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सर्वकोश
बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)

बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)

Brihan Naradiya Purana with Sanskrit & Hindi Commentary

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)

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DevanagariSanskritpublished1,008 पृष्ठ

पृष्ठ 602, कुल 1008 में से

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पृष्ठ 602

अष्टषष्टितमोऽध्यायः ५८३
समर्थः सर्वकल्पेषु योऽनुकल्पं समाचरेत् । न सांगशयिकं तस्य दुर्मतेर्जायते फलम् ॥१४०॥
इति श्रीबृहन्नारदीयपुराणे पूर्वभागे बृहदुपाख्याने तृतीयपादे देवपूजानिरूपणं नाम
सप्तषष्टितमोऽध्यायः ॥६७॥
अथाष्टषष्टितमोऽध्यायः
सनत्कुमार उवाच
अथ वक्ष्ये गणेशस्य मंत्रान्सर्वेष्टदायकान् । यान्समाराध्य विप्रेंद्र साधको भुक्तिमुक्तिमान् ॥१॥
अव्ययो विष्णुवनिता शंभुस्त्री मीनकेतनः । स्मृतिर्मासेंदुमन्वाढ्या सा पुनश्चंद्रशेखरा ॥२॥
ङेन्तो गणपतिस्तोयं भुजंगो वरदेति च । सर्वान्ते जनमुच्चार्य ततो मे वशमानय ॥३॥
वह्निःप्रियांतो मंत्रोऽयमष्टाविंशतिवर्णवान् । गणकोऽस्य मुनिश्चंदो गायत्री निव्यादादिका ॥४॥
गणेशो देवता बीजं षष्ठशक्तिस्तदादिका । श्रीमन्महागणपतिप्रीतये विनियोगकः ॥५॥
ऋषि शिरसि वक्त्रे तु छन्दश्च हृदि देवताम् । गुह्ये बीजं पदोः शक्तिं न्यसेत्साधकत्तमः ॥६॥
षड्दीर्घाढ्येन बीजेन यं च बीजादिना पुनः । षडंगानि न्यसेदस्य जातियुक्तानि मंत्रवित् ॥७॥
शैवी षडंगमुद्रात्र न्यस्तव्या हि षडंगके । गामाद्यं चैव भूर्लोकं नाभ्यंतं पादयोर्न्यसेत् ॥८॥
होकर भी अनुकल्प (पीछे बताये हुए अपूर्ण विधान) का अनुष्ठान करता है, उस उपासक को सम्पूर्ण फल की
प्राप्ति नहीं होती है । ॥१३७-१४०॥
श्री नारदीय पुराण के पूर्वभाग में देव-पूजा-निरूपण नामक सड़सठवां अध्याय समाप्त ॥६७॥
अध्याय ६८
श्री सनत्कुमार बोले-अब मैं गणेश के सकल कामनादायक मन्त्रों को बताऊँगा, जिनकी समाराधना
करके साधक भोग-मोक्ष को प्राप्त करता है । अव्यय, लक्ष्मी, पार्वती, कामदेव, स्मृति, मांस तथा इन्द्र रूप मन्त्र
से युक्त दुर्गा, चतुर्थी विभक्ति, गणपति, तोय, भुजंग और वरद पद को जोड़ने से जो मन्त्र बनता है, उसका
उच्चारण करके अंत में 'अमुकं जनं मे वशम् आनय' कहना चाहिए । इसके बाद 'स्वाहा ।' भी उसमें जोड़ना
चाहिए । इस प्रकार यह गणेश-मन्त्र अट्ठाईस अक्षरों का होता है । इस मन्त्र का मुनि गणक है, छंद निवृत-आदिक
गायत्री है, देवता गणेश है और इसका बीज गणेशादिक छठो शक्ति है । श्रीमान् महागणपति की प्रीति के लिए
इस मन्त्र का विनियोग किया जाता है ॥१-५॥
उत्तम साधक ऋषि का मस्तक पर, छंद का मुख में, देवता का हृदय में, बीज का गुह्य स्थान में और
शक्ति का दोनों चरणों में न्यास करे । छह दीर्घ मात्राओं से युक्त बीज मन्त्र से सामान्य न्यास करके मन्त्रवेत्ता जाति
(स्वर) युक्त षडंगों का बीज-मन्त्र से ही न्यास करे । फिर छह अंगों में शैवी षडंग मुद्रा का न्यास करना चाहिए ।
आदि में 'गां' जोड़कर भूर्लोक का दोनों चरणों से नाभि तक, आदि में 'गीं' जोड़कर भुवर्लोक का नाभि से कंठ तक