सुई के समान काँटे तो कहीं मार्ग में सेवार और बाँसों की पाँत खड़ी रहती हैं । कहीं बाघ गुर्रारि तो कहीं
१६८ नारदीयपुराणम्
एवं बहुविधक्लेशाः पापिनो यांति नारद । क्रोशंतश्च रुदन्तश्च ग्लायंतश्चैव पापिनः ॥११॥
पाशेन यंत्रिताः केचित्कृष्यमाणास्तथांकुशः । शस्त्रास्त्रैस्ताड्यमानीश्च पृष्ठतो यांति पापिनः ॥१२॥
नासाग्रपाशकृष्टाश्च केचिदंत्रैश्च बंधिताः । वहंतश्चायसां भारं शिश्नाग्रेण प्रयांति वै ॥१३॥
अयोभारद्वये केचिन्नासाग्रेण तथापरे । कर्णाभ्यां च तथा केचिद्वहंतो यांति पापिनः ॥१४॥
केचिच्च स्खलिता यांति ताड्यमानास्तथापरे । अयथोच्छ्वसिताः केचित्केचिदाच्छन्नलोचनाः ॥१५॥
छायाजलविहीने तु पथि यात्यतिदुःखिताः । शोचन्तः स्वानि कर्माणि ज्ञानाज्ञानकृतानि च ॥१६॥
ये तु नारद धर्मिष्ठा दानशोला सुबुद्धयः । अतीव सुखसंपन्नास्ते यांति धर्ममंदिरम् ॥१७॥
अन्नदास्तु मुनिश्रेष्ठ भुंजतः स्वादु यांति वै । नीरदा यांति सुखिनः पिबंतः क्षीरमुत्तमम् ।
तक्रदा दधिदाश्चैव तत्तद्भोगं लभंति वै । घृतदा मधुदाश्चैव क्षीरदाश्च द्विजोत्तम ॥१८॥
सुधापानं प्रकुर्वंतो यांति वै धर्ममंदिरम् । शाकदाः पायसं भुंजन्दीपदो ज्वलयन्दिशः ॥१९॥
वस्त्रदो मुनिशार्दूल याति दिव्याम्बरावृतः । पुराकरप्रदो याति स्तूयमानोऽमरैः पथि ॥२०॥
गोदानेन नरो याति सर्वसौख्यसमन्वितः । भूमिदो गृहदश्चैव विमाने सर्वसंपदि ॥२१॥
अप्सरोगणसंकीर्णे क्रीडन्त्याति वृवालयम् । हयदो यानदश्चापि गजदश्च द्विजोत्तम ॥२२॥
धर्मालयं विमानेन याति भोगान्वितेन वै । अनडुहो मुनिश्रेष्ठ यानारूढः प्रयाति वै ॥२३॥
फलदः पुष्पदाश्चापि याति संतोषसंयुतः । ताम्बूलदो नरो याति प्रहृष्टो धर्ममंदिरम् ॥२४॥
मातापित्रोश्च शुश्रूषां कृतवान्यो नरोत्तमः । स याति परितुष्टात्मा पूज्यमानो दिविस्थतैः ॥२५॥
ज्वर का हो प्रकोप बढ़ता रहता है । नारद ! इस प्रकार पापी भाँति भाँति के क्लेश पाते हैं, वे कभी रोते कभी
चिल्लाते और मलिन मुख रहते हैं । कोई पाश में बँधे रहते तो किसी को अंकुश से पकड़ कर यमदूत खींचते हैं ।
कोई पापी शस्त्रास्त्रों से आहत होते हुए पीठ के बल जाते हैं । किसी पापी का नासाग्र पाश में बाँधकर खींचा जाता
तो कोई आन्त्र जाल अँतड़ी या रस्सी से बँधा है । कोई अपने लिंग के अग्रभाग से लोहे का भार ढो रहा है तो कोई
नाक के अग्रभाग पर दोनों ओर लोहे का भार लटकाये जा रहा है तो कोई पापी कानों से ही लौह भार ढोते हुए
चल रहा है । कोई मार्ग में गिर पड़ते हैं तो दूसरे पीटे जाते हैं, कितने पीड़ा के कारण हाँफ रहे हैं, तो कितने
