बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)
Brihan Naradiya Purana with Sanskrit & Hindi Commentary
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)
पृष्ठ 569, कुल 1008 में से
संदर्भ में पढ़ें५५० नारदीयपुराणम्
मननं सर्ववेदित्वं त्राणं संसार्यनुग्रहः । । मननात्त्राणधर्मत्वान्मंत्र इत्यभिधीयते ॥३॥
स्त्रीपुंनपुंसकात्मानस्ते मंत्रास्तु त्रिधा मताः । स्त्रीमंस्त्रास्तु द्विठांताःस्युः पुंमंत्रा हुं फडंतकाः ॥४॥
क्लीबाश्चैव नमोऽताः स्युर्मंत्राणां जातयः स्मृताः । पुंदैवतास्तु मन्त्राः स्युर्विद्याः स्त्रीदैवता मताः ॥५॥
षट्कर्मसु प्रशस्तास्ते मनवस्त्रिविधाः [पुनः । तारांत्यरेफः स्वाहास्तु त्वाग्नेयाः समीरिताः ॥६॥
सौम्यास्तु भृगुपीयूषबीजाढयाः कथिता मुने । अग्नीषोमात्मका ह्येवं मंत्रा ज्ञेया मनीषिभिः ॥७॥
बोधमायांति चाग्नेयाः श्वसने पिंगलाश्रिते । सौम्याश्चैव प्रबुध्यंते वामे वहति मारुतेः ॥८॥
सर्वे मंत्राः प्रबुध्यंते वायौ नाडिद्वयाश्रिते । स्वापकाले तु मन्त्रस्य जपोऽनर्थफलप्रदः ॥६॥
प्रत्येकं मन्त्रमुच्चार्य नाव्यानां तान्समुच्चरेत् । अनुलोमे बिंदुयुक्तान्विलोमे सर्गसंयुतान् ॥१०॥
जप्तो यदि स वै देवं प्रबुद्धः क्षिप्रसिद्धिदः । अनया मालया जप्तो दुष्टमन्त्रोऽपि सिद्ध्यति ॥११॥
क्रूरे कर्मणि चाग्नेयाः सौम्याः सौम्यफलप्रदाः । शांतज्ञानेति रौद्र्येशांतिजातिसमन्वितः ॥१२॥
शांतोऽपि रौद्रतामेति हुंफट्पल्लवियोजनात् । छिन्नादिदोषयुक्तास्ते नैव रक्षंति साधकम् ॥१३॥
छिन्नो रुद्धः शक्तिहीनस्ततश्चैव पराङ्मुखः । कर्णहीनो नेत्रहीनः कीलितः स्तंभितस्तथा ॥१४॥
दग्धः त्रस्तश्च भीतश्च मलिनश्च तिरस्कृतः । भेदितश्च सुषुप्तश्च मदोन्मत्तश्च मूर्च्छितः ॥१५॥
हतवीर्यो भ्रांतसंज्ञः प्रध्वस्तो बालकस्तथा । कुमारोऽथ युवा प्रौढो वृद्धो निस्त्रिंशकस्तथा ॥१६॥
निर्बीजः सिद्धिहीनश्च मंदः कूटो निरंशकः । सत्त्वहीनः केकरश्च बीजहीनश्च घूर्णितः ॥१७॥
मन्त्र बनता है। मनन का अर्थ सर्वज्ञत्व और त्राण का जीवों पर अनुग्रह करना है मनन और त्राण धर्म के कारण
ही इसका नाम मन्त्र पड़ा ॥३॥ उन मन्त्रों के स्त्री, पुरुष और नपुंसक तीन भेद हैं। दो ठ (स्वाहा) वाला मन्त्र
स्त्री मन्त्र है, 'हुँ' और 'फट्' जिसके अन्त में हों पुल्लिंग्ग मन्त्र हैं। नमः जिसके अन्त में हो वे मन्त्र नपुंसक हैं।
ये ही तीन मन्त्रों की जातियाँ हैं। मन्त्र पुंदैवत अर्थात् पुल्लिंग देवता वाले हैं और विद्यायें स्त्री दैवत हैं ॥४-५॥
ये तीन प्रकार के मन्त्र छः कर्मों में प्रशस्त (शुभ) माने जाते हैं। जिसमें प्रणवान्त रेफ (रां) और स्वाहा का प्रयोग
हो, वह मन्त्र आग्नेय कहा जाता है ॥६॥ मुने ! भृगु बीज (सं) और पीयूष (वं) से परिपूर्ण मन्त्र सौम्य मन्त्र हैं।
इस प्रकार मनीषियों ने मन्त्रों को अग्नि और सोमात्मक माना है ॥७॥ जब प्राण पिंगला नाड़ी में रहता है (अर्थात्
दाहिनी सांस चलती हो) तब आग्नेय मन्त्र सिद्ध होते हैं और वाम नाड़ी में प्राण के संचारित होने पर अर्थात्
बायीं सांस चलने पर सौम्य मन्त्र प्रबुद्ध होते हैं ॥८॥ सब मन्त्र दो नाड़ियों में प्राण के संचारित होने पर ही
जाग्रत होते हैं। मन्त्र के सोते समय उसका जप करने से मन्त्र अनर्थ कर देने वाला हो जाता है ॥९॥ प्रत्येक
मन्त्र का उच्चारण करते समय उनका श्वास रोककर उच्चारण न करे। अनुलोम में तो विन्दु (अनुस्वार) और
विलोम में विसर्ग संयुक्त मन्त्रों का उच्चारण करना चाहिए ॥१०॥ यदि इस विधि से देवों के मन्त्रों का जप किया
जाय तो शीघ्र सिद्धि हो जाती है। इस प्रकार की माला से जप करने पर दुष्ट मन्त्र भी सिद्ध हो जाते हैं ॥११॥
क्रूर कर्म (मारण, उच्चाटन आदि) में आग्नेय मन्त्र सिद्धि प्रद होते हैं और सौम्य कर्मों में (मोहन, वशीकरण) में
सौम्य मन्त्र फलप्रद होते हैं। शान्तिजाति से युक्त मन्त्र शान्त कर्मों में सिद्धिदायक होते हैं। शान्ति मन्त्र
भी 'हुँ फट्' आदि के जोड़ देने से रौद्र मन्त्र हो जाते हैं ॥१-१२३॥ परन्तु छिन्न आदि दोष से युक्त मन्त्र कभी
भी साधक के रक्षक नहीं होते हैं ॥१३॥ छिन्न, रुद्ध, शक्तिहीन, पराङ् मुख, कर्ण हीन, नेत्र हीन, कीलित,
स्तंभित, दग्ध, त्रस्त, भीत, मलिन, तिरस्कृत, भेदित, सुषुप्त, मदोन्मत्त, मूर्च्छित, हतवीर्य, भ्रांत, प्रध्वस्त, बालक,
कुमार, युवा, प्रौढ़, वृद्ध, निस्त्रिंशक, निर्बीज, सिद्धिहीन, मंदकूट, निरंशक, सत्त्वहीन, केकर, बीजहीन,