बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)
Brihan Naradiya Purana with Sanskrit & Hindi Commentary
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंचतुःषष्टितमोऽध्यायः ५५१
आलिंगितो मोहितश्च क्षुधार्तश्चातिदीप्तकः । अंगहीनोऽतिक्रु द्धश्चातिक्रू रो व्रीडितस्तथा ॥११८॥
प्रशांतमानसःस्थानभ्रष्टश्च विकलस्तथा । अतिवृद्धोऽतिनिःस्नेहः पीड़ितश्च तथा पुनः ॥११८॥
दोषा ह्येते समाख्याता वक्ष्याम्येषां च लक्षणम् । संयुक्तं वा वियुक्तं वा त्रिधा वा स्वरसंयुतम् ॥१२०॥
मनोर्यस्यादिमध्यांते वह्निबीजं तथोच्यते । चतुर्द्धा पञ्चधा वापि स मन्त्रश्छिन्नसंज्ञकः ॥१२१॥
मनोर्यस्यादिमध्यांते भूबीजद्वयमुच्यते । स तु रुद्धो मनुर्ज्ञेयो ह्यतिक्लेशेन सिद्धिदः ॥१२२॥
तारवर्मत्रया लक्ष्मीरेवं हीनस्तु यो मनुः । शक्तिहीनः स विज्ञेयश्चिरकालफलप्रदः ॥१२३॥
कामबीजं मुखं मायाह्यं ते चैवाङ्कुशं तथा । असौ पराङ्मुखो ज्ञेयो भजतां चिरसिद्धिदः ॥१२४॥
आदिमध्यावसानेषु सकारो दृश्यते यदि । स मन्त्रो बधिरः प्रोक्तः कष्टेनाल्पफलप्रदः ॥१२५॥
पञ्चार्णो यदि रेफार्काबंदुवर्जितविग्रहः । नेत्रहीनस्तु विज्ञेयः क्लेशेनापि न सिद्धिदः ॥१२६॥
आदिमध्यावसानेषु हंसः प्रासादवाग्भवौ । हंसेंदुर्वा सकारो वा फकारो वर्म वा पुनः ॥१२७॥
मात्रा नमामि च पदं नास्ति यस्मिन्स कीलितः । एवं मध्ये द्वयं मूर्ध्नि यस्मिन्नस्त्रलकारको ॥१२८॥
न विद्यंते स मंत्रस्तु स्तंभितः सिद्धिरोधकृत् । अग्निः पवनसंयुक्तो मनोर्यस्य तु मूर्द्धनि ॥१२६॥
स सार्णो दृश्यते यस्तु स मंत्रो दग्धसंज्ञकः । अस्त्रं द्वाभ्यां त्रिभिः षड्भिरष्टाभिदृ श्यतेऽक्षरैः ॥१३०॥
त्रस्तः स मंत्रो विज्ञेयो मुखे तारविवर्जितः । हकारः शक्तिरथवा भीतो मंत्रः स एव हि ॥१३१॥
मनोर्यस्यादिमध्यांते स्यान्मकारचतुष्टयम् । मलिनस्तु स विज्ञेयो ह्यतिक्लेशेन सिद्धिदः ॥१३२॥
घूमित, आलिंगित, मोहित, क्षुधार्त, अति दीप्तक, अंग हीन, अतिक्रूर, अतिक्रुद्ध, व्रीडित, प्रशान्तमानस,स्थान-
भ्रष्ट, विकल, अतिवृद्ध, अति निःस्नेह और पीडित इतने मन्त्र के दोष हैं, जिनके लक्षण आगे कहूँगा ॥११४-४९३॥
जिस मन्त्र के आदि, मध्य और अन्त में संयुक्त, वियुक्त और तीन भागों में विभक्त अथवा स्वर से संयुक्त हो
उसको वह्नि बीज (रं) कहते हैं। जिस मन्त्र के आदि मध्य और अन्त में वह्नि बीज हो अथवा चार प्रकार या
पांच प्रकार से वह विभक्त हो या वह्नि बीज हो उसको छिन्न कहते हैं ॥१२०-२१॥ जिस मन्त्र के आदि मध्य
और अन्त में दो भू बीज (लं) हो उसको रुद्ध मन्त्र कहते हैं और वह अत्यन्त क्लेश से सिद्धि प्रदान करता है
॥१२२॥ प्रणव और कवच (हूँ) ये तीन बार जिस मन्त्र में आये हों, वह लक्ष्मो युक्त होता है। ऐसी लक्ष्मी से
हीन जो मंत्र है उसे शक्ति हीन जानना चाहिए। वह चिरकाल में फल देने वाला होता है ॥१२३॥ जिस
मन्त्र के आदि में काम बीज (क्लीं), मध्य में माया बीज (ह्रीं) और अन्त में अङ्कुश बीज (क्रों) हो उस मन्त्र
को पराङ्मुख कहते हैं जो साधकों को चिरकाल में सिद्धि प्रदान करता है ॥१२४॥ जिस मन्त्र के आदि मध्य,
और अन्त में सकार हो उसको बधिर (कर्णहीन) कहते हैं और बहुत कष्ट उठाने पर भी स्वल्प फल देता है
॥१२५॥ पांच वणों वाला मन्त्र यदि रेफ, मकार और अनुस्वार से रहित हो तो उसको नेत्र हीन कहते हैं और वह
कष्ट उठाने पर भो सिद्धिप्रद नहीं होता ॥१२६॥ जिस मन्त्र के आदि, मध्य और अन्त में हंस, (सं) प्रासाद, तथा
वाग्बीज (ऐं) हो अथवा हंस और चन्द्रविन्दु या सकार फकार अथवा हूँ हो तथा जिसमें मा प्रा और नमामि पद
न हो वह मन्त्र कीलित माना गया है। इसी प्रकार जिसके मध्य में और अन्त वे दोनों पद न हों तथा जिसमें
फट् और लकार न हों उसको स्तंभित मन्त्र कहते हैं और वह सिद्धि में बाधा उत्पन्न करता है ॥१२७३॥ जिस मन्त्र
के अन्त में अग्नि (रं) बीज वायु (य) बीज के साथ हो तथा जो सात अक्षरों से युक्त हो, वह मन्त्र दग्ध है। जो
मन्त्र दो, तीन, छः और आठ अक्षरों के साथ अस्त्र (फट्) से युक्त हो तथा जिसके मुखभागमें प्रणवरहित हकार शक्ति
हो उसको त्रस्त कहते हैं। अथवा भोत मंत्र उसी को कहते हैं, जिस मंत्र के आदि मध्य और अन्त में चार मकार हों
उसको मलिन कहते हैं और उसको कष्टपूर्वक जप करने पर सिद्धि प्राप्त होती है ॥१२९-३२॥ जिस मन्त्र के मध्य