अपनी आखों को ढके हुए जा रहे हैं । उस छाया और जल से शून्य मार्ग पर अपने ज्ञान या अज्ञानवश किये हुए
कर्मों पर पश्चात्ताप करते हुए दुःखी होकर पापी चलते हैं ॥११-१६॥ नारद ! जो दानशील, धर्मिष्ठ
और सज्जन हैं वे तो अत्यन्त सुखपूर्वक यम-मन्दिर को जाते हैं । मुनिश्रेष्ठ ! अन्न दान करने वाले
स्वादिष्ट भोजन करते हुए और जल दान करने वाले उत्तम क्षीर पान करते हुए जाते हैं । तक्र
(छाछ) और दही का दान करने वाला छाछ पीते और दही खाते जाते हैं । द्विजोत्तम ! घी, मधु और
क्षीर का दान करने वाले सुधापान करते हुए यमपुरी को जाते हैं । शाक दान करने वाले खीर खाते हुए और
दीप दान करने वाले अपने तेज से दिशाओं को प्रकाशित करते हुए जाते हैं ॥१७-१९॥ मुनिशार्दूल ! वस्त्र
दान करने वाले दिव्य वस्त्र पहनकर जाते हैं । पुर और खान का दान करने वाले व्यक्ति को देवतागण यम-पथ
में स्तुति करते हुए लिवा जाते हैं ॥२०॥ गोदान करने वाला मनुष्य सब सुखों का भोग करता हुआ जाता है।
भूमिदान और गृहदान करने वाला सब सुख सामग्रियों से भरे विमान पर आरूढ़ हो अप्सराओं के साथ क्रीड़ा
करता हुआ जाता है । द्विजोत्तम ! घोड़ा, सवारी या हाथी का दान करने वाला सब भोगों से परिपूर्ण विमान से
यम-नगर को जाता है । बैल का दान करने वाला यान पर आरूढ़ होकर जाता है ॥२१-२३॥ फल और फूल का
दान करने वाला सन्तोष पूर्वक उस पथ पर जाता है । तांबूल का दान करने वाला नर प्रसन्नता पूर्वक धर्ममन्दिर
को जाता है ॥२४॥ जिस व्यक्ति ने माता पिता की सेवा की वह संतुष्टात्मा देवों से पूज्यमान हो यम-मन्दिर
एकविंशोऽध्यायः १६६
शुश्रूषां कुरुते यस्तु यतीनां व्रतचारिणाम् । द्विज्याग्र्यब्राह्मणानां च स यात्यति सुखान्वितः ॥२६॥
सर्वभूतदयायुक्तः पूज्यमानोऽमरैर्द्विजः । सर्वभोगान्वितेनासौ विमानेन प्रयाति च ॥२७॥
विद्यादानरतो याति पूज्यमानोऽब्जसूनुभिः । पुराणपाठको याति स्तूयमानो मुनीश्वरैः ॥२८॥
एवं धर्मपरा यांति सुखं धर्मस्य मंदिरम् । यमश्चतुर्मुखो भूत्वा शंखचक्रगदासिभृत् ॥२९॥
पुण्यकर्मरतं सम्यक्स्नेहान्मित्रमिवार्चति । भो भो बुद्धिमतां श्रेष्ठ नरकक्लेशभीरवः ॥३०॥
युष्माभिः साधितं पुण्यमत्रामुत्रसुखावहम् । मनुष्यजन्म यः प्राप्य सुकृतं न करोति च ॥३१॥
स एव पापिनां श्रेष्ठ आत्मघातं करोति च । अनित्यं प्राप्य मानुष्यं नित्यं यस्तु न साधयेत् ॥३२॥
स याति नरकं घोरं कोऽन्यस्तस्मादचेतनः । शरीरं यातनारूपं मलाद्यैः परिदूषितम् ॥३३॥
तस्मिन्यो याति विश्वासं तं विद्यादात्मघातकम् । सर्वेषु प्राणिनः श्रेष्ठास्तेषु वै बुद्धिजीविनः ॥३४॥
बुद्धिमत्सु नराः श्रेष्ठा नरेषु ब्राह्मणास्तथा । ब्राह्मणेषु च विद्वांसो विद्वत्सु कृतबुद्धयः ॥३५॥
