बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)
Brihan Naradiya Purana with Sanskrit & Hindi Commentary
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)
पृष्ठ 603, कुल 1008 में से
संदर्भ में पढ़ें५८४ नारदीयपुराणम्
गोमाद्यं च भुवर्लोकं कंठांतं नाभितो न्यसेत् । स्वर्लोकं चैव गूमाद्यं कंठादिमस्तकावधि ॥६॥
व्यापकं मूलमन्त्रेण न्यासोऽयं भुवनाभिधः । मूलमंत्रं समुच्चार्य मातृकावर्णमीरयेत् ॥१०॥
तदंतेऽपि च मूलं स्यान्नमोऽतं मातृकास्थले । क्षान्तं विन्यस्य मूलेन व्यापकं रचयेत्सुधीः ॥११॥
वर्णन्यासोऽयमाख्यातः पदन्यासस्तथोच्यते । पञ्चत्रिबाणवह्नींदुचंद्राक्षिणिगमैः क्रमात् ॥१२॥
विभक्तेर्मूलगायत्र्या हृदंतैरष्टभिः पदैः । भालदेशे मुखे कण्ठे हृदि नाभ्यूरुजानुषु ॥१३॥
पादयोश्चैव विन्यस्य मूलेन व्यापकं चरेत् । वदेत्तत्पुरुषायति विद्महेति पदं ततः ॥१४॥
वक्रतुंडाय शब्दांते धीमहीति समीरयेत् । तन्नो दंतिः प्रचोदयाँ दयादिति वदेत्पुनः ॥१५॥
एषोक्ता मूलगायत्री सर्वसिद्धिप्रदायिनी । एवं न्यासविधिं कृत्वा ध्यायेद्देवं हृदंबुजे ॥१६॥
उद्यन्मार्तण्डसदृशं लोकस्थित्यंतकारणम् । सशक्तिकं मूषितांगं दंतचक्राद्युदायुधम् ॥१७॥
एवं ध्यात्वा चतुश्चत्वारिंशल्लक्षह्वसंयुतम् । चर्तुलक्षं जपेन्मंत्रं अष्टद्रव्यैर्यदांशतः ॥१८॥
जुहुयाद्विधिवन्मंत्वी संस्कृते हव्यवाहने । इक्षवः सक्तवो मोचाफलानि चिपिटास्तिलाः ॥१९॥
मोदका नारिकेलानि लाजा द्रव्याष्टकं स्मृतम् । पीठमाधारशक्त्यादिपरतत्वांतमर्चयेत् ॥२०॥
षट्कोणांतरित्रकोणं च बहिरष्टदलं लिखेत् । भूपुरं तद्विहः कृत्वा गणेशं तत्र पूजयेत् ॥२१॥
तीव्राख्या ज्वालिनी नंदा भोगदा कामरूपिणी । उग्रा तेजोवती सत्या नवमी विघ्ननाशिनी ॥२२॥
सर्वाशक्तिकमलासनाय हृदयांतिकः । पीठमंत्रोऽयमेतेन दद्यादासनमुत्तमम् ॥२३॥
तत्रावाह्य गणाधीशं मध्ये सम्पूज्य यत्नतः । त्रिकोणबाह्ये पूर्वादिचतुर्दिक्ष्वर्चयेत्क्रमात् ॥२४॥
ओर आदि में 'भू'' जोड़कर स्वर्लोक का कंठ से मस्तक तक मूल मन्त्र से व्यापक न्यास करना चाहिए । इस न्यास
की संज्ञा भुवन है । इसके बाद मूल मन्त्र का उच्चारण करके मातृकाक्षरों का उच्चारण करना चाहिए । उसके
अन्त में भी मूल मन्त्र का उच्चारण करके मन्त्र के अन्त में 'नमः' पद जोड़कर उससे मातृकाक्षरों के आदि से
लेकर 'क्ष' तक व्यापक न्यास करना विद्वान् का कर्तव्य है । इसको वर्णन्यास कहते हैं । अब पदन्यास बताता
हूँ ॥६-११॥
पाँच, तीन, पाँच, तीन, एक, एक, दो और चार (२४) अक्षरों में विभक्त आठ पदों एवं अन्त में 'नमः'
से युक्त मूल गायत्री से ललाट, मुख, कंठ, हृदय, नाभि, जंघे, घुटने तथा पैरों में मूलतः व्यापक न्यास करे । अंत
में 'तत्पुरुषाय,' उसके बाद 'विद्महे,' उसके पश्चात् 'वक्रतुण्डाय' और उसके अनन्तर 'धीमहि' पद का उच्चारण
करे । फिर 'तन्नो दन्तिः प्रचोदयात्' बोले । यही मूलगायत्री है, जो सकल सिद्धियाँ देने वाली हैं । ॥१२-१८॥
इस प्रकार ध्यान करके साधक चार लाख चौवालीस हजार की संख्या में मन्त्र-जप करे और उसका
दशांश अष्टद्रव्यों से संस्कृत अग्नि में विधिपूर्वक हवन करे । यहाँ अष्टद्रव्य ये हैं-१ ईख, २ सत्तू, ३ केला,
४ चिउरा, ५ तिल, ६ लड्डू, ७ नारियल और ८ लावा । इसके बाद आधारशक्ति से लेकर परमतत्त्व तक पीठ
की अर्चना करे । षट्कोण के भीतर त्रिकोण तथा उसके बाहर अष्टदल कमल लिखे । उसके बाहर भूपुर की
रचना करके उसमें गणेश का पूजन करे ॥१९-२१॥ तीव्राख्या ज्वालिनी नंदा भोगदा कामरूपिणी । उग्रा तेजोवती
सत्या नवमी विघ्ननाशिनी । सर्वाशक्तिकमलासनाय नमः'-यह पीठ मन्त्र है । इस मन्त्र से उत्तम आसन प्रदान
कर उस पर गणपति का आवाहन करके मध्य में यत्नपूर्वक उनका पूजन करे । अनन्तर त्रिकोण के बाहर पूर्व
आदि चारों दिशाओं में क्रमशः श्री तथा श्रीपति, गौरी तथा गौरीपति, रति तथा रतिपति और पश्चात् पृथ्वी