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बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)

Brihan Naradiya Purana with Sanskrit & Hindi Commentary

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,008 पृष्ठ

वर्णनन्नाम दशमोऽध्यायः ॥१०॥

एकादशोऽध्यायः ६१
सैवावशिष्टा जननी सुराणामन्वाच्छतादच्युतसक्तचित्ता ।
संरक्षिता विष्णुसुदर्शनेन दैत्यान्तकेन स्वजनानुकम्पिना ॥५२॥
इति श्रीबृहन्नारदीयपुराणे पूर्वभागे प्रथमपादे गङ्गोत्पत्तौ बलिकृतदेवपराजय-
वर्णनन्नाम दशमोऽध्यायः ॥१०॥

एकादशोऽध्यायः
नारद उवाच
अहो ह्यत्यद्भुतं प्रोक्तं त्वया भ्रातरिहं मम । स वह्निरदितिं मुक्त्वा कथं तानदहत्क्षणात् ॥१॥
वदादितेर्महासत्त्वं विशेषाश्चर्यकारणम् । परोपदेशनिरताः सज्जना हि मुनीश्वराः ॥२॥
सनक उवाच
शृणु नारद माहात्म्यं हरिभक्तिरतात्मनाम् । हरिध्यानपरान्साधूनकः समर्थः प्रबाधितुम् ॥३॥
हरिभक्तिपरो यत्र तत्र ब्रह्मा हरिः शिवः । देवाः सिद्धा मुनेशाश्च नित्यं तिष्ठन्ति सत्तमाः ॥४॥
हरिरास्ते महाभाग हृदये शान्तचेतसाम् । हरिनाम्पराणां च किमु ध्यानरतात्मनाम् ॥५॥
शिवपूजारतो वाऽपि विष्णुपूजापरोऽपि वा । यत्र तिष्ठति तत्रैव लक्ष्मीः सर्वाश्च देवताः ॥६॥

में लगी रहने वाली केवल जननी अदिति ही केवल, अपने भक्तों पर कृपा दृष्टि रखने वाले, दैत्य संहारक विष्णु
के सुदर्शन की कृपा से रक्षित होने के कारण बच गई ॥४६-५२॥
श्रीनारदीयपुराण के पूर्वभाग- प्रथम पाद में गंगोत्पत्ति के प्रसंग में बलि-कृत देव-पराजय
वर्णन नामक दसवाँ अध्याय समाप्त ॥१०॥

अध्याय ११
गङ्गोत्पत्ति-वर्णन
नारद बोले- भाई ! तुमने तो अत्यन्त आश्चर्यजनक यह आख्यान सुनाया। उस अग्नि ने कैसे अदिति
को छोड़कर सब को क्षण भर में जला दिया ? अदिति के आश्चर्य चकित कर देने वाले उस महा तेज और प्रभाव
का वर्णन करो, क्योंकि मुनीश्वर सर्वदा दूसरों को उपदेश देने में ही निरत होते हैं ॥१॥
सनक बोले- नारद ! हरि-भक्ति में सर्वदा लीन रहने वाले भक्तों की महिमा सुनो। हरि के ध्यान
में मग्न रहने वाले साधुओं को कौन कष्ट देने का साहस कर सकता है ? जहाँ हरिभक्त रहते हैं वहाँ ब्रह्मा, विष्णु,
शिव, देवगण, सिद्ध मुनीश्वर, श्रेष्ठ जीव सर्वदा विराजमान रहते हैं। महाभाग ! परमशान्त, हरिनास-परायण
भक्तों के हृदय में भगवान् सर्वदा विराजमान रहते हैं, तो पुनः हरि ध्यान में निमग्न रहने वाले योगो भक्तों के
विषय में तो कुछ कहना ही नहीं। शिवपूजन में रत रहने वाले विष्णु की पूजा में लीन रहने वाले भक्त जहाँ