कृतबुद्धिषु कर्त्तारः कर्तृषु ब्रह्मवादिनः । ब्रह्मवादिष्वपि तथा श्रेष्ठो निर्मम उच्यते ॥३६॥
एतेभ्योऽपि परो ज्ञेयो नित्यं ध्यानपरायणः । तस्मात्सर्वप्रयत्नेन कर्त्तव्यो धर्मसंग्रहः ॥३७॥
सर्वत्र पूज्यते जंतुर्धर्मवान्नात्र संशयः । गच्छ स्वपुण्यैर्मत्स्थानं सर्वभोगसमन्वितम् ॥३८॥
अस्ति चेद्दुष्कृतं किंचित्पश्चादत्रैव भोक्ष्यसे । एवं यमस्तमभ्यर्च्य प्रापयित्वा च सद्गतिम् ॥३९॥
आहूय पापिनश्चैव कालदंडेन तर्जयेत् । प्रलयांबुदनिर्घोषो ह्यंजनाद्रिसमप्रभः ॥४०॥
को जाता है ॥२५॥ जो व्रती यतियों और उत्तम ब्राह्मणों की शुश्रूषा करता है, वह अत्यन्त सुखपूर्वक जाता है ॥२६॥
जो द्विज सब प्राणियों पर दया दृष्टि रखता है वह देवों से पूजित हो सब सुख सामग्रियों से पूर्ण विमान पर
आरूढ़ होकर जाता है ॥२७॥ विद्या दान करने वाला व्यक्ति ब्रह्मा से पूज्यमान होकर जाता है, पुराण का
पाठ करने वाला व्यक्ति जब चलता है तो मुनीश्वर उसकी स्तुति करते चलते हैं ॥२८॥ इस प्रकार धार्मिक
जन सुखपूर्वक धर्म मन्दिर को जाते हैं । वहाँ यमराज चतुर्मुख का रूप धारण कर हाथ में शंख, चक्र, गदा और
तलवार लेकर पुण्यकर्मों में रुचि रखने वाले उन महापुरुषों की भली-भाँति प्रेम पूर्वक मित्र के समान सम्मान
करते हैं । वे कहते हैं कि हे बुद्धिमानों में श्रेष्ठ ! तुम लोग नरक के भय से पुण्य कर्मों को किया है इसीलिए वे
कर्म दोनों लोकों के लिए सुखदायक सिद्ध हुए ॥२९-३०॥ जो मानव जन्म पाकर भी शुभ कर्म नहीं करता है
वही महान् पापी है, वह आत्म-हनन करता है । जो इस अनित्य मानुष योनि को पाकर नित्य तत्त्व (धर्म),
की साधना नहीं करता वह घोर नरक में जाता हैं । उससे बढ़कर चेतनाहीन कौन हो सकता है ? ॥३१-३२॥
यह शरीर यातना की मूर्ति है, मल आदि से दूषित है ऐसे शरीर पर जो विश्वास करता अर्थात् इसको नित्य
और सुख का साधन समझता है उसको आत्मघातक समझना चाहिए । सारी सृष्टि में प्राणी श्रेष्ठ हैं, प्राणियों
में बुद्धिजीवी श्रेष्ठ है, बुद्धिजीवियों (चेतन) में मनुष्य श्रेष्ठ हैं, मनुष्यों में ब्राह्मण, ब्राह्मणों में विद्वान् और
विद्वानों में कृतबुद्धि (विवेकी), कृत बुद्धियों में कर्त्ता और कर्त्ताओं (कर्मपरायणों) में ब्रह्मवादी और ब्रह्मवादियों
में निर्मम व्यक्ति श्रेष्ठ माना जाता है ॥३३-३६॥ इनसे भी नित्य धर्मपरायण व्यक्ति श्रेष्ठ माना जाता है ।
इसलिए सब प्रकार से धर्म संग्रह करना चाहिए। इसमें कुछ भी सन्देह नहीं कि धर्मवान् व्यक्ति सर्वत्र पूजित
