बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)
Brihan Naradiya Purana with Sanskrit & Hindi Commentary
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें१६८ नारदीयपुराणम्
एवं बहुविधक्लेशाः पापिनो यांति नारद । क्रोशंतश्च रुदन्तश्च ग्लायंतश्चैव पापिनः ॥११॥
पाशेन यंत्रिताः केचित्कृष्यमाणास्तथांकुशः । शस्त्रास्त्रैस्ताड्यमानीश्च पृष्ठतो यांति पापिनः ॥१२॥
नासाग्रपाशकृष्टाश्च केचिदंत्रैश्च बंधिताः । वहंतश्चायसां भारं शिश्नाग्रेण प्रयांति वै ॥१३॥
अयोभारद्वये केचिन्नासाग्रेण तथापरे । कर्णाभ्यां च तथा केचिद्वहंतो यांति पापिनः ॥१४॥
केचिच्च स्खलिता यांति ताड्यमानास्तथापरे । अयथोच्छ्वसिताः केचित्केचिदाच्छन्नलोचनाः ॥१५॥
छायाजलविहीने तु पथि यात्यतिदुःखिताः । शोचन्तः स्वानि कर्माणि ज्ञानाज्ञानकृतानि च ॥१६॥
ये तु नारद धर्मिष्ठा दानशोला सुबुद्धयः । अतीव सुखसंपन्नास्ते यांति धर्ममंदिरम् ॥१७॥
अन्नदास्तु मुनिश्रेष्ठ भुंजतः स्वादु यांति वै । नीरदा यांति सुखिनः पिबंतः क्षीरमुत्तमम् ।
तक्रदा दधिदाश्चैव तत्तद्भोगं लभंति वै । घृतदा मधुदाश्चैव क्षीरदाश्च द्विजोत्तम ॥१८॥
सुधापानं प्रकुर्वंतो यांति वै धर्ममंदिरम् । शाकदाः पायसं भुंजन्दीपदो ज्वलयन्दिशः ॥१९॥
वस्त्रदो मुनिशार्दूल याति दिव्याम्बरावृतः । पुराकरप्रदो याति स्तूयमानोऽमरैः पथि ॥२०॥
गोदानेन नरो याति सर्वसौख्यसमन्वितः । भूमिदो गृहदश्चैव विमाने सर्वसंपदि ॥२१॥
अप्सरोगणसंकीर्णे क्रीडन्त्याति वृवालयम् । हयदो यानदश्चापि गजदश्च द्विजोत्तम ॥२२॥
धर्मालयं विमानेन याति भोगान्वितेन वै । अनडुहो मुनिश्रेष्ठ यानारूढः प्रयाति वै ॥२३॥
फलदः पुष्पदाश्चापि याति संतोषसंयुतः । ताम्बूलदो नरो याति प्रहृष्टो धर्ममंदिरम् ॥२४॥
मातापित्रोश्च शुश्रूषां कृतवान्यो नरोत्तमः । स याति परितुष्टात्मा पूज्यमानो दिविस्थतैः ॥२५॥
ज्वर का हो प्रकोप बढ़ता रहता है । नारद ! इस प्रकार पापी भाँति भाँति के क्लेश पाते हैं, वे कभी रोते कभी
चिल्लाते और मलिन मुख रहते हैं । कोई पाश में बँधे रहते तो किसी को अंकुश से पकड़ कर यमदूत खींचते हैं ।
कोई पापी शस्त्रास्त्रों से आहत होते हुए पीठ के बल जाते हैं । किसी पापी का नासाग्र पाश में बाँधकर खींचा जाता
तो कोई आन्त्र जाल अँतड़ी या रस्सी से बँधा है । कोई अपने लिंग के अग्रभाग से लोहे का भार ढो रहा है तो कोई
नाक के अग्रभाग पर दोनों ओर लोहे का भार लटकाये जा रहा है तो कोई पापी कानों से ही लौह भार ढोते हुए
चल रहा है । कोई मार्ग में गिर पड़ते हैं तो दूसरे पीटे जाते हैं, कितने पीड़ा के कारण हाँफ रहे हैं, तो कितने
अपनी आखों को ढके हुए जा रहे हैं । उस छाया और जल से शून्य मार्ग पर अपने ज्ञान या अज्ञानवश किये हुए
कर्मों पर पश्चात्ताप करते हुए दुःखी होकर पापी चलते हैं ॥११-१६॥ नारद ! जो दानशील, धर्मिष्ठ
और सज्जन हैं वे तो अत्यन्त सुखपूर्वक यम-मन्दिर को जाते हैं । मुनिश्रेष्ठ ! अन्न दान करने वाले
स्वादिष्ट भोजन करते हुए और जल दान करने वाले उत्तम क्षीर पान करते हुए जाते हैं । तक्र
(छाछ) और दही का दान करने वाला छाछ पीते और दही खाते जाते हैं । द्विजोत्तम ! घी, मधु और
क्षीर का दान करने वाले सुधापान करते हुए यमपुरी को जाते हैं । शाक दान करने वाले खीर खाते हुए और
दीप दान करने वाले अपने तेज से दिशाओं को प्रकाशित करते हुए जाते हैं ॥१७-१९॥ मुनिशार्दूल ! वस्त्र
दान करने वाले दिव्य वस्त्र पहनकर जाते हैं । पुर और खान का दान करने वाले व्यक्ति को देवतागण यम-पथ
में स्तुति करते हुए लिवा जाते हैं ॥२०॥ गोदान करने वाला मनुष्य सब सुखों का भोग करता हुआ जाता है।
भूमिदान और गृहदान करने वाला सब सुख सामग्रियों से भरे विमान पर आरूढ़ हो अप्सराओं के साथ क्रीड़ा
करता हुआ जाता है । द्विजोत्तम ! घोड़ा, सवारी या हाथी का दान करने वाला सब भोगों से परिपूर्ण विमान से
यम-नगर को जाता है । बैल का दान करने वाला यान पर आरूढ़ होकर जाता है ॥२१-२३॥ फल और फूल का
दान करने वाला सन्तोष पूर्वक उस पथ पर जाता है । तांबूल का दान करने वाला नर प्रसन्नता पूर्वक धर्ममन्दिर
को जाता है ॥२४॥ जिस व्यक्ति ने माता पिता की सेवा की वह संतुष्टात्मा देवों से पूज्यमान हो यम-मन्दिर