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सर्वकोश
ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य सहित)

ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य सहित)

Brahma Sutras with Shankara Bhashya - Gita Press

महर्षि बादरायण / आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: गीताप्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस गोरखपुर · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished417 पृष्ठ

पृष्ठ 87, कुल 417 में से

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पृष्ठ 87

६६ वेदान्त-दर्शन [ पाद ३
सर्वेषां तु स नामानि कर्माणि च पृथक् पृथक् ।
वेदशब्देभ्य एवादौ पृथक् संस्थाश्च निर्ममे ॥
( मनु० १ । २१ )
'उन सृष्टिकर्ता परमात्माने पहले सृष्टिके प्रारम्भमे सबके नाम और पृथक्-
पृथक् कर्म तथा उन सबकी अलग-अलग व्यवस्थाएँ भी वेदोक्त शब्दोके अनुसार
ही बनायीं ।'
सम्बन्ध—उपर्युक्त कथनको ही वेदकी नित्यतामे हेतु बतलाते हैं—
अतएव च नित्यत्वम् ॥ १ । ३ । २९ ॥
अतएव=इसीसे; नित्यत्वम्=वेदकी नित्यता; च=भी; ( सिद्ध होती है )।
व्याख्या—सृष्टिकर्त्ता परमेश्वर वैदिक शब्दोके अनुसार ही समस्त जगत्‌की
रचना करते हैं, यह कहा गया है। इससे वेदोकी नित्यता स्वतः सिद्ध हो जाती
है; क्योकि प्रत्येक कल्पमे परमेश्वरद्वारा वेदोकी भी नयी रचना की जाती है;
यह बात कहीं नहीं कही गयी है।
सम्बन्ध—प्रत्येक कल्पमें देवताओके नाम-रूप बदल जानेके कारण वेदोक्त
शब्दोंकी नित्यतामें विरोध कैसे नही आयेगा ? इस जिज्ञासापर कहते है—
समाननामरूपत्वाच्चावृत्तावप्यविरोधो दर्शनात्
स्मृतेश्च ॥ १ । ३ । ३० ॥
च=तथा; समाननामरूपत्वात्=( कल्पान्तरमे उत्पन्न होनेवाले देवादिको-
के ) नाम-रूप पहलेके ही समान होते है, इस कारण; आवृत्तौ=पुनः आवृत्ति
होनेपर; अपि=भी; अविरोधः=किसी प्रकारका विरोध नहीं है; दर्शनात्=
क्योकि ( श्रुतिमे ) ऐसा ही वर्णन देखा गया है; च=और; स्मृतेः=स्मृतिसे
भी ( यही बात सिद्ध होती है )।
व्याख्या—वेदमें यह कहा गया है कि 'सूर्याचन्द्रमसौ धाता यथापूर्वम-
कल्पयत् ।' ( ऋ० १० । १९० । ३ ) अर्थात् 'जगत्-स्रष्टा परमेश्वरने सूर्य,
चन्द्रमा आदि सबको पहलेकी भाँति बनाया।' श्वेताश्वतरोपनिषद् ( ६ । १८ )
मे इस प्रकार वर्णन आता है—
यो ब्रह्माणं विदधाति पूर्वं यो वै वेदांश्च प्रहिणोति तस्मै ।
त५ह देवमात्मबुद्धिप्रकाशं मुमुक्षुर्वै शरणमहं प्रपद्ये ॥