होता है । इसलिए अपने पुण्य से उपार्जित मेरे पुण्य स्थान पर जाओ, जहाँ सारे ऐश्वर्य भरे पड़े हैं ॥३७-३८॥
यदि कोई दुष्कृत होगा तो उसको भी पुण्य भोग के अनन्तर यहीं भोगना पड़ेगा । इस प्रकार पुण्यात्माओं
की पूजाकर उनको सब गति दे देने के पश्चात महाराज यम पापियों को बुलाकर अपने कालदण्ड से तर्जन करते
हैं । उस समय यम प्रलय कालीन मेघ के समान गर्जन करने लगते हैं । उनका आकार अंजन (नील) गिरि के
२०० नारदीयपुराणम्
नारद उवाच
विद्युत्प्रभायुधैर्भीमो द्वात्रिंशद्भुजसंयुतः । योजनत्रयविस्तारो रक्ताक्षो दीर्घनासिकः ॥४१॥
दंष्ट्राकरालवदनो वापीतुल्यांगलोचनः । मृत्युज्वरादिभिर्मुख्यैश्चित्रगुप्तोऽपि भीषणः ॥४२॥
सर्वे दूताश्च गर्जंति यमतुल्यविभीषणाः । ततो ब्रवीति तान्सर्वांकंपमानांश्च पापिनः ॥४३॥
शोचन्तः स्वानि कर्माणि चित्रगुप्तो यमाज्ञया । भो भो पापा दुराचारा अहङ्कारप्रदूषिताः ॥४४॥
किमर्थमर्जितं पापं ह्युष्माभिरविवेकिभिः । कामक्रोधादिदृप्तेन मदेन तु चेतसा ॥४५॥
यद्यत्पापतरं तत्किमर्थं अर्जितं जनाः । कुर्वन्तः पुनः यूयं पापाख्यं च बहुविधाः ॥४६॥
तथैव यातना भोग्याः किं वृथा ह्यतिदुःखिताः । भृत्यमित्रकलत्रार्थं दुष्कृतं चरितं यथा ॥४७॥
तथा कर्मवशात्प्राप्ता यूयमत्रातिदुःखिताः । युष्माभिः पोषिता ये तु पुत्राद्या अन्यतो गताः ॥४८॥
युष्माकमेव तत्पापं प्राप्तं किं दुःखकारणम् । यथा कृतानि पापानि युष्माभिः सुखहनि वै ॥४९॥
तथा प्राप्तानि दुःखानि किमर्थमिह दुःखिताः । विचारयध्वं यूयं तु युष्माभिश्चार्जितं पुरा ॥५०॥
यमः करिष्यते दंडमिति किं न विचारितम् । दरिद्रेऽपि च मूर्खे न पंडिते वा धियान्विते ॥५१॥
कांदिशीके च वीरे च समवर्ती यमः स्मृतः । चित्रगुप्तेरितं वाक्यं श्रुत्वा ते पापिनस्तदा ॥५२॥
शोचंतः स्वानि कर्माणि तूष्णीं तिष्ठंति भीषिताः । यमाज्ञाकारिणः क्रूराश्चंडा दूता भयानकाः ॥५३॥
चंडालाद्याः प्रसङ्ग्यातान्रौरवेषु क्षिपंति च । स्वदुष्कर्मफलं ते तु भुक्त्वांते पापशेषतः ॥५४॥
महीतलं च संप्राप्य भवंति स्थावरादयः । भगवन्संशयो जातो मच्चेतसि दयानिधे ॥५५॥
समान हो जाता है। अपनी बत्तीस भुजाओं में विद्युत् के समान चमकने वाले अस्त्रों को धारण करने से महा
भयंकर जान पड़ते हैं। उनकी काया तीन योजन विस्तृत सी जान पड़ती है। उनकी लाल-लाल आँखे, बड़ी लंबी
नाक, भयानक दाढ़ी वाला भयानक मुख और बावली के समान आंखें बड़ी ही भयंकर जान पड़ती है। मृत्यु-ज्वर
और घातक रोगों और भीषण आकृति वाले लिपिक चित्रगुप्त के साथ वो और डरावने हो जाते हैं ॥४१-४२॥
यम के समान भयंकर सब यमदूत घोर गर्जन करने लगते हैं इसके अनन्तर यम का आदेश पाकर चित्रगुप्त