निवास करते हैं वहाँ साक्षात् लक्ष्मी और सब देवता सर्वदा निवास करते हैं ॥२-६॥ जहाँ विष्णु पूजा में तल्लीन

७० नारदीयपुराणम्
यत्र पूजापरो विष्णोर्वह्निस्तत्र न बाधते । राजा वा तस्करो वापि व्याधयश्च न सन्ति हि ॥७॥
प्रेताः पिशाचाः कूष्माण्डग्रहा बालग्रहास्तथा । डाकिन्यो राक्षसाश्चैव न बाधन्तेऽच्युतार्चकम् ॥८॥
परपीडारता ये तु भूतवेतालकादयः । नश्यन्ति यत्र सद्‌भक्तो हरिलक्ष्म्यर्चने रतः ॥६॥
जितेन्द्रियः सर्वहितो धर्मकर्मपरायणः । यत्र तिष्ठति तत्रैव सर्वतीर्थानि देवताः ॥१०॥
निमिषं निमिषार्द्धं वा यत्र तिष्ठन्ति योगिनः । तत्रैव सर्वश्रेयांसि तत्तीर्थं तत्तपोवनम् ॥११॥
यन्नामोच्चारणादेव सर्वे नश्यन्त्युपद्रवाः । स्तोत्रैर्वाप्यर्हणाभिर्वा किमु ध्यानेन कथ्यते ॥१२॥
एवं तेनाग्निना विप्र दग्धं सासुरकाननम् । सादितिर्नैव दग्धाभूद्विष्णुचक्राभिरक्षिता ॥१३॥
ततः प्रसन्नवदनः पद्मपत्रायतेक्षणः । प्रादुरासीत्समीपेऽस्याः शङ्खचक्रगदाधरः ॥१४॥
ईषद्धास्यस्फुरद्दन्तप्रभाभासितदिङ्मुखः । स्पृशन्करेण पुण्येन प्राह कश्यपवल्लभाम् ॥१५॥
श्रीभगवानुवाच
देवमातः प्रसन्नोऽस्मि तपसाराधितस्त्वया । चिरं श्रान्तासि भद्रं ते भविष्यति न संशयः ॥१६॥
वरं वरय दास्यामि यत्ते मनसि रोचते । मा भैर्भद्रे महाभागे ध्रुवं श्रेयो भविष्यति ॥१७॥
इत्युक्ता देवमाता सा देवदेवेन चक्रिणा । तुष्टाव प्रणिपत्यैनं सर्वलोकसुखावहम् ॥१८॥
अदितिरुवाच
नमस्ते देवदेवेश सर्वव्यापिञ्जनार्दन । सत्त्वादिगुणभेदेन लोकव्यापारकारण ॥१९॥
रहने वाले भक्त रहते हैं वहाँ अग्नि किसी प्रकार की बाधा नहीं पहुँचा सकते । राजा, चोर अथवा व्याधियाँ
उसका बाल भी बाँका नहीं कर सकते; प्रेत, पिशाच, डाकिनी, कूष्माण्डग्रह (दुष्टग्रह) बाल ग्रह और राक्षस
आदि उस विष्णु भक्त की छाया का भी स्पर्श नहीं कर सकते । पर पीड़ा में आसक्त रहने वाले भूत, वेताल
आदि वहाँ जाकर स्वयं भस्म हो जाते हैं जहाँ विष्णु भक्ति में तत्पर रहने वाले भक्त विद्यमान रहते हैं । जितेन्द्रिय
सबका मङ्गल करने वाले और धर्म, सत्कर्म आदि में लीन रहने वाले महात्मा जहाँ रहते हैं वहाँ सब देवता और
तीर्थ स्वयं आकर निवास करते हैं ॥३-११॥ एक पल अथवा उसके आधे समय तक जहाँ योगीजन निवास करते
हैं वहीं सभी तीर्थ और अखिल कल्याण आ जाते हैं एवं वही पुनीत तपोवन हो जाता है । जिसके मात्र नामोच्चारण
स्तोत्र पाठ अथवा पूजादिसे सभी उपद्रव नष्ट हो जाते हैं, उसके ध्यान की महिमा का क्या वर्णन किया जाय ?
