ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य सहित)
Brahma Sutras with Shankara Bhashya - Gita Press
महर्षि बादरायण / आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: गीताप्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस गोरखपुर · 1950 (उद्गम)
पृष्ठ 84, कुल 417 में से
संदर्भ में पढ़ेंसूत्र २४—२६ ] अध्याय १ ६३
सम्बन्ध—अब यह जिज्ञासा होती है कि उस परब्रह्म परमात्माको अङ्गुष्ठके
बराबर मापवाला क्यों बताया गया है ? इसपर कहते हैं—
हृद्यपेक्षया तु मनुष्याधिकारत्वात् ॥ १ । ३ । २५ ॥
तु=उस परमपुरुषको अङ्गुष्ठके बराबर मापवाला कहना तो; हृदि=
हृदयमे स्थित बताये जानेकी; अपेक्षया=अपेक्षासे है; मनुष्याधिकारत्वात्=
क्योकि ( ब्रह्मविद्यामे ) मनुष्यका ही अधिकार है ।
व्याख्या—उपनिषदोंमे वर्णित ब्रह्मविद्याके द्वारा ब्रह्मको जाननेका अधिकार
मनुष्यको ही है । अन्य पशु-पक्षी आदि अधम योनियोंमे यह जीवात्मा उस
परब्रह्म परमात्माको नहीं जान सकता और मनुष्यके हृदयका माप अङ्गुष्ठके बराबर
माना गया है; इस कारण यहाँ मनुष्य-हृदयके मापकी अपेक्षासे उस परब्रह्म
परमेश्वरको 'अङ्गुष्ठमात्र पुरुष' कहा गया है ।
सम्बन्ध—पूर्वसूत्रमें अधिकारकी बात आ जानेसे प्रसङ्गवश दूसरा प्रकरण
चल पड़ा । पहले यह बताया गया है कि वेदाध्ययनपूर्वक ब्रह्मविद्याके द्वारा
ब्रह्मको प्राप्त करनेका अधिकार मनुष्योंका ही है । इसपर यह जिज्ञासा होती है
कि क्या मनुष्यको छोड़कर अन्य किसीका भी अधिकार नहीं है ? इसपर
कहते हैं—
तदुपर्यपि बादरायणः संभवात् ॥ १ । ३ । २६ ॥
बादरायणः=आचार्य बादरायण कहते है कि; तदुपरि=मनुष्यसे ऊपर
जो देवता आदि हैं, उनका; अपि=भी ( अधिकार है ), संभवात्=क्योकि
उन्हें वेद-ज्ञानपूर्वक ब्रह्मज्ञान होना संभव है ।
व्याख्या—मनुष्यसे नीचेकी योनियोमे तो वेदविद्याको पढ़ने तथा उसके
द्वारा परमात्म-ज्ञान प्राप्त करनेकी सामर्थ्य ही नहीं है, इसलिये उनका अधिकार
न बतलाना तो उचित ही है । परन्तु देवादि योनि मनुष्ययोनिसे ऊपर है ।
जो मनुष्य धर्म तथा ज्ञानमे श्रेष्ठ होते हैं, उन्हींको देवादि योनि प्राप्त होती है ।
अतः उनमे पूर्वजन्मके अभ्याससे ब्रह्मविद्याको जाननेकी सामर्थ्य होती ही है ।
अतएव साधन करनेपर उन्हे ब्रह्मका ज्ञान होना सम्भव है । इसलिये भगवान्
बादरायणका कहना है कि मनुष्योंसे ऊपरवाली योनियोंमे भी ब्रह्मज्ञान प्राप्त
करनेका अधिकार है ।