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बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)

बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)

Brihan Naradiya Purana with Sanskrit & Hindi Commentary

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)

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DevanagariSanskritpublished1,008 पृष्ठ

पृष्ठ 817, कुल 1008 में से

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पृष्ठ 817

७६८ नारदीयपुराणम्
वाग्भवं लोहितो राये श्रीकंठो लोहितोऽनलः । दीर्घवान्यै परा पश्चादपरायौ हसौ युतः ॥६६॥
सदाशिवमहाप्रेतकेतं पद्मासनं नमः । अनेन मनुना दद्यादासनं श्रीगुरुक्रमम् ॥६७॥
प्राङ्मध्ययोन्यंतराले पुजयेत्कल्पयेत्ततः । पंचभिः प्रणवैर्मूति तस्यामावाह्य देवताम् ॥६८॥
पुजयेदागमोक्तेन विधानेन समाहितः । तारावाक्शक्तिकमला हसख्फ्रें हसौः स्मृताः ॥६९॥
वामकोणे यजेद्देव्या रतिमिंदुसमप्रभाम् । सृणिपाशधरां सौम्यां मदविभ्रमविह्वलाम् ॥७०॥
प्रीतिं दक्षिणकोणस्थां तप्त कांचनसन्निभाम् । अङ्कुशं प्रजतं दोभ्यां धारयन्तीं समर्चयेत् ॥७१॥
अग्रे मनोभवां रक्तां रक्तपुष्पार्च्यलंकृताम् । इक्षुकार्मुकपुष्पेषुधारिणीं सस्मिताननाम् ॥७२॥
अङ्गान्मभ्यर्चयेत्पश्चाद्यथापूर्वं विधानवित् । दिक्ष्वग्रे च निजैर्मन्त्रैः पूजयेद्बाणदेवताः ॥७३॥
हस्ताब्जधृतपुष्पेषुप्रणाममृतसप्रभाः । अष्टयोनिश्चाष्टशक्तीः पूजयेत्सुभगादिकाः ॥७४॥
मातरो भैरवांकस्था मदविभ्रमविह्वलाः । अष्टपत्रेषुसम्पूज्य यथावत्कुसुमादिभिः ॥७५॥
लोकपालांस्ततो दिक्षु तेषामस्त्राणि तद्बहिः । पूर्वजन्मकृतेः पुण्यैर्ज्ञात्वैनां परदेवताम् ॥७६॥
यो भजेदुक्तमार्गेण स भवेत्संपदां पदम् । एवं सिद्धमनुर्मन्त्री साधयेदिष्टमात्मनः ॥७७॥
जुहुयादरुणांभोजैर्दोषैर्मधुराप्लुतैः । लक्षसंख्यं तदर्द्धं वा प्रत्यहं भोजयेद्द्विजान् ॥७८॥
वनिता युवती रम्याः प्रीणयेद्देवताधिया । होमांते धनधान्याद्यैस्तोषयेद्गुरुमात्मनः ॥७९॥
एवं कृते जगद्वश्यो रमाया भवनं भवेत् । रक्तोत्पलैस्त्रिमध्वक्तैररुणैर्वा हयारिजैः ॥८०॥

कामिनी, कामदायिनी, रति प्रिया, मंदा, आनंदा और मनोन्मनो--ये नौ शक्तियाँ हैं, जो वर तथा अभय देने
वाले अस्त्रों का धारण किये हुई हैं ॥६०-६५॥ "वाग्भवम् ............ नमः"--इस मंत्र से आसन प्रदान करे ।
तत्पश्चात् प्रथम और मध्यम योनि के बीच पूजा का आरंभ करे । पांच प्रणवों से प्रतिमा में देवी का आवाहन
करके सावधान होकर तंत्रोक्त विधान से पूजा करनी चाहिये । "तारा........."--यह मंत्र हैं। इस मंत्र
से वामकोण में चन्द्रमा के समान प्रभा वाली, अंकुश तथा पाश धारण करने वाली, सुन्दर रूप वाली, और मद के
आधिक्य से विह्वल नेत्र वाली देवी की अर्चना करे । दक्षिण कोण में तपे सोने के समान कान्तिवाली और हाथों
में अंकुश तथा पाश धारण करनेवाली प्रीति देवी की पूजा करे ॥६६-७१॥ अग्र भाग में, रक्तवर्ण वाली, रक्तपुष्प
आदि से अलंकृता, ईख का धनुष तथा पुष्पों का वाण धारण करने वाली और मन्द मुसकान से युक्त मुख वाली
मनोभवा देवी की अर्चना करे । तत्पश्चात् विधानवेत्ता व्यक्ति यथा पूर्व अंगों की पूजा करके दिशाओं में तथा
अग्रभाग में अमृत के समान प्रभा वाले और करकमलों में पुष्पबाण धारण करनेवाले बाण देवताओं का पूजन
करे । फिर अष्ट योनियों में सुभगा आदि आठों शक्तियों की पूजा करे । अष्ट पत्रों पर भैरव की गोद में रहने
वाली, मदविह्वला माताओं की पुष्प आदि से यथावत् पूजा करे । तदनन्तर दिशाओं में लोकपालों का और बाहर
उनके अस्त्रों का पूजन करे । जो व्यक्ति पूर्वजन्म के सुकृत से इन श्रेष्ठ देवता को जान कर उपर्युक्त प्रकार से
इनकी उपासना करता हैं, वह संपत्तियों का अधीश्वर होता है ॥ ७२-७६॥

इस प्रकार मन्त्र सिद्ध कर लेने पर मन्त्री अपने इष्टदेव की साधना करे । दोष रहित लाल कमलों में
मधुर मिलाकर उनसे एक लाख या पचास हजार हवन करे । और प्रतिदिन ब्राह्मणों को भोजन कराये । सुन्दरी
एवम् युवती ललनाओं को देवता बुद्ध्या संतुष्ट करे। होम के अन्त में धन धान्य आदि से अपने गुरु को संतुष्ट करे।
ऐसा करने से संसार वशीभूत हो जाता है और उसके घर लक्ष्मी निवास करती है। त्रिमधुयुक्त रक्तकमल तथा