इस कारण उस अग्नि से असुरों के सहित सारा कानन भस्महो गया, परन्तु वह अदिति पूर्णतया सुरक्षित रही ।
क्योंकि विष्णु का सुदर्शन उसकी रक्षा के लिए उद्यत था ॥१२-१३॥ उसकी घोर तपस्या को देखकर पद्मलोचन
शङ्ख-चक्र-गदाधारी भगवान् प्रसन्नता पूर्वक वहाँ उस जननी अदिति के सम्मुख प्रत्यक्ष हुए । उनके मन्द हास्य से
खुली दन्तपंक्ति की प्रभा से सारा दिङ्मण्डल प्रकाशित हो गया, अपने पुनीत करों से देवमाता कश्यपपत्नी का
स्पर्श करते हुए बोले ॥१४-१५॥
श्री भगवान् बोले-देवमाता ! मैं तुम्हारी तपस्या से प्रसन्न हूँ, तुम बहुत श्रान्त हो गई हो, निःसन्देह
तुम्हारा कल्याण होगा । तुम्हारी जो इच्छा हो, माँगो । भद्रे ! डरो मत, महाभागे ! निश्चित रूप से तुम्हारा
कल्याण होगा । देवाधिदेव, चक्री विष्णु की इतनी सान्त्वना पाकर अदिति अखिल लोक को सुखो करने वाले
भगवान् के चरणों में गिर पड़ी और स्तुति करने लगी ॥१४-१८॥
अदिति बोली-देवदेवेश ! सर्वव्यापी ! जनार्दन ! आपको नमस्कार है, सत्त्व आदि त्रिगुण भेद से लोक

७१
एकादशोऽध्यायः
नमस्ते बहुरूपायारूपाय च महात्मने । सर्वैकरूपरूपाय निर्गुणाय गुणात्मने ॥२०॥
नमस्ते लोकनाथाय परमज्ञानरूपिणे । सद्‌भक्तजनवात्सल्यशालिने मङ्गलात्मने ॥२१॥
यस्यावताररूपाणि ह्यर्चयन्ति मुनीश्वराः । तमादिपुरुषं देवं नमामि ह्यर्थसिद्धये ॥२२॥
श्रुतयो यं न जानन्ति न जानन्ति च सुरयः । ते नमामि जगद्धेतुं समायं चाप्यमायिनम् ॥२३॥
यस्यावलोकनं चित्रं मायोपद्रवकारणम् । जगद्रूपं जगद्धेतुं तं वन्दे सर्ववन्दितम् ॥२४॥
यत्पादाम्बुजकिञ्जल्कसेवारक्षितमस्तकाः । अवापुः परमां सिद्धिं तं वन्दे कमलाधवम् ॥२५॥
यस्य ब्रह्मादयो देवा महिमानं न वै विदुः । अत्यासन्नं च भक्तानां तं वन्दे भक्तसंगिनम् ॥२६॥
यो देवस्त्यक्तसङ्गानां शान्तानां करुणार्णवः । करोति ह्यात्मनः सङ्गं तं देवं सङ्गवर्जितम् ॥२७॥
यज्ञेश्वरं यज्ञकर्म यज्ञकर्मसुनिष्ठितम् । नमामि यज्ञफलदं यज्ञकर्मप्रबोधकम् ॥२८॥
अजामिलोऽपि पापात्मा यन्नामोच्चारणादनु । प्राप्तवान्परमं धाम तं वन्दे लोकसाक्षिणम् ॥२९॥
हरिरूपी महादेवः शिवरूपी जनार्दनः । इति लोकस्य नेता यस्तं नमामि जगद्गुरुम् ॥३०॥
ब्रह्माद्या अपि देवेशा यन्मायापाशयन्त्रिताः । न जानन्ति परं भावं तं वन्दे सर्वनायकम् ॥३१॥
हृत्पद्मस्थोऽपि योग्यानां दूरस्थ इव भासते । प्रमाणातीतसद्भावस्तं वन्दे ज्ञानसाक्षिणम् ॥३२॥
यन्मुखाद्ब्राह्मणो जातो बाहुभ्यां क्षत्रियोऽजनि । ऊर्वोर्वैश्यः समुत्पन्नः पद्भ्यां शूद्रोऽभ्यजायत ॥३३॥
