बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)
Brihan Naradiya Purana with Sanskrit & Hindi Commentary
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)
पृष्ठ 999, कुल 1008 में से
संदर्भ में पढ़ें१८० नारदीयपुराणम्
कस्तूरीवर्णसंयुक्तांसुसूक्ष्मां नंदने वने। चूताशोकतरुस्थां कलगीतविनादिनीम् ॥२०॥
चिंतयेत्पार्वतीं देवीं कोकिलाधपधारिणीम्। गंधाद्यैः प्रत्यहं प्राज्ञश्चित्लिखितां यजैतः पटे ॥२१॥
ततो वस्त्रांसि हैमीं वा तिलपिष्टमयीं द्विज। दद्याद्विप्राय संतोष्य शक्त्या सस्वर्ण-दक्षिणाम् ॥२२॥
देवीं शंकारकोत्पन्ने कोकिले हरवल्लभे। तांबूलं दत्वा विप्राय सर्वसौभाग्यदा भव ॥२३॥
द्विजं सुवासिनींस्त्रिपदवेकां वा भोजयेत्ततः। वस्त्रादिकां च दत्वा प्रणामं कृत्वा विसर्जयेत् ॥२४॥
एवं या कुरुते नारी कोकिलाब्रतमुत्तमम्। सा राज्ञीसुभगातीव सप्तजन्मसु नारद ॥२५॥
अथ श्रावणपूर्णायां वेदोपाकरणं स्मृतम्। यजुर्वेदोक्त कर्मणां देवर्षिपितृतर्पणम् ॥२६॥
ऋषीणां पूजनं चापि स्वशाखोक्तविधानतः। बह्वृचैस्तु चतुर्दश्यां श्रावणेऽहनि परे ॥२७॥
रक्षाविधानं च तथा कर्तव्यं विधिपूर्वकम्। ॥२८॥
विप्रायोक्षतराजिकाश्च विमृता रक्षांगुलेतिः सिताः
कौसुंभेन च संसूताः सरितां मन्त्रस्य पांग्रैः शुभैः।
बंधायेद्विप्रमुख्येन वेदाभिरतान्तार्थ विप्रपाणिना-
म्प्रदक्षिणैःकुङ्कुमाक्तैः प्रहृष्टेना सहिता महोत्सवे कृते ॥२९॥
ततस्तु दक्षिणां दत्वा द्विजैश्चोपाध्यायाचरेत्। विसृज्य च बहृचांश्च प्रावरेद्यज्ञोपवीतकम् ॥३०॥
रंजितं कुंकुमाद्यैश्च नवीनं निर्मितं स्वयम्। भक्त्या संभोज्य विप्रान्प्रशस्तोपवस्त्रं समाचरेत् ॥३१॥
कृते ह्यस्मिन्ब्रते विप्र वार्षिकं कर्म वैदिकम्। विस्मृतं विधिहीनं च न कुर्या सुकृतं भवेत् ॥३२॥
प्रौष्ठपद्यां पौर्णमास्यामुमामाहेश्वरव्रतम्। एकाब्दमुषप्य भक्तां तु शिवं संपूर्य यत्नतः ॥३३॥
रूपधारिणी पार्वती देवी की इस प्रकार चिंतना करे कि उनके पंख सोने के हैं, नेत्र रत्न के, मुखकमल प्रवाल
(मूंगा) के, वर्ण कस्तूरी के समान है, उत्पत्ति नंदनवन में हुई है, आम तथा चंपा के वृक्षों पर वे ठहरती हैं,
मधुर एवम् अव्यक्त शब्दों में गीत गाती हैं। ध्यानोपरान्त "देवि..." इस मंत्र को पढ़ते हुए वस्त्र पर रंग
आदि से लिखित गौरी की गंध आदि से पूजा किया करे। द्विज! व्रतांत में सुवर्ण की या तिलचूर्ण की बनी
कोकिला-प्रतिमा विप्र को समर्पित कर सुवर्ण दक्षिणा दे। तदनन्तर तीन या एक ही ब्राह्मण तथा ललनाओं को
खिलाकर वस्त्र आदि दक्षिणा दे प्रणाम करके विदा करे। नारद! जो नारी इस प्रकार उत्तम कोकिलावत को
करती है, वह सात जन्मों तक सुख-सौभाग्य को प्राप्त करती है ॥१८-२५॥
श्रावणी पूर्णिमा में वेदोपाकरण व्रत किया जाता है। उस दिन यजुर्वेद के मंत्रों से देवों, ऋषियों तथा
पितरों का तर्पण करे। अपनी शाखोक्त विधि से ऋषियों का पूजन भी करे। रक्षा-बंधन के दिन ऋचाओं तथा
साम-मंत्रों से विधिपूर्वक पूजा आदि करनी चाहिये। तदनन्तर कांस्यपात्र को जल से प्रक्षालित कर उसमें उजला
सरसों, अक्षत, रक्षाबन्धन तथा कुसुम्भी रंग से रंगा डोरा रख कर गंध आदि से विष्णु आदि देवसमूह का पूजन
करे। पश्चात् प्रसन्नतापूर्वक ब्राह्मण के हाथ से डोरा बँधा ले। अनन्तर द्विजों को दक्षिणा दे वेदों का स्वाध्याय
करे, सप्तर्षियों का विसर्जन करे, कुंकुम आदि से रंगे नवीन ब्रह्मसूत्र को धारण करे और यथाशक्ति उत्तम ब्राह्मणों
को खिला कर स्वयं अनुष्ठान करे। विप्र! इस व्रत के कर लेने पर वार्षिक वैदिक कार्य विस्मृत हो जाय
या सविधि न हो सके तो भी कोई क्षति नहीं ॥२६-३२॥
भाद्रौ की पूर्णिमा में उमा-महेश्वरव्रत करना चाहिये। चतुर्दशी में एक भुक्त करते हुए शंकर की यत्नपूर्वक