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सर्वकोश
बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)

बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)

Brihan Naradiya Purana with Sanskrit & Hindi Commentary

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)

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DevanagariSanskritpublished1,008 पृष्ठ

पृष्ठ 998, कुल 1008 में से

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पृष्ठ 998

चतुर्विंशत्यधिकशततमोऽध्यायः ६७६
धर्मराजव्रतं चात्र कथितं तन्निशामय। श्रुतान्नमुदकुम्भं च वैशाख्यां वै द्विजोत्तमे ॥४॥
दद्याद्गोदानफलं धर्मराजस्य तुष्टये। अत्र कृष्णाजिनं दद्यात्सखुरं च सशृङ्गकम् ॥५॥
तिलैः सह समाच्छाद्यवस्त्रैर्हेम्ना द्विजातये। यस्तु कृष्णाजिनं दद्यात्सत्कृत्य विधिपूर्वकम् ॥६॥
सर्वशास्त्रविदे सप्तद्वीपभूमिप्रदः स वै। मोदते विष्णुलोके हि यावच्चन्द्रार्कतारकम् ॥७॥
कुम्भांस्वच्छजलैः पूर्णान् हिरण्येन समन्वितान्। यः प्रयच्छाद्विजाग्र्येभ्यः स न शोचति कर्हिचित् ॥८॥
अथ ज्येष्ठस्य पूर्ण्यां वटसावित्रिकं व्रतम्। सोपवासा वटं सिञ्चेत्सलिलैरमृतोपमैः ॥९॥
सूत्रेण वेष्टयेच्चैव सशताष्टप्रदक्षिणम्। ततः संप्रार्थयेद्देवीं सावित्रीं सुपतिव्रताम् ॥१०॥
जगत्पूज्ये जगन्मातः सावित्रि पतिदैवते। पत्या सहावियोगं मे वटस्थे कुरु ते नमः ॥११॥
इति संप्रार्थ्य या नारी भोजयित्वा परेऽहनि। सुवासिनीः स्वयं भुंक्त्वात्सा स्यात्सौभाग्यभागिनी ॥१२॥
आषाढस्य तु पूर्ण्यां गोपद्मव्रतमुच्यते। चतुर्भुजं महाकायं जांबूनदसमप्रभम् ॥१३॥
शंखचक्रगदापद्मरमाग रुडशोभितम्। सेवितं मुनिभिर्देवैर्यक्षगंधर्वकिन्नरैः ॥१४॥
एवंविधं हरिं तत्र स्नात्वा पूजां समाचरेत्। पौरुषेणैव सूक्तेन गंधाद्यैरुपचारकैः ॥१५॥
आचार्य वस्त्रभूषाद्यैस्तोषयेत्स्निग्धमानसः। भोजयेन्मिष्टपक्वान्नैर्द्विजानन्यांश्च शक्तितः ॥१६॥
एवं कृत्वा व्रतं विप्र प्रसादात्कमलापतेः। ऐहिकामुष्मिकान्कामांल्लभते नात्र संशयः ॥१७॥
कोकिलाव्रतमप्यत्र प्रोक्तं तद्विधिरुच्यते। पूर्णिमायां समारभ्य व्रतं स्नायाद्बहिर्जले ॥१८॥
पूर्णांतं श्रावणे मासि गौरीरूपां च कोकिलाम्। स्वर्णपक्षां रत्ननेत्रां प्रवालमुखपंकजाम् ॥१९॥
धर्मराज को संतुष्ट करने के लिये उत्तम ब्राह्मण को सुत्तीर्ण अन्न तथा जल-पूर्ण घट देना चाहिये। उससे गोदान
का फल मिलता है ॥१-४३॥ उस तिथि में जो व्यक्ति सकलशास्त्रवेत्ता द्विज का सत्कार कर विधिपूर्वक कृष्ण-
मृगचर्म प्रदान करता है, उसे सातों द्वीप समेत वसुंधरा दान करने का फल मिलता है और वह विष्णुलोक में
तब तक आनन्द करता है जब तक सूर्य-चंद्रमा रहते हैं। उक्त तिथि में जो स्वच्छ जल पूर्ण घट सुवर्ण समेत उत्तम
ब्राह्मण को समर्पित करता है, उसे कभी शोक नहीं होता ॥५-८॥
ज्येष्ठ-पूर्णिमा में वटसावित्रीव्रत किया जाता है। उस दिन उपवास करते हुए अमृतोपम जल से वटवृक्ष
को सींचे। फिर सूत से वृक्ष को लपेट कर एक सौ आठ बार प्रदक्षिणा करके सुपतिव्रता सावित्री देवी की प्रार्थना
करे- "जगत्पूज्ये ! जगन्मातः ! सावित्रि ! पतिदैवते ! वटवृक्ष पर रहने वाली ! मुझे पति से कभी वियोग न हो,
ऐसा आप करें।" इस प्रकार प्रार्थना कर जो नारी दूसरे दिन सधवाओं को खिला कर स्वयं भोजन करती है,
वह सौभाग्यशालिनी होती है ॥९-१२॥ आषाढ़ की पूर्णिमा में गोपद्मव्रत किया जाता है। उस दिन स्नान कर
पुरुषसूक्त को पढ़ते हुए गंध आदि उपचारों से चतुर्भुज, महाकाय, सुवर्णसदृशकान्तिमान्, शंख, चक्र, गदा, पद्म,
लक्ष्मी तथा गरुड़ से सुशोभित, मुनि, देव, यक्ष, गंधर्व तथा किन्नरों से संसेवित हरि की अर्चना करे। अनन्तर
प्रसन्नचित्त हो वस्त्र, आभूषण आदि से आचार्य को संतुष्ट करे और अन्य विप्रों को मिष्टान्न खिलाकर यथाशक्ति
दक्षिणा दे। विप्र ! इस तरह व्रत करने वाला व्यक्ति कमलापति की कृपा से ऐहलोकिक एवम् पारलोकिक फलों को
प्राप्त करता है, इसमें संशय नहीं ॥१३-१७॥ उक्त तिथि में कोकिलाव्रत भी किया जाता है। उक्त तिथि से लेकर
श्रावण की पूर्णिमा तक प्रतिदिन जलाशय आदि के जल में स्नान कर गौरी रूप कोकिला की पूजा करे। कोकिला...