मनसश्चन्द्रमा जातो जातः सूर्यश्च चक्षुषः । मुखादग्निश्चेन्द्रश्च प्राणाद्वायुरजायत ॥३४॥
सृष्टि के आदि कारण ! नमस्कार है । बहुरूप, अरूप और महात्मा को नमस्कार करती हूँ सबमें एक रूप से रहने
वाले, निर्गुण और सगुण भगवान् को नमस्कार है । लोकस्वामी, परमज्ञानरूपी, सद्‌भक्तों पर वात्सल्य भाव
रखने वाले, मंगलग्रूप को नमस्कार है । जिनके अवतार रूपों की मुनीश्वर अर्चना करते हैं उस आदि पुरुष देव
को अपनी मनोरथ सिद्धि के लिए नमस्कार करती हूँ । जिसको, श्रुतियां और विद्वान् मनुष्य नहीं जान पाते हैं,
उस जगत् के आदि कारण, माया युक्त और पुनरपि माया रहित देव को नमस्कार है । जिसका अवलोकन माया
के उपद्रव को शान्त करने का कारण है, उस सर्वज्ञ, और सर्वज्ञेय, जगद्रूप और जगदादिकारण को नमस्कार करती
हूँ ।।१६-२४।। जिसके चरण कमल के पराग की सेवा में सर्वदा शिर-झुकाये रहने वाले अतएव रक्षित भक्तजनों
ने परम सिद्धि को प्राप्त किया उस कमलापति को नमस्कार है । जिसकी महिमा को ब्रह्मा आदि देवगण भी न
जान सके उसी भक्तरक्षक और भक्तों के अति निकट रहने वाले भक्त वत्सल को नमस्कार है । जो करुणासागर
देवता शान्त और संसार से सर्वथा दूर रहने वाले जनों से अपना संपर्क स्थापित करता है उस अनासक्त देव को
नमस्कार है ।।२६-२७।। उस यज्ञेश्वर, यज्ञकर्म और यज्ञकार्य में अपनी निष्ठा रखने वाले, यज्ञफल दाता और
यज्ञकर्मों को प्रेरणा प्रदान करने वाले देव को नमस्कार करती हूँ । पापात्मा अजामिल भी जिसके नामोच्चारण
मात्र से तत्काल परम पद को प्राप्त हो गया, उस लोक-साक्षी की वन्दना करती हूँ, जो हरि रूपी महादेव और
शिवरूपी जनार्दन अपने अद्वैत भाव से लोक के अग्रणी हैं उन जगद्गुरु को नमस्कार करती हूँ । ब्रह्मा आदि देव
प्रभु भी जिस माया पति के माया-पाश में बँध कर उसके परम रूप को नहीं जान पाते हैं उस अखिल-जीव-नायक
की वन्दना करती हूँ, जो हृदय कमल में रहता हुआ भी योगिजनों की दृष्टि में दूरस्थ की भांति दीख पड़ता है
जिसकी स्थिति या सद्भाव को प्रमाणों द्वारा भी सिद्ध नहीं किया जा सकता है । तथा उस ज्ञान साक्षी की वन्दना
करती हूँ, जिसके मुख से ब्राह्मण और बाहुओं से क्षत्रिय उत्पन्न हुए, ऊरु से वैश्य और चरणों से शूद्रों की उत्पत्ति
हुई ।।२८-३३।। मन से चन्द्रमा और चक्षु से सूर्य, मुख से अग्नि तथा इन्द्र और प्राण से वायु की उत्पत्ति हुई,

७२ नारदीयपुराणम्