अपने पाप कर्मों पर अनुताप करने वाले उन पापियों से, जो भय से कांपते रहते हैं, कहता है कि—
अरे पापियो! दुराचारियो! अहंकार में पड़कर तुम अविवेकियों ने क्यों पाप किया? काम, क्रोध आदि के
वश में होकर गर्वोन्मत्त तुम पापियों ने पापकर्म क्यों किये? अत्यन्त प्रसन्न हो-हो कर तुम लोगों ने जैसे बहुत से
पाप किये हैं वैसी ही यातनायें तुमको भोगनी पड़ेंगी। अब क्यों व्यर्थ दुःखी हो रहे हो? ॥४३-४६॥ जिस
प्रकार सेवक, मित्र और स्त्री के लिए तुम लोगों ने दुष्कर्म किए हैं, उसी प्रकार कर्मवश वहां दुःख भोगने के लिए
आये हुए हो देखो, जिन पुत्र आदि को तुम लोगों ने पालन किया वे तो तुम्हें छोड़कर चले गए। अब उन पापों को
तुम लोगों को ही भोगना है। इसमें दुःख करने की क्या आवश्यकता है ॥४७-४८½॥ तुम लोगों ने जैसे अत्यन्त
घोर पापों को किया है वैसे ही दुःख अब प्राप्त हुए हैं, तो अब यहां दुःखी क्यों हो रहे हो? विचारो तो सही, पहले
जिस समय पाप कर्म किये उस समय 'यम इसका दंड अवश्य देगें' इसका विचार क्या नहीं किया? यम दरिद्र,
मूर्ख, पंडित, धनी, भय-भीत कायर और वीर सबके प्रति समान न्याय करते हैं ॥४९-५१½॥
उस समय चित्र गुप्त की उन बातों को सुनकर के पापी अपने पाप-कर्मों पर अनुताप करते हुए भयभीत
हो चुप चाप बैठे रहते हैं ॥५२½॥ यम के आज्ञापालक, क्रूर, भयानक चण्ड, चाण्डाल आदि दूत उन पापियों को
पकड़कर बलात् नरक कुण्डों में फेंक देते हैं। वहाँ अपने पापों को वे भलीभांति भोगते और कुछ शेष रह जाने पर
इस भूतल पर आकर स्थावर आदि योनियों में जन्म लेते हैं ॥५३-५४½॥
एकोनत्रिंशोऽध्यायः २०१
नारद उवाच
त्वं समर्थोऽसि तच्छेत्तुं यतो नो ह्यग्रजो भवान् । धर्माश्च विविधाः प्रोक्ताः पापान्यापि बहूनि च ॥५६॥
चिरभोज्यं फलं तेषामुक्तं बहुविदा त्वया । दिनांते ब्रह्मणः प्रोक्तो नाशो लोकत्रयस्य वै ॥५७॥
परार्द्धद्वितयांते तु ब्रह्माण्डस्यापि संक्षयः । ग्रामदानादिपुण्यानां त्वयैव विधिनंदन ॥५८॥
कल्पकोटिसहस्रेषु महांन्भोग उदाहृतः । सर्वेषामेव लोकानां विनाशः प्राकृते लये ॥५६॥
एकः शिष्यत एवेति त्वया प्रोक्तं जनार्दनः । एष मे संशयो जातस्तं भवाञ्छेत्तुमर्हति ॥६०॥
पुण्यपापोपभोगानां समाप्तिर्नास्य संप्लवे ।
सनक उवाच
॥६१॥
साधु साधु महाप्राज्ञ गुह्याद्गुह्यतमं त्विदम्
पृष्टं तत्तेऽभिधास्यामि शृणुष्व सुसमाहितः । नारायणोऽक्षरोऽनंतः परं ज्योतिः सनातनः ॥६२॥
विशुद्धो निर्गुणो नित्यो मायामोहविवर्जितः । निर्गुणोऽपि परानन्दो गुणवानिव भाति यः ॥६३॥
ब्रह्मविष्णुशिवाद्यैस्तु भेदवानिव लक्ष्यते । गुणोपाधिकभेदेषु त्रिष्वेतेषु सनातन ॥६४॥
