बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)
Brihan Naradiya Purana with Sanskrit & Hindi Commentary
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंसप्ताशीतितमोऽध्यायः ७८३
पुष्पैः पयोन्नैः सघृतैर्होमाद्विश्वं वशं नयेत् । वाक्सिद्धिं लभते मन्त्री पलाशकुसुमैर्हुतैः ॥८१॥
कर्पूरागुरुसंयुक्तं गुग्गुलं जुहुयात्सुधीः । ज्ञानं दिव्यमवाप्नोति तेनैव स भवेत्कविः ॥८२॥
क्षीराक्तैरमृताखंडैर्होमः सर्वापमृत्युजित् । दूर्वाभिरायुषे होमः क्षीराक्ताभिर्दिनत्रयम् ॥८३॥
गिरिकर्णीभवैः पुष्पैर्ब्राह्मणान्वशयेद्द्भुतः । कल्हारैः पाथिर्वान्पुष्पैस्तद्वध्रुः कर्णिकारजैः ॥८४॥
मल्लिकाकुसुमैर्हुत्वा राजपुत्रान्वशं नयेत् । कोरंटकुसुमैर्वैश्यान्वश्यान्पाटोलोद्भवैः ॥८५॥
अनुलोमं विलोमांतस्थितसाध्याह्वयान्वितम् । मन्त्रमुच्चार्य जुहुयान्मन्त्री मधुरलोलितैः ॥८६॥
सर्षपैर्मधुसंमिश्रैर्वशयेत्पाथिर्वान् क्षणात् । अनेनैव विधानेन तत्पत्नीस्तत्सुतानपि ॥८७॥
जातिबिल्वभवैः पुष्पैर्मधुरत्रयसंयुतैः । नरनारीनरपतीन्होमेन वशयेत्क्रमात् ॥८८॥
मालतीबकुलोद्भूतैः पुष्पैश्चन्दनलोलितैः । जुहुयात्कवितां मन्त्री लभते वत्सरांतरे ॥८९॥
मधुरत्रयसंयुक्तैः फलैर्बिल्वसमुद्भवैः । जुहुयाद्वशयेल्लोकं श्रियं प्राप्नोति वांच्छिताम् ॥९०॥
साज्यमन्नं प्रजुहुयादन्नवेदनसमृद्धिमान् । कस्तूरीकुंकुमोपेतं कर्पूरं जुहुयाद्वशी ॥९१॥
कन्दर्पादधिकं सद्यः सौंदर्यमधिगच्छति । लाजान्प्रजुहुयान्मन्त्री दधिक्षीरमधुप्लुतान् ॥९२॥
विजित्य रोगानखिलान्स जीवेच्छरदां शतम् । पादद्वयं मलयजं पादं कुंकुमकेसरम् ॥९३॥
पादं गोरोचनांतानि त्रीणि पिष्ट्वा हिमांभसा । विदध्यात्तिलकं भाले यान्पश्येद्यैर्विलोक्यते ॥९४॥
यांस्पृशेत्स्पृश्यते यैर्वा वश्याः स्युस्तस्य तेऽचिरात् । कर्पूरंकपिचोराणि समभागानि कल्पयेत् ॥९५॥
चतुर्भुजा जटामांसी तावती रोचना मता । कुंकुमं समभागं स्याद्विभागं चन्दनं मतम् ॥९६॥
अगुरुर्नवभागं स्यादिति भागक्रमेण च । हिमाद्रिभ्रः कन्यया विष्टमेतत्सर्वं सुसाधितम् ॥९७॥
आदाय तिलकं भाले कुर्याद्भूमितीन्नरान् । वनितामदगर्वाढ्या मदोन्मत्तान्मतंगजान् ॥९८॥
लाल करवीर के पुष्पों से हवन करनेवाला मन्त्री वाक्सिद्धि को प्राप्त करता है । कर्पूर तथा अगर युक्त गुग्गुल से
हवन करने से दिव्यज्ञान तथा कवित्वशक्ति की प्राप्ति होती है ॥७७-८२॥ दूधयुक्त बहेड़े से हवन करने से अपमृत्यु
पर विजय प्राप्त होती है । क्षीर युक्त दूर्वा से तीन दिन होम करने से आयु बढ़ती है । अपराजिता के पुष्पों से हवन
करने से ब्राह्मण वश में होते हैं । श्वेत कमल से हवन करने से राजा वश में होते हैं और कर्णिकारपुष्पों से होम करने
से रानियां वशीभूत होती हैं। मालती के पुष्पों से होम करने से राजपुत्र वशीभूत होते हैं। कोरंट के पुष्पों से वैश्य
और पाटल से शूद्र वशीभूत होते हैं। अनुलोम-विलोम प्रकार से मंत्र का उच्चारण कर मधुमिश्रित सरसों से हवन
करने से राजा तत्क्षण वशीभूत हो जाते हैं। इसी विधान से राजपत्नियां तथा राजपुत्र वश में आते हैं । त्रिमधुयुक्त
पुष्प एवम् बिल्व के पुष्पों से होम करने से राजा तथा नर-नारितां वशीभूत होती हैं ॥८३-८८॥ एक वर्ष तक जूही
के चन्दनयुक्त मालती तथा मौलसिरी के पुष्पों से हवन करने से कवित्वशक्ति की प्राप्ति होती है । त्रिमधुयुक्त बिल्व
के फलों से होम करने से संसार वशीभूत हो जाता है ओर वांछित धन की प्राप्ति होती है । घृताक्त अन्न से
होम करने से अन्न की समृद्धि होती है । कस्तूरी और कुंकुम युक्त कर्पूर से हवन करने वाला साधक कामदेव
से भी अधिक सुन्दर होता है। दही, दूध और मधु सहित लावे से होम करने वाला व्यक्ति अखिल रोगों को
जीत कर सौ वर्षों तक जीता है ॥८९-९२३॥ जो व्यक्ति दो भाग चन्दन और एक-एक भाग कुंकुम, केशर तथा
गोरोचन को हिम जल के साथ पीस कर ललाट पर तिलक लगाता है, वह जिसे देखता है तथा स्पर्श करता है, वे
सब तत्काल उसके वशीभूत हो जाते हैं। समभाग कर्पूर, रक्तचंदन, चोर (ओषधिविशेष), चतुर्भुज, जटामांसी,