ऋग्यजुः सामरूपाय सत्यस्वरगतात्मने । षडङ्गरूपिणे तुभ्यं भूयोभूयो नमो नमः ॥३५॥
त्वमिन्द्रः पवनः सोमस्त्वमीशानस्त्वमन्तकः । त्वमग्निर्निऋतिश्चैव वरुणस्त्वं दिवाकरः ॥३६॥
देवाश्च स्थावराश्चैव पिशाचाश्चैव राक्षसाः । गिरयः सिद्धगंधर्वा नद्यो भूमिश्च सागराः ॥३७॥
त्वमेव जगतामीशो यत्रासि त्वं परात्परः । त्वद्रूपमखिलं देव तस्मान्नित्यं नमोऽस्तु ते ॥३८॥
अनाथनाथसर्वज्ञ भूतदेवेन्द्रविग्रह । दैत्यैर्बाधितान्पुत्रान्मम पाहि जनार्दन ॥३६॥
इति स्तुत्वा देवमाता देवं नत्वा पुनः पुनः । उवाच प्राञ्जलिर्भूत्वा हर्षाश्रुक्षालितस्तनी ॥४०॥
अनुग्राह्यास्मि देवेश त्वया सर्वादिकारण । अकण्टकां श्रियं देहि मत्सुतानां दिवौकसाम् ॥४१॥
अन्तर्यामिञ्जगद्रूप सर्वज्ञ परमेश्वर । अज्ञातं किं तव श्रीश किं मामीहयसि प्रभो ॥४२॥
तथापि तव वक्ष्यामि यन्मे मनसि रोचते । वृथापुत्रास्मि देवेश दैत्यैः परिपीडिता ॥४३॥
तान्न हिंसितुमिच्छामि यस्ततेऽपि सुता मम । तानहत्वा श्रियं देहि मत्सुतेभ्यः सुरेश्वर ॥४४॥
इत्युक्तो देवेदेवेशः पुनः प्रीतिमुपागतः । उवाच हर्षयन्विप्र देवमातरमादरात् ॥४५॥
श्रीभगवानुवाच
प्रीतोऽस्मि देवि भद्रं ते भविष्यामि सुतो ह्यहम् । यतः सपत्निपुत्रेषु वात्सल्यं देवि दुर्लभम् ॥४६॥
त्वया तु यत्कृतं स्तोत्रं तत्पठन्ति नरास्तु ये । तेषां संपद्वरा पुत्रा न हीयन्ते कदाचन ॥४७॥
स्वात्मजे वान्यपुत्रे वा यः समत्वेन वर्तते । न तस्य पुत्रशोकः स्यादेष धर्मः सनातनः ॥४८॥

उस ऋक् यजु और सामरूप, सत्य स्वर को प्राप्त आत्मावाले षडङ्ग ब्रह्म को बार बार नमस्कार है। तुम इन्द्र हो, पवन,
ईशान, सोम और यम हो, तुम अग्नि, निर्ऋति, वरुण और दिवाकर भी हो, देव, स्थावर, पिशाच राक्षस, गिरि
सिद्ध, गन्धर्व, नदियाँ, भूमि, सागर आदि तुम्हीं हो ॥३४-३७॥ समस्त जगत् के ईश और परात्पर ब्रह्म भी तुम्हीं
हो। देव ! यह समस्त जगत् तुम्हारा ही रूप है, इसलिए तुमको सतत नमस्कार है। अनाथों के नाथ ! सर्वज्ञ ! सब
प्राणियों और देवेन्द्र के रूप में रहने वाले ! जनार्दन ! दैत्यों से पीड़ित मेरे पुत्रों की रक्षा करो । । ३८-३६॥
देवमाता ने इस प्रकार भगवान् की स्तुति की और बार बार भगवान् को प्रणाम किया । फिर हाथ जोड़कर
आनन्दाश्रु से अपने हृदय को धोती हुई वह बोली- देवेश ! सबके आदि कारण ! इस समय तुम्हारे अनुग्रह
का एकमात्र पात्र मैं हूँ, मेरे स्वर्गस्थ पुत्रों (देवों) को अक्षय श्री प्रदान करो । जगद्रूप ! सर्वज्ञ ! परमेश्वर !