संयोज्य मायामखिलं जगत्कार्यं करोति च । ब्रह्मारूपेण सृजति विष्णुरूपेण पाति च ॥६५॥
अंते च रुद्ररूपेण सर्वमत्तीति निश्चितम् । प्रलयांते समुत्थाय ब्रह्मारूपी जनार्दनः ॥६६॥
चराचरात्मकं विश्वं यथापूर्वमकल्पयत् । स्थावराद्याश्च विप्रेन्द्र यत्र यत्र व्यवस्थिता ॥६७॥
ब्रह्मा तत्तज्जगत्सर्वं यथापूर्वं करोति वै । तस्मात्कृतानां पापानां पुण्यानां चैव सत्तम् ॥६८॥
अवश्यमेव भोक्तव्यं कर्मणां ह्यक्षयं फलम् । नाभुक्तं क्षीयते कर्म कल्पकोटिशतैरपि ॥६६॥
नारद ने कहा—भगवन् ! दयानिधे ! मेरे मन में सन्देह हो रहा है । आप ही उसको दूर करने में समर्थ
हैं, क्योंकि आप हमारे अग्रज हैं । बहुज्ञ आपने बहुविध धर्म, बहुत से पाप और उनके चिर काल तक भोगने के
योग्य फलों को कहा और यह भी बताया कि ब्रह्मा के दिन के अन्त में तीनों लोकों का नाश हो जाता है ॥५५-५७॥
दो परार्द्ध के बीत जाने पर ब्रह्माण्ड का भी नाश हो जाता है । विधिनन्दन ! आपने अभी ग्राम दान आदि पुण्य
कर्मों का करोड़ों कल्पों तक महान् भोग कहा, फिर यह ब्रह्मा ही शेष रह जाता है। यही मुझे सन्देह हो गया है,
आप ही उसे दूर कर सकते हैं । क्या उस प्रलय में भी पाप और पुण्यों का नाश नहीं होता ? ॥५८-६०॥
सनक बोले—महाप्राज्ञ ! धन्य हो, धन्य हो । यह तो अत्यन्त गूढ़ प्रश्न पूछा, इसलिए तुमसे कह
रहा हूँ, सावधान होकर सुनो । नारायण अक्षर, अनन्त, परम ज्योति, सनातन, विशुद्ध, निर्गुण, नित्य माया-मोह से
रहित और परानन्द हैं जो निर्गुण होते हुए भी सगुण से जान पड़ते हैं ॥६१-६३॥ वही सनातन ब्रह्म ब्रह्मा, विष्णु
और शिव आदि रूपों में भिन्न-भिन्न जान पड़ता है । यद्यपि इन तीनों में केवल गुण और उपाधि का ही भेद
है ॥६४॥ वह माया से युक्त होकर अखिल जगत् का कार्य करता है वह ब्रह्मारूप से सृष्टि करता, विष्णुरूप से
पालन करता और अन्त में रुद्र रूप से सम्पूर्ण सृष्टि को उदरस्थ कर लेता है, यह निश्चित है ॥६५॥ प्रलय काल
बीत जाने पर वही ब्रह्मारूपी जनार्दन पूर्व की भाँति चराचरात्मक विश्व की रचना करता है । विप्रेन्द्र ! पूर्व
सृष्टि में स्थावर आदि पदार्थ जहाँ जिस रूप में व्यवस्थित थे, तदनुरूप ही ब्रह्मा ने उन सब के साथ सारे जगत्
को बनाया ॥६६-६७॥ सज्जन ! इस कारण कृत पापों और पुण्यों का फल अवश्यमेव भोगना पड़ता है । कर्मों के
फल अक्षय हैं । बिना उन कर्मों का भोग किए करोड़ों कल्पों में भी वे नष्ट नहीं होते । अपने किये शुभ-अशुभ कर्मों
२६ ना० पु०
२०२ नारदीयपुराणम्
अवश्यमेव भोक्तव्यं कृतं कर्म शुभाशुभम् । यो देवः सर्वलोकानामंतरात्मा जगन्मयः ।
