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सर्वकोश
ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य सहित)

ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य सहित)

Brahma Sutras with Shankara Bhashya - Gita Press

महर्षि बादरायण / आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: गीताप्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस गोरखपुर · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished417 पृष्ठ

पृष्ठ 50, कुल 417 में से

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सूत्र ९-११ ] अध्याय १ २९
दो भोक्ताओंका वर्णन है। यदि परमात्मा कर्मफलका भोक्ता नहीं है तो उक्त दो
भोक्ता कौन-कौन-से हैं ? इसपर कहते हैं-
गुहां प्रविष्टावात्मानौ हि तद्दर्शनात् ॥ १ । २ । ११ ॥
गुहाम्=हृदयरूप गुहामें; प्रविष्टौ=प्रविष्ट हुए दोनो; आत्मानौ=जीवात्मा
और परमात्मा; हि=ही हैं; तद्दर्शनात्=क्योंकि ( दूसरी श्रुतिमें भी ) ऐसा ही
देखा जाता है।
व्याख्या-कठोपनिषद् ( १ । ३ । १ ) मे कहा है 'ऋतं पिबन्तौ सुकृतस्य
लोके गुहां प्रविष्टौ परमे परार्धे । छायातपौ ब्रह्मविदो वदन्ति पञ्चाग्नयो ये च
त्रिणाचिकेताः ।।' अर्थात् 'शुभ कर्मोंके फलरूप मनुष्य-शरीरके भीतर परब्रह्मके
उत्तम निवास-स्थान ( हृदयाकाश ) मे बुद्धिरूप गुहामे छिपे हुए तथा 'सत्य' का
पान करनेवाले दो हैं, वे दोनों छाया और धूपकी भाँति परस्पर विरुद्ध स्वभाववाले
हैं। यह बात ब्रह्मवेत्ता ज्ञानी कहते हैं। तथा जो तीन बार नाचिकेत अग्निका
चयन करनेवाले पञ्चाग्नि-सम्पन्न गृहस्थ हैं, वे भी कहते हैं।' इस मन्त्रमे कहे
हुए दोनो भोक्ता जीवात्मा और परमात्मा ही हैं। उन्हींका वर्णन छाया और
धूपके रूपमें हुआ है। परमात्मा सर्वज्ञ, पूर्ण ज्ञानस्वरूप एवं स्वप्रकाश है, अतः
उसका धूपके नामसे वर्णन किया गया है। और जीवात्मा अल्पज्ञ है। उसमे
जो कुछ स्वल्प ज्ञान है, वह भी परमात्माका ही है। जैसे छायामे जो थोड़ा
प्रकाश होता है, वह धूपका ही अंग होता है। इसलिये जीवात्माको छायाके नाम-
से कहा गया है। दूसरी श्रुतिमे भी जीवात्मा और परमात्माका एक साथ मनुष्य-शरीर-
मे प्रविष्ट होना इस प्रकार कहा है-'सेयं देवतैक्षत हन्ताहमिमास्तिस्रो देवता अनेन
जीवेनात्मनानुप्रविश्य नामरूपे व्याकरवाणि' ( छा० उ० ६ । ३ । २ ) अर्थात्
'उस देवता ( परमात्मा ) ने ईक्षण ( सङ्कल्प ) किया कि मै इस जीवात्माके
सहित इन तेज आदि तीनों देवताओमे अर्थात् इनके कार्यरूप शरीरमे प्रविष्ट
होकर नाम और रूपको प्रकट करूँ।' इससे भी यही सिद्ध होता है कि उपर्युक्त
कठोपनिषद्‌के मन्त्रमे कहे हुए छाया और धूप सदृश दो भोक्ता जीवात्मा और
परमात्मा ही हैं। यहाँ जो जीवात्माके साथ-साथ परमात्माको सत्य अर्थात् श्रेष्ठ
कर्मोंके फलका भोगनेवाला बताया गया है, उसका यह भाव है कि परब्रह्म
परमेश्वर ही समस्त देवता आदिके रूपमे प्रकारान्तरसे समस्त यज्ञ और तपरूप