श्रीश ! तुमसे कौन सा रहस्य अज्ञात है ? अतः प्रभो ! तुम मुझसे क्या पूछ रहे हो ? तथापि मेरे मन को जो अच्छा
लग रहा है, उसको कह रही हूँ। देवेश ! इस समय मैं दैत्यों से पीड़ित पुत्रों की माता हूँ, जिनकी शक्ति व्यर्थ
सी हो गई है । उन दैत्यों का वध नहीं चाहती क्योंकि वे भी मेरे पुत्र हैं; परन्तु उनकी हिंसा न करते हुए भी आप
मेरे पुत्रों को ऐश्वर्य और इन्द्र पद प्रदान कीजिए। देवदेवेश इतनी बातें सुनकर पुनः और अधिक प्रसन्न हो गए ।
विप्रनारद ! तब वे आदर पूर्वक देवमाता का हर्ष बढ़ाते हुए बोले ॥४०-४५॥
श्री भगवान् बोले-- देवि ! मैं तुम पर प्रसन्न हूँ, तुम्हारा कल्याण होगा। तुम्हारा सौत के पुत्रों पर
भी अनुपम वात्सल्य है, अतः मैं स्वयं तुम्हारा पुत्र बनूँगा । तुमने जिस स्तोत्र से मेरा स्तवन किया है उस स्तोत्र
को जो मनुष्य पढ़ेंगे उनकी भी श्रेष्ठ सम्पत्ति और सन्तति का क्षय कभी भी नहीं होगा। जो अपने और दूसरे के
पुत्रों पर समान भाव रखता है उसको कभी भी पुत्रशोक नहीं होता, यह एक सनातन नियम है ॥४६-४८॥

दशमोऽध्यायः ७३
अदितिरुवाच
नाहं वोढुं क्षमा देव त्वामाद्यं पुरुषं परम् । असंख्याताण्डरोमाणं सर्वेशं सर्वकारणम् ॥४६॥
यत्प्रभावं न जानन्ति श्रुतयः सर्वदेवताः । तमहं देवदेवेशं धारयामि कथं प्रभो ॥५०॥
अणोरणीयांसमजं परात्परतरं प्रभुम् । धारयामि कथं देव त्वामहं पुरुषोत्तमम् ॥५१॥
महापातकयुक्तोऽपि यन्नामस्मृतिमात्रतः । मुच्यते स कथं देवो ग्राम्येषु जनिमर्हति ॥५२॥
यथा शूकरमत्स्याद्या अवतारास्तव प्रभो । तथायमपि को वेद तव विश्वेश ! चेष्टितम् ॥५३॥
त्वत्पादपद्मप्रणता त्वन्नामस्मृतितत्परा । त्वामेव चिंतये देव ! यथेच्छसि तथा कुरु ॥५४॥
सनक उवाच
तयोक्तं वचनं श्रुत्वा देवदेवो जनार्दनः । दत्त्वाभयं देवमातुरिदं वचनमब्रवीत् ॥५५॥
श्रीभगवानुवाच
सत्यमुक्तं महाभागे त्वया नास्त्यत्र संशयः । तथापि शृणु वक्ष्यामि गुह्याद्गुह्यतरं शुभे ॥५६॥
रागद्वेषविहीना ये मद्भक्ता मत्परायणाः । वहन्ति सततं ते मां गतासूया अदांभिकाः ॥५७॥
परोपतापविमुखाः] शिवभक्तिपरायणाः । मत्कथाश्रवणासक्ता वहन्ति सततं हि माम् ।५८॥
पतिव्रताः पतिप्राणाः पतिभक्तिपरायणाः । वहन्ति सततं देवि स्त्रियोऽपि त्यक्तमत्सराः ॥५९॥
मातापित्रोश्च शुश्रूषुर्गुरुभक्तोऽतिथिप्रियः । हितकृद्ब्राह्मणानां यः स मां वहति सर्वदा ॥६०॥
अदिति बोली--देव ! आदि, परम पुरुष तुमको मैं गर्भ में धारण करने में समर्थ नहीं हूँ। जिसके रोम-रोम
में असंख्य ब्रह्माण्ड भूलते रहते, जो सर्वेश और सब का आदि कारण है, जिसकी महिमा को श्रुतियाँ और सब