सर्वकर्मफलं भुङ्क्ते परिपूर्णः सनातनः ॥७०॥
योऽसौ विश्वंभरो देवो गुणभेदव्यवस्थितः । सृजत्यवति चात्त्येतत्सर्वं सर्वभृगव्ययः ॥७१॥
इति श्रीबृहन्नारदीयपुराणे पूर्वभागे प्रथमपादे यमदूतकृत्यनिरूपणं नामैकविंशोऽध्यायः ॥३१॥
अथ द्वात्रिंशोऽध्यायः
सनक उवाच
एवं कर्मपाशनियंत्रित जतवः स्वर्गादिपुण्यस्थानेषु पुण्यभोगमनुभूय यातनासु चातीव दुःखतरं पापफल-
मनुभूय प्रक्षीणकर्मावशेषेणामुं लोकमागत्य सर्वभयविह्वलेषु मृत्युबाधासंयुतेषु स्थावरादिषु जायन्ते ।
वृक्षगुल्मलतावल्लीगिरयश्च तृणानि च । स्थावराश्चेति विख्याता महामोहमसावृताः ॥१॥
स्थावरत्वे पृथिव्यामुप्तबीजानि जलसेकानुपदं सुसंस्कारसामग्रीवशादन्तरूष्मप्रपाविताक्युच्छून्तरत्वमापद्ये
ततो मूलभावं तन्मूलादंकुरोत्पत्तिस्तस्मादपि पर्णकांडनालादिकं
कांडेपु च प्रसवमापद्यते तेषु च पुष्पसंभवः ॥२॥
तानि पुष्पाणि कानिचिदफलानि कानिचित्फलहेतुभूतानि तेषु पुष्पेषु वृद्धभावेषु सत्सु
तत्पुष्पमूलतस्तुषोत्पत्तिर्जायते तेषु तुषु भोक्तॄणां प्राणिनां संस्कारसामग्रीवशाद्धिमरश्मिकरणा-
का फल अवश्य ही भोगना पड़ता है । जो जगन्मय, सर्वलोकान्तरात्मा, परिपूर्ण सनातन देव है, वे सब कर्मों का फल
भोग करते हैं । जो ये विश्वम्भर देव हैं, जो गुण-भेद से स्थित हैं, वे सर्वभुक् अव्यय इस सारी सृष्टि को बनाते और
पालते हैं ॥६८-७१॥
श्रीनारदीयमहापुराण में यमदूतकृत्यनिरूपण नामक इकतीसवाँ अध्याय समाप्त ॥३१॥
अध्याय ३२
भवाटवी का वर्णन
सनक बोले—इस प्रकार कर्म पाश में बँधा हुआ जीव स्वर्गादि पुण्य स्थानों में पुण्य भोग का अनुभव
कर, यातना स्थानों में अति कष्टप्रद पाप-फलों का अनुभव करके कुछ कर्मों के शेष रह जाने पर इस लोक में
आते हैं और सब प्रकार के भय से युक्त, मृत्यु बाधा से विजड़ित स्थावरादि योनियों में उत्पन्न होते हैं । वृक्ष, झुर-
मुट, लता, वल्लरी, पहाड़ और तृण ये स्थावर नाम से प्रसिद्ध हैं जो महामोह से आवृत हैं ॥१॥ स्थावर की
दशा में पृथ्वी में बोये गए बीज सिञ्चन के बाद अपने संस्कारवश, अन्तः उष्णता के कारण कुछ आर्द्र होकर बढ़
जाते हैं । फिर उनमें से जड़े निकलतीं, जड़ों से अंकुर, अंकुर से पत्तियाँ, डंठल और नाल आदि निकलते हैं ।
कांडों से प्रसव (कलियाँ) और इससे फूल निकलते हैं ॥२॥ उन फूलों में से कुछ तो फल देने में असमर्थ, कुछ फल
देने के योग्य होते हैं । वे फूल जब पूर्ण रूप से विकसित हो जाते हैं तब पुष्प मूल से तुष (रस) निकलता है
उन तुषों में भोक्ता प्राणी के संस्कारवश चन्द्रमा की किरणों के संयोग से उसका ओषधि-रस तुष के भीतर मिल