देवता नहीं जान पाते हैं, प्रभो ! उस देवदेवेश को मैं कैसे गर्भ में धारण कर सकती हूँ ? ॥४६-५०॥ देव ! अणु से भी
अणुतम, अज, परात्पर, प्रभु और पुरुषोत्तम देव तुमको कैसे मैं धारण कर सकती हूँ ? जिसके नाम स्मरण मात्र
से महापापों में फँसा प्राणी भी शीघ्र मुक्त हो जाता है वह आदि देव किस प्रकार मेरे समान ग्राम्य मानवी की
कुक्षि से उत्पन्न हो सकता है ? प्रभो ! जिस प्रकार शूकर, मत्स्य (मछली) आदि तुम्हारे अन्य अवतार हुए हैं इसी
प्रकार यह तुम्हारा कोई अवतार होगा ? भला तुम्हारे रहस्यमय व्यापार को कौन जान सकता है ? देव ! मैं तो
केवल तुम्हारे चरण-कमलों में ही सर्वदा विनत रहने वाली, तुम्हारे नामों के रटने में ही लीन रहने वाली और
सर्वदा तुम्हारा हो चिन्तन करने वाली एक किङ्करी हूँ, तुम्हारी जैसी इच्छा हो करो ॥५१-५४॥
सनक बोले-उसकी कही हुई बातों को सुनकर देवाधिदेव जनार्दन ने देवमाता को अभय वरदान
दिया और कहा--॥५५॥
श्री भगवान् बोले--महाभाग्यशालिनि ! तुमने जो कुछ कहा सत्य है, इसमें कुछ भी सन्देह नहीं । फिर
भो शुभे ! सुनो, आज तुमको अत्यन्त रहस्यमय तत्त्व बता रहा हूँ । जो राग द्वेष से हीन मेरे भक्त, मुझमें ही
विरत रहने वाले तथा ईर्ष्या और दंभ से रहित हैं, वे सर्वदा मुझको ढोते रहते हैं। दूसरों को पीड़ा न पहुँचाने वाले,
शिव-भक्ति में अनन्य भाव रखने वाले और मेरी कथा में सर्वदा तल्लीन रहने वाले भक्त सर्वदा मुझको ढोते हैं ।
पतिव्रता, पतिप्रिया, पतिभक्ति को ही अपना सर्वस्व समझने वाली और ईर्ष्या से सर्वथा दूर रहने वाली स्त्रियां
भी मुझको अपने हृदय में रखती है ॥५६-५६॥ माता पिता की सेवा करने वाला, गुरुभक्त, अतिथिसवो और
ब्राह्मणों का हित करने वाला मनुष्य सर्वदा मुझको ढोता है । नित्य पुण्य तीर्थों में रत रहने वाला, सत्संग
१०-नार०

७४ नारदीयपुराणम्
पुण्यतीर्थरता नित्यं सत्सङ्गनिरतास्तथा । लोकानुग्रहशीलाश्च सततं ते वहन्ति माम् ॥६१॥
परोपकारनिरताः परद्रव्यपराङ्मुखाः । नपुंसकाः परस्त्रीषु ते वहन्ति च मां सदा ॥६२॥
तुलस्युपासनरताः सदा नामपरायणाः । गोरक्षणपरा ये च सततं मां वहन्ति ते ॥६३॥
प्रतिग्रहनिवृत्ता ये परान्नविमुखास्तथा । अन्नोदकप्रदातारो वहन्ति सततं हि माम् ॥६४॥
त्वं तु देवि ! पतिप्राणा साध्वी भूतहिते रता । संप्राप्य पुत्रभावं ते साधयिष्ये मनोरथम् ॥६५॥
इत्युक्त्वा देवदेवेशो ह्रार्दित देवमातरम् । दत्त्वा कण्ठगतां मालामभयं च तिरोदधे ॥६६॥
सा तु संहृष्टमनसा देवसुदर्शनन्दिनी । प्रणम्य कमलाकान्तं पुनः स्वस्थानमाव्रजत् ॥६७॥
ततोऽदितिर्महाभागा सुप्रीता लोकवन्दिता । असूत समये पुत्रं सर्वलोकनमस्कृतम् ॥६८॥
शङ्खचक्रधरं शान्तं चन्द्रमण्डलमध्यगम् । सुधाकलशदध्यन्नकरं वामनसंज्ञितम् ॥६९॥
सहस्रादित्यसंकाशं व्याकोशकमलेक्षणम् । सर्वाभरणसंयुक्तं पीताम्बरधरं हरिम् ॥७०॥
स्तुत्यं मुनिगणैर्युक्तं सर्वलोकैकनायकम् । आविर्भूतं हरिं ज्ञात्वा कश्यपो हर्षविह्वलः ।
प्रणम्य प्राञ्जलिर्भूत्वा स्तोतुं समुपचक्रमे ॥७१॥
कश्यप उवाच
नमो नमस्तेऽखिलकारणाय नमोनमस्तेऽखिलपालकाय ।
नमो नमस्तेऽमरनायकाय नमो नमो दैत्यविनाशनाय ॥७२॥
नमो नमो भक्तजनप्रियाय नमोनमः सज्जनरंजिताय ।
नमो नमो दुर्जननाशनाय नमोऽस्तु तस्मै जगदीशवराय ॥७३॥
में लगातार रहने वाला और सर्वदा लोक पर अनुग्रह करने वाला व्यक्ति मुझको अपने हृदय में ढोता रहता है।
परोपकार-परायण, पर की थोड़ी भी आकांक्षा न रखने वाले और परस्त्री के प्रति नपुंसक-सा व्यवहार करने
वाले मुझे सर्वदा ढोते हैं ॥६०-६२॥ तुलसी की उपासना में सर्वदा लगे रहने वाले हरिनाम का उच्चारण करने
वाले और गोरक्षक सर्वदा मुझको ढोते रहते हैं। जो दान लेने का नाम तक नहीं लेते, जो दूसरों के दिये अन्न
की इच्छा नहीं रखते और जो स्वयं अन्न और जल का दान करते हैं वे सर्वदा मुझको ढोते रहते हैं ॥६३-६४॥ देवि !
तुम तो पतिव्रता, साध्वी और सब प्राणियों के हित में निरत रहने वाली हो मैं तुम्हारा पुत्र बनकर तुम्हारे सब
मनोरथों को पूर्ण करूँगा ॥६५॥ देवदेवेश ने देवमाता अदिति से इस प्रकार कहकर अपने कंठ की माला
उसको दे दी और अभय वरदान देकर स्वयं अन्तर्हित हो गए। वह देव-जननी, दक्षकन्या अदिति प्रसन्न मन से
कमलापति को प्रणाम कर अपने स्थान पर लौट आई ॥६६-६७॥ तदन्तर अनुकूल समय पर महाभागशालिनी,
प्रसन्नवदना और लोकपूज्या अदिति ने सबलोकों से वन्दित, शंखचक्रधारी, शान्त, चन्द्रमण्डल (प्रभामण्डल) से
आवृत्त, सुधा कलश एवं दधि मिश्रित अन्न हाथ में लिये हुए वामन नामक पुत्र को उत्पन्न किया जो सहस्रसूर्य के
समान तेजस्वी, विकसित कमल के समान नेत्र वाला सब प्रकार के आभूषणों से सुशोभित, पीताम्बरधारी, मुनि-
गणों से वन्द्य और सब लोकों के नायक स्वयं हरि थे । भगवान् को अपने पुत्ररूप में प्रकट हुए देखकर महात्मा
कश्यप ने आनन्द विभोर हो प्रणाम किया और हाथ जोड़कर स्तुति करने लगे ॥६८-७१॥
कश्यप बोले—अखिल जगत के कारण हरि को नमस्कार है । अखिल लोक के पालक को बार-बार
नमस्कार करते हैं । देवेश, दैत्य-विनाशक को नमस्कार है । भक्त जनों के प्रिय को नमस्कार है । सज